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उत्पत्ति 1:1 ¶ आदि में परमेश्‍वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। (IN)

उत्पत्ति 1:2 पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अंधियारा था; तथा परमेश्‍वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डराता था। (IN)

उत्पत्ति 1:3 ¶ तब परमेश्‍वर ने कहा, “उजियाला हो,” तो उजियाला हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:4 और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अंधियारे से अलग किया। (IN)

उत्पत्ति 1:5 और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अंधियारे को रात कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:6 ¶ फिर परमेश्‍वर ने कहा, “जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।” (IN)

उत्पत्ति 1:7 तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग-अलग किया; और वैसा ही हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:8 और परमेश्‍वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:9 ¶ फिर परमेश्‍वर ने कहा, “आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे,” और वैसा ही हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:10 और परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा; और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। (IN)

उत्पत्ति 1:11 फिर परमेश्‍वर ने कहा, “पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे-छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक-एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगें,” और वैसा ही हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:12 इस प्रकार पृथ्वी से हरी घास, और छोटे-छोटे पेड़ जिनमें अपनी-अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज एक-एक की जाति के अनुसार उन्हीं में होते हैं उगें; और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। (IN)

उत्पत्ति 1:13 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:14 ¶ फिर परमेश्‍वर ने कहा, “दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियों हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षों के कारण हों; (IN)

उत्पत्ति 1:15 और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें,” और वैसा ही हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:16 तब परमेश्‍वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनाईं; उनमें से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया; और तारागण को भी बनाया। (IN)

उत्पत्ति 1:17 परमेश्‍वर ने उनको आकाश के अन्तर में इसलिए रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, (IN)

उत्पत्ति 1:18 तथा दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अंधियारे से अलग करें; और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। (IN)

उत्पत्ति 1:19 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौथा दिन हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:20 ¶ फिर परमेश्‍वर ने कहा, “जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।” (IN)

उत्पत्ति 1:21 इसलिए परमेश्‍वर ने जाति-जाति के बड़े-बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते-फिरते हैं जिनसे जल बहुत ही भर गया और एक-एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्टि की; और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। (IN)

उत्पत्ति 1:22 परमेश्‍वर ने यह कहकर उनको आशीष दी, “फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें।” (IN)

उत्पत्ति 1:23 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पाँचवाँ दिन हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:24 ¶ फिर परमेश्‍वर ने कहा, “पृथ्वी से एक-एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वन पशु, जाति-जाति के अनुसार उत्‍पन्‍न हों,” और वैसा ही हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:25 इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति-जाति के वन-पशुओं को, और जाति-जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति-जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया; और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। (IN)

उत्पत्ति 1:26 फिर परमेश्‍वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।” (IN)

उत्पत्ति 1:27 तब परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्‍पन्‍न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्‍वर ने उसको उत्‍पन्‍न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। (IN)

उत्पत्ति 1:28 और परमेश्‍वर ने उनको आशीष दी; और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुंद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।” (IN)

उत्पत्ति 1:29 फिर परमेश्‍वर ने उनसे कहा, “सुनो, जितने बीजवाले छोटे-छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैंने तुमको दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं; (IN)

उत्पत्ति 1:30 और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले जन्तु हैं, जिनमें जीवन का प्राण हैं, उन सबके खाने के लिये मैंने सब हरे-हरे छोटे पेड़ दिए हैं,” और वैसा ही हो गया। (IN)

उत्पत्ति 1:31 तब परमेश्‍वर ने जो कुछ बनाया था, सबको देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवाँ दिन हो गया। (IN)

उत्पत्ति 2:1 ¶ इस तरह आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया। (IN)

उत्पत्ति 2:2 और परमेश्‍वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया, और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया। (IN)

उत्पत्ति 2:3 और परमेश्‍वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया। (IN)

उत्पत्ति 2:4 आकाश और पृथ्वी की उत्पत्ति का वृत्तान्त यह है कि जब वे उत्‍पन्‍न हुए अर्थात् जिस दिन यहोवा परमेश्‍वर ने पृथ्वी और आकाश को बनाया। (IN)

उत्पत्ति 2:5 तब मैदान का कोई पौधा भूमि पर न था, और न मैदान का कोई छोटा पेड़ उगा था, क्योंकि यहोवा परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जल नहीं बरसाया था, और भूमि पर खेती करने के लिये मनुष्य भी नहीं था। (IN)

उत्पत्ति 2:6 लेकिन कुहरा पृथ्वी से उठता था जिससे सारी भूमि सिंच जाती थी। (IN)

उत्पत्ति 2:7 ¶ तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्‍वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया। (IN)

उत्पत्ति 2:8 और यहोवा परमेश्‍वर ने पूर्व की ओर, अदन में एक वाटिका लगाई; और वहाँ आदम को जिसे उसने रचा था, रख दिया। (IN)

उत्पत्ति 2:9 और यहोवा परमेश्‍वर ने भूमि से सब भाँति के वृक्ष, जो देखने में मनोहर और जिनके फल खाने में अच्छे हैं, उगाए, और वाटिका के बीच में जीवन के वृक्ष को और भले या बुरे के ज्ञान के वृक्ष को भी लगाया। (IN)

उत्पत्ति 2:10 उस वाटिका को सींचने के लिये एक महानदी अदन से निकली और वहाँ से आगे बहकर चार नदियों में बँट गई। (IN)

उत्पत्ति 2:11 पहली नदी का नाम पीशोन है, यह वही है जो हवीला नाम के सारे देश को जहाँ सोना मिलता है घेरे हुए है। (IN)

उत्पत्ति 2:12 उस देश का सोना उत्तम होता है; वहाँ मोती और सुलैमानी पत्थर भी मिलते हैं। (IN)

उत्पत्ति 2:13 और दूसरी नदी का नाम गीहोन है; यह वही है जो कूश के सारे देश को घेरे हुए है। (IN)

उत्पत्ति 2:14 और तीसरी नदी का नाम हिद्देकेल है; यह वही है जो अश्शूर के पूर्व की ओर बहती है। और चौथी नदी का नाम फरात है। (IN)

उत्पत्ति 2:15 तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे। (IN)

उत्पत्ति 2:16 और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को यह आज्ञा दी, “तू वाटिका के किसी भी वृक्षों का फल खा सकता है; (IN)

उत्पत्ति 2:17 पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 2:18 ¶ फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उसके लिये उपयुक्‍त होगा।” (IN)

उत्पत्ति 2:19 और यहोवा परमेश्‍वर भूमि में से सब जाति के जंगली पशुओं, और आकाश के सब भाँति के पक्षियों को रचकर आदम के पास ले आया कि देखे, कि वह उनका क्या-क्या नाम रखता है; और जिस-जिस जीवित प्राणी का जो-जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया। (IN)

उत्पत्ति 2:20 अतः आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पक्षियों, और सब जाति के जंगली पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिये कोई ऐसा सहायक न मिला जो उससे मेल खा सके। (IN)

उत्पत्ति 2:21 तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को गहरी नींद में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उसने उसकी एक पसली निकालकर उसकी जगह माँस भर दिया। (IN)

उत्पत्ति 2:22 और यहोवा परमेश्‍वर ने उस पसली को जो उसने आदम में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। (IN)

उत्पत्ति 2:23 तब आदम ने कहा, “अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे माँस में का माँस है; इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।” (IN)

उत्पत्ति 2:24 इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्‍नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बने रहेंगे। (IN)

उत्पत्ति 2:25 आदम और उसकी पत्‍नी दोनों नंगे थे, पर वे लज्‍जित न थे। (IN)

उत्पत्ति 3:1 ¶ यहोवा परमेश्‍वर ने जितने जंगली पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्त्री से कहा, “क्या सच है, कि परमेश्‍वर ने कहा, 'तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना'?” (IN)

उत्पत्ति 3:2 स्त्री ने सर्प से कहा, “इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं; (IN)

उत्पत्ति 3:3 पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्‍वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न ही उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।” (IN)

उत्पत्ति 3:4 तब सर्प ने स्त्री से कहा, “तुम निश्चय न मरोगे (IN)

उत्पत्ति 3:5 वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।” (IN)

उत्पत्ति 3:6 अतः जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उसमें से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, जो उसके साथ था और उसने भी खाया। (IN)

उत्पत्ति 3:7 तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़-जोड़कर लंगोट बना लिये। (IN)

उत्पत्ति 3:8 ¶ तब यहोवा परमेश्‍वर, जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था, उसका शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्‍नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए। (IN)

उत्पत्ति 3:9 तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, “तू कहाँ है?” (IN)

उत्पत्ति 3:10 उसने कहा, “मैं तेरा शब्द वाटिका में सुनकर डर गया, क्योंकि मैं नंगा था; इसलिए छिप गया।” (IN)

उत्पत्ति 3:11 यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “किसने तुझे बताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैंने तुझे मना किया था, क्या तूने उसका फल खाया है?” (IN)

उत्पत्ति 3:12 आदम ने कहा, “जिस स्त्री को तूने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया।” (IN)

उत्पत्ति 3:13 तब यहोवा परमेश्‍वर ने स्त्री से कहा, “तूने यह क्या किया है?” स्त्री ने कहा, “सर्प ने मुझे बहका दिया, तब मैंने खाया।” (IN)

उत्पत्ति 3:14 तब यहोवा परमेश्‍वर ने सर्प से कहा, “तूने जो यह किया है इसलिए तू सब घरेलू पशुओं, और सब जंगली पशुओं से अधिक श्रापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा; (IN)

उत्पत्ति 3:15 और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्‍पन्‍न करूँगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” (IN)

उत्पत्ति 3:16 फिर स्त्री से उसने कहा, “मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बच्चे उत्‍पन्‍न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” (IN)

उत्पत्ति 3:17 और आदम से उसने कहा, “तूने जो अपनी पत्‍नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तूने खाया है, इसलिए भूमि तेरे कारण श्रापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगा; (IN)

उत्पत्ति 3:18 और वह तेरे लिये काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा; (IN)

उत्पत्ति 3:19 और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 3:20 आदम ने अपनी पत्‍नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की मूलमाता वही हुई। (IN)

उत्पत्ति 3:21 और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्‍नी के लिये चमड़े के वस्‍त्र बनाकर उनको पहना दिए। (IN)

उत्पत्ति 3:22 फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है: इसलिए अब ऐसा न हो, कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़ कर खा ले और सदा जीवित रहे।” (IN)

उत्पत्ति 3:23 इसलिए यहोवा परमेश्‍वर ने उसको अदन की वाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिसमें से वह बनाया गया था। (IN)

उत्पत्ति 3:24 इसलिए आदम को उसने निकाल दिया और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की वाटिका के पूर्व की ओर करूबों को, और चारों ओर घूमनेवाली अग्निमय तलवार को भी नियुक्त कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 4:1 ¶ जब आदम अपनी पत्‍नी हव्वा के पास गया तब उसने गर्भवती होकर कैन को जन्म दिया और कहा, “मैंने यहोवा की सहायता से एक पुत्र को जन्म दिया है।” (IN)

उत्पत्ति 4:2 फिर वह उसके भाई हाबिल को भी जन्मी, हाबिल तो भेड़-बकरियों का चरवाहा बन गया, परन्तु कैन भूमि की खेती करनेवाला किसान बना। (IN)

उत्पत्ति 4:3 कुछ दिनों के पश्चात् कैन यहोवा के पास भूमि की उपज में से कुछ भेंट ले आया। (IN)

उत्पत्ति 4:4 और हाबिल भी अपनी भेड़-बकरियों के कई एक पहलौठे बच्चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, (IN)

उत्पत्ति 4:5 परन्तु कैन और उसकी भेंट को उसने ग्रहण न किया। तब कैन अति क्रोधित हुआ, और उसके मुँह पर उदासी छा गई। (IN)

उत्पत्ति 4:6 तब यहोवा ने कैन से कहा, “तू क्यों क्रोधित हुआ? और तेरे मुँह पर उदासी क्यों छा गई है? (IN)

उत्पत्ति 4:7 यदि तू भला करे, तो क्या तेरी भेंट ग्रहण न की जाएगी? और यदि तू भला न करे, तो पाप द्वार पर छिपा रहता है, और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है।” (IN)

उत्पत्ति 4:8 तब कैन ने अपने भाई हाबिल से कुछ कहा; और जब वे मैदान में थे, तब कैन ने अपने भाई हाबिल पर चढ़कर उसकी हत्‍या कर दी। (IN)

उत्पत्ति 4:9 तब यहोवा ने कैन से पूछा, “तेरा भाई हाबिल कहाँ है?” उसने कहा, “मालूम नहीं; क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?” (IN)

उत्पत्ति 4:10 उसने कहा, “तूने क्या किया है? तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दुहाई दे रहा है! (IN)

उत्पत्ति 4:11 इसलिए अब भूमि जिसने तेरे भाई का लहू तेरे हाथ से पीने के लिये अपना मुँह खोला है, उसकी ओर से तू श्रापित है। (IN)

उत्पत्ति 4:12 चाहे तू भूमि पर खेती करे, तो भी उसकी पूरी उपज फिर तुझे न मिलेगी, और तू पृथ्वी पर भटकने वाला और भगोड़ा होगा।” (IN)

उत्पत्ति 4:13 तब कैन ने यहोवा से कहा, “मेरा दण्ड असहनीय है। (IN)

उत्पत्ति 4:14 देख, तूने आज के दिन मुझे भूमि पर से निकाला है और मैं तेरी दृष्टि की आड़ में रहूँगा और पृथ्वी पर भटकने वाला और भगोड़ा रहूँगा; और जो कोई मुझे पाएगा, मेरी हत्‍या करेगा।” (IN)

उत्पत्ति 4:15 इस कारण यहोवा ने उससे कहा, “जो कोई कैन की हत्‍या करेगा उससे सात गुणा पलटा लिया जाएगा।” और यहोवा ने कैन के लिये एक चिन्ह ठहराया ऐसा न हो कि कोई उसे पाकर मार डाले। (IN)

उत्पत्ति 4:16 ¶ तब कैन यहोवा के सम्मुख से निकल गया और नोद नामक देश में, जो अदन के पूर्व की ओर है, रहने लगा। (IN)

उत्पत्ति 4:17 जब कैन अपनी पत्‍नी के पास गया तब वह गर्भवती हुई और हनोक को जन्म दिया; फिर कैन ने एक नगर बसाया और उस नगर का नाम अपने पुत्र के नाम पर हनोक रखा। (IN)

उत्पत्ति 4:18 हनोक से ईराद उत्‍पन्‍न हुआ, और ईराद से महूयाएल उत्‍पन्‍न हुआ और महूयाएल से मतूशाएल, और मतूशाएल से लेमेक उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 4:19 लेमेक ने दो स्त्रियाँ ब्याह लीं: जिनमें से एक का नाम आदा और दूसरी का सिल्ला है। (IN)

उत्पत्ति 4:20 आदा ने याबाल को जन्म दिया। वह उन लोगों का पिता था जो तम्बूओं में रहते थे और पशुओं का पालन करके जीवन निर्वाह करते थे। (IN)

उत्पत्ति 4:21 उसके भाई का नाम यूबाल था : वह उन लोगों का पिता था जो वीणा और बाँसुरी बजाते थे। (IN)

उत्पत्ति 4:22 और सिल्ला ने भी तूबल-कैन नामक एक पुत्र को जन्म दिया: वह पीतल और लोहे के सब धारवाले हथियारों का गढ़नेवाला हुआ। और तूबल-कैन की बहन नामाह थी। (IN)

उत्पत्ति 4:23 लेमेक ने अपनी पत्नियों से कहा, (IN)

उत्पत्ति 4:24 जब कैन का पलटा सातगुणा लिया जाएगा। (IN)

उत्पत्ति 4:25 ¶ और आदम अपनी पत्‍नी के पास फिर गया; और उसने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम यह कहकर शेत रखा कि “परमेश्‍वर ने मेरे लिये हाबिल के बदले, जिसको कैन ने मारा था, एक और वंश प्रदान किया।” (IN)

उत्पत्ति 4:26 और शेत के भी एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ और उसने उसका नाम एनोश रखा। उसी समय से लोग यहोवा से प्रार्थना करने लगे। (IN)

उत्पत्ति 5:1 ¶ आदम की वंशावली यह है। जब परमेश्‍वर ने मनुष्य की सृष्टि की तब अपने ही स्वरूप में उसको बनाया। (IN)

उत्पत्ति 5:2 उसने नर और नारी करके मनुष्यों की सृष्टि की और उन्हें आशीष दी, और उनकी सृष्टि के दिन उनका नाम आदम रखा। (IN)

उत्पत्ति 5:3 जब आदम एक सौ तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा उसकी समानता में उस ही के स्वरूप के अनुसार एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। उसने उसका नाम शेत रखा। (IN)

उत्पत्ति 5:4 और शेत के जन्म के पश्चात् आदम आठ सौ वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:5 इस प्रकार आदम की कुल आयु नौ सौ तीस वर्ष की हुई, तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:6 जब शेत एक सौ पाँच वर्ष का हुआ, उससे एनोश उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 5:7 एनोश के जन्म के पश्चात् शेत आठ सौ सात वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:8 इस प्रकार शेत की कुल आयु नौ सौ बारह वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:9 जब एनोश नब्बे वर्ष का हुआ, तब उसने केनान को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:10 केनान के जन्म के पश्चात् एनोश आठ सौ पन्द्रह वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:11 इस प्रकार एनोश की कुल आयु नौ सौ पाँच वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:12 जब केनान सत्तर वर्ष का हुआ, तब उसने महललेल को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:13 महललेल के जन्म के पश्चात् केनान आठ सौ चालीस वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:14 इस प्रकार केनान की कुल आयु नौ सौ दस वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:15 जब महललेल पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उसने येरेद को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:16 येरेद के जन्म के पश्चात् महललेल आठ सौ तीस वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:17 इस प्रकार महललेल की कुल आयु आठ सौ पंचानबे वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:18 जब येरेद एक सौ बासठ वर्ष का हुआ, जब उसने हनोक को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:19 हनोक के जन्म के पश्चात् येरेद आठ सौ वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:20 इस प्रकार येरेद की कुल आयु नौ सौ बासठ वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:21 जब हनोक पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उसने मतूशेलह को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:22 मतूशेलह के जन्म के पश्चात् हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:23 इस प्रकार हनोक की कुल आयु तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई। (IN)

उत्पत्ति 5:24 हनोक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्‍वर ने उसे उठा लिया। (IN)

उत्पत्ति 5:25 जब मतूशेलह एक सौ सत्तासी वर्ष का हुआ, तब उसने लेमेक को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:26 लेमेक के जन्म के पश्चात् मतूशेलह सात सौ बयासी वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:27 इस प्रकार मतूशेलह की कुल आयु नौ सौ उनहत्तर वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:28 जब लेमेक एक सौ बयासी वर्ष का हुआ, तब उसने एक पुत्र जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 5:29 उसने यह कहकर उसका नाम नूह रखा, कि “यहोवा ने जो पृथ्वी को श्राप दिया है, उसके विषय यह लड़का हमारे काम में, और उस कठिन परिश्रम में जो हम करते हैं, हमें शान्ति देगा।” (IN)

उत्पत्ति 5:30 नूह के जन्म के पश्चात् लेमेक पाँच सौ पंचानबे वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 5:31 इस प्रकार लेमेक की कुल आयु सात सौ सतहत्तर वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 5:32 और नूह पाँच सौ वर्ष का हुआ; और नूह ने शेम, और हाम और येपेत को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 6:1 ¶ फिर जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढ़ने लगे, और उनके बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं, (IN)

उत्पत्ति 6:2 तब परमेश्‍वर के पुत्रों ने मनुष्य की पुत्रियों को देखा, कि वे सुन्दर हैं; और उन्होंने जिस-जिस को चाहा उनसे ब्याह कर लिया। (IN)

उत्पत्ति 6:3 तब यहोवा ने कहा, “मेरा आत्मा मनुष्‍य में सदा के लिए निवास न करेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है; उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।” (IN)

उत्पत्ति 6:4 उन दिनों में पृथ्वी पर दानव रहते थे; और इसके पश्चात् जब परमेश्‍वर के पुत्र मनुष्य की पुत्रियों के पास गए तब उनके द्वारा जो सन्तान उत्‍पन्‍न हुए, वे पुत्र शूरवीर होते थे, जिनकी कीर्ति प्राचीनकाल से प्रचलित है। (IN)

उत्पत्ति 6:5 ¶ यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्‍पन्‍न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। (IN)

उत्पत्ति 6:6 और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। (IN)

उत्पत्ति 6:7 तब यहोवा ने कहा, “मैं मनुष्य को जिसकी मैंने सृष्टि की है पृथ्वी के ऊपर से मिटा दूँगा; क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगनेवाले जन्तु, क्या आकाश के पक्षी, सब को मिटा दूँगा, क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 6:8 ¶ परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही। (IN)

उत्पत्ति 6:9 नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था; और नूह परमेश्‍वर ही के साथ-साथ चलता रहा। (IN)

उत्पत्ति 6:10 और नूह से शेम, और हाम, और येपेत नामक, तीन पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 6:11 उस समय पृथ्वी परमेश्‍वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। (IN)

उत्पत्ति 6:12 और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपनी-अपनी चाल-चलन बिगाड़ ली थी। (IN)

उत्पत्ति 6:13 तब परमेश्‍वर ने नूह से कहा, “सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिए मैं उनको पृथ्वी समेत नाश कर डालूँगा। (IN)

उत्पत्ति 6:14 इसलिए तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उसमें कोठरियाँ बनाना, और भीतर-बाहर उस पर राल लगाना। (IN)

उत्पत्ति 6:15 इस ढंग से तू उसको बनाना: जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊँचाई तीस हाथ की हो। (IN)

उत्पत्ति 6:16 जहाज में एक खिड़की बनाना, और उसके एक हाथ ऊपर से उसकी छत बनाना, और जहाज की एक ओर एक द्वार रखना, और जहाज में पहला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना। (IN)

उत्पत्ति 6:17 और सुन, मैं आप पृथ्वी पर जल-प्रलय करके सब प्राणियों को, जिनमें जीवन का श्‍वास है, आकाश के नीचे से नाश करने पर हूँ; और सब जो पृथ्वी पर हैं मर जाएँगे। (IN)

उत्पत्ति 6:18 परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिए तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। (IN)

उत्पत्ति 6:19 और सब जीवित प्राणियों में से, तू एक-एक जाति के दो-दो, अर्थात् एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। (IN)

उत्पत्ति 6:20 एक-एक जाति के पक्षी, और एक-एक जाति के पशु, और एक-एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो-दो तेरे पास आएँगे, कि तू उनको जीवित रखे। (IN)

उत्पत्ति 6:21 और भाँति-भाँति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपने पास इकट्ठा कर रखना; जो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा।” (IN)

उत्पत्ति 6:22 परमेश्‍वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया। (IN)

उत्पत्ति 7:1 ¶ तब यहोवा ने नूह से कहा, “तू अपने सारे घराने समेत जहाज में जा; क्योंकि मैंने इस समय के लोगों में से केवल तुझी को अपनी दृष्टि में धर्मी पाया है। (IN)

उत्पत्ति 7:2 सब जाति के शुद्ध पशुओं में से तो तू सात-सात जोड़े, अर्थात् नर और मादा लेना: पर जो पशु शुद्ध नहीं हैं, उनमें से दो-दो लेना, अर्थात् नर और मादा: (IN)

उत्पत्ति 7:3 और आकाश के पक्षियों में से भी, सात-सात जोड़े, अर्थात् नर और मादा लेना, कि उनका वंश बचकर सारी पृथ्वी के ऊपर बना रहे। (IN)

उत्पत्ति 7:4 क्योंकि अब सात दिन और बीतने पर मैं पृथ्वी पर चालीस दिन और चालीस रात तक जल बरसाता रहूँगा; और जितने प्राणी मैंने बनाये हैं उन सबको भूमि के ऊपर से मिटा दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 7:5 यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया। (IN)

उत्पत्ति 7:6 नूह की आयु छः सौ वर्ष की थी, जब जल-प्रलय पृथ्वी पर आया। (IN)

उत्पत्ति 7:7 नूह अपने पुत्रों, पत्‍नी और बहुओं समेत, जल-प्रलय से बचने के लिये जहाज में गया। (IN)

उत्पत्ति 7:8 शुद्ध, और अशुद्ध दोनों प्रकार के पशुओं में से, पक्षियों, (IN)

उत्पत्ति 7:9 और भूमि पर रेंगनेवालों में से भी, दो-दो, अर्थात् नर और मादा, जहाज में नूह के पास गए, जिस प्रकार परमेश्‍वर ने नूह को आज्ञा दी थी। (IN)

उत्पत्ति 7:10 सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा। (IN)

उत्पत्ति 7:11 ¶ जब नूह की आयु के छः सौवें वर्ष के दूसरे महीने का सत्रहवाँ दिन आया; उसी दिन बड़े गहरे समुद्र के सब सोते फूट निकले और आकाश के झरोखे खुल गए। (IN)

उत्पत्ति 7:12 और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर होती रही। (IN)

उत्पत्ति 7:13 ठीक उसी दिन नूह अपने पुत्र शेम, हाम, और येपेत, और अपनी पत्‍नी, और तीनों बहुओं समेत, (IN)

उत्पत्ति 7:14 और उनके संग एक-एक जाति के सब जंगली पशु, और एक-एक जाति के सब घरेलू पशु, और एक-एक जाति के सब पृथ्वी पर रेंगनेवाले, और एक-एक जाति के सब उड़नेवाले पक्षी, जहाज में गए। (IN)

उत्पत्ति 7:15 जितने प्राणियों में जीवन का श्‍वास थी उनकी सब जातियों में से दो-दो नूह के पास जहाज में गए। (IN)

उत्पत्ति 7:16 और जो गए, वह परमेश्‍वर की आज्ञा के अनुसार सब जाति के प्राणियों में से नर और मादा गए। तब यहोवा ने जहाज का द्वार बन्द कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 7:17 पृथ्वी पर चालीस दिन तक जल-प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़ता ही गया, जिससे जहाज ऊपर को उठने लगा, और वह पृथ्वी पर से ऊँचा उठ गया। (IN)

उत्पत्ति 7:18 जल बढ़ते-बढ़ते पृथ्वी पर बहुत ही बढ़ गया, और जहाज जल के ऊपर-ऊपर तैरता रहा। (IN)

उत्पत्ति 7:19 जल पृथ्वी पर अत्यन्त बढ़ गया, यहाँ तक कि सारी धरती पर जितने बड़े-बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। (IN)

उत्पत्ति 7:20 जल तो पन्द्रह हाथ ऊपर बढ़ गया, और पहाड़ भी डूब गए। (IN)

उत्पत्ति 7:21 और क्या पक्षी, क्या घरेलू पशु, क्या जंगली पशु, और पृथ्वी पर सब चलनेवाले प्राणी, और जितने जन्तु पृथ्वी में बहुतायत से भर गए थे, वे सब, और सब मनुष्य मर गए। (IN)

उत्पत्ति 7:22 जो-जो भूमि पर थे उनमें से जितनों के नथनों में जीवन का श्‍वास था, सब मर मिटे। (IN)

उत्पत्ति 7:23 और क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगनेवाले जन्तु, क्या आकाश के पक्षी, जो-जो भूमि पर थे, सब पृथ्वी पर से मिट गए; केवल नूह, और जितने उसके संग जहाज में थे, वे ही बच गए। (IN)

उत्पत्ति 7:24 और जल पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा। (IN)

उत्पत्ति 8:1 ¶ परन्तु परमेश्‍वर ने नूह और जितने जंगली पशु और घरेलू पशु उसके संग जहाज में थे, उन सभी की सुधि ली: और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा। (IN)

उत्पत्ति 8:2 गहरे समुंद्र के सोते और आकाश के झरोखे बंद हो गए; और उससे जो वर्षा होती थी वह भी थम गई। (IN)

उत्पत्ति 8:3 और एक सौ पचास दिन के पश्चात् जल पृथ्वी पर से लगातार घटने लगा। (IN)

उत्पत्ति 8:4 सातवें महीने के सत्रहवें दिन को, जहाज अरारात नामक पहाड़ पर टिक गया। (IN)

उत्पत्ति 8:5 और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहले दिन को, पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई दीं। (IN)

उत्पत्ति 8:6 फिर ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात् नूह ने अपने बनाए हुए जहाज की खिड़की को खोलकर, (IN)

उत्पत्ति 8:7 एक कौआ उड़ा दिया: जब तक जल पृथ्वी पर से सूख न गया, तब तक कौआ इधर-उधर फिरता रहा। (IN)

उत्पत्ति 8:8 फिर उसने अपने पास से एक कबूतरी को भी उड़ा दिया कि देखे कि जल भूमि से घट गया कि नहीं। (IN)

उत्पत्ति 8:9 उस कबूतरी को अपने पैर टेकने के लिये कोई आधार न मिला, तो वह उसके पास जहाज में लौट आई: क्योंकि सारी पृथ्वी के ऊपर जल ही जल छाया था तब उसने हाथ बढ़ाकर उसे अपने पास जहाज में ले लिया। (IN)

उत्पत्ति 8:10 तब और सात दिन तक ठहरकर, उसने उसी कबूतरी को जहाज में से फिर उड़ा दिया। (IN)

उत्पत्ति 8:11 और कबूतरी सांझ के समय उसके पास आ गई, तो क्या देखा कि उसकी चोंच में जैतून का एक नया पत्ता है; इससे नूह ने जान लिया, कि जल पृथ्वी पर घट गया है। (IN)

उत्पत्ति 8:12 फिर उसने सात दिन और ठहरकर उसी कबूतरी को उड़ा दिया; और वह उसके पास फिर कभी लौटकर न आई। (IN)

उत्पत्ति 8:13 नूह की आयु के छः सौ एक वर्ष के पहले महीने के पहले दिन जल पृथ्वी पर से सूख गया। तब नूह ने जहाज की छत खोलकर क्या देखा कि धरती सूख गई है। (IN)

उत्पत्ति 8:14 और दूसरे महीने के सताईसवें दिन को पृथ्वी पूरी रीति से सूख गई। (IN)

उत्पत्ति 8:15 ¶ तब परमेश्‍वर ने नूह से कहा, (IN)

उत्पत्ति 8:16 “तू अपने पुत्रों, पत्‍नी और बहुओं समेत जहाज में से निकल आ। (IN)

उत्पत्ति 8:17 क्या पक्षी, क्या पशु, क्या सब भाँति के रेंगनेवाले जन्तु जो पृथ्वी पर रेंगते हैं; जितने शरीरधारी जीव-जन्तु तेरे संग हैं, उन सबको अपने साथ निकाल ले आ कि पृथ्वी पर उनसे बहुत बच्चे उत्‍पन्‍न हों; और वे फूलें-फलें, और पृथ्वी पर फैल जाएँ।” (IN)

उत्पत्ति 8:18 तब नूह और उसके पुत्र और पत्‍नी और बहुएँ, निकल आईं। (IN)

उत्पत्ति 8:19 और सब चौपाए, रेंगनेवाले जन्तु, और पक्षी, और जितने जीवजन्तु पृथ्वी पर चलते-फिरते हैं, सब जाति-जाति करके जहाज में से निकल आए। (IN)

उत्पत्ति 8:20 ¶ तब नूह ने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं, और सब शुद्ध पक्षियों में से, कुछ-कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया। (IN)

उत्पत्ति 8:21 इस पर यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर सोचा, “मनुष्य के कारण मैं फिर कभी भूमि को श्राप न दूँगा, यद्यपि मनुष्य के मन में बचपन से जो कुछ उत्‍पन्‍न होता है वह बुरा ही होता है; तो भी जैसा मैंने सब जीवों को अब मारा है, वैसा उनको फिर कभी न मारूँगा। (IN)

उत्पत्ति 8:22 अब से जब तक पृथ्वी बनी रहेगी, तब तक बोने और काटने के समय, ठण्डा और तपन, धूपकाल और शीतकाल, दिन और रात, निरन्तर होते चले जाएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 9:1 ¶ फिर परमेश्‍वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, “फूलो-फलो और बढ़ो और पृथ्वी में भर जाओ। (IN)

उत्पत्ति 9:2 तुम्हारा डर और भय पृथ्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पक्षियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियों पर बना रहेगा वे सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। (IN)

उत्पत्ति 9:3 सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसे तुमको हरे-हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसे ही तुम्हें सब कुछ देता हूँ। (IN)

उत्पत्ति 9:4 पर माँस को प्राण समेत अर्थात् लहू समेत तुम न खाना। (IN)

उत्पत्ति 9:5 और निश्चय मैं तुम्हारा लहू अर्थात् प्राण का बदला लूँगा: सब पशुओं, और मनुष्यों, दोनों से मैं उसे लूँगा; मनुष्य के प्राण का बदला मैं एक-एक के भाई बन्धु से लूँगा। (IN)

उत्पत्ति 9:6 जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा क्योंकि परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है। (IN)

उत्पत्ति 9:7 और तुम तो फूलो-फलो और बढ़ो और पृथ्वी पर बहुतायत से सन्तान उत्‍पन्‍न करके उसमें भर जाओ।” (IN)

उत्पत्ति 9:8 ¶ फिर परमेश्‍वर ने नूह और उसके पुत्रों से कहा, (IN)

उत्पत्ति 9:9 “सुनो, मैं तुम्हारे साथ और तुम्हारे पश्चात् जो तुम्हारा वंश होगा, उसके साथ भी वाचा बाँधता हूँ; (IN)

उत्पत्ति 9:10 और सब जीवित प्राणियों से भी जो तुम्हारे संग हैं, क्या पक्षी क्या घरेलू पशु, क्या पृथ्वी के सब जंगली पशु, पृथ्वी के जितने जीवजन्तु जहाज से निकले हैं। (IN)

उत्पत्ति 9:11 और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नाश न होंगे और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।” (IN)

उत्पत्ति 9:12 फिर परमेश्‍वर ने कहा, “जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सबके साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ; उसका यह चिन्ह है: (IN)

उत्पत्ति 9:13 कि मैंने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिन्ह होगा। (IN)

उत्पत्ति 9:14 और जब मैं पृथ्वी पर बादल फैलाऊं तब बादल में धनुष दिखाई देगा। (IN)

उत्पत्ति 9:15 तब मेरी जो वाचा तुम्हारे और सब जीवित शरीरधारी प्राणियों के साथ बंधी है; उसको मैं स्मरण करूँगा, तब ऐसा जल-प्रलय फिर न होगा जिससे सब प्राणियों का विनाश हो। (IN)

उत्पत्ति 9:16 बादल में जो धनुष होगा मैं उसे देखकर यह सदा की वाचा स्मरण करूँगा, जो परमेश्‍वर के और पृथ्वी पर के सब जीवित शरीरधारी प्राणियों के बीच बंधी है।” (IN)

उत्पत्ति 9:17 फिर परमेश्‍वर ने नूह से कहा, “जो वाचा मैंने पृथ्वी भर के सब प्राणियों के साथ बाँधी है, उसका चिन्ह यही है।” (IN)

उत्पत्ति 9:18 ¶ नूह के जो पुत्र जहाज में से निकले, वे शेम, हाम और येपेत थे; और हाम कनान का पिता हुआ। (IN)

उत्पत्ति 9:19 नूह के तीन पुत्र ये ही हैं, और इनका वंश सारी पृथ्वी पर फैल गया। (IN)

उत्पत्ति 9:20 नूह किसानी करने लगा: और उसने दाख की बारी लगाई। (IN)

उत्पत्ति 9:21 और वह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ; और अपने तम्बू के भीतर नंगा हो गया। (IN)

उत्पत्ति 9:22 तब कनान के पिता हाम ने, अपने पिता को नंगा देखा, और बाहर आकर अपने दोनों भाइयों को बता दिया। (IN)

उत्पत्ति 9:23 तब शेम और येपेत दोनों ने कपड़ा लेकर अपने कंधों पर रखा और पीछे की ओर उलटा चलकर अपने पिता के नंगे तन को ढाँप दिया और वे अपना मुख पीछे किए हुए थे इसलिए उन्होंने अपने पिता को नंगा न देखा। (IN)

उत्पत्ति 9:24 जब नूह का नशा उतर गया, तब उसने जान लिया कि उसके छोटे पुत्र ने उसके साथ क्या किया है। (IN)

उत्पत्ति 9:25 इसलिए उसने कहा, (IN)

उत्पत्ति 9:26 फिर उसने कहा, (IN)

उत्पत्ति 9:27 परमेश्‍वर येपेत के वंश को फैलाए; (IN)

उत्पत्ति 9:28 ¶ जल-प्रलय के पश्चात् नूह साढ़े तीन सौ वर्ष जीवित रहा। (IN)

उत्पत्ति 9:29 इस प्रकार नूह की कुल आयु साढ़े नौ सौ वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया। (IN)

उत्पत्ति 10:1 ¶ नूह के पुत्र शेम, हाम और येपेत थे; उनके पुत्र जल-प्रलय के पश्चात् उत्‍पन्‍न हुए: उनकी वंशावली यह है। (IN)

उत्पत्ति 10:2 ¶ येपेत के पुत्र: गोमेर, मागोग, मादै, यावान, तूबल, मेशेक और तीरास हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:3 और गोमेर के पुत्र: अश्कनज, रीपत और तोगर्मा हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:4 और यावान के वंश में एलीशा और तर्शीश, और कित्ती, और दोदानी लोग हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:5 इनके वंश अन्यजातियों के द्वीपों के देशों में ऐसे बँट गए कि वे भिन्न-भिन्न भाषाओं, कुलों, और जातियों के अनुसार अलग-अलग हो गए। (IN)

उत्पत्ति 10:6 ¶ फिर हाम के पुत्र: कूश, मिस्र, पूत और कनान हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:7 और कूश के पुत्र सबा, हवीला, सबता, रामाह, और सब्तका हुए। और रामाह के पुत्र शेबा और ददान हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:8 कूश के वंश में निम्रोद भी हुआ; पृथ्वी पर पहला वीर वही हुआ है। (IN)

उत्पत्ति 10:9 वही यहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकार खेलनेवाला ठहरा, इससे यह कहावत चली है; “निम्रोद के समान यहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकार खेलनेवाला।” (IN)

उत्पत्ति 10:10 उसके राज्य का आरम्भ शिनार देश में बाबेल, एरेख, अक्कद, और कलने से हुआ। (IN)

उत्पत्ति 10:11 उस देश से वह निकलकर अश्शूर को गया, और नीनवे, रहोबोतीर और कालह को, (IN)

उत्पत्ति 10:12 और नीनवे और कालह के बीच जो रेसेन है, उसे भी बसाया; बड़ा नगर यही है। (IN)

उत्पत्ति 10:13 मिस्र के वंश में लूदी, अनामी, लहाबी, नप्तूही, (IN)

उत्पत्ति 10:14 और पत्रूसी, कसलूही, और कप्तोरी लोग हुए, कसलूहियों में से तो पलिश्ती लोग निकले। (IN)

उत्पत्ति 10:15 कनान के वंश में उसका ज्येष्ठ पुत्र सीदोन, तब हित्त, (IN)

उत्पत्ति 10:16 यबूसी, एमोरी, गिर्गाशी, (IN)

उत्पत्ति 10:17 हिव्वी, अर्की, सीनी, (IN)

उत्पत्ति 10:18 अर्वदी, समारी, और हमाती लोग भी हुए; फिर कनानियों के कुल भी फैल गए। (IN)

उत्पत्ति 10:19 और कनानियों की सीमा सीदोन से लेकर गरार के मार्ग से होकर गाज़ा तक और फिर सदोम और गमोरा और अदमा और सबोयीम के मार्ग से होकर लाशा तक हुआ। (IN)

उत्पत्ति 10:20 हाम के वंश में ये ही हुए; और ये भिन्न-भिन्न कुलों, भाषाओं, देशों, और जातियों के अनुसार अलग-अलग हो गए। (IN)

उत्पत्ति 10:21 ¶ फिर शेम, जो सब एबेरवंशियों का मूलपुरुष हुआ, और जो येपेत का ज्येष्ठ भाई था, उसके भी पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:22 शेम के पुत्र: एलाम, अश्शूर, अर्पक्षद, लूद और आराम हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:23 आराम के पुत्र: ऊस, हूल, गेतेर और मश हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:24 और अर्पक्षद ने शेलह को, और शेलह ने एबेर को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 10:25 और एबेर के दो पुत्र उत्‍पन्‍न हुए, एक का नाम पेलेग इस कारण रखा गया कि उसके दिनों में पृथ्वी बँट गई, और उसके भाई का नाम योक्तान था। (IN)

उत्पत्ति 10:26 और योक्तान ने अल्मोदाद, शेलेप, हसर्मावेत, येरह, (IN)

उत्पत्ति 10:27 हदोराम, ऊजाल, दिक्ला, (IN)

उत्पत्ति 10:28 ओबाल, अबीमाएल, शेबा, (IN)

उत्पत्ति 10:29 ओपीर, हवीला, और योबाब को जन्म दिया: ये ही सब योक्तान के पुत्र हुए। (IN)

उत्पत्ति 10:30 इनके रहने का स्थान मेशा से लेकर सपारा, जो पूर्व में एक पहाड़ है, उसके मार्ग तक हुआ। (IN)

उत्पत्ति 10:31 शेम के पुत्र ये ही हुए; और ये भिन्न-भिन्न कुलों, भाषाओं, देशों और जातियों के अनुसार अलग-अलग हो गए। (IN)

उत्पत्ति 10:32 नूह के पुत्रों के घराने ये ही है: और उनकी जातियों के अनुसार उनकी वंशावलियाँ ये ही हैं; और जल-प्रलय के पश्चात् पृथ्वी भर की जातियाँ इन्हीं में से होकर बँट गईं। (IN)

उत्पत्ति 11:1 ¶ सारी पृथ्वी पर एक ही भाषा, और एक ही बोली थी। (IN)

उत्पत्ति 11:2 उस समय लोग पूर्व की ओर चलते-चलते शिनार देश में एक मैदान पाकर उसमें बस गए। (IN)

उत्पत्ति 11:3 तब वे आपस में कहने लगे, “आओ, हम ईटें बना-बनाकर भली-भाँति आग में पकाएँ।” और उन्होंने पत्थर के स्थान पर ईंट से, और मिट्टी के गारे के स्थान में चूने से काम लिया। (IN)

उत्पत्ति 11:4 फिर उन्होंने कहा, “आओ, हम एक नगर और एक मीनार बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें, ऐसा न हो कि हमको सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े।” (IN)

उत्पत्ति 11:5 जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब उन्हें देखने के लिये यहोवा उतर आया। (IN)

उत्पत्ति 11:6 और यहोवा ने कहा, “मैं क्या देखता हूँ, कि सब एक ही दल के हैं और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जो कुछ वे करने का यत्न करेंगे, उसमें से कुछ भी उनके लिये अनहोना न होगा। (IN)

उत्पत्ति 11:7 इसलिए आओ, हम उतर कर उनकी भाषा में बड़ी गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सके।” (IN)

उत्पत्ति 11:8 इस प्रकार यहोवा ने उनको वहाँ से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया। (IN)

उत्पत्ति 11:9 इस कारण उस नगर का नाम बाबेल पड़ा; क्योंकि सारी पृथ्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, वह यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्यों को सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया। (IN)

उत्पत्ति 11:10 ¶ शेम की वंशावली यह है। जल-प्रलय के दो वर्ष पश्चात् जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उसने अर्पक्षद को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 11:11 और अर्पक्षद ने जन्म के पश्चात् शेम पाँच सौ वर्ष जीवित रहा; और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:12 जब अर्पक्षद पैंतीस वर्ष का हुआ, तब उसने शेलह को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 11:13 और शेलह के जन्म के पश्चात् अर्पक्षद चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:14 जब शेलह तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा एबेर का जन्म हुआ। (IN)

उत्पत्ति 11:15 और एबेर के जन्म के पश्चात् शेलह चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:16 जब एबेर चौंतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा पेलेग का जन्म हुआ। (IN)

उत्पत्ति 11:17 और पेलेग के जन्म के पश्चात् एबेर चार सौ तीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:18 जब पेलेग तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा रू का जन्म हुआ। (IN)

उत्पत्ति 11:19 और रू के जन्म के पश्चात् पेलेग दो सौ नौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:20 जब रू बत्तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा सरूग का जन्म हुआ। (IN)

उत्पत्ति 11:21 और सरूग के जन्म के पश्चात् रू दो सौ सात वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:22 जब सरूग तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा नाहोर का जन्म हुआ। (IN)

उत्पत्ति 11:23 और नाहोर के जन्म के पश्चात् सरूग दो सौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:24 जब नाहोर उनतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा तेरह का जन्म हुआ; (IN)

उत्पत्ति 11:25 और तेरह के जन्म के पश्चात् नाहोर एक सौ उन्नीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे-बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुईं। (IN)

उत्पत्ति 11:26 जब तक तेरह सत्तर वर्ष का हुआ, तब तक उसके द्वारा अब्राम, और नाहोर, और हारान उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 11:27 ¶ तेरह की वंशावली यह है: तेरह ने अब्राम, और नाहोर, और हारान को जन्म दिया; और हारान ने लूत को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 11:28 और हारान अपने पिता के सामने ही, कसदियों के ऊर नाम नगर में, जो उसकी जन्म-भूमि थी, मर गया। (IN)

उत्पत्ति 11:29 अब्राम और नाहोर दोनों ने विवाह किया। अब्राम की पत्‍नी का नाम सारै, और नाहोर की पत्‍नी का नाम मिल्का था। यह उस हारान की बेटी थी, जो मिल्का और यिस्का दोनों का पिता था। (IN)

उत्पत्ति 11:30 सारै तो बाँझ थी; उसके सन्तान न हुई। (IN)

उत्पत्ति 11:31 और तेरह अपना पुत्र अब्राम, और अपना पोता लूत, जो हारान का पुत्र था, और अपनी बहू सारै, जो उसके पुत्र अब्राम की पत्‍नी थी, इन सभी को लेकर कसदियों के ऊर नगर से निकल कनान देश जाने को चला; पर हारान नामक देश में पहुँचकर वहीं रहने लगा। (IN)

उत्पत्ति 11:32 जब तेरह दो सौ पाँच वर्ष का हुआ, तब वह हारान देश में मर गया। (IN)

उत्पत्ति 12:1 ¶ यहोवा ने अब्राम से कहा, “अपने देश, और अपनी जन्म-भूमि, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा। (IN)

उत्पत्ति 12:2 और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। (IN)

उत्पत्ति 12:3 और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं श्राप दूँगा; और भूमंडल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 12:4 यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का था। (IN)

उत्पत्ति 12:5 इस प्रकार अब्राम अपनी पत्‍नी सारै, और अपने भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया था, और जो प्राणी उन्होंने हारान में प्राप्त किए थे, सबको लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ गए। (IN)

उत्पत्ति 12:6 उस देश के बीच से जाते हुए अब्राम शेकेम में, जहाँ मोरे का बांज वृक्ष है पहुँचा। उस समय उस देश में कनानी लोग रहते थे। (IN)

उत्पत्ति 12:7 तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, “यह देश मैं तेरे वंश को दूँगा।” और उसने वहाँ यहोवा के लिये, जिसने उसे दर्शन दिया था, एक वेदी बनाई। (IN)

उत्पत्ति 12:8 फिर वहाँ से आगे बढ़कर, वह उस पहाड़ पर आया, जो बेतेल के पूर्व की ओर है; और अपना तम्बू उस स्थान में खड़ा किया जिसके पश्चिम की ओर तो बेतेल, और पूर्व की ओर आई है; और वहाँ भी उसने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई: और यहोवा से प्रार्थना की। (IN)

उत्पत्ति 12:9 और अब्राम आगे बढ़ करके दक्षिण देश की ओर चला गया। (IN)

उत्पत्ति 12:10 ¶ उस देश में अकाल पड़ा: इसलिए अब्राम मिस्र देश को चला गया कि वहाँ परदेशी होकर रहे क्योंकि देश में भयंकर अकाल पड़ा था। (IN)

उत्पत्ति 12:11 फिर ऐसा हुआ कि मिस्र के निकट पहुँचकर, उसने अपनी पत्‍नी सारै से कहा, “सुन, मुझे मालूम है, कि तू एक सुन्दर स्त्री है; (IN)

उत्पत्ति 12:12 और जब मिस्री तुझे देखेंगे, तब कहेंगे, ‘यह उसकी पत्‍नी है,’ इसलिए वे मुझको तो मार डालेंगे, पर तुझको जीवित रख लेंगे। (IN)

उत्पत्ति 12:13 अतः यह कहना, 'मैं उसकी बहन हूँ,’ जिससे तेरे कारण मेरा कल्याण हो और मेरा प्राण तेरे कारण बचे।” (IN)

उत्पत्ति 12:14 फिर ऐसा हुआ कि जब अब्राम मिस्र में आया, तब मिस्रियों ने उसकी पत्‍नी को देखा कि यह अति सुन्दर है। (IN)

उत्पत्ति 12:15 और मिस्र के राजा फ़िरौन के हाकिमों ने उसको देखकर फ़िरौन के सामने उसकी प्रशंसा की: इसलिए वह स्त्री फ़िरौन के महल में पहुँचाई गई। (IN)

उत्पत्ति 12:16 और फ़िरौन ने उसके कारण अब्राम की भलाई की; और उसको भेड़-बकरी, गाय-बैल, दास-दासियाँ, गदहे-गदहियाँ, और ऊँट मिले। (IN)

उत्पत्ति 12:17 तब यहोवा ने फ़िरौन और उसके घराने पर, अब्राम की पत्‍नी सारै के कारण बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ डाली। (IN)

उत्पत्ति 12:18 तब फ़िरौन ने अब्राम को बुलवाकर कहा, “तूने मेरे साथ यह क्या किया? तूने मुझे क्यों नहीं बताया कि वह तेरी पत्‍नी है? (IN)

उत्पत्ति 12:19 तूने क्यों कहा कि वह तेरी बहन है? मैंने उसे अपनी ही पत्‍नी बनाने के लिये लिया; परन्तु अब अपनी पत्‍नी को लेकर यहाँ से चला जा।” (IN)

उत्पत्ति 12:20 और फ़िरौन ने अपने आदमियों को उसके विषय में आज्ञा दी और उन्होंने उसको और उसकी पत्‍नी को, सब सम्पत्ति समेत जो उसका था, विदा कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 13:1 ¶ तब अब्राम अपनी पत्‍नी, और अपनी सारी सम्पत्ति लेकर, लूत को भी संग लिये हुए, मिस्र को छोड़कर कनान के दक्षिण देश में आया। (IN)

उत्पत्ति 13:2 अब्राम भेड़-बकरी, गाय-बैल, और सोने-चाँदी का बड़ा धनी था। (IN)

उत्पत्ति 13:3 फिर वह दक्षिण देश से चलकर, बेतेल के पास उसी स्थान को पहुँचा, जहाँ पहले उसने अपना तम्बू खड़ा किया था, जो बेतेल और आई के बीच में है। (IN)

उत्पत्ति 13:4 यह स्थान उस वेदी का है, जिसे उसने पहले बनाया था, और वहाँ अब्राम ने फिर यहोवा से प्रार्थना की। (IN)

उत्पत्ति 13:5 ¶ लूत के पास भी, जो अब्राम के साथ चलता था, भेड़-बकरी, गाय-बैल, और तम्बू थे। (IN)

उत्पत्ति 13:6 इसलिए उस देश में उन दोनों के लिए पर्याप्त स्थान न था कि वे इकट्ठे रहें क्योंकि उनके पास बहुत संपत्ति थी इसलिए वे इकट्ठे न रह सके। (IN)

उत्पत्ति 13:7 सो अब्राम, और लूत की भेड़-बकरी, और गाय-बैल के चरवाहों में झगड़ा हुआ। उस समय कनानी, और परिज्जी लोग, उस देश में रहते थे। (IN)

उत्पत्ति 13:8 तब अब्राम लूत से कहने लगा, “मेरे और तेरे बीच, और मेरे और तेरे चरवाहों के बीच में झगड़ा न होने पाए; क्योंकि हम लोग भाई बन्धु हैं। (IN)

उत्पत्ति 13:9 क्या सारा देश तेरे सामने नहीं? सो मुझसे अलग हो, यदि तू बाईं ओर जाए तो मैं दाहिनी ओर जाऊँगा; और यदि तू दाहिनी ओर जाए तो मैं बाईं ओर जाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 13:10 तब लूत ने आँख उठाकर, यरदन नदी के पास वाली सारी तराई को देखा कि वह सब सिंची हुई है। जब तक यहोवा ने सदोम और गमोरा को नाश न किया था, तब तक सोअर के मार्ग तक वह तराई यहोवा की वाटिका, और मिस्र देश के समान उपजाऊ थी। (IN)

उत्पत्ति 13:11 सो लूत अपने लिये यरदन की सारी तराई को चुन के पूर्व की ओर चला, और वे एक दूसरे से अलग हो गये। (IN)

उत्पत्ति 13:12 अब्राम तो कनान देश में रहा, पर लूत उस तराई के नगरों में रहने लगा; और अपना तम्बू सदोम के निकट खड़ा किया। (IN)

उत्पत्ति 13:13 सदोम के लोग यहोवा की दृष्टि में बड़े दुष्ट और पापी थे। (IN)

उत्पत्ति 13:14 ¶ जब लूत अब्राम से अलग हो गया तब उसके पश्चात् यहोवा ने अब्राम से कहा, “आँख उठाकर जिस स्थान पर तू है वहाँ से उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, चारों ओर दृष्टि कर। (IN)

उत्पत्ति 13:15 क्योंकि जितनी भूमि तुझे दिखाई देती है, उस सबको मैं तुझे और तेरे वंश को युग-युग के लिये दूँगा। (IN)

उत्पत्ति 13:16 और मैं तेरे वंश को पृथ्वी की धूल के किनकों के समान बहुत करूँगा, यहाँ तक कि जो कोई पृथ्वी की धूल के किनकों को गिन सकेगा वही तेरा वंश भी गिन सकेगा। (IN)

उत्पत्ति 13:17 उठ, इस देश की लम्बाई और चौड़ाई में चल फिर; क्योंकि मैं उसे तुझी को दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 13:18 इसके पश्चात् अब्राम अपना तम्बू उखाड़कर, मम्रे के बांज वृक्षों के बीच जो हेब्रोन में थे, जाकर रहने लगा, और वहाँ भी यहोवा की एक वेदी बनाई। (IN)

उत्पत्ति 14:1 ¶ शिनार के राजा अम्रापेल, और एल्लासार के राजा अर्योक, और एलाम के राजा कदोर्लाओमेर, और गोयीम के राजा तिदाल के दिनों में ऐसा हुआ, (IN)

उत्पत्ति 14:2 कि उन्होंने सदोम के राजा बेरा, और गमोरा के राजा बिर्शा, और अदमा के राजा शिनाब, और सबोयीम के राजा शेमेबेर, और बेला जो सोअर भी कहलाता है, इन राजाओं के विरुद्ध युद्ध किया। (IN)

उत्पत्ति 14:3 इन पाँचों ने सिद्दीम नामक तराई में, जो खारे नदी के पास है, एका किया। (IN)

उत्पत्ति 14:4 बारह वर्ष तक तो ये कदोर्लाओमेर के अधीन रहे; पर तेरहवें वर्ष में उसके विरुद्ध उठे। (IN)

उत्पत्ति 14:5 चौदहवें वर्ष में कदोर्लाओमेर, और उसके संगी राजा आए, और अश्तारोत्कनम में रापाइयों को, और हाम में जूजियों को, और शावे-किर्यातैम में एमियों को, (IN)

उत्पत्ति 14:6 और सेईर नामक पहाड़ में होरियों को, मारते-मारते उस एल्पारान तक जो जंगल के पास है, पहुँच गए। (IN)

उत्पत्ति 14:7 वहाँ से वे लौटकर एन्मिशपात को आए, जो कादेश भी कहलाता है, और अमालेकियों के सारे देश को, और उन एमोरियों को भी जीत लिया, जो हसासोन्तामार में रहते थे। (IN)

उत्पत्ति 14:8 तब सदोम, गमोरा, अदमा, सबोयीम, और बेला, जो सोअर भी कहलाता है, इनके राजा निकले, और सिद्दीम नाम तराई में, उनके साथ युद्ध के लिये पाँति बाँधी: (IN)

उत्पत्ति 14:9 अर्थात् एलाम के राजा कदोर्लाओमेर, गोयीम के राजा तिदाल, शिनार के राजा अम्रापेल, और एल्लासार के राजा अर्योक, इन चारों के विरुद्ध उन पाँचों ने पाँति बाँधी। (IN)

उत्पत्ति 14:10 सिद्दीम नामक तराई में जहाँ लसार मिट्टी के गड्ढे ही गड्ढे थे; सदोम और गमोरा के राजा भागते-भागते उनमें गिर पड़े, और जो बचे वे पहाड़ पर भाग गए। (IN)

उत्पत्ति 14:11 तब वे सदोम और गमोरा के सारे धन और भोजन वस्तुओं को लूट लाट कर चले गए। (IN)

उत्पत्ति 14:12 और अब्राम का भतीजा लूत, जो सदोम में रहता था; उसको भी धन समेत वे लेकर चले गए। (IN)

उत्पत्ति 14:13 तब एक जन जो भागकर बच निकला था उसने जाकर इब्री अब्राम को समाचार दिया; अब्राम तो एमोरी मम्रे, जो एशकोल और आनेर का भाई था, उसके बांज वृक्षों के बीच में रहता था; और ये लोग अब्राम के संग वाचा बाँधे हुए थे। (IN)

उत्पत्ति 14:14 ¶ यह सुनकर कि उसका भतीजा बन्दी बना लिया गया है, अब्राम ने अपने तीन सौ अठारह प्रशिक्षित, युद्ध कौशल में निपुण दासों को लेकर जो उसके कुटुम्ब में उत्‍पन्‍न हुए थे, अस्त्र-शस्त्र धारण करके दान तक उनका पीछा किया। (IN)

उत्पत्ति 14:15 और अपने दासों के अलग-अलग दल बाँधकर रात को उन पर चढ़ाई करके उनको मार लिया और होबा तक, जो दमिश्क की उत्तर की ओर है, उनका पीछा किया। (IN)

उत्पत्ति 14:16 और वह सारे धन को, और अपने भतीजे लूत, और उसके धन को, और स्त्रियों को, और सब बन्दियों को, लौटा ले आया। (IN)

उत्पत्ति 14:17 जब वह कदोर्लाओमेर और उसके साथी राजाओं को जीतकर लौटा आता था तब सदोम का राजा शावे नामक तराई में, जो राजा की तराई भी कहलाती है, उससे भेंट करने के लिये आया। (IN)

उत्पत्ति 14:18 ¶ तब शालेम का राजा मलिकिसिदक, जो परमप्रधान परमेश्‍वर का याजक था, रोटी और दाखमधु ले आया। (IN)

उत्पत्ति 14:19 और उसने अब्राम को यह आशीर्वाद दिया, “परमप्रधान परमेश्‍वर की ओर से, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, तू धन्य हो। (IN)

उत्पत्ति 14:20 और धन्य है परमप्रधान परमेश्‍वर, जिसने तेरे द्रोहियों को तेरे वश में कर दिया है।” तब अब्राम ने उसको सब का दशमांश दिया। (IN)

उत्पत्ति 14:21 तब सदोम के राजा ने अब्राम से कहा, “प्राणियों को तो मुझे दे, और धन को अपने पास रख।” (IN)

उत्पत्ति 14:22 अब्राम ने सदोम के राजा ने कहा, “परमप्रधान परमेश्‍वर यहोवा, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, (IN)

उत्पत्ति 14:23 उसकी मैं यह शपथ खाता हूँ, कि जो कुछ तेरा है उसमें से न तो मैं एक सूत, और न जूती का बन्धन, न कोई और वस्तु लूँगा; कि तू ऐसा न कहने पाए, कि अब्राम मेरे ही कारण धनी हुआ। (IN)

उत्पत्ति 14:24 पर जो कुछ इन जवानों ने खा लिया है और उनका भाग जो मेरे साथ गए थे; अर्थात् आनेर, एशकोल, और मम्रे मैं नहीं लौटाऊँगा वे तो अपना-अपना भाग रख लें।” (IN)

उत्पत्ति 15:1 ¶ इन बातों के पश्चात् यहोवा का यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुँचा “हे अब्राम, मत डर; मैं तेरी ढाल और तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 15:2 अब्राम ने कहा, “हे प्रभु यहोवा, मैं तो सन्तानहीन हूँ, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्कवासी एलीएजेर होगा, अतः तू मुझे क्या देगा?” (IN)

उत्पत्ति 15:3 और अब्राम ने कहा, “मुझे तो तूने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूँ, कि मेरे घर में उत्‍पन्‍न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा।” (IN)

उत्पत्ति 15:4 तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुँचा, “यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा।” (IN)

उत्पत्ति 15:5 और उसने उसको बाहर ले जाकर कहा, “आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है?” फिर उसने उससे कहा, “तेरा वंश ऐसा ही होगा।” (IN)

उत्पत्ति 15:6 उसने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। (IN)

उत्पत्ति 15:7 और उसने उससे कहा, “मैं वही यहोवा हूँ जो तुझे कसदियों के ऊर नगर से बाहर ले आया, कि तुझको इस देश का अधिकार दूँ।” (IN)

उत्पत्ति 15:8 उसने कहा, “हे प्रभु यहोवा मैं कैसे जानूँ कि मैं इसका अधिकारी हूँगा?” (IN)

उत्पत्ति 15:9 यहोवा ने उससे कहा, “मेरे लिये तीन वर्ष की एक बछिया, और तीन वर्ष की एक बकरी, और तीन वर्ष का एक मेढ़ा, और एक पिंडुक और कबूतर का एक बच्चा ले।” (IN)

उत्पत्ति 15:10 और इन सभी को लेकर, उसने बीच से दो टुकड़े कर दिया और टुकड़ों को आमने-सामने रखा पर चिड़ियों को उसने टुकड़े नहीं किए। (IN)

उत्पत्ति 15:11 जब माँसाहारी पक्षी लोथों पर झपटे, तब अब्राम ने उन्हें उड़ा दिया। (IN)

उत्पत्ति 15:12 जब सूर्य अस्त होने लगा, तब अब्राम को भारी नींद आई; और देखो, अत्यन्त भय और महा अंधकार ने उसे छा लिया। (IN)

उत्पत्ति 15:13 तब यहोवा ने अब्राम से कहा, “यह निश्चय जान कि तेरे वंश पराए देश में परदेशी होकर रहेंगे, और उस देश के लोगों के दास हो जाएँगे; और वे उनको चार सौ वर्ष तक दुःख देंगे; (IN)

उत्पत्ति 15:14 फिर जिस देश के वे दास होंगे उसको मैं दण्ड दूँगा: और उसके पश्चात् वे बड़ा धन वहाँ से लेकर निकल आएँगे। (IN)

उत्पत्ति 15:15 तू तो अपने पितरों में कुशल के साथ मिल जाएगा; तुझे पूरे बुढ़ापे में मिट्टी दी जाएगी। (IN)

उत्पत्ति 15:16 पर वे चौथी पीढ़ी में यहाँ फिर आएँगे: क्योंकि अब तक एमोरियों का अधर्म पूरा नहीं हुआ हैं।” (IN)

उत्पत्ति 15:17 और ऐसा हुआ कि जब सूर्य अस्त हो गया और घोर अंधकार छा गया, तब एक अँगीठी जिसमें से धुआँ उठता था और एक जलती हुई मशाल दिखाई दी जो उन टुकड़ों के बीच में से होकर निकल गई। (IN)

उत्पत्ति 15:18 उसी दिन यहोवा ने अब्राम के साथ यह वाचा बाँधी, “मिस्र के महानद से लेकर फरात नामक बड़े नद तक जितना देश है, (IN)

उत्पत्ति 15:19 अर्थात्, केनियों, कनिज्जियों, कदमोनियों, (IN)

उत्पत्ति 15:20 हित्तियों, परिज्जियों, रापाइयों, (IN)

उत्पत्ति 15:21 एमोरियों, कनानियों, गिर्गाशियों और यबूसियों का देश, मैंने तेरे वंश को दिया है।” (IN)

उत्पत्ति 16:1 ¶ अब्राम की पत्‍नी सारै के कोई सन्तान न थी: और उसके हाजिरा नाम की एक मिस्री दासी थी। (IN)

उत्पत्ति 16:2 सारै ने अब्राम से कहा, “देख, यहोवा ने तो मेरी कोख बन्द कर रखी है इसलिए मैं तुझ से विनती करती हूँ कि तू मेरी दासी के पास जा; सम्भव है कि मेरा घर उसके द्वारा बस जाए।” सारै की यह बात अब्राम ने मान ली। (IN)

उत्पत्ति 16:3 इसलिए जब अब्राम को कनान देश में रहते दस वर्ष बीत चुके तब उसकी स्त्री सारै ने अपनी मिस्री दासी हाजिरा को लेकर अपने पति अब्राम को दिया, कि वह उसकी पत्‍नी हो। (IN)

उत्पत्ति 16:4 वह हाजिरा के पास गया, और वह गर्भवती हुई; जब उसने जाना कि वह गर्भवती है, तब वह अपनी स्वामिनी को अपनी दृष्टि में तुच्छ समझने लगी। (IN)

उत्पत्ति 16:5 तब सारै ने अब्राम से कहा, “जो मुझ पर उपद्रव हुआ वह तेरे ही सिर पर हो। मैंने तो अपनी दासी को तेरी पत्‍नी कर दिया; पर जब उसने जाना कि वह गर्भवती है, तब वह मुझे तुच्छ समझने लगी, इसलिए यहोवा मेरे और तेरे बीच में न्याय करे।” (IN)

उत्पत्ति 16:6 अब्राम ने सारै से कहा, “देख तेरी दासी तेरे वश में है; जैसा तुझे भला लगे वैसा ही उसके साथ कर।” तब सारै उसको दुःख देने लगी और वह उसके सामने से भाग गई। (IN)

उत्पत्ति 16:7 तब यहोवा के दूत ने उसको जंगल में शूर के मार्ग पर जल के एक सोते के पास पाकर कहा, (IN)

उत्पत्ति 16:8 “हे सारै की दासी हाजिरा, तू कहाँ से आती और कहाँ को जाती है?” उसने कहा, “मैं अपनी स्वामिनी सारै के सामने से भाग आई हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 16:9 यहोवा के दूत ने उससे कहा, “अपनी स्वामिनी के पास लौट जा और उसके वश में रह।” (IN)

उत्पत्ति 16:10 और यहोवा के दूत ने उससे कहा, “मैं तेरे वंश को बहुत बढ़ाऊँगा, यहाँ तक कि बहुतायत के कारण उसकी गिनती न हो सकेगी।” (IN)

उत्पत्ति 16:11 और यहोवा के दूत ने उससे कहा, “देख तू गर्भवती है, और पुत्र जनेगी; तू उसका नाम इश्माएल रखना; क्योंकि यहोवा ने तेरे दुःख का हाल सुन लिया है। (IN)

उत्पत्ति 16:12 और वह मनुष्य जंगली गदहे के समान होगा, उसका हाथ सबके विरुद्ध उठेगा, और सबके हाथ उसके विरुद्ध उठेंगे; और वह अपने सब भाई-बन्धुओं के मध्य में बसा रहेगा।” (IN)

उत्पत्ति 16:13 तब उसने यहोवा का नाम जिसने उससे बातें की थीं, अत्ताएलरोई रखकर कहा, “क्या मैं यहाँ भी उसको जाते हुए देखने पाई और देखने के बाद भी जीवित रही?” (IN)

उत्पत्ति 16:14 इस कारण उस कुएँ का नाम बएर-लहई-रोई कुआँ पड़ा; वह तो कादेश और बेरेद के बीच में है। (IN)

उत्पत्ति 16:15 हाजिरा को अब्राम के द्वारा एक पुत्र हुआ; और अब्राम ने अपने पुत्र का नाम, जिसे हाजिरा ने जन्म दिया था, इश्माएल रखा। (IN)

उत्पत्ति 16:16 जब हाजिरा ने अब्राम के द्वारा इश्माएल को जन्म दिया उस समय अब्राम छियासी वर्ष का था। (IN)

उत्पत्ति 17:1 ¶ जब अब्राम निन्यानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, “मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा। (IN)

उत्पत्ति 17:2 मैं तेरे साथ वाचा बाँधूँगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 17:3 तब अब्राम मुँह के बल गिरा और परमेश्‍वर उससे यह बातें करता गया, (IN)

उत्पत्ति 17:4 “देख, मेरी वाचा तेरे साथ बंधी रहेगी, इसलिए तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। (IN)

उत्पत्ति 17:5 इसलिए अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैंने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। (IN)

उत्पत्ति 17:6 मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझको जाति-जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्‍पन्‍न होंगे। (IN)

उत्पत्ति 17:7 और मैं तेरे साथ, और तेरे पश्चात् पीढ़ी-पीढ़ी तक तेरे वंश के साथ भी इस आशय की युग-युग की वाचा बाँधता हूँ, कि मैं तेरा और तेरे पश्चात् तेरे वंश का भी परमेश्‍वर रहूँगा। (IN)

उत्पत्ति 17:8 और मैं तुझको, और तेरे पश्चात् तेरे वंश को भी, यह सारा कनान देश, जिसमें तू परदेशी होकर रहता है, इस रीति दूँगा कि वह युग-युग उनकी निज भूमि रहेगी, और मैं उनका परमेश्‍वर रहूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 17:9 फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, “तू भी मेरे साथ बाँधी हुई वाचा का पालन करना; तू और तेरे पश्चात् तेरा वंश भी अपनी-अपनी पीढ़ी में उसका पालन करे। (IN)

उत्पत्ति 17:10 मेरे साथ बाँधी हुई वाचा, जिसका पालन तुझे और तेरे पश्चात् तेरे वंश को करना पड़ेगा, वह यह है: तुम में से एक-एक पुरुष का खतना हो। (IN)

उत्पत्ति 17:11 तुम अपनी-अपनी खलड़ी का खतना करा लेना: जो वाचा मेरे और तुम्हारे बीच में है, उसका यही चिन्ह होगा। (IN)

उत्पत्ति 17:12 पीढ़ी-पीढ़ी में केवल तेरे वंश ही के लोग नहीं पर जो तेरे घर में उत्‍पन्‍न हुआ हों, अथवा परदेशियों को रूपा देकर मोल लिया जाए, ऐसे सब पुरुष भी जब आठ दिन के हों जाएँ, तब उनका खतना किया जाए। (IN)

उत्पत्ति 17:13 जो तेरे घर में उत्‍पन्‍न हो, अथवा तेरे रूपे से मोल लिया जाए, उसका खतना अवश्य ही किया जाए; इस प्रकार मेरी वाचा जिसका चिन्ह तुम्हारी देह में होगा वह युग-युग रहेगी। (IN)

उत्पत्ति 17:14 जो पुरुष खतनारहित रहे, अर्थात् जिसकी खलड़ी का खतना न हो, वह प्राणी अपने लोगों में से नाश किया जाए, क्योंकि उसने मेरे साथ बाँधी हुई वाचा को तोड़ दिया।” (IN)

उत्पत्ति 17:15 ¶ फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, “तेरी जो पत्‍नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। (IN)

उत्पत्ति 17:16 मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझको उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा, कि वह जाति-जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्‍पन्‍न होंगे।” (IN)

उत्पत्ति 17:17 तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, “क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगा और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?” (IN)

उत्पत्ति 17:18 और अब्राहम ने परमेश्‍वर से कहा, “इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे! यही बहुत है।” (IN)

उत्पत्ति 17:19 तब परमेश्‍वर ने कहा, “निश्चय तेरी पत्‍नी सारा के तुझसे एक पुत्र उत्‍पन्‍न होगा; और तू उसका नाम इसहाक रखना; और मैं उसके साथ ऐसी वाचा बाँधूँगा जो उसके पश्चात् उसके वंश के लिये युग-युग की वाचा होगी। (IN)

उत्पत्ति 17:20 इश्माएल के विषय में भी मैंने तेरी सुनी है; मैं उसको भी आशीष दूँगा, और उसे फलवन्त करूँगा और अत्यन्त ही बढ़ा दूँगा; उससे बारह प्रधान उत्‍पन्‍न होंगे, और मैं उससे एक बड़ी जाति बनाऊँगा। (IN)

उत्पत्ति 17:21 परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्‍पन्‍न होगा।” (IN)

उत्पत्ति 17:22 तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया। (IN)

उत्पत्ति 17:23 तब अब्राहम ने अपने पुत्र इश्माएल को लिया और, उसके घर में जितने उत्‍पन्‍न हुए थे, और जितने उसके रुपये से मोल लिये गए थे, अर्थात् उसके घर में जितने पुरुष थे, उन सभी को लेकर उसी दिन परमेश्‍वर के वचन के अनुसार उनकी खलड़ी का खतना किया। (IN)

उत्पत्ति 17:24 जब अब्राहम की खलड़ी का खतना हुआ तब वह निन्यानवे वर्ष का था। (IN)

उत्पत्ति 17:25 और जब उसके पुत्र इश्माएल की खलड़ी का खतना हुआ तब वह तेरह वर्ष का था। (IN)

उत्पत्ति 17:26 अब्राहम और उसके पुत्र इश्माएल दोनों का खतना एक ही दिन हुआ। (IN)

उत्पत्ति 17:27 और उसके घर में जितने पुरुष थे जो घर में उत्‍पन्‍न हुए, तथा जो परदेशियों के हाथ से मोल लिये गए थे, सब का खतना उसके साथ ही हुआ। (IN)

उत्पत्ति 18:1 ¶ अब्राहम मम्रे के बांज वृक्षों के बीच कड़ी धूप के समय तम्बू के द्वार पर बैठा हुआ था, तब यहोवा ने उसे दर्शन दिया: (IN)

उत्पत्ति 18:2 उसने आँख उठाकर दृष्टि की तो क्या देखा, कि तीन पुरुष उसके सामने खड़े हैं। जब उसने उन्हें देखा तब वह उनसे भेंट करने के लिये तम्बू के द्वार से दौड़ा, और भूमि पर गिरकर दण्डवत् की और कहने लगा, (IN)

उत्पत्ति 18:3 “हे प्रभु, यदि मुझ पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि है तो मैं विनती करता हूँ, कि अपने दास के पास से चले न जाना। (IN)

उत्पत्ति 18:4 मैं थोड़ा सा जल लाता हूँ और आप अपने पाँव धोकर इस वृक्ष के तले विश्राम करें। (IN)

उत्पत्ति 18:5 फिर मैं एक टुकड़ा रोटी ले आऊँ, और उससे आप अपने-अपने जीव को तृप्त करें; तब उसके पश्चात् आगे बढ़ें क्योंकि आप अपने दास के पास इसलिए पधारे हैं।” उन्होंने कहा, “जैसा तू कहता है वैसा ही कर।” (IN)

उत्पत्ति 18:6 तब अब्राहम तुरन्त तम्बू में सारा के पास गया और कहा, “तीन सआ मैदा जल्दी से गूँध, और फुलके बना।” (IN)

उत्पत्ति 18:7 फिर अब्राहम गाय-बैल के झुण्ड में दौड़ा, और एक कोमल और अच्छा बछड़ा लेकर अपने सेवक को दिया, और उसने जल्दी से उसको पकाया। (IN)

उत्पत्ति 18:8 तब उसने दही, और दूध, और बछड़े का माँस, जो उसने पकवाया था, लेकर उनके आगे परोस दिया; और आप वृक्ष के तले उनके पास खड़ा रहा, और वे खाने लगे। (IN)

उत्पत्ति 18:9 ¶ उन्होंने उससे पूछा, “तेरी पत्‍नी सारा कहाँ है?” उसने कहा, “वह तो तम्बू में है।” (IN)

उत्पत्ति 18:10 उसने कहा, “मैं वसन्त ऋतु में निश्चय तेरे पास फिर आऊँगा; और तेरी पत्‍नी सारा के एक पुत्र उत्‍पन्‍न होगा।” सारा तम्बू के द्वार पर जो अब्राहम के पीछे था सुन रही थी। (IN)

उत्पत्ति 18:11 अब्राहम और सारा दोनों बहुत बूढ़े थे; और सारा का मासिक धर्म बन्द हो गया था। (IN)

उत्पत्ति 18:12 इसलिए सारा मन में हँस कर कहने लगी, “मैं तो बूढ़ी हूँ, और मेरा स्वामी भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा?” (IN)

उत्पत्ति 18:13 तब यहोवा ने अब्राहम से कहा, “सारा यह कहकर क्यों हँसी, कि क्या मेरे, जो ऐसी बुढ़िया हो गई हूँ, सचमुच एक पुत्र उत्‍पन्‍न होगा? (IN)

उत्पत्ति 18:14 क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्थात् वसन्त ऋतु में, मैं तेरे पास फिर आऊँगा, और सारा के पुत्र उत्‍पन्‍न होगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:15 तब सारा डर के मारे यह कहकर मुकर गई, “मैं नहीं हँसी।” उसने कहा, “नहीं; तू हँसी तो थी।” (IN)

उत्पत्ति 18:16 ¶ फिर वे पुरुष वहाँ से चलकर, सदोम की ओर दृष्टि की; और अब्राहम उन्हें विदा करने के लिये उनके संग-संग चला। (IN)

उत्पत्ति 18:17 तब यहोवा ने कहा, “यह जो मैं करता हूँ उसे क्या अब्राहम से छिपा रखूँ? (IN)

उत्पत्ति 18:18 अब्राहम से तो निश्चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। (IN)

उत्पत्ति 18:19 क्योंकि मैं जानता हूँ, कि वह अपने पुत्रों और परिवार को जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें, ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।” (IN)

उत्पत्ति 18:20 फिर यहोवा ने कहा, “सदोम और गमोरा के विरुद्ध चिल्लाहट बढ़ गई है, और उनका पाप बहुत भारी हो गया है; (IN)

उत्पत्ति 18:21 इसलिए मैं उतरकर देखूँगा, कि उसकी जैसी चिल्लाहट मेरे कान तक पहुँची है, उन्होंने ठीक वैसा ही काम किया है कि नहीं; और न किया हो तो मैं उसे जान लूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:22 तब वे पुरुष वहाँ से मुड़ कर सदोम की ओर जाने लगे; पर अब्राहम यहोवा के आगे खड़ा रह गया। (IN)

उत्पत्ति 18:23 तब अब्राहम उसके समीप जाकर कहने लगा, “क्या तू सचमुच दुष्ट के संग धर्मी भी नाश करेगा? (IN)

उत्पत्ति 18:24 कदाचित् उस नगर में पचास धर्मी हों तो क्या तू सचमुच उस स्थान को नाश करेगा और उन पचास धर्मियों के कारण जो उसमें हों न छोड़ेगा? (IN)

उत्पत्ति 18:25 इस प्रकार का काम करना तुझ से दूर रहे कि दुष्ट के संग धर्मी को भी मार डाले और धर्मी और दुष्ट दोनों की एक ही दशा हो। यह तुझ से दूर रहे। क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?” (IN)

उत्पत्ति 18:26 यहोवा ने कहा, “यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:27 फिर अब्राहम ने कहा, “हे प्रभु, सुन मैं तो मिट्टी और राख हूँ; तो भी मैंने इतनी ढिठाई की कि तुझ से बातें करूँ। (IN)

उत्पत्ति 18:28 कदाचित् उन पचास धर्मियों में पाँच घट जाएँ; तो क्या तू पाँच ही के घटने के कारण उस सारे नगर का नाश करेगा?” उसने कहा, “यदि मुझे उसमें पैंतालीस भी मिलें, तो भी उसका नाश न करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:29 फिर उसने उससे यह भी कहा, “कदाचित् वहाँ चालीस मिलें।” उसने कहा, “तो मैं चालीस के कारण भी ऐसा न करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:30 फिर उसने कहा, “हे प्रभु, क्रोध न कर, तो मैं कुछ और कहूँ: कदाचित् वहाँ तीस मिलें।” उसने कहा, “यदि मुझे वहाँ तीस भी मिलें, तो भी ऐसा न करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:31 फिर उसने कहा, “हे प्रभु, सुन, मैंने इतनी ढिठाई तो की है कि तुझ से बातें करूँ: कदाचित् उसमें बीस मिलें।” उसने कहा, “मैं बीस के कारण भी उसका नाश न करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:32 फिर उसने कहा, “हे प्रभु, क्रोध न कर, मैं एक ही बार और कहूँगा: कदाचित् उसमें दस मिलें।” उसने कहा, “तो मैं दस के कारण भी उसका नाश न करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 18:33 जब यहोवा अब्राहम से बातें कर चुका, तब चला गया: और अब्राहम अपने घर को लौट गया। (IN)

उत्पत्ति 19:1 ¶ सांझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उनको देखकर वह उनसे भेंट करने के लिये उठा; और मुँह के बल झुककर दण्डवत् कर कहा; (IN)

उत्पत्ति 19:2 “हे मेरे प्रभुओं, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पाँव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइए।” उन्होंने कहा, “नहीं; हम चौक ही में रात बिताएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 19:3 और उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया; इसलिए वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए; और उसने उनके लिये भोजन तैयार किया, और बिना ख़मीर की रोटियाँ बनाकर उनको खिलाईं। (IN)

उत्पत्ति 19:4 उनके सो जाने के पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन् चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया; (IN)

उत्पत्ति 19:5 और लूत को पुकारकर कहने लगे, “जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ, कि हम उनसे भोग करें।” (IN)

उत्पत्ति 19:6 तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया, और किवाड़ को अपने पीछे बन्द करके कहा, (IN)

उत्पत्ति 19:7 “हे मेरे भाइयों, ऐसी बुराई न करो। (IN)

उत्पत्ति 19:8 सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा, इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो: पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत के तले आए हैं।” (IN)

उत्पत्ति 19:9 उन्होंने कहा, “हट जा!” फिर वे कहने लगे, “तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिये आया पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिए अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।” और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए। (IN)

उत्पत्ति 19:10 तब उन अतिथियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 19:11 और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरुषों को जो घर के द्वार पर थे अंधेर कर दिया, अतः वे द्वार को टटोलते-टटोलते थक गए। (IN)

उत्पत्ति 19:12 ¶ फिर उन अतिथियों ने लूत से पूछा, “यहाँ तेरा और कौन-कौन हैं? दामाद, बेटे, बेटियाँ, और नगर में तेरा जो कोई हो, उन सभी को लेकर इस स्थान से निकल जा। (IN)

उत्पत्ति 19:13 क्योंकि हम यह स्थान नाश करने पर हैं, इसलिए कि इसकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बढ़ गई है; और यहोवा ने हमें इसका सत्यानाश करने के लिये भेज दिया है।” (IN)

उत्पत्ति 19:14 तब लूत ने निकलकर अपने दामादों को, जिनके साथ उसकी बेटियों की सगाई हो गई थी, समझाकर कहा, “उठो, इस स्थान से निकल चलो; क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश करने पर है।” उसके दामाद उसका मज़ाक उड़ाने लगे। (IN)

उत्पत्ति 19:15 जब पौ फटने लगी, तब दूतों ने लूत से जल्दी करने को कहा और बोले, “उठ, अपनी पत्‍नी और दोनों बेटियों को जो यहाँ हैं ले जा: नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 19:16 पर वह विलम्ब करता रहा, इस पर उन पुरुषों ने उसका और उसकी पत्‍नी, और दोनों बेटियों के हाथ पकड़े; क्योंकि यहोवा की दया उस पर थी: और उसको निकालकर नगर के बाहर कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 19:17 और ऐसा हुआ कि जब उन्होंने उनको बाहर निकाला, तब उसने कहा, “अपना प्राण लेकर भाग जा; पीछे की ओर न ताकना, और तराई भर में न ठहरना; उस पहाड़ पर भाग जाना, नहीं तो तू भी भस्म हो जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 19:18 लूत ने उनसे कहा, “हे प्रभु, ऐसा न कर! (IN)

उत्पत्ति 19:19 देख, तेरे दास पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि हुई है, और तूने इसमें बड़ी कृपा दिखाई, कि मेरे प्राण को बचाया है; पर मैं पहाड़ पर भाग नहीं सकता, कहीं ऐसा न हो, कि कोई विपत्ति मुझ पर आ पड़े, और मैं मर जाऊँ। (IN)

उत्पत्ति 19:20 देख, वह नगर ऐसा निकट है कि मैं वहाँ भाग सकता हूँ, और वह छोटा भी है। मुझे वहीं भाग जाने दे, क्या वह नगर छोटा नहीं है? और मेरा प्राण बच जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 19:21 उसने उससे कहा, “देख, मैंने इस विषय में भी तेरी विनती स्वीकार की है, कि जिस नगर की चर्चा तूने की है, उसको मैं नाश न करूँगा। (IN)

उत्पत्ति 19:22 फुर्ती से वहाँ भाग जा; क्योंकि जब तक तू वहाँ न पहुँचे तब तक मैं कुछ न कर सकूँगा।” इसी कारण उस नगर का नाम सोअर पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 19:23 ¶ लूत के सोअर के निकट पहुँचते ही सूर्य पृथ्वी पर उदय हुआ। (IN)

उत्पत्ति 19:24 तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और गमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; (IN)

उत्पत्ति 19:25 और उन नगरों को और सम्पूर्ण तराई को, और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नाश कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 19:26 लूत की पत्‍नी ने जो उसके पीछे थी पीछे मुड़कर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई। (IN)

उत्पत्ति 19:27 भोर को अब्राहम उठकर उस स्थान को गया, जहाँ वह यहोवा के सम्मुख खड़ा था; (IN)

उत्पत्ति 19:28 और सदोम, और गमोरा, और उस तराई के सारे देश की ओर आँख उठाकर क्या देखा कि उस देश में से धधकती हुई भट्ठी का सा धुआँ उठ रहा है। (IN)

उत्पत्ति 19:29 और ऐसा हुआ कि जब परमेश्‍वर ने उस तराई के नगरों को, जिनमें लूत रहता था, उलट पुलट कर नाश किया, तब उसने अब्राहम को याद करके लूत को उस घटना से बचा लिया। (IN)

उत्पत्ति 19:30 ¶ लूत ने सोअर को छोड़ दिया, और पहाड़ पर अपनी दोनों बेटियों समेत रहने लगा; क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता था; इसलिए वह और उसकी दोनों बेटियाँ वहाँ एक गुफा में रहने लगे। (IN)

उत्पत्ति 19:31 तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, “हमारा पिता बूढ़ा है, और पृथ्वी भर में कोई ऐसा पुरुष नहीं जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए। (IN)

उत्पत्ति 19:32 इसलिए आ, हम अपने पिता को दाखमधु पिलाकर, उसके साथ सोएँ, जिससे कि हम अपने पिता के वंश को बचाए रखें।” (IN)

उत्पत्ति 19:33 अतः उन्होंने उसी दिन-रात के समय अपने पिता को दाखमधु पिलाया, तब बड़ी बेटी जाकर अपने पिता के पास लेट गई; पर उसने न जाना, कि वह कब लेटी, और कब उठ गई। (IN)

उत्पत्ति 19:34 और ऐसा हुआ कि दूसरे दिन बड़ी ने छोटी से कहा, “देख, कल रात को मैं अपने पिता के साथ सोई; इसलिए आज भी रात को हम उसको दाखमधु पिलाएँ; तब तू जाकर उसके साथ सोना कि हम अपने पिता के द्वारा वंश उत्‍पन्‍न करें।” (IN)

उत्पत्ति 19:35 अतः उन्होंने उस दिन भी रात के समय अपने पिता को दाखमधु पिलाया, और छोटी बेटी जाकर उसके पास लेट गई; पर उसको उसके भी सोने और उठने का ज्ञान न था। (IN)

उत्पत्ति 19:36 इस प्रकार से लूत की दोनों बेटियाँ अपने पिता से गर्भवती हुईं। (IN)

उत्पत्ति 19:37 बड़ी एक पुत्र जनी और उसका नाम मोआब रखा; वह मोआब नामक जाति का जो आज तक है मूलपिता हुआ। (IN)

उत्पत्ति 19:38 और छोटी भी एक पुत्र जनी, और उसका नाम बेनअम्‍मी रखा; वह अम्मोनवंशियों का जो आज तक है मूलपिता हुआ। (IN)

उत्पत्ति 20:1 ¶ फिर अब्राहम वहाँ से निकलकर दक्षिण देश में आकर कादेश और शूर के बीच में ठहरा, और गरार में रहने लगा। (IN)

उत्पत्ति 20:2 और अब्राहम अपनी पत्‍नी सारा के विषय में कहने लगा, “वह मेरी बहन है,” इसलिए गरार के राजा अबीमेलेक ने दूत भेजकर सारा को बुलवा लिया। (IN)

उत्पत्ति 20:3 रात को परमेश्‍वर ने स्वप्न में अबीमेलेक के पास आकर कहा, “सुन, जिस स्त्री को तूने रख लिया है, उसके कारण तू मर जाएगा, क्योंकि वह सुहागिन है।” (IN)

उत्पत्ति 20:4 परन्तु अबीमेलेक उसके पास न गया था; इसलिए उसने कहा, “हे प्रभु, क्या तू निर्दोष जाति का भी घात करेगा? (IN)

उत्पत्ति 20:5 क्या उसी ने स्वयं मुझसे नहीं कहा, 'वह मेरी बहन है?' और उस स्त्री ने भी आप कहा, 'वह मेरा भाई है,' मैंने तो अपने मन की खराई और अपने व्यवहार की सच्चाई से यह काम किया।” (IN)

उत्पत्ति 20:6 परमेश्‍वर ने उससे स्वप्न में कहा, “हाँ, मैं भी जानता हूँ कि अपने मन की खराई से तूने यह काम किया है और मैंने तुझे रोक भी रखा कि तू मेरे विरुद्ध पाप न करे; इसी कारण मैंने तुझको उसे छूने नहीं दिया। (IN)

उत्पत्ति 20:7 इसलिए अब उस पुरुष की पत्‍नी को उसे लौटाए; क्योंकि वह नबी है, और तेरे लिये प्रार्थना करेगा, और तू जीता रहेगा पर यदि तू उसको न लौटा दे तो जान रख, कि तू, और तेरे जितने लोग हैं, सब निश्चय मर जाएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 20:8 सवेरे अबीमेलेक ने तड़के उठकर अपने सब कर्मचारियों को बुलवाकर ये सब बातें सुनाईं; और वे लोग बहुत डर गए। (IN)

उत्पत्ति 20:9 तब अबीमेलेक ने अब्राहम को बुलवाकर कहा, “तूने हम से यह क्या किया है? और मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था कि तूने मेरे और मेरे राज्य के ऊपर ऐसा बड़ा पाप डाल दिया है? तूने मेरे साथ वह काम किया है जो उचित न था।” (IN)

उत्पत्ति 20:10 फिर अबीमेलेक ने अब्राहम से पूछा, “तूने क्या समझकर ऐसा काम किया?” (IN)

उत्पत्ति 20:11 अब्राहम ने कहा, “मैंने यह सोचा था कि इस स्थान में परमेश्‍वर का कुछ भी भय न होगा; इसलिए ये लोग मेरी पत्‍नी के कारण मेरा घात करेंगे। (IN)

उत्पत्ति 20:12 इसके अतिरिक्त सचमुच वह मेरी बहन है, वह मेरे पिता की बेटी तो है पर मेरी माता की बेटी नहीं; फिर वह मेरी पत्‍नी हो गई। (IN)

उत्पत्ति 20:13 और ऐसा हुआ कि जब परमेश्‍वर ने मुझे अपने पिता का घर छोड़कर निकलने की आज्ञा दी, तब मैंने उससे कहा, 'इतनी कृपा तुझे मुझ पर करनी होगी कि हम दोनों जहाँ-जहाँ जाएँ वहाँ-वहाँ तू मेरे विषय में कहना कि यह मेरा भाई है'।” (IN)

उत्पत्ति 20:14 तब अबीमेलेक ने भेड़-बकरी, गाय-बैल, और दास-दासियाँ लेकर अब्राहम को दीं, और उसकी पत्‍नी सारा को भी उसे लौटा दिया। (IN)

उत्पत्ति 20:15 और अबीमेलेक ने कहा, “देख, मेरा देश तेरे सामने है; जहाँ तुझे भाए वहाँ रह।” (IN)

उत्पत्ति 20:16 और सारा से उसने कहा, “देख, मैंने तेरे भाई को रूपे के एक हजार टुकड़े दिए हैं। देख, तेरे सारे संगियों के सामने वही तेरी आँखों का परदा बनेगा, और सभी के सामने तू ठीक होगी।” (IN)

उत्पत्ति 20:17 तब अब्राहम ने यहोवा से प्रार्थना की, और यहोवा ने अबीमेलेक, और उसकी पत्‍नी, और दासियों को चंगा किया और वे जनने लगीं। (IN)

उत्पत्ति 20:18 क्योंकि यहोवा ने अब्राहम की पत्‍नी सारा के कारण अबीमेलेक के घर की सब स्त्रियों की कोखों को पूरी रीति से बन्द कर दिया था। (IN)

उत्पत्ति 21:1 ¶ यहोवा ने जैसा कहा था वैसा ही सारा की सुधि लेकर उसके साथ अपने वचन के अनुसार किया। (IN)

उत्पत्ति 21:2 सारा अब्राहम से गर्भवती होकर उसके बुढ़ापे में उसी नियुक्त समय पर जो परमेश्‍वर ने उससे ठहराया था, एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 21:3 अब्राहम ने अपने पुत्र का नाम जो सारा से उत्‍पन्‍न हुआ था इसहाक रखा। (IN)

उत्पत्ति 21:4 और जब उसका पुत्र इसहाक आठ दिन का हुआ, तब उसने परमेश्‍वर की आज्ञा के अनुसार उसका खतना किया। (IN)

उत्पत्ति 21:5 जब अब्राहम का पुत्र इसहाक उत्‍पन्‍न हुआ तब वह एक सौ वर्ष का था। (IN)

उत्पत्ति 21:6 और सारा ने कहा, “परमेश्‍वर ने मुझे प्रफुल्लित किया है; इसलिए सब सुननेवाले भी मेरे साथ प्रफुल्लित होंगे।” (IN)

उत्पत्ति 21:7 फिर उसने यह भी कहा, “क्या कोई कभी अब्राहम से कह सकता था, कि सारा लड़कों को दूध पिलाएगी? पर देखो, मुझसे उसके बुढ़ापे में एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ।” (IN)

उत्पत्ति 21:8 और वह लड़का बढ़ा और उसका दूध छुड़ाया गया; और इसहाक के दूध छुड़ाने के दिन अब्राहम ने बड़ा भोज किया। (IN)

उत्पत्ति 21:9 ¶ तब सारा को मिस्री हाजिरा का पुत्र, जो अब्राहम से उत्‍पन्‍न हुआ था, हँसी करता हुआ दिखाई पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 21:10 इस कारण उसने अब्राहम से कहा, “इस दासी को पुत्र सहित निकाल दे: क्योंकि इस दासी का पुत्र मेरे पुत्र इसहाक के साथ भागी न होगा।” (IN)

उत्पत्ति 21:11 यह बात अब्राहम को अपने पुत्र के कारण बुरी लगी। (IN)

उत्पत्ति 21:12 तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, “उस लड़के और अपनी दासी के कारण तुझे बुरा न लगे; जो बात सारा तुझ से कहे, उसे मान, क्योंकि जो तेरा वंश कहलाएगा सो इसहाक ही से चलेगा। (IN)

उत्पत्ति 21:13 दासी के पुत्र से भी मैं एक जाति उत्‍पन्‍न करूँगा इसलिए कि वह तेरा वंश है।” (IN)

उत्पत्ति 21:14 इसलिए अब्राहम ने सवेरे तड़के उठकर रोटी और पानी से भरी चमड़े की थैली भी हाजिरा को दी, और उसके कंधे पर रखी, और उसके लड़के को भी उसे देकर उसको विदा किया। वह चली गई, और बेर्शेबा के जंगल में भटकने लगी। (IN)

उत्पत्ति 21:15 जब थैली का जल समाप्त हो गया, तब उसने लड़के को एक झाड़ी के नीचे छोड़ दिया। (IN)

उत्पत्ति 21:16 और आप उससे तीर भर के टप्पे पर दूर जाकर उसके सामने यह सोचकर बैठ गई, “मुझको लड़के की मृत्यु देखनी न पड़े।” तब वह उसके सामने बैठी हुई चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी। (IN)

उत्पत्ति 21:17 परमेश्‍वर ने उस लड़के की सुनी; और उसके दूत ने स्वर्ग से हाजिरा को पुकारकर कहा, “हे हाजिरा, तुझे क्या हुआ? मत डर; क्योंकि जहाँ तेरा लड़का है वहाँ से उसकी आवाज परमेश्‍वर को सुन पड़ी है। (IN)

उत्पत्ति 21:18 उठ, अपने लड़के को उठा और अपने हाथ से सम्भाल; क्योंकि मैं उसके द्वारा एक बड़ी जाति बनाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 21:19 तब परमेश्‍वर ने उसकी आँखें खोल दीं, और उसको एक कुआँ दिखाई पड़ा; तब उसने जाकर थैली को जल से भरकर लड़के को पिलाया। (IN)

उत्पत्ति 21:20 और परमेश्‍वर उस लड़के के साथ रहा; और जब वह बड़ा हुआ, तब जंगल में रहते-रहते धनुर्धारी बन गया। (IN)

उत्पत्ति 21:21 वह पारान नामक जंगल में रहा करता था; और उसकी माता ने उसके लिये मिस्र देश से एक स्त्री मँगवाई। (IN)

उत्पत्ति 21:22 ¶ उन दिनों में ऐसा हुआ कि अबीमेलेक अपने सेनापति पीकोल को संग लेकर अब्राहम से कहने लगा, “जो कुछ तू करता है उसमें परमेश्‍वर तेरे संग रहता है; (IN)

उत्पत्ति 21:23 इसलिए अब मुझसे यहाँ इस विषय में परमेश्‍वर की शपथ खा कि तू न तो मुझसे छल करेगा, और न कभी मेरे वंश से करेगा, परन्तु जैसी करुणा मैंने तुझ पर की है, वैसी ही तू मुझ पर और इस देश पर भी, जिसमें तू रहता है, करेगा।” (IN)

उत्पत्ति 21:24 अब्राहम ने कहा, “मैं शपथ खाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 21:25 और अब्राहम ने अबीमेलेक को एक कुएँ के विषय में जो अबीमेलेक के दासों ने बलपूर्वक ले लिया था, उलाहना दिया। (IN)

उत्पत्ति 21:26 तब अबीमेलेक ने कहा, “मैं नहीं जानता कि किसने यह काम किया; और तूने भी मुझे नहीं बताया, और न मैंने आज से पहले इसके विषय में कुछ सुना।” (IN)

उत्पत्ति 21:27 तब अब्राहम ने भेड़-बकरी, और गाय-बैल अबीमेलेक को दिए; और उन दोनों ने आपस में वाचा बाँधी। (IN)

उत्पत्ति 21:28 अब्राहम ने सात मादा मेम्नों को अलग कर रखा। (IN)

उत्पत्ति 21:29 तब अबीमेलेक ने अब्राहम से पूछा, “इन सात बच्चियों का, जो तूने अलग कर रखी हैं, क्या प्रयोजन है?” (IN)

उत्पत्ति 21:30 उसने कहा, “तू इन सात बच्चियों को इस बात की साक्षी जानकर मेरे हाथ से ले कि मैंने यह कुआँ खोदा है।” (IN)

उत्पत्ति 21:31 उन दोनों ने जो उस स्थान में आपस में शपथ खाई, इसी कारण उसका नाम बेर्शेबा पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 21:32 जब उन्होंने बेर्शेबा में परस्पर वाचा बाँधी, तब अबीमेलेक और उसका सेनापति पीकोल, उठकर पलिश्तियों के देश में लौट गए। (IN)

उत्पत्ति 21:33 फिर अब्राहम ने बेर्शेबा में झाऊ का एक वृक्ष लगाया, और वहाँ यहोवा से जो सनातन परमेश्‍वर है, प्रार्थना की। (IN)

उत्पत्ति 21:34 अब्राहम पलिश्तियों के देश में बहुत दिनों तक परदेशी होकर रहा। (IN)

उत्पत्ति 22:1 ¶ इन बातों के पश्चात् ऐसा हुआ कि परमेश्‍वर ने, अब्राहम से यह कहकर उसकी परीक्षा की, “हे अब्राहम!” उसने कहा, “देख, मैं यहाँ हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 22:2 उसने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिससे तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा, और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।” (IN)

उत्पत्ति 22:3 अतः अब्राहम सवेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकलकर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी। (IN)

उत्पत्ति 22:4 तीसरे दिन अब्राहम ने आँखें उठाकर उस स्थान को दूर से देखा। (IN)

उत्पत्ति 22:5 और उसने अपने सेवकों से कहा, “गदहे के पास यहीं ठहरे रहो; यह लड़का और मैं वहाँ तक जाकर, और दण्डवत् करके, फिर तुम्हारे पास लौट आएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 22:6 तब अब्राहम ने होमबलि की लकड़ी ले अपने पुत्र इसहाक पर लादी, और आग और छुरी को अपने हाथ में लिया; और वे दोनों एक साथ चल पड़े। (IN)

उत्पत्ति 22:7 इसहाक ने अपने पिता अब्राहम से कहा, “हे मेरे पिता,” उसने कहा, “हे मेरे पुत्र, क्या बात है?” उसने कहा, “देख, आग और लकड़ी तो हैं; पर होमबलि के लिये भेड़ कहाँ है?” (IN)

उत्पत्ति 22:8 अब्राहम ने कहा, “हे मेरे पुत्र, परमेश्‍वर होमबलि की भेड़ का उपाय आप ही करेगा।” और वे दोनों संग-संग आगे चलते गए। (IN)

उत्पत्ति 22:9 जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन-चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर रखी लड़कियों के ऊपर रख दिया। (IN)

उत्पत्ति 22:10 फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे। (IN)

उत्पत्ति 22:11 तब यहोवा के दूत ने स्वर्ग से उसको पुकारकर कहा, “हे अब्राहम, हे अब्राहम!” उसने कहा, “देख, मैं यहाँ हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 22:12 उसने कहा, “उस लड़के पर हाथ मत बढ़ा, और न उसे कुछ कर; क्योंकि तूने जो मुझसे अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; इससे मैं अब जान गया कि तू परमेश्‍वर का भय मानता है।” (IN)

उत्पत्ति 22:13 तब अब्राहम ने आँखें उठाई, और क्या देखा, कि उसके पीछे एक मेढ़ा अपने सींगों से एक झाड़ी में फँसा हुआ है; अतः अब्राहम ने जाकर उस मेढ़े को लिया, और अपने पुत्र के स्थान पर होमबलि करके चढ़ाया। (IN)

उत्पत्ति 22:14 अब्राहम ने उस स्थान का नाम यहोवा यिरे रखा, इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है, “यहोवा के पहाड़ पर प्रदान किया जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 22:15 फिर यहोवा के दूत ने दूसरी बार स्वर्ग से अब्राहम को पुकारकर कहा, (IN)

उत्पत्ति 22:16 “यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तूने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; (IN)

उत्पत्ति 22:17 इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र तट के रेतकणों के समान अनगिनत करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; (IN)

उत्पत्ति 22:18 और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तूने मेरी बात मानी है।” (IN)

उत्पत्ति 22:19 तब अब्राहम अपने सेवकों के पास लौट आया, और वे सब बेर्शेबा को संग-संग गए; और अब्राहम बेर्शेबा में रहने लगा। (IN)

उत्पत्ति 22:20 ¶ इन बातों के पश्चात् ऐसा हुआ कि अब्राहम को यह सन्देश मिला, “मिल्का के तेरे भाई नाहोर से सन्तान उत्‍पन्‍न हुई हैं।” (IN)

उत्पत्ति 22:21 मिल्का के पुत्र तो ये हुए, अर्थात् उसका जेठा ऊस, और ऊस का भाई बूज, और कमूएल, जो अराम का पिता हुआ। (IN)

उत्पत्ति 22:22 फिर केसेद, हज़ो, पिल्दाश, यिद्लाप, और बतूएल।” (IN)

उत्पत्ति 22:23 इन आठों को मिल्का ने अब्राहम के भाई नाहोर के द्वारा जन्म दिया। और बतूएल से रिबका उत्‍पन्‍न हुई। (IN)

उत्पत्ति 22:24 फिर नाहोर के रूमा नामक एक रखैल भी थी; जिससे तेबह, गहम, तहश, और माका, उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 23:1 ¶ सारा तो एक सौ सताईस वर्ष की आयु को पहुँची; और जब सारा की इतनी आयु हुई; (IN)

उत्पत्ति 23:2 तब वह किर्यतअर्बा में मर गई। यह तो कनान देश में है, और हेब्रोन भी कहलाता है। इसलिए अब्राहम सारा के लिये रोने-पीटने को वहाँ गया। (IN)

उत्पत्ति 23:3 तब अब्राहम शव के पास से उठकर हित्तियों से कहने लगा, (IN)

उत्पत्ति 23:4 “मैं तुम्हारे बीच अतिथि और परदेशी हूँ; मुझे अपने मध्य में कब्रिस्तान के लिये ऐसी भूमि दो जो मेरी निज की हो जाए, कि मैं अपने मृतक को गाड़कर अपने आँख की ओट करूँ।” (IN)

उत्पत्ति 23:5 हित्तियों ने अब्राहम से कहा, (IN)

उत्पत्ति 23:6 “हे हमारे प्रभु, हमारी सुन; तू तो हमारे बीच में बड़ा प्रधान है। हमारी कब्रों में से जिसको तू चाहे उसमें अपने मृतक को गाड़; हम में से कोई तुझे अपनी कब्र के लेने से न रोकेगा, कि तू अपने मृतक को उसमें गाड़ने न पाए।” (IN)

उत्पत्ति 23:7 तब अब्राहम उठकर खड़ा हुआ, और हित्तियों के सामने, जो उस देश के निवासी थे, दण्डवत् करके कहने लगा, (IN)

उत्पत्ति 23:8 “यदि तुम्हारी यह इच्छा हो कि मैं अपने मृतक को गाड़कर अपनी आँख की ओट करूँ, तो मेरी प्रार्थना है, कि सोहर के पुत्र एप्रोन से मेरे लिये विनती करो, (IN)

उत्पत्ति 23:9 कि वह अपनी मकपेलावाली गुफा, जो उसकी भूमि की सीमा पर है; उसका पूरा दाम लेकर मुझे दे दे, कि वह तुम्हारे बीच कब्रिस्तान के लिये मेरी निज भूमि हो जाए।” (IN)

उत्पत्ति 23:10 एप्रोन तो हित्तियों के बीच वहाँ बैठा हुआ था, इसलिए जितने हित्ती उसके नगर के फाटक से होकर भीतर जाते थे, उन सभी के सामने उसने अब्राहम को उत्तर दिया, (IN)

उत्पत्ति 23:11 “हे मेरे प्रभु, ऐसा नहीं, मेरी सुन; वह भूमि मैं तुझे देता हूँ, और उसमें जो गुफा है, वह भी मैं तुझे देता हूँ; अपने जाति भाइयों के सम्मुख मैं उसे तुझको दिए देता हूँ; अतः अपने मृतक को कब्र में रख।” (IN)

उत्पत्ति 23:12 तब अब्राहम ने उस देश के निवासियों के सामने दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 23:13 और उनके सुनते हुए एप्रोन से कहा, “यदि तू ऐसा चाहे, तो मेरी सुन उस भूमि का जो दाम हो, वह मैं देना चाहता हूँ; उसे मुझसे ले ले, तब मैं अपने मुर्दे को वहाँ गाड़ूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 23:14 एप्रोन ने अब्राहम को यह उत्तर दिया, (IN)

उत्पत्ति 23:15 “हे मेरे प्रभु, मेरी बात सुन; उस भूमि का दाम तो चार सौ शेकेल रूपा है; पर मेरे और तेरे बीच में यह क्या है? अपने मुर्दे को कब्र में रख।” (IN)

उत्पत्ति 23:16 अब्राहम ने एप्रोन की मानकर उसको उतना रूपा तौल दिया, जितना उसने हित्तियों के सुनते हुए कहा था, अर्थात् चार सौ ऐसे शेकेल जो व्यापारियों में चलते थे। (IN)

उत्पत्ति 23:17 इस प्रकार एप्रोन की भूमि, जो मम्रे के सम्मुख की मकपेला में थी, वह गुफा समेत, और उन सब वृक्षों समेत भी जो उसमें और उसके चारों ओर सीमा पर थे, (IN)

उत्पत्ति 23:18 जितने हित्ती उसके नगर के फाटक से होकर भीतर जाते थे, उन सभी के सामने अब्राहम के अधिकार में पक्की रीति से आ गई। (IN)

उत्पत्ति 23:19 इसके पश्चात् अब्राहम ने अपनी पत्‍नी सारा को उस मकपेला वाली भूमि की गुफा में जो मम्रे के अर्थात् हेब्रोन के सामने कनान देश में है, मिट्टी दी। (IN)

उत्पत्ति 23:20 इस प्रकार वह भूमि गुफा समेत, जो उसमें थी, हित्तियों की ओर से कब्रिस्तान के लिये अब्राहम के अधिकार में पूरी रीति से आ गई। (IN)

उत्पत्ति 24:1 ¶ अब्राहम अब वृद्ध हो गया था और उसकी आयु बहुत थी और यहोवा ने सब बातों में उसको आशीष दी थी। (IN)

उत्पत्ति 24:2 अब्राहम ने अपने उस दास से, जो उसके घर में पुरनिया और उसकी सारी सम्पत्ति पर अधिकारी था, कहा, “अपना हाथ मेरी जाँघ के नीचे रख; (IN)

उत्पत्ति 24:3 और मुझसे आकाश और पृथ्वी के परमेश्‍वर यहोवा की इस विषय में शपथ खा, कि तू मेरे पुत्र के लिये कनानियों की लड़कियों में से, जिनके बीच मैं रहता हूँ, किसी को न ले आएगा। (IN)

उत्पत्ति 24:4 परन्तु तू मेरे देश में मेरे ही कुटुम्बियों के पास जाकर मेरे पुत्र इसहाक के लिये एक पत्‍नी ले आएगा।” (IN)

उत्पत्ति 24:5 दास ने उससे कहा, “कदाचित् वह स्त्री इस देश में मेरे साथ आना न चाहे; तो क्या मुझे तेरे पुत्र को उस देश में जहाँ से तू आया है ले जाना पड़ेगा?” (IN)

उत्पत्ति 24:6 अब्राहम ने उससे कहा, “चौकस रह, मेरे पुत्र को वहाँ कभी न ले जाना।” (IN)

उत्पत्ति 24:7 स्वर्ग का परमेश्‍वर यहोवा, जिसने मुझे मेरे पिता के घर से और मेरी जन्म-भूमि से ले आकर मुझसे शपथ खाकर कहा, की “मैं यह देश तेरे वंश को दूँगा; वही अपना दूत तेरे आगे-आगे भेजेगा, कि तू मेरे पुत्र के लिये वहाँ से एक स्त्री ले आए। (IN)

उत्पत्ति 24:8 और यदि वह स्त्री तेरे साथ आना न चाहे तब तो तू मेरी इस शपथ से छूट जाएगा; पर मेरे पुत्र को वहाँ न ले जाना।” (IN)

उत्पत्ति 24:9 तब उस दास ने अपने स्वामी अब्राहम की जाँघ के नीचे अपना हाथ रखकर उससे इस विषय की शपथ खाई। (IN)

उत्पत्ति 24:10 तब वह दास अपने स्वामी के ऊँटों में से दस ऊँट छाँटकर उसके सब उत्तम-उत्तम पदार्थों में से कुछ-कुछ लेकर चला; और अरम्नहरैम में नाहोर के नगर के पास पहुँचा। (IN)

उत्पत्ति 24:11 और उसने ऊँटों को नगर के बाहर एक कुएँ के पास बैठाया। वह संध्या का समय था, जिस समय स्त्रियाँ जल भरने के लिये निकलती हैं। (IN)

उत्पत्ति 24:12 वह कहने लगा, “हे मेरे स्वामी अब्राहम के परमेश्‍वर यहोवा, आज मेरे कार्य को सिद्ध कर, और मेरे स्वामी अब्राहम पर करुणा कर। (IN)

उत्पत्ति 24:13 देख, मैं जल के इस सोते के पास खड़ा हूँ; और नगरवासियों की बेटियाँ जल भरने के लिये निकली आती हैं (IN)

उत्पत्ति 24:14 इसलिए ऐसा होने दे कि जिस कन्या से मैं कहूँ, 'अपना घड़ा मेरी ओर झुका, कि मैं पीऊँ,' और वह कहे, 'ले, पी ले, बाद में मैं तेरे ऊँटों को भी पिलाऊँगी,' यह वही हो जिसे तूने अपने दास इसहाक के लिये ठहराया हो; इसी रीति मैं जान लूँगा कि तूने मेरे स्वामी पर करुणा की है।” (IN)

उत्पत्ति 24:15 और ऐसा हुआ कि जब वह कह ही रहा था कि रिबका, जो अब्राहम के भाई नाहोर के जन्माये मिल्का के पुत्र, बतूएल की बेटी थी, वह कंधे पर घड़ा लिये हुए आई। (IN)

उत्पत्ति 24:16 वह अति सुन्दर, और कुमारी थी, और किसी पुरुष का मुँह न देखा था। वह कुएँ में सोते के पास उतर गई, और अपना घड़ा भर कर फिर ऊपर आई। (IN)

उत्पत्ति 24:17 तब वह दास उससे भेंट करने को दौड़ा, और कहा, “अपने घड़े में से थोड़ा पानी मुझे पिला दे।” (IN)

उत्पत्ति 24:18 उसने कहा, “हे मेरे प्रभु, ले, पी ले,” और उसने फुर्ती से घड़ा उतारकर हाथ में लिये-लिये उसको पानी पिला दिया। (IN)

उत्पत्ति 24:19 जब वह उसको पिला चुकी, तक कहा, “मैं तेरे ऊँटों के लिये भी तब तक पानी भर-भर लाऊँगी, जब तक वे पी न चुकें।” (IN)

उत्पत्ति 24:20 तब वह फुर्ती से अपने घड़े का जल हौदे में उण्डेलकर फिर कुएँ पर भरने को दौड़ गई; और उसके सब ऊँटों के लिये पानी भर दिया। (IN)

उत्पत्ति 24:21 और वह पुरुष उसकी ओर चुपचाप अचम्भे के साथ ताकता हुआ यह सोचता था कि यहोवा ने मेरी यात्रा को सफल किया है कि नहीं। (IN)

उत्पत्ति 24:22 जब ऊँट पी चुके, तब उस पुरुष ने आधा तोला सोने का एक नत्थ निकालकर उसको दिया, और दस तोले सोने के कंगन उसके हाथों में पहना दिए; (IN)

उत्पत्ति 24:23 और पूछा, “तू किस की बेटी है? यह मुझको बता। क्या तेरे पिता के घर में हमारे टिकने के लिये स्थान है?” (IN)

उत्पत्ति 24:24 उसने उत्तर दिया, “मैं तो नाहोर के जन्माए मिल्का के पुत्र बतूएल की बेटी हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 24:25 फिर उसने उससे कहा, “हमारे यहाँ पुआल और चारा बहुत है, और टिकने के लिये स्थान भी है।” (IN)

उत्पत्ति 24:26 तब उस पुरुष ने सिर झुकाकर यहोवा को दण्डवत् करके कहा, (IN)

उत्पत्ति 24:27 “धन्य है मेरे स्वामी अब्राहम का परमेश्‍वर यहोवा, जिसने अपनी करुणा और सच्चाई को मेरे स्वामी पर से हटा नहीं लिया: यहोवा ने मुझको ठीक मार्ग पर चलाकर मेरे स्वामी के भाई-बन्धुओं के घर पर पहुँचा दिया है।” (IN)

उत्पत्ति 24:28 तब उस कन्या ने दौड़कर अपनी माता को इस घटना का सारा हाल बता दिया। (IN)

उत्पत्ति 24:29 तब लाबान जो रिबका का भाई था, बाहर कुएँ के निकट उस पुरुष के पास दौड़ा गया। (IN)

उत्पत्ति 24:30 और ऐसा हुआ कि जब उसने वह नत्थ और अपनी बहन रिबका के हाथों में वे कंगन भी देखे, और उसकी यह बात भी सुनी कि उस पुरुष ने मुझसे ऐसी बातें कहीं; तब वह उस पुरुष के पास गया; और क्या देखा, कि वह सोते के निकट ऊँटों के पास खड़ा है। (IN)

उत्पत्ति 24:31 उसने कहा, “हे यहोवा की ओर से धन्य पुरुष भीतर आ तू क्यों बाहर खड़ा है? मैंने घर को, और ऊँटों के लिये भी स्थान तैयार किया है।” (IN)

उत्पत्ति 24:32 इस पर वह पुरुष घर में गया; और लाबान ने ऊँटों की काठियाँ खोलकर पुआल और चारा दिया; और उसके और उसके साथियों के पाँव धोने को जल दिया। (IN)

उत्पत्ति 24:33 तब अब्राहम के दास के आगे जलपान के लिये कुछ रखा गया; पर उसने कहा “मैं जब तक अपना प्रयोजन न कह दूँ, तब तक कुछ न खाऊँगा।” लाबान ने कहा, “कह दे।” (IN)

उत्पत्ति 24:34 तब उसने कहा, “मैं तो अब्राहम का दास हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 24:35 यहोवा ने मेरे स्वामी को बड़ी आशीष दी है; इसलिए वह महान पुरुष हो गया है; और उसने उसको भेड़-बकरी, गाय-बैल, सोना-रूपा, दास-दासियाँ, ऊँट और गदहे दिए हैं। (IN)

उत्पत्ति 24:36 और मेरे स्वामी की पत्‍नी सारा के बुढ़ापे में उससे एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ है; और उस पुत्र को अब्राहम ने अपना सब कुछ दे दिया है। (IN)

उत्पत्ति 24:37 मेरे स्वामी ने मुझे यह शपथ खिलाई है, कि 'मैं उसके पुत्र के लिये कनानियों की लड़कियों में से जिनके देश में वह रहता है, कोई स्त्री न ले आऊँगा। (IN)

उत्पत्ति 24:38 मैं उसके पिता के घर, और कुल के लोगों के पास जाकर उसके पुत्र के लिये एक स्त्री ले आऊँगा।' (IN)

उत्पत्ति 24:39 तब मैंने अपने स्वामी से कहा, 'कदाचित् वह स्त्री मेरे पीछे न आए।' (IN)

उत्पत्ति 24:40 तब उसने मुझसे कहा, 'यहोवा, जिसके सामने मैं चलता आया हूँ, वह तेरे संग अपने दूत को भेजकर तेरी यात्रा को सफल करेगा; और तू मेरे कुल, और मेरे पिता के घराने में से मेरे पुत्र के लिये एक स्त्री ले आ सकेगा। (IN)

उत्पत्ति 24:41 तू तब ही मेरी इस शपथ से छूटेगा, जब तू मेरे कुल के लोगों के पास पहुँचेगा; और यदि वे तुझे कोई स्त्री न दें, तो तू मेरी शपथ से छूटेगा।' (IN)

उत्पत्ति 24:42 इसलिए मैं आज उस कुएँ के निकट आकर कहने लगा, हे मेरे स्वामी अब्राहम के परमेश्‍वर यहोवा, यदि तू मेरी इस यात्रा को सफल करता हो; (IN)

उत्पत्ति 24:43 तो देख मैं जल के इस कुएँ के निकट खड़ा हूँ; और ऐसा हो, कि जो कुमारी जल भरने के लिये आए, और मैं उससे कहूँ, “अपने घड़े में से मुझे थोड़ा पानी पिला,” (IN)

उत्पत्ति 24:44 और वह मुझसे कहे, “पी ले, और मैं तेरे ऊँटों के पीने के लिये भी पानी भर दूँगी,” वह वही स्त्री हो जिसको तूने मेरे स्वामी के पुत्र के लिये ठहराया है। (IN)

उत्पत्ति 24:45 मैं मन ही मन यह कह ही रहा था, कि देख रिबका कंधे पर घड़ा लिये हुए निकल आई; फिर वह सोते के पास उतरकर भरने लगी। मैंने उससे कहा, 'मुझे पानी पिला दे।' (IN)

उत्पत्ति 24:46 और उसने जल्दी से अपने घड़े को कंधे पर से उतार के कहा, 'ले, पी ले, पीछे मैं तेरे ऊँटों को भी पिलाऊँगी,' इस प्रकार मैंने पी लिया, और उसने ऊँटों को भी पिला दिया। (IN)

उत्पत्ति 24:47 तब मैंने उससे पूछा, 'तू किस की बेटी है?' और उसने कहा, 'मैं तो नाहोर के जन्माए मिल्का के पुत्र बतूएल की बेटी हूँ,' तब मैंने उसकी नाक में वह नत्थ, और उसके हाथों में वे कंगन पहना दिए। (IN)

उत्पत्ति 24:48 फिर मैंने सिर झुकाकर यहोवा को दण्डवत् किया, और अपने स्वामी अब्राहम के परमेश्‍वर यहोवा को धन्य कहा, क्योंकि उसने मुझे ठीक मार्ग से पहुँचाया कि मैं अपने स्वामी के पुत्र के लिये उसके कुटुम्बी की पुत्री को ले जाऊँ। (IN)

उत्पत्ति 24:49 इसलिए अब, यदि तुम मेरे स्वामी के साथ कृपा और सच्चाई का व्यवहार करना चाहते हो, तो मुझसे कहो; और यदि नहीं चाहते हो; तो भी मुझसे कह दो; ताकि मैं दाहिनी ओर, या बाईं ओर फिर जाऊँ।” (IN)

उत्पत्ति 24:50 तब लाबान और बतूएल ने उत्तर दिया, “यह बात यहोवा की ओर से हुई है; इसलिए हम लोग तुझ से न तो भला कह सकते हैं न बुरा। (IN)

उत्पत्ति 24:51 देख, रिबका तेरे सामने है, उसको ले जा, और वह यहोवा के वचन के अनुसार, तेरे स्वामी के पुत्र की पत्‍नी हो जाए।” (IN)

उत्पत्ति 24:52 उनकी यह बात सुनकर, अब्राहम के दास ने भूमि पर गिरकर यहोवा को दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 24:53 फिर उस दास ने सोने और रूपे के गहने, और वस्त्र निकालकर रिबका को दिए; और उसके भाई और माता को भी उसने अनमोल-अनमोल वस्तुएँ दीं। (IN)

उत्पत्ति 24:54 तब उसने अपने संगी जनों समेत भोजन किया, और रात वहीं बिताई। उसने तड़के उठकर कहा, “मुझको अपने स्वामी के पास जाने के लिये विदा करो।” (IN)

उत्पत्ति 24:55 रिबका के भाई और माता ने कहा, “कन्या को हमारे पास कुछ दिन, अर्थात् कम से कम दस दिन रहने दे; फिर उसके पश्चात् वह चली जाएगी।” (IN)

उत्पत्ति 24:56 उसने उनसे कहा, “यहोवा ने जो मेरी यात्रा को सफल किया है; इसलिए तुम मुझे मत रोको अब मुझे विदा कर दो, कि मैं अपने स्वामी के पास जाऊँ।” (IN)

उत्पत्ति 24:57 उन्होंने कहा, “हम कन्या को बुलाकर पूछते हैं, और देखेंगे, कि वह क्या कहती है।” (IN)

उत्पत्ति 24:58 और उन्होंने रिबका को बुलाकर उससे पूछा, “क्या तू इस मनुष्य के संग जाएगी?” उसने कहा, “हाँ मैं जाऊँगी।” (IN)

उत्पत्ति 24:59 तब उन्होंने अपनी बहन रिबका, और उसकी दाई और अब्राहम के दास, और उसके साथी सभी को विदा किया। (IN)

उत्पत्ति 24:60 और उन्होंने रिबका को आशीर्वाद देकर कहा, “हे हमारी बहन, तू हजारों लाखों की आदिमाता हो, और तेरा वंश अपने बैरियों के नगरों का अधिकारी हो।” (IN)

उत्पत्ति 24:61 तब रिबका अपनी सहेलियों समेत चली; और ऊँट पर चढ़कर उस पुरुष के पीछे हो ली। इस प्रकार वह दास रिबका को साथ लेकर चल दिया। (IN)

उत्पत्ति 24:62 इसहाक जो दक्षिण देश में रहता था, लहैरोई नामक कुएँ से होकर चला आता था। (IN)

उत्पत्ति 24:63 सांझ के समय वह मैदान में ध्यान करने के लिये निकला था; और उसने आँखें उठाकर क्या देखा, कि ऊँट चले आ रहे हैं। (IN)

उत्पत्ति 24:64 रिबका ने भी आँखें उठाकर इसहाक को देखा, और देखते ही ऊँट पर से उतर पड़ी। (IN)

उत्पत्ति 24:65 तब उसने दास से पूछा, “जो पुरुष मैदान पर हम से मिलने को चला आता है, वह कौन है?” दास ने कहा, “वह तो मेरा स्वामी है।” तब रिबका ने घूँघट लेकर अपने मुँह को ढाँप लिया। (IN)

उत्पत्ति 24:66 दास ने इसहाक से अपने साथ हुई घटना का वर्णन किया। (IN)

उत्पत्ति 24:67 तब इसहाक रिबका को अपनी माता सारा के तम्बू में ले आया, और उसको ब्याह कर उससे प्रेम किया। इस प्रकार इसहाक को माता की मृत्यु के पश्चात् शान्ति प्राप्त हुई। (IN)

उत्पत्ति 25:1 ¶ तब अब्राहम ने एक पत्‍नी ब्याह ली जिसका नाम कतूरा था। (IN)

उत्पत्ति 25:2 उससे जिम्रान, योक्षान, मदना, मिद्यान, यिशबाक, और शूह उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 25:3 योक्षान से शेबा और ददान उत्‍पन्‍न हुए; और ददान के वंश में अश्शूरी, लतूशी, और लुम्मी लोग हुए। (IN)

उत्पत्ति 25:4 मिद्यान के पुत्र एपा, एपेर, हनोक, अबीदा, और एल्दा हुए, ये सब कतूरा की सन्तान हुए। (IN)

उत्पत्ति 25:5 इसहाक को तो अब्राहम ने अपना सब कुछ दिया। (IN)

उत्पत्ति 25:6 पर अपनी रखेलियों के पुत्रों को, कुछ-कुछ देकर अपने जीते जी अपने पुत्र इसहाक के पास से पूर्व देश में भेज दिया। (IN)

उत्पत्ति 25:7 ¶ अब्राहम की सारी आयु एक सौ पचहत्तर वर्ष की हुई। (IN)

उत्पत्ति 25:8 अब्राहम का दीर्घायु होने के कारण अर्थात् पूरे बुढ़ापे की अवस्था में प्राण छूट गया; और वह अपने लोगों में जा मिला। (IN)

उत्पत्ति 25:9 उसके पुत्र इसहाक और इश्माएल ने, हित्ती सोहर के पुत्र एप्रोन की मम्रे के सम्मुखवाली भूमि में, जो मकपेला की गुफा थी, उसमें उसको मिट्टी दी; (IN)

उत्पत्ति 25:10 अर्थात् जो भूमि अब्राहम ने हित्तियों से मोल ली थी; उसी में अब्राहम, और उसकी पत्‍नी सारा, दोनों को मिट्टी दी गई। (IN)

उत्पत्ति 25:11 अब्राहम के मरने के पश्चात् परमेश्‍वर ने उसके पुत्र इसहाक को जो लहैरोई नामक कुएँ के पास रहता था, आशीष दी। (IN)

उत्पत्ति 25:12 ¶ अब्राहम का पुत्र इश्माएल जो सारा की मिस्री दासी हाजिरा से उत्‍पन्‍न हुआ था, उसकी यह वंशावली है। (IN)

उत्पत्ति 25:13 इश्माएल के पुत्रों के नाम और वंशावली यह है: अर्थात् इश्माएल का जेठा पुत्र नबायोत, फिर केदार, अदबएल, मिबसाम, (IN)

उत्पत्ति 25:14 मिश्मा, दूमा, मस्सा, (IN)

उत्पत्ति 25:15 हदद, तेमा, यतूर, नापीश, और केदमा। (IN)

उत्पत्ति 25:16 इश्माएल के पुत्र ये ही हुए, और इन्हीं के नामों के अनुसार इनके गाँवों, और छावनियों के नाम भी पड़े; और ये ही बारह अपने-अपने कुल के प्रधान हुए। (IN)

उत्पत्ति 25:17 इश्माएल की सारी आयु एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई; तब उसके प्राण छूट गए, और वह अपने लोगों में जा मिला। (IN)

उत्पत्ति 25:18 और उसके वंश हवीला से शूर तक, जो मिस्र के सम्मुख अश्शूर के मार्ग में है, बस गए; और उनका भाग उनके सब भाई-बन्धुओं के सम्मुख पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 25:19 ¶ अब्राहम के पुत्र इसहाक की वंशावली यह है: अब्राहम से इसहाक उत्‍पन्‍न हुआ; (IN)

उत्पत्ति 25:20 और इसहाक ने चालीस वर्ष का होकर रिबका को, जो पद्दनराम के वासी, अरामी बतूएल की बेटी, और अरामी लाबान की बहन थी, ब्याह लिया। (IN)

उत्पत्ति 25:21 इसहाक की पत्‍नी तो बाँझ थी, इसलिए उसने उसके निमित्त यहोवा से विनती की; और यहोवा ने उसकी विनती सुनी, इस प्रकार उसकी पत्‍नी रिबका गर्भवती हुई। (IN)

उत्पत्ति 25:22 लड़के उसके गर्भ में आपस में लिपट कर एक दूसरे को मारने लगे। तब उसने कहा, “मेरी जो ऐसी ही दशा रहेगी तो मैं कैसे जीवित रहूँगी?” और वह यहोवा की इच्छा पूछने को गई। (IN)

उत्पत्ति 25:23 तब यहोवा ने उससे कहा, (IN)

उत्पत्ति 25:24 ¶ जब उसके पुत्र उत्‍पन्‍न होने का समय आया, तब क्या प्रगट हुआ, कि उसके गर्भ में जुड़वे बालक हैं। (IN)

उत्पत्ति 25:25 पहला जो उत्‍पन्‍न हुआ वह लाल निकला, और उसका सारा शरीर कम्बल के समान रोममय था; इसलिए उसका नाम एसाव रखा गया। (IN)

उत्पत्ति 25:26 पीछे उसका भाई अपने हाथ से एसाव की एड़ी पकड़े हुए उत्‍पन्‍न हुआ; और उसका नाम याकूब रखा गया। जब रिबका ने उनको जन्म दिया तब इसहाक साठ वर्ष का था। (IN)

उत्पत्ति 25:27 ¶ फिर वे लड़के बढ़ने लगे और एसाव तो वनवासी होकर चतुर शिकार खेलनेवाला हो गया, पर याकूब सीधा मनुष्य था, और तम्बूओं में रहा करता था। (IN)

उत्पत्ति 25:28 इसहाक एसाव के अहेर का माँस खाया करता था, इसलिए वह उससे प्रीति रखता था; पर रिबका याकूब से प्रीति रखती थी। (IN)

उत्पत्ति 25:29 एक दिन याकूब भोजन के लिये कुछ दाल पका रहा था; और एसाव मैदान से थका हुआ आया। (IN)

उत्पत्ति 25:30 तब एसाव ने याकूब से कहा, “वह जो लाल वस्तु है, उसी लाल वस्तु में से मुझे कुछ खिला, क्योंकि मैं थका हूँ।” इसी कारण उसका नाम एदोम भी पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 25:31 याकूब ने कहा, “अपना पहलौठे का अधिकार आज मेरे हाथ बेच दे।” (IN)

उत्पत्ति 25:32 एसाव ने कहा, “देख, मैं तो अभी मरने पर हूँ इसलिए पहलौठे के अधिकार से मेरा क्या लाभ होगा?” (IN)

उत्पत्ति 25:33 याकूब ने कहा, “मुझसे अभी शपथ खा,” अतः उसने उससे शपथ खाई, और अपना पहलौठे का अधिकार याकूब के हाथ बेच डाला। (IN)

उत्पत्ति 25:34 इस पर याकूब ने एसाव को रोटी और पकाई हुई मसूर की दाल दी; और उसने खाया पिया, तब उठकर चला गया। इस प्रकार एसाव ने अपना पहलौठे का अधिकार तुच्छ जाना। (IN)

उत्पत्ति 26:1 ¶ उस देश में अकाल पड़ा, वह उस पहले अकाल से अलग था जो अब्राहम के दिनों में पड़ा था। इसलिए इसहाक गरार को पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक के पास गया। (IN)

उत्पत्ति 26:2 वहाँ यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, “मिस्र में मत जा; जो देश मैं तुझे बताऊँ उसी में रह। (IN)

उत्पत्ति 26:3 तू इसी देश में रह, और मैं तेरे संग रहूँगा, और तुझे आशीष दूँगा; और ये सब देश मैं तुझको, और तेरे वंश को दूँगा; और जो शपथ मैंने तेरे पिता अब्राहम से खाई थी, उसे मैं पूरी करूँगा। (IN)

उत्पत्ति 26:4 और मैं तेरे वंश को आकाश के तारागण के समान करूँगा; और मैं तेरे वंश को ये सब देश दूँगा, और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी। (IN)

उत्पत्ति 26:5 क्योंकि अब्राहम ने मेरी मानी, और जो मैंने उसे सौंपा था उसको और मेरी आज्ञाओं, विधियों और व्यवस्था का पालन किया।” (IN)

उत्पत्ति 26:6 इसलिए इसहाक गरार में रह गया। (IN)

उत्पत्ति 26:7 ¶ जब उस स्थान के लोगों ने उसकी पत्‍नी के विषय में पूछा, तब उसने यह सोचकर कि यदि मैं उसको अपनी पत्‍नी कहूँ, तो यहाँ के लोग रिबका के कारण जो परम सुन्दरी है मुझको मार डालेंगे, उत्तर दिया, “वह तो मेरी बहन है।” (IN)

उत्पत्ति 26:8 जब उसको वहाँ रहते बहुत दिन बीत गए, तब एक दिन पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक ने खिड़की में से झाँककर क्या देखा कि इसहाक अपनी पत्‍नी रिबका के साथ क्रीड़ा कर रहा है। (IN)

उत्पत्ति 26:9 तब अबीमेलेक ने इसहाक को बुलवाकर कहा, “वह तो निश्चय तेरी पत्‍नी है; फिर तूने क्यों उसको अपनी बहन कहा?” इसहाक ने उत्तर दिया, “मैंने सोचा था, कि ऐसा न हो कि उसके कारण मेरी मृत्यु हो।” (IN)

उत्पत्ति 26:10 अबीमेलेक ने कहा, “तूने हम से यह क्या किया? ऐसे तो प्रजा में से कोई तेरी पत्‍नी के साथ सहज से कुकर्म कर सकता, और तू हमको पाप में फँसाता। (IN)

उत्पत्ति 26:11 इसलिए अबीमेलेक ने अपनी सारी प्रजा को आज्ञा दी, “जो कोई उस पुरुष को या उस स्त्री को छूएगा, सो निश्चय मार डाला जाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 26:12 ¶ फिर इसहाक ने उस देश में जोता बोया, और उसी वर्ष में सौ गुणा फल पाया; और यहोवा ने उसको आशीष दी, (IN)

उत्पत्ति 26:13 और वह बढ़ा और उसकी उन्नति होती चली गई, यहाँ तक कि वह बहुत धनी पुरुष हो गया। (IN)

उत्पत्ति 26:14 जब उसके भेड़-बकरी, गाय-बैल, और बहुत से दास-दासियाँ हुईं, तब पलिश्ती उससे डाह करने लगे। (IN)

उत्पत्ति 26:15 ¶ इसलिए जितने कुओं को उसके पिता अब्राहम के दासों ने अब्राहम के जीते जी खोदा था, उनको पलिश्तियों ने मिट्टी से भर दिया। (IN)

उत्पत्ति 26:16 तब अबीमेलेक ने इसहाक से कहा, “हमारे पास से चला जा; क्योंकि तू हम से बहुत सामर्थी हो गया है।” (IN)

उत्पत्ति 26:17 अतः इसहाक वहाँ से चला गया, और गरार की घाटी में अपना तम्बू खड़ा करके वहाँ रहने लगा। (IN)

उत्पत्ति 26:18 तब जो कुएँ उसके पिता अब्राहम के दिनों में खोदे गए थे, और अब्राहम के मरने के पीछे पलिश्तियों ने भर दिए थे, उनको इसहाक ने फिर से खुदवाया; और उनके वे ही नाम रखे, जो उसके पिता ने रखे थे। (IN)

उत्पत्ति 26:19 फिर इसहाक के दासों को घाटी में खोदते-खोदते बहते जल का एक सोता मिला। (IN)

उत्पत्ति 26:20 तब गरार के चरवाहों ने इसहाक के चरवाहों से झगड़ा किया, और कहा, “यह जल हमारा है।” इसलिए उसने उस कुएँ का नाम एसेक रखा; क्योंकि वे उससे झगड़े थे। (IN)

उत्पत्ति 26:21 फिर उन्होंने दूसरा कुआँ खोदा; और उन्होंने उसके लिये भी झगड़ा किया, इसलिए उसने उसका नाम सित्ना रखा। (IN)

उत्पत्ति 26:22 तब उसने वहाँ से निकलकर एक और कुआँ खुदवाया; और उसके लिये उन्होंने झगड़ा न किया; इसलिए उसने उसका नाम यह कहकर रहोबोत रखा, “अब तो यहोवा ने हमारे लिये बहुत स्थान दिया है, और हम इस देश में फूले-फलेंगे।” (IN)

उत्पत्ति 26:23 ¶ वहाँ से वह बेर्शेबा को गया। (IN)

उत्पत्ति 26:24 और उसी दिन यहोवा ने रात को उसे दर्शन देकर कहा, “मैं तेरे पिता अब्राहम का परमेश्‍वर हूँ; मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ, और अपने दास अब्राहम के कारण तुझे आशीष दूँगा, और तेरा वंश बढ़ाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 26:25 तब उसने वहाँ एक वेदी बनाई, और यहोवा से प्रार्थना की, और अपना तम्बू वहीं खड़ा किया; और वहाँ इसहाक के दासों ने एक कुआँ खोदा। (IN)

उत्पत्ति 26:26 ¶ तब अबीमेलेक अपने सलाहकार अहुज्जत, और अपने सेनापति पीकोल को संग लेकर, गरार से उसके पास गया। (IN)

उत्पत्ति 26:27 इसहाक ने उनसे कहा, “तुम ने मुझसे बैर करके अपने बीच से निकाल दिया था, अब मेरे पास क्यों आए हो?” (IN)

उत्पत्ति 26:28 उन्होंने कहा, “हमने तो प्रत्यक्ष देखा है, कि यहोवा तेरे साथ रहता है; इसलिए हमने सोचा, कि तू तो यहोवा की ओर से धन्य है, अतः हमारे तेरे बीच में शपथ खाई जाए, और हम तुझ से इस विषय की वाचा बन्धाएँ; (IN)

उत्पत्ति 26:29 कि जैसे हमने तुझे नहीं छुआ, वरन् तेरे साथ केवल भलाई ही की है, और तुझको कुशल क्षेम से विदा किया, उसके अनुसार तू भी हम से कोई बुराई न करेगा।” (IN)

उत्पत्ति 26:30 तब उसने उनको भोज दिया, और उन्होंने खाया-पिया। (IN)

उत्पत्ति 26:31 सवेरे उन सभी ने तड़के उठकर आपस में शपथ खाई; तब इसहाक ने उनको विदा किया, और वे कुशल क्षेम से उसके पास से चले गए। (IN)

उत्पत्ति 26:32 उसी दिन इसहाक के दासों ने आकर अपने उस खोदे हुए कुएँ का वृत्तान्त सुना कर कहा, “हमको जल का एक सोता मिला है।” (IN)

उत्पत्ति 26:33 तब उसने उसका नाम शिबा रखा; इसी कारण उस नगर का नाम आज तक बेर्शेबा पड़ा है। (IN)

उत्पत्ति 26:34 ¶ जब एसाव चालीस वर्ष का हुआ, तब उसने हित्ती बेरी की बेटी यहूदीत, और हित्ती एलोन की बेटी बासमत को ब्याह लिया; (IN)

उत्पत्ति 26:35 और इन स्त्रियों के कारण इसहाक और रिबका के मन को खेद हुआ। (IN)

उत्पत्ति 27:1 ¶ जब इसहाक बूढ़ा हो गया, और उसकी आँखें ऐसी धुंधली पड़ गईं कि उसको सूझता न था, तब उसने अपने जेठे पुत्र एसाव को बुलाकर कहा, “हे मेरे पुत्र,” उसने कहा, “क्या आज्ञा।” (IN)

उत्पत्ति 27:2 उसने कहा, “सुन, मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, और नहीं जानता कि मेरी मृत्यु का दिन कब होगा (IN)

उत्पत्ति 27:3 इसलिए अब तू अपना तरकश और धनुष आदि हथियार लेकर मैदान में जा, और मेरे लिये अहेर कर ले आ। (IN)

उत्पत्ति 27:4 तब मेरी रूचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बनाकर मेरे पास ले आना, कि मैं उसे खाकर मरने से पहले तुझे जी भर कर आशीर्वाद दूँ।” (IN)

उत्पत्ति 27:5 तब एसाव अहेर करने को मैदान में गया। जब इसहाक एसाव से यह बात कह रहा था, तब रिबका सुन रही थी। (IN)

उत्पत्ति 27:6 ¶ इसलिए उसने अपने पुत्र याकूब से कहा, “सुन, मैंने तेरे पिता को तेरे भाई एसाव से यह कहते सुना है, (IN)

उत्पत्ति 27:7 'तू मेरे लिये अहेर करके उसका स्वादिष्ट भोजन बना, कि मैं उसे खाकर तुझे यहोवा के आगे मरने से पहले आशीर्वाद दूँ।' (IN)

उत्पत्ति 27:8 इसलिए अब, हे मेरे पुत्र, मेरी सुन, और यह आज्ञा मान, (IN)

उत्पत्ति 27:9 कि बकरियों के पास जाकर बकरियों के दो अच्छे-अच्छे बच्चे ले आ; और मैं तेरे पिता के लिये उसकी रूचि के अनुसार उनके माँस का स्वादिष्ट भोजन बनाऊँगी। (IN)

उत्पत्ति 27:10 तब तू उसको अपने पिता के पास ले जाना, कि वह उसे खाकर मरने से पहले तुझको आशीर्वाद दे।” (IN)

उत्पत्ति 27:11 याकूब ने अपनी माता रिबका से कहा, “सुन, मेरा भाई एसाव तो रोंआर पुरुष है, और मैं रोमहीन पुरुष हूँ। (IN)

उत्पत्ति 27:12 कदाचित् मेरा पिता मुझे टटोलने लगे, तो मैं उसकी दृष्टि में ठग ठहरूँगा; और आशीष के बदले श्राप ही कमाऊँगा। (IN)

उत्पत्ति 27:13 उसकी माता ने उससे कहा, “हे मेरे, पुत्र, श्राप तुझ पर नहीं मुझी पर पड़े, तू केवल मेरी सुन, और जाकर वे बच्चे मेरे पास ले आ।” (IN)

उत्पत्ति 27:14 तब याकूब जाकर उनको अपनी माता के पास ले आया, और माता ने उसके पिता की रूचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बना दिया। (IN)

उत्पत्ति 27:15 तब रिबका ने अपने पहलौठे पुत्र एसाव के सुन्दर वस्त्र, जो उसके पास घर में थे, लेकर अपने छोटे पुत्र याकूब को पहना दिए। (IN)

उत्पत्ति 27:16 और बकरियों के बच्चों की खालों को उसके हाथों में और उसके चिकने गले में लपेट दिया। (IN)

उत्पत्ति 27:17 और वह स्वादिष्ट भोजन और अपनी बनाई हुई रोटी भी अपने पुत्र याकूब के हाथ में दे दी। (IN)

उत्पत्ति 27:18 तब वह अपने पिता के पास गया, और कहा, “हे मेरे पिता,” उसने कहा, “क्या बात है? हे मेरे पुत्र, तू कौन है?” (IN)

उत्पत्ति 27:19 याकूब ने अपने पिता से कहा, “मैं तेरा जेठा पुत्र एसाव हूँ। मैंने तेरी आज्ञा के अनुसार किया है; इसलिए उठ और बैठकर मेरे अहेर के माँस में से खा, कि तू जी से मुझे आशीर्वाद दे।” (IN)

उत्पत्ति 27:20 इसहाक ने अपने पुत्र से कहा, “हे मेरे पुत्र, क्या कारण है कि वह तुझे इतनी जल्दी मिल गया?” उसने यह उत्तर दिया, “तेरे परमेश्‍वर यहोवा ने उसको मेरे सामने कर दिया।” (IN)

उत्पत्ति 27:21 फिर इसहाक ने याकूब से कहा, “हे मेरे पुत्र, निकट आ, मैं तुझे टटोलकर जानूँ, कि तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है या नहीं।” (IN)

उत्पत्ति 27:22 तब याकूब अपने पिता इसहाक के निकट गया, और उसने उसको टटोलकर कहा, “बोल तो याकूब का सा है, पर हाथ एसाव ही के से जान पड़ते हैं।” (IN)

उत्पत्ति 27:23 और उसने उसको नहीं पहचाना, क्योंकि उसके हाथ उसके भाई के से रोंआर थे। अतः उसने उसको आशीर्वाद दिया। (IN)

उत्पत्ति 27:24 और उसने पूछा, “क्या तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है?” उसने कहा, “हाँ मैं हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 27:25 ¶ तब उसने कहा, “भोजन को मेरे निकट ले आ, कि मैं, अपने पुत्र के अहेर के माँस में से खाकर, तुझे जी से आशीर्वाद दूँ।” तब वह उसको उसके निकट ले आया, और उसने खाया; और वह उसके पास दाखमधु भी लाया, और उसने पिया। (IN)

उत्पत्ति 27:26 तब उसके पिता इसहाक ने उससे कहा, “हे मेरे पुत्र निकट आकर मुझे चूम।” (IN)

उत्पत्ति 27:27 उसने निकट जाकर उसको चूमा। और उसने उसके वस्त्रों का सुगन्ध पाकर उसको वह आशीर्वाद दिया, (IN)

उत्पत्ति 27:28 परमेश्‍वर तुझे आकाश से ओस, (IN)

उत्पत्ति 27:29 राज्य-राज्य के लोग तेरे अधीन हों, (IN)

उत्पत्ति 27:30 ¶ जैसे ही यह आशीर्वाद इसहाक याकूब को दे चुका, और याकूब अपने पिता इसहाक के सामने से निकला ही था, कि एसाव अहेर लेकर आ पहुँचा। (IN)

उत्पत्ति 27:31 तब वह भी स्वादिष्ट भोजन बनाकर अपने पिता के पास ले आया, और उसने कहा, “हे मेरे पिता, उठकर अपने पुत्र के अहेर का माँस खा, ताकि मुझे जी से आशीर्वाद दे।” (IN)

उत्पत्ति 27:32 उसके पिता इसहाक ने पूछा, “तू कौन है?” उसने कहा, “मैं तेरा जेठा पुत्र एसाव हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 27:33 तब इसहाक ने अत्यन्त थरथर काँपते हुए कहा, “फिर वह कौन था जो अहेर करके मेरे पास ले आया था, और मैंने तेरे आने से पहले सब में से कुछ-कुछ खा लिया और उसको आशीर्वाद दिया? वरन् उसको आशीष लगी भी रहेगी।” (IN)

उत्पत्ति 27:34 अपने पिता की यह बात सुनते ही एसाव ने अत्यन्त ऊँचे और दुःख भरे स्वर से चिल्लाकर अपने पिता से कहा, “हे मेरे पिता, मुझको भी आशीर्वाद दे!” (IN)

उत्पत्ति 27:35 उसने कहा, “तेरा भाई धूर्तता से आया, और तेरे आशीर्वाद को लेकर चला गया।” (IN)

उत्पत्ति 27:36 उसने कहा, “क्या उसका नाम याकूब यथार्थ नहीं रखा गया? उसने मुझे दो बार अड़ंगा मारा, मेरा पहलौठे का अधिकार तो उसने ले ही लिया था; और अब देख, उसने मेरा आशीर्वाद भी ले लिया है।” फिर उसने कहा, “क्या तूने मेरे लिये भी कोई आशीर्वाद नहीं सोच रखा है?” (IN)

उत्पत्ति 27:37 इसहाक ने एसाव को उत्तर देकर कहा, “सुन, मैंने उसको तेरा स्वामी ठहराया, और उसके सब भाइयों को उसके अधीन कर दिया, और अनाज और नया दाखमधु देकर उसको पुष्ट किया है। इसलिए अब, हे मेरे पुत्र, मैं तेरे लिये क्या करूँ?” (IN)

उत्पत्ति 27:38 एसाव ने अपने पिता से कहा, “हे मेरे पिता, क्या तेरे मन में एक ही आशीर्वाद है? हे मेरे पिता, मुझको भी आशीर्वाद दे।” यह कहकर एसाव फूट-फूट कर रोया। (IN)

उत्पत्ति 27:39 उसके पिता इसहाक ने उससे कहा, (IN)

उत्पत्ति 27:40 तू अपनी तलवार के बल से जीवित रहे, (IN)

उत्पत्ति 27:41 ¶ एसाव ने तो याकूब से अपने पिता के दिए हुए आशीर्वाद के कारण बैर रखा; और उसने सोचा, “मेरे पिता के अन्तकाल का दिन निकट है, फिर मैं अपने भाई याकूब को घात करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 27:42 जब रिबका को अपने पहलौठे पुत्र एसाव की ये बातें बताई गईं, तब उसने अपने छोटे पुत्र याकूब को बुलाकर कहा, “सुन, तेरा भाई एसाव तुझे घात करने के लिये अपने मन में धीरज रखे हुए है। (IN)

उत्पत्ति 27:43 इसलिए अब, हे मेरे पुत्र, मेरी सुन, और हारान को मेरे भाई लाबान के पास भाग जा; (IN)

उत्पत्ति 27:44 और थोड़े दिन तक, अर्थात् जब तक तेरे भाई का क्रोध न उतरे तब तक उसी के पास रहना। (IN)

उत्पत्ति 27:45 फिर जब तेरे भाई का क्रोध तुझ पर से उतरे, और जो काम तूने उससे किया है उसको वह भूल जाए; तब मैं तुझे वहाँ से बुलवा भेजूँगी। ऐसा क्यों हो कि एक ही दिन में मुझे तुम दोनों से वंचित होना पड़े?” (IN)

उत्पत्ति 27:46 फिर रिबका ने इसहाक से कहा, “हित्ती लड़कियों के कारण मैं अपने प्राण से घिन करती हूँ; इसलिए यदि ऐसी हित्ती लड़कियों में से, जैसी इस देश की लड़कियाँ हैं, याकूब भी एक को कहीं ब्याह ले, तो मेरे जीवन में क्या लाभ होगा?” (IN)

उत्पत्ति 28:1 ¶ तब इसहाक ने याकूब को बुलाकर आशीर्वाद दिया, और आज्ञा दी, “तू किसी कनानी लड़की को न ब्याह लेना। (IN)

उत्पत्ति 28:2 पद्दनराम में अपने नाना बतूएल के घर जाकर वहाँ अपने मामा लाबान की एक बेटी को ब्याह लेना। (IN)

उत्पत्ति 28:3 सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर तुझे आशीष दे, और फलवन्त कर के बढ़ाए, और तू राज्य-राज्य की मण्डली का मूल हो। (IN)

उत्पत्ति 28:4 वह तुझे और तेरे वंश को भी अब्राहम की सी आशीष दे, कि तू यह देश जिसमें तू परदेशी होकर रहता है, और जिसे परमेश्‍वर ने अब्राहम को दिया था, उसका अधिकारी हो जाए।” (IN)

उत्पत्ति 28:5 तब इसहाक ने याकूब को विदा किया, और वह पद्दनराम को अरामी बतूएल के पुत्र लाबान के पास चला, जो याकूब और एसाव की माता रिबका का भाई था। (IN)

उत्पत्ति 28:6 ¶ जब एसाव को पता चला कि इसहाक ने याकूब को आशीर्वाद देकर पद्दनराम भेज दिया, कि वह वहीं से पत्‍नी लाए, और उसको आशीर्वाद देने के समय यह आज्ञा भी दी, “तू किसी कनानी लड़की को ब्याह न लेना,” (IN)

उत्पत्ति 28:7 और याकूब माता-पिता की मानकर पद्दनराम को चल दिया। (IN)

उत्पत्ति 28:8 तब एसाव यह सब देखकर और यह भी सोचकर कि कनानी लड़कियाँ मेरे पिता इसहाक को बुरी लगती हैं, (IN)

उत्पत्ति 28:9 अब्राहम के पुत्र इश्माएल के पास गया, और इश्माएल की बेटी महलत को, जो नबायोत की बहन थी, ब्याहकर अपनी पत्नियों में मिला लिया। (IN)

उत्पत्ति 28:10 ¶ याकूब बेर्शेबा से निकलकर हारान की ओर चला। (IN)

उत्पत्ति 28:11 और उसने किसी स्थान में पहुँचकर रात वहीं बिताने का विचार किया, क्योंकि सूर्य अस्त हो गया था; इसलिए उसने उस स्थान के पत्थरों में से एक पत्थर ले अपना तकिया बनाकर रखा, और उसी स्थान में सो गया। (IN)

उत्पत्ति 28:12 तब उसने स्वप्न में क्या देखा, कि एक सीढ़ी पृथ्वी पर खड़ी है, और उसका सिरा स्वर्ग तक पहुँचा है; और परमेश्‍वर के दूत उस पर से चढ़ते-उतरते हैं। (IN)

उत्पत्ति 28:13 और यहोवा उसके ऊपर खड़ा होकर कहता है, “मैं यहोवा, तेरे दादा अब्राहम का परमेश्‍वर, और इसहाक का भी परमेश्‍वर हूँ; जिस भूमि पर तू लेटा है, उसे मैं तुझको और तेरे वंश को दूँगा। (IN)

उत्पत्ति 28:14 और तेरा वंश भूमि की धूल के किनकों के समान बहुत होगा, और पश्चिम, पूरब, उत्तर, दक्षिण, चारों ओर फैलता जाएगा: और तेरे और तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे। (IN)

उत्पत्ति 28:15 और सुन, मैं तेरे संग रहूँगा, और जहाँ कहीं तू जाए वहाँ तेरी रक्षा करूँगा, और तुझे इस देश में लौटा ले आऊँगा: मैं अपने कहे हुए को जब तक पूरा न कर लूँ तब तक तुझको न छोड़ूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 28:16 तब याकूब जाग उठा, और कहने लगा, “निश्चय इस स्थान में यहोवा है; और मैं इस बात को न जानता था।” (IN)

उत्पत्ति 28:17 और भय खाकर उसने कहा, “यह स्थान क्या ही भयानक है! “यह तो परमेश्‍वर के भवन को छोड़ और कुछ नहीं हो सकता; वरन् यह स्वर्ग का फाटक ही होगा।” (IN)

उत्पत्ति 28:18 भोर को याकूब उठा, और अपने तकिये का पत्थर लेकर उसका खम्भा खड़ा किया, और उसके सिरे पर तेल डाल दिया। (IN)

उत्पत्ति 28:19 और उसने उस स्थान का नाम बेतेल रखा; पर उस नगर का नाम पहले लूज़ था। (IN)

उत्पत्ति 28:20 याकूब ने यह मन्नत मानी, “यदि परमेश्‍वर मेरे संग रहकर इस यात्रा में मेरी रक्षा करे, और मुझे खाने के लिये रोटी, और पहनने के लिये कपड़ा दे, (IN)

उत्पत्ति 28:21 और मैं अपने पिता के घर में कुशल क्षेम से लौट आऊँ; तो यहोवा मेरा परमेश्‍वर ठहरेगा। (IN)

उत्पत्ति 28:22 और यह पत्थर, जिसका मैंने खम्भा खड़ा किया है, परमेश्‍वर का भवन ठहरेगा: और जो कुछ तू मुझे दे उसका दशमांश मैं अवश्य ही तुझे दिया करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 29:1 ¶ फिर याकूब ने अपना मार्ग लिया, और पूर्वियों के देश में आया। (IN)

उत्पत्ति 29:2 और उसने दृष्टि करके क्या देखा, कि मैदान में एक कुआँ है, और उसके पास भेड़-बकरियों के तीन झुण्ड बैठे हुए हैं; क्योंकि जो पत्थर उस कुएँ के मुँह पर धरा रहता था, जिसमें से झुण्डों को जल पिलाया जाता था, वह भारी था। (IN)

उत्पत्ति 29:3 और जब सब झुण्ड वहाँ इकट्ठे हो जाते तब चरवाहे उस पत्थर को कुएँ के मुँह पर से लुढ़काकर भेड़-बकरियों को पानी पिलाते, और फिर पत्थर को कुएँ के मुँह पर ज्यों का त्यों रख देते थे। (IN)

उत्पत्ति 29:4 अतः याकूब ने चरवाहों से पूछा, “हे मेरे भाइयों, तुम कहाँ के हो?” उन्होंने कहा, “हम हारान के हैं।” (IN)

उत्पत्ति 29:5 तब उसने उनसे पूछा, “क्या तुम नाहोर के पोते लाबान को जानते हो?” उन्होंने कहा, “हाँ, हम उसे जानते हैं।” (IN)

उत्पत्ति 29:6 फिर उसने उनसे पूछा, “क्या वह कुशल से है?” उन्होंने कहा, “हाँ, कुशल से है और वह देख, उसकी बेटी राहेल भेड़-बकरियों को लिये हुए चली आती है।” (IN)

उत्पत्ति 29:7 उसने कहा, “देखो, अभी तो दिन बहुत है, पशुओं के इकट्ठे होने का समय नहीं; इसलिए भेड़-बकरियों को जल पिलाकर फिर ले जाकर चराओ।” (IN)

उत्पत्ति 29:8 उन्होंने कहा, “हम अभी ऐसा नहीं कर सकते, जब सब झुण्ड इकट्ठे होते हैं तब पत्थर कुएँ के मुँह से लुढ़काया जाता है, और तब हम भेड़-बकरियों को पानी पिलाते हैं।” (IN)

उत्पत्ति 29:9 उनकी यह बातचीत हो रही थी, कि राहेल जो पशु चराया करती थी, अपने पिता की भेड़-बकरियों को लिये हुए आ गई। (IN)

उत्पत्ति 29:10 अपने मामा लाबान की बेटी राहेल को, और उसकी भेड़-बकरियों को भी देखकर याकूब ने निकट जाकर कुएँ के मुँह पर से पत्थर को लुढ़काकर अपने मामा लाबान की भेड़-बकरियों को पानी पिलाया। (IN)

उत्पत्ति 29:11 तब याकूब ने राहेल को चूमा, और ऊँचे स्वर से रोया। (IN)

उत्पत्ति 29:12 और याकूब ने राहेल को बता दिया, कि मैं तेरा फुफेरा भाई हूँ, अर्थात् रिबका का पुत्र हूँ। तब उसने दौड़कर अपने पिता से कह दिया। (IN)

उत्पत्ति 29:13 अपने भांजे याकूब का समाचार पाते ही लाबान उससे भेंट करने को दौड़ा, और उसको गले लगाकर चूमा, फिर अपने घर ले आया। और याकूब ने लाबान से अपना सब वृत्तान्त वर्णन किया। (IN)

उत्पत्ति 29:14 तब लाबान ने याकूब से कहा, “तू तो सचमुच मेरी हड्डी और माँस है।” और याकूब एक महीना भर उसके साथ रहा। (IN)

उत्पत्ति 29:15 तब लाबान ने याकूब से कहा, “भाई-बन्धु होने के कारण तुझ से मुफ़्त सेवा कराना मेरे लिए उचित नहीं है; इसलिए कह मैं तुझे सेवा के बदले क्या दूँ?” (IN)

उत्पत्ति 29:16 लाबान की दो बेटियाँ थी, जिनमें से बड़ी का नाम लिआ और छोटी का राहेल था। (IN)

उत्पत्ति 29:17 लिआ के तो धुन्धली आँखें थीं, पर राहेल रूपवती और सुन्दर थी। (IN)

उत्पत्ति 29:18 ¶ इसलिए याकूब ने, जो राहेल से प्रीति रखता था, कहा, “मैं तेरी छोटी बेटी राहेल के लिये सात वर्ष तेरी सेवा करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 29:19 लाबान ने कहा, “उसे पराए पुरुष को देने से तुझको देना उत्तम होगा; इसलिए मेरे पास रह।” (IN)

उत्पत्ति 29:20 अतः याकूब ने राहेल के लिये सात वर्ष सेवा की; और वे उसको राहेल की प्रीति के कारण थोड़े ही दिनों के बराबर जान पड़े। (IN)

उत्पत्ति 29:21 ¶ तब याकूब ने लाबान से कहा, “मेरी पत्‍नी मुझे दे, और मैं उसके पास जाऊँगा, क्योंकि मेरा समय पूरा हो गया है।” (IN)

उत्पत्ति 29:22 अतः लाबान ने उस स्थान के सब मनुष्यों को बुलाकर इकट्ठा किया, और एक भोज दिया। (IN)

उत्पत्ति 29:23 सांझ के समय वह अपनी बेटी लिआ को याकूब के पास ले गया, और वह उसके पास गया। (IN)

उत्पत्ति 29:24 लाबान ने अपनी बेटी लिआ को उसकी दासी होने के लिये अपनी दासी जिल्पा दी। (IN)

उत्पत्ति 29:25 भोर को मालूम हुआ कि यह तो लिआ है, इसलिए उसने लाबान से कहा, “यह तूने मुझसे क्या किया है? मैंने तेरे साथ रहकर जो तेरी सेवा की, तो क्या राहेल के लिये नहीं की? फिर तूने मुझसे क्यों ऐसा छल किया है?” (IN)

उत्पत्ति 29:26 लाबान ने कहा, “हमारे यहाँ ऐसी रीति नहीं, कि बड़ी बेटी से पहले दूसरी का विवाह कर दें। (IN)

उत्पत्ति 29:27 ¶ इसका सप्ताह तो पूरा कर; फिर दूसरी भी तुझे उस सेवा के लिये मिलेगी जो तू मेरे साथ रहकर और सात वर्ष तक करेगा।” (IN)

उत्पत्ति 29:28 याकूब ने ऐसा ही किया, और लिआ के सप्ताह को पूरा किया; तब लाबान ने उसे अपनी बेटी राहेल भी दी, कि वह उसकी पत्‍नी हो। (IN)

उत्पत्ति 29:29 लाबान ने अपनी बेटी राहेल की दासी होने के लिये अपनी दासी बिल्हा को दिया। (IN)

उत्पत्ति 29:30 तब याकूब राहेल के पास भी गया, और उसकी प्रीति लिआ से अधिक उसी पर हुई, और उसने लाबान के साथ रहकर सात वर्ष और उसकी सेवा की। (IN)

उत्पत्ति 29:31 ¶ जब यहोवा ने देखा कि लिआ अप्रिय हुई, तब उसने उसकी कोख खोली, पर राहेल बाँझ रही। (IN)

उत्पत्ति 29:32 अतः लिआ गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ, और उसने यह कहकर उसका नाम रूबेन रखा, “यहोवा ने मेरे दुःख पर दृष्टि की है, अब मेरा पति मुझसे प्रीति रखेगा।” (IN)

उत्पत्ति 29:33 फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ; तब उसने यह कहा, “यह सुनकर कि मैं अप्रिय हूँ यहोवा ने मुझे यह भी पुत्र दिया।” इसलिए उसने उसका नाम शिमोन रखा। (IN)

उत्पत्ति 29:34 फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ; और उसने कहा, “अब की बार तो मेरा पति मुझसे मिल जाएगा, क्योंकि उससे मेरे तीन पुत्र उत्‍पन्‍न हुए।” इसलिए उसका नाम लेवी रखा गया। (IN)

उत्पत्ति 29:35 और फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक और पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ; और उसने कहा, “अब की बार तो मैं यहोवा का धन्यवाद करूँगी।” इसलिए उसने उसका नाम यहूदा रखा; तब उसकी कोख बन्द हो गई। (IN)

उत्पत्ति 30:1 ¶ जब राहेल ने देखा कि याकूब के लिये मुझसे कोई सन्तान नहीं होती, तब वह अपनी बहन से डाह करने लगी और याकूब से कहा, “मुझे भी सन्तान दे, नहीं तो मर जाऊँगी।” (IN)

उत्पत्ति 30:2 तब याकूब ने राहेल से क्रोधित होकर कहा, “क्या मैं परमेश्‍वर हूँ? तेरी कोख तो उसी ने बन्द कर रखी है।” (IN)

उत्पत्ति 30:3 राहेल ने कहा, “अच्छा, मेरी दासी बिल्हा हाज़िर है; उसी के पास जा, वह मेरे घुटनों पर जनेगी, और उसके द्वारा मेरा भी घर बसेगा।” (IN)

उत्पत्ति 30:4 तब उसने उसे अपनी दासी बिल्हा को दिया, कि वह उसकी पत्‍नी हो; और याकूब उसके पास गया। (IN)

उत्पत्ति 30:5 और बिल्हा गर्भवती हुई और याकूब से उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 30:6 तब राहेल ने कहा, “परमेश्‍वर ने मेरा न्याय चुकाया और मेरी सुनकर मुझे एक पुत्र दिया।” इसलिए उसने उसका नाम दान रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:7 राहेल की दासी बिल्हा फिर गर्भवती हुई और याकूब से एक पुत्र और उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 30:8 तब राहेल ने कहा, “मैंने अपनी बहन के साथ बड़े बल से लिपटकर मल्लयुद्ध किया और अब जीत गई।” अतः उसने उसका नाम नप्ताली रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:9 जब लिआ ने देखा कि मैं जनने से रहित हो गई हूँ, तब उसने अपनी दासी जिल्पा को लेकर याकूब की पत्‍नी होने के लिये दे दिया। (IN)

उत्पत्ति 30:10 और लिआ की दासी जिल्पा के भी याकूब से एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 30:11 तब लिआ ने कहा, “अहो भाग्य!” इसलिए उसने उसका नाम गाद रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:12 फिर लिआ की दासी जिल्पा के याकूब से एक और पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 30:13 तब लिआ ने कहा, “मैं धन्य हूँ; निश्चय स्त्रियाँ मुझे धन्य कहेंगी।” इसलिए उसने उसका नाम आशेर रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:14 गेहूँ की कटनी के दिनों में रूबेन को मैदान में दूदाफल मिले, और वह उनको अपनी माता लिआ के पास ले गया, तब राहेल ने लिआ से कहा, “अपने पुत्र के दूदाफलों में से कुछ मुझे दे।” (IN)

उत्पत्ति 30:15 उसने उससे कहा, “तूने जो मेरे पति को ले लिया है क्या छोटी बात है? अब क्या तू मेरे पुत्र के दूदाफल भी लेना चाहती है?” राहेल ने कहा, “अच्छा, तेरे पुत्र के दूदाफलों के बदले वह आज रात को तेरे संग सोएगा।” (IN)

उत्पत्ति 30:16 सांझ को जब याकूब मैदान से आ रहा था, तब लिआ उससे भेंट करने को निकली, और कहा, “तुझे मेरे ही पास आना होगा, क्योंकि मैंने अपने पुत्र के दूदाफल देकर तुझे सचमुच मोल लिया।” तब वह उस रात को उसी के संग सोया। (IN)

उत्पत्ति 30:17 तब परमेश्‍वर ने लिआ की सुनी, और वह गर्भवती हुई और याकूब से उसके पाँचवाँ पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 30:18 तब लिआ ने कहा, “मैंने जो अपने पति को अपनी दासी दी, इसलिए परमेश्‍वर ने मुझे मेरी मजदूरी दी है।” इसलिए उसने उसका नाम इस्साकार रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:19 लिआ फिर गर्भवती हुई और याकूब से उसके छठवाँ पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ। (IN)

उत्पत्ति 30:20 तब लिआ ने कहा, “परमेश्‍वर ने मुझे अच्छा दान दिया है; अब की बार मेरा पति मेरे संग बना रहेगा, क्योंकि मेरे उससे छः पुत्र उत्‍पन्‍न हो चुके हैं।” इसलिए उसने उसका नाम जबूलून रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:21 तत्पश्चात् उसके एक बेटी भी हुई, और उसने उसका नाम दीना रखा। (IN)

उत्पत्ति 30:22 परमेश्‍वर ने राहेल की भी सुधि ली, और उसकी सुनकर उसकी कोख खोली। (IN)

उत्पत्ति 30:23 इसलिए वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ; तब उसने कहा, “परमेश्‍वर ने मेरी नामधराई को दूर कर दिया है।” (IN)

उत्पत्ति 30:24 इसलिए उसने यह कहकर उसका नाम यूसुफ रखा, “परमेश्‍वर मुझे एक पुत्र और भी देगा।” (IN)

उत्पत्ति 30:25 ¶ जब राहेल से यूसुफ उत्‍पन्‍न हुआ, तब याकूब ने लाबान से कहा, “मुझे विदा कर कि मैं अपने देश और स्थान को जाऊँ। (IN)

उत्पत्ति 30:26 मेरी स्त्रियाँ और मेरे बच्चे, जिनके लिये मैंने तेरी सेवा की है, उन्हें मुझे दे कि मैं चला जाऊँ; तू तो जानता है कि मैंने तेरी कैसी सेवा की है।” (IN)

उत्पत्ति 30:27 लाबान ने उससे कहा, “यदि तेरी दृष्टि में मैंने अनुग्रह पाया है, तो यहीं रह जा; क्योंकि मैंने अनुभव से जान लिया है कि यहोवा ने तेरे कारण से मुझे आशीष दी है।” (IN)

उत्पत्ति 30:28 फिर उसने कहा, “तू ठीक बता कि मैं तुझको क्या दूँ, और मैं उसे दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 30:29 उसने उससे कहा, “तू जानता है कि मैंने तेरी कैसी सेवा की, और तेरे पशु मेरे पास किस प्रकार से रहे। (IN)

उत्पत्ति 30:30 मेरे आने से पहले वे कितने थे, और अब कितने हो गए हैं; और यहोवा ने मेरे आने पर तुझे आशीष दी है। पर मैं अपने घर का काम कब करने पाऊँगा?” (IN)

उत्पत्ति 30:31 उसने फिर कहा, “मैं तुझे क्या दूँ?” याकूब ने कहा, “तू मुझे कुछ न दे; यदि तू मेरे लिये एक काम करे, तो मैं फिर तेरी भेड़-बकरियों को चराऊँगा, और उनकी रक्षा करूँगा। (IN)

उत्पत्ति 30:32 मैं आज तेरी सब भेड़-बकरियों के बीच होकर निकलूँगा, और जो भेड़ या बकरी चित्तीवाली या चितकबरी हो, और जो भेड़ काली हो, और जो बकरी चितकबरी और चित्तीवाली हो, उन्हें मैं अलग कर रखूँगा; और मेरी मजदूरी में वे ही ठहरेंगी। (IN)

उत्पत्ति 30:33 और जब आगे को मेरी मजदूरी की चर्चा तेरे सामने चले, तब धर्म की यही साक्षी होगी; अर्थात् बकरियों में से जो कोई न चित्तीवाली न चितकबरी हो, और भेड़ों में से जो कोई काली न हो, यदि मेरे पास निकलें, तो चोरी की ठहरेंगी।” (IN)

उत्पत्ति 30:34 तब लाबान ने कहा, “तेरे कहने के अनुसार हो।” (IN)

उत्पत्ति 30:35 अतः उसने उसी दिन सब धारीवाले और चितकबरे बकरों, और सब चित्तीवाली और चितकबरी बकरियों को, अर्थात् जिनमें कुछ उजलापन था, उनको और सब काली भेड़ों को भी अलग करके अपने पुत्रों के हाथ सौंप दिया। (IN)

उत्पत्ति 30:36 और उसने अपने और याकूब के बीच में तीन दिन के मार्ग का अन्तर ठहराया; और याकूब लाबान की भेड़-बकरियों को चराने लगा। (IN)

उत्पत्ति 30:37 तब याकूब ने चिनार, और बादाम, और अर्मोन वृक्षों की हरी-हरी छड़ियाँ लेकर, उनके छिलके कहीं-कहीं छील के, उन्हें धारीदार बना दिया, ऐसी कि उन छड़ियों की सफेदी दिखाई देने लगी। (IN)

उत्पत्ति 30:38 और तब छीली हुई छड़ियों को भेड़-बकरियों के सामने उनके पानी पीने के कठौतों में खड़ा किया; और जब वे पानी पीने के लिये आई तब गाभिन हो गईं। (IN)

उत्पत्ति 30:39 छड़ियों के सामने गाभिन होकर, भेड़-बकरियाँ धारीवाले, चित्तीवाले और चितकबरे बच्चे जनीं। (IN)

उत्पत्ति 30:40 तब याकूब ने भेड़ों के बच्चों को अलग-अलग किया, और लाबान की भेड़-बकरियों के मुँह को चित्तीवाले और सबकाले बच्चों की ओर कर दिया; और अपने झुण्डों को उनसे अलग रखा, और लाबान की भेड़-बकरियों से मिलने न दिया। (IN)

उत्पत्ति 30:41 और जब-जब बलवन्त भेड़-बकरियाँ गाभिन होती थीं, तब-तब याकूब उन छड़ियों को कठौतों में उनके सामने रख देता था; जिससे वे छड़ियों को देखती हुई गाभिन हो जाएँ। (IN)

उत्पत्ति 30:42 पर जब निर्बल भेड़-बकरियाँ गाभिन होती थी, तब वह उन्हें उनके आगे नहीं रखता था। इससे निर्बल-निर्बल लाबान की रहीं, और बलवन्त-बलवन्त याकूब की हो गईं। (IN)

उत्पत्ति 30:43 इस प्रकार वह पुरुष अत्यन्त धनाढ्य हो गया, और उसके बहुत सी भेड़-बकरियाँ, और दासियाँ और दास और ऊँट और गदहे हो गए। (IN)

उत्पत्ति 31:1 ¶ फिर लाबान के पुत्रों की ये बातें याकूब के सुनने में आईं, “याकूब ने हमारे पिता का सब कुछ छीन लिया है, और हमारे पिता के धन के कारण उसकी यह प्रतिष्ठा है।” (IN)

उत्पत्ति 31:2 और याकूब ने लाबान के चेहरे पर दृष्टि की और ताड़ लिया, कि वह उसके प्रति पहले के समान नहीं है। (IN)

उत्पत्ति 31:3 तब यहोवा ने याकूब से कहा, “अपने पितरों के देश और अपनी जन्म-भूमि को लौट जा, और मैं तेरे संग रहूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 31:4 तब याकूब ने राहेल और लिआ को, मैदान में अपनी भेड़-बकरियों के पास बुलवाकर कहा, (IN)

उत्पत्ति 31:5 “तुम्हारे पिता के चेहरे से मुझे समझ पड़ता है, कि वह तो मुझे पहले के सामान अब नहीं देखता; पर मेरे पिता का परमेश्‍वर मेरे संग है। (IN)

उत्पत्ति 31:6 और तुम भी जानती हो, कि मैंने तुम्हारे पिता की सेवा शक्ति भर की है। (IN)

उत्पत्ति 31:7 फिर भी तुम्हारे पिता ने मुझसे छल करके मेरी मजदूरी को दस बार बदल दिया; परन्तु परमेश्‍वर ने उसको मेरी हानि करने नहीं दिया। (IN)

उत्पत्ति 31:8 जब उसने कहा, 'चित्तीवाले बच्चे तेरी मजदूरी ठहरेंगे,' तब सब भेड़-बकरियाँ चित्तीवाले ही जनने लगीं, और जब उसने कहा, 'धारीवाले बच्चे तेरी मजदूरी ठहरेंगे,' तब सब भेड़-बकरियाँ धारीवाले जनने लगीं। (IN)

उत्पत्ति 31:9 इस रीति से परमेश्‍वर ने तुम्हारे पिता के पशु लेकर मुझको दे दिए। (IN)

उत्पत्ति 31:10 भेड़-बकरियों के गाभिन होने के समय मैंने स्वप्न में क्या देखा, कि जो बकरे बकरियों पर चढ़ रहे हैं, वे धारीवाले, चित्तीवाले, और धब्बेवाले हैं। (IN)

उत्पत्ति 31:11 तब परमेश्‍वर के दूत ने स्वप्न में मुझसे कहा, 'हे याकूब,' मैंने कहा, 'क्या आज्ञा।' (IN)

उत्पत्ति 31:12 उसने कहा, 'आँखें उठाकर उन सब बकरों को जो बकरियों पर चढ़ रहे हैं, देख, कि वे धारीवाले, चित्तीवाले, और धब्बेवाले हैं; क्योंकि जो कुछ लाबान तुझ से करता है, वह मैंने देखा है। (IN)

उत्पत्ति 31:13 मैं उस बेतेल का परमेश्‍वर हूँ, जहाँ तूने एक खम्भे पर तेल डाल दिया था और मेरी मन्नत मानी थी। अब चल, इस देश से निकलकर अपनी जन्म-भूमि को लौट जा'।” (IN)

उत्पत्ति 31:14 तब राहेल और लिआ ने उससे कहा, “क्या हमारे पिता के घर में अब भी हमारा कुछ भाग या अंश बचा है? (IN)

उत्पत्ति 31:15 क्या हम उसकी दृष्टि में पराये न ठहरीं? देख, उसने हमको तो बेच डाला, और हमारे रूपे को खा बैठा है। (IN)

उत्पत्ति 31:16 इसलिए परमेश्‍वर ने हमारे पिता का जितना धन ले लिया है, वह हमारा, और हमारे बच्चों का है; अब जो कुछ परमेश्‍वर ने तुझ से कहा है, वही कर।” (IN)

उत्पत्ति 31:17 तब याकूब ने अपने बच्चों और स्त्रियों को ऊँटों पर चढ़ाया; (IN)

उत्पत्ति 31:18 और जितने पशुओं को वह पद्दनराम में इकट्ठा करके धनाढ्य हो गया था, सबको कनान में अपने पिता इसहाक के पास जाने की मनसा से, साथ ले गया। (IN)

उत्पत्ति 31:19 लाबान तो अपनी भेड़ों का ऊन कतरने के लिये चला गया था, और राहेल अपने पिता के गृहदेवताओं को चुरा ले गई। (IN)

उत्पत्ति 31:20 अतः याकूब लाबान अरामी के पास से चोरी से चला गया, उसको न बताया कि मैं भागा जाता हूँ। (IN)

उत्पत्ति 31:21 वह अपना सब कुछ लेकर भागा, और महानद के पार उतरकर अपना मुँह गिलाद के पहाड़ी देश की ओर किया। (IN)

उत्पत्ति 31:22 ¶ तीसरे दिन लाबान को समाचार मिला कि याकूब भाग गया है। (IN)

उत्पत्ति 31:23 इसलिए उसने अपने भाइयों को साथ लेकर उसका सात दिन तक पीछा किया, और गिलाद के पहाड़ी देश में उसको जा पकड़ा। (IN)

उत्पत्ति 31:24 तब परमेश्‍वर ने रात के स्वप्न में अरामी लाबान के पास आकर कहा, “सावधान रह, तू याकूब से न तो भला कहना और न बुरा।” (IN)

उत्पत्ति 31:25 और लाबान याकूब के पास पहुँच गया। याकूब अपना तम्बू गिलाद नामक पहाड़ी देश में खड़ा किए पड़ा था; और लाबान ने भी अपने भाइयों के साथ अपना तम्बू उसी पहाड़ी देश में खड़ा किया। (IN)

उत्पत्ति 31:26 तब लाबान याकूब से कहने लगा, “तूने यह क्या किया, कि मेरे पास से चोरी से चला आया, और मेरी बेटियों को ऐसा ले आया, जैसा कोई तलवार के बल से बन्दी बनाई गई हों? (IN)

उत्पत्ति 31:27 तू क्यों चुपके से भाग आया, और मुझसे बिना कुछ कहे मेरे पास से चोरी से चला आया; नहीं तो मैं तुझे आनन्द के साथ मृदंग और वीणा बजवाते, और गीत गवाते विदा करता? (IN)

उत्पत्ति 31:28 तूने तो मुझे अपने बेटे-बेटियों को चूमने तक न दिया? तूने मूर्खता की है। (IN)

उत्पत्ति 31:29 तुम लोगों की हानि करने की शक्ति मेरे हाथ में तो है; पर तुम्हारे पिता के परमेश्‍वर ने मुझसे बीती हुई रात में कहा, 'सावधान रह, याकूब से न तो भला कहना और न बुरा।' (IN)

उत्पत्ति 31:30 भला, अब तू अपने पिता के घर का बड़ा अभिलाषी होकर चला आया तो चला आया, पर मेरे देवताओं को तू क्यों चुरा ले आया है?” (IN)

उत्पत्ति 31:31 याकूब ने लाबान को उत्तर दिया, “मैं यह सोचकर डर गया था कि कहीं तू अपनी बेटियों को मुझसे छीन न ले। (IN)

उत्पत्ति 31:32 जिस किसी के पास तू अपने देवताओं को पाए, वह जीवित न बचेगा। मेरे पास तेरा जो कुछ निकले, उसे भाई-बन्धुओं के सामने पहचानकर ले-ले।” क्योंकि याकूब न जानता था कि राहेल गृहदेवताओं को चुरा ले आई है। (IN)

उत्पत्ति 31:33 यह सुनकर लाबान, याकूब और लिआ और दोनों दासियों के तम्बूओं में गया; और कुछ न मिला। तब लिआ के तम्बू में से निकलकर राहेल के तम्बू में गया। (IN)

उत्पत्ति 31:34 राहेल तो गृहदेवताओं को ऊँट की काठी में रखकर उन पर बैठी थी। लाबान ने उसके सारे तम्बू में टटोलने पर भी उन्हें न पाया। (IN)

उत्पत्ति 31:35 राहेल ने अपने पिता से कहा, “हे मेरे प्रभु; इससे अप्रसन्न न हो, कि मैं तेरे सामने नहीं उठी; क्योंकि मैं मासिक धर्म से हूँ।” अतः उसके ढूँढ़ ढाँढ़ करने पर भी गृहदेवता उसको न मिले। (IN)

उत्पत्ति 31:36 तब याकूब क्रोधित होकर लाबान से झगड़ने लगा, और कहा, “मेरा क्या अपराध है? मेरा क्या पाप है, कि तूने इतना क्रोधित होकर मेरा पीछा किया है? (IN)

उत्पत्ति 31:37 तूने जो मेरी सारी सामग्री को टटोलकर देखा, तो तुझको अपने घर की सारी सामग्री में से क्या मिला? कुछ मिला हो तो उसको यहाँ अपने और मेरे भाइयों के सामने रख दे, और वे हम दोनों के बीच न्याय करें। (IN)

उत्पत्ति 31:38 इन बीस वर्षों से मैं तेरे पास रहा; इनमें न तो तेरी भेड़-बकरियों के गर्भ गिरे, और न तेरे मेढ़ों का माँस मैंने कभी खाया। (IN)

उत्पत्ति 31:39 जिसे जंगली जन्तुओं ने फाड़ डाला उसको मैं तेरे पास न लाता था, उसकी हानि मैं ही उठाता था; चाहे दिन को चोरी जाता चाहे रात को, तू मुझ ही से उसको ले लेता था। (IN)

उत्पत्ति 31:40 मेरी तो यह दशा थी कि दिन को तो घाम और रात को पाला मुझे खा गया; और नींद मेरी आँखों से भाग जाती थी। (IN)

उत्पत्ति 31:41 बीस वर्ष तक मैं तेरे घर में रहा; चौदह वर्ष तो मैंने तेरी दोनों बेटियों के लिये, और छः वर्ष तेरी भेड़-बकरियों के लिये सेवा की; और तूने मेरी मजदूरी को दस बार बदल डाला। (IN)

उत्पत्ति 31:42 मेरे पिता का परमेश्‍वर अर्थात् अब्राहम का परमेश्‍वर, जिसका भय इसहाक भी मानता है, यदि मेरी ओर न होता, तो निश्चय तू अब मुझे खाली हाथ जाने देता। मेरे दुःख और मेरे हाथों के परिश्रम को देखकर परमेश्‍वर ने बीती हुई रात में तुझे डाँटा।” (IN)

उत्पत्ति 31:43 ¶ लाबान ने याकूब से कहा, “ये बेटियाँ तो मेरी ही हैं, और ये पुत्र भी मेरे ही हैं, और ये भेड़-बकरियाँ भी मेरे ही हैं, और जो कुछ तुझे देख पड़ता है वह सब मेरा ही है परन्तु अब मैं अपनी इन बेटियों और इनकी सन्तान से क्या कर सकता हूँ? (IN)

उत्पत्ति 31:44 अब आ, मैं और तू दोनों आपस में वाचा बाँधें, और वह मेरे और तेरे बीच साक्षी ठहरी रहे।” (IN)

उत्पत्ति 31:45 तब याकूब ने एक पत्थर लेकर उसका खम्भा खड़ा किया। (IN)

उत्पत्ति 31:46 तब याकूब ने अपने भाई-बन्धुओं से कहा, “पत्थर इकट्ठा करो,” यह सुनकर उन्होंने पत्थर इकट्ठा करके एक ढेर लगाया और वहीं ढेर के पास उन्होंने भोजन किया। (IN)

उत्पत्ति 31:47 उस ढेर का नाम लाबान ने तो जैगर सहादुथा, पर याकूब ने गिलियाद रखा। (IN)

उत्पत्ति 31:48 लाबान ने कहा, “यह ढेर आज से मेरे और तेरे बीच साक्षी रहेगा।” इस कारण उसका नाम गिलियाद रखा गया, (IN)

उत्पत्ति 31:49 और मिस्पा भी; क्योंकि उसने कहा, “जब हम एक दूसरे से दूर रहें तब यहोवा मेरी और तेरी देख-भाल करता रहे। (IN)

उत्पत्ति 31:50 यदि तू मेरी बेटियों को दुःख दे, या उनके सिवाय और स्त्रियाँ ब्याह ले, तो हमारे साथ कोई मनुष्य तो न रहेगा; पर देख मेरे तेरे बीच में परमेश्‍वर साक्षी रहेगा।” (IN)

उत्पत्ति 31:51 फिर लाबान ने याकूब से कहा, “इस ढेर को देख और इस खम्भे को भी देख, जिनको मैंने अपने और तेरे बीच में खड़ा किया है। (IN)

उत्पत्ति 31:52 यह ढेर और यह खम्भा दोनों इस बात के साक्षी रहें कि हानि करने की मनसा से न तो मैं इस ढेर को लाँघकर तेरे पास जाऊँगा, न तू इस ढेर और इस खम्भे को लाँघकर मेरे पास आएगा। (IN)

उत्पत्ति 31:53 अब्राहम और नाहोर और उनके पिता; तीनों का जो परमेश्‍वर है, वही हम दोनों के बीच न्याय करे।” तब याकूब ने उसकी शपथ खाई जिसका भय उसका पिता इसहाक मानता था। (IN)

उत्पत्ति 31:54 और याकूब ने उस पहाड़ पर बलि चढ़ाया, और अपने भाई-बन्धुओं को भोजन करने के लिये बुलाया, तब उन्होंने भोजन करके पहाड़ पर रात बिताई। (IN)

उत्पत्ति 31:55 भोर को लाबान उठा, और अपने बेटे-बेटियों को चूमकर और आशीर्वाद देकर चल दिया, और अपने स्थान को लौट गया। (IN)

उत्पत्ति 32:1 ¶ याकूब ने भी अपना मार्ग लिया और परमेश्‍वर के दूत उसे आ मिले। (IN)

उत्पत्ति 32:2 उनको देखते ही याकूब ने कहा, “यह तो परमेश्‍वर का दल है।” इसलिए उसने उस स्थान का नाम महनैम रखा। (IN)

उत्पत्ति 32:3 तब याकूब ने सेईर देश में, अर्थात् एदोम देश में, अपने भाई एसाव के पास अपने आगे दूत भेज दिए। (IN)

उत्पत्ति 32:4 और उसने उन्हें यह आज्ञा दी, “मेरे प्रभु एसाव से यह कहना; कि तेरा दास याकूब तुझ से यह कहता है, कि मैं लाबान के यहाँ परदेशी होकर अब तक रहा; (IN)

उत्पत्ति 32:5 और मेरे पास गाय-बैल, गदहे, भेड़-बकरियाँ, और दास-दासियाँ हैं और मैंने अपने प्रभु के पास इसलिए सन्देश भेजा है कि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो।” (IN)

उत्पत्ति 32:6 वे दूत याकूब के पास लौटकर कहने लगे, “हम तेरे भाई एसाव के पास गए थे, और वह भी तुझ से भेंट करने को चार सौ पुरुष संग लिये हुए चला आता है।” (IN)

उत्पत्ति 32:7 तब याकूब बहुत डर गया, और संकट में पड़ा: और यह सोचकर, अपने साथियों के, और भेड़-बकरियों, और गाय-बैलों, और ऊँटों के भी अलग-अलग दो दल कर लिये, (IN)

उत्पत्ति 32:8 कि यदि एसाव आकर पहले दल को मारने लगे, तो दूसरा दल भागकर बच जाएगा। (IN)

उत्पत्ति 32:9 फिर याकूब ने कहा, “हे यहोवा, हे मेरे दादा अब्राहम के परमेश्‍वर, हे मेरे पिता इसहाक के परमेश्‍वर, तूने तो मुझसे कहा था कि अपने देश और जन्म-भूमि में लौट जा, और मैं तेरी भलाई करूँगा: (IN)

उत्पत्ति 32:10 तूने जो-जो काम अपनी करुणा और सच्चाई से अपने दास के साथ किए हैं, कि मैं जो अपनी छड़ी ही लेकर इस यरदन नदी के पार उतर आया, और अब मेरे दो दल हो गए हैं, तेरे ऐसे-ऐसे कामों में से मैं एक के भी योग्य तो नहीं हूँ। (IN)

उत्पत्ति 32:11 मेरी विनती सुनकर मुझे मेरे भाई एसाव के हाथ से बचा मैं तो उससे डरता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि वह आकर मुझे और माँ समेत लड़कों को भी मार डाले। (IN)

उत्पत्ति 32:12 तूने तो कहा है, कि मैं निश्चय तेरी भलाई करूँगा, और तेरे वंश को समुद्र के रेतकणों के समान बहुत करूँगा, जो बहुतायत के मारे गिने नहीं जा सकते।” (IN)

उत्पत्ति 32:13 उसने उस दिन की रात वहीं बिताई; और जो कुछ उसके पास था उसमें से अपने भाई एसाव की भेंट के लिये छाँट-छाँटकर निकाला; (IN)

उत्पत्ति 32:14 अर्थात् दो सौ बकरियाँ, और बीस बकरे, और दो सौ भेड़ें, और बीस मेढ़े, (IN)

उत्पत्ति 32:15 और बच्चों समेत दूध देनेवाली तीस ऊँटनियाँ, और चालीस गायें, और दस बैल, और बीस गदहियाँ और उनके दस बच्चे। (IN)

उत्पत्ति 32:16 इनको उसने झुण्ड-झुण्ड करके, अपने दासों को सौंपकर उनसे कहा, “मेरे आगे बढ़ जाओ; और झुण्डों के बीच-बीच में अन्तर रखो।” (IN)

उत्पत्ति 32:17 फिर उसने अगले झुण्ड के रखवाले को यह आज्ञा दी, “जब मेरा भाई एसाव तुझे मिले, और पूछने लगे, 'तू किस का दास है, और कहाँ जाता है, और ये जो तेरे आगे-आगे हैं, वे किस के हैं?' (IN)

उत्पत्ति 32:18 तब कहना, 'यह तेरे दास याकूब के हैं। हे मेरे प्रभु एसाव, ये भेंट के लिये तेरे पास भेजे गए हैं, और वह आप भी हमारे पीछे-पीछे आ रहा है'।” (IN)

उत्पत्ति 32:19 और उसने दूसरे और तीसरे रखवालों को भी, वरन् उन सभी को जो झुण्डों के पीछे-पीछे थे ऐसी ही आज्ञा दी कि जब एसाव तुमको मिले तब इसी प्रकार उससे कहना। (IN)

उत्पत्ति 32:20 और यह भी कहना, “तेरा दास याकूब हमारे पीछे-पीछे आ रहा है।” क्योंकि उसने यह सोचा कि यह भेंट जो मेरे आगे-आगे जाती है, इसके द्वारा मैं उसके क्रोध को शान्त करके तब उसका दर्शन करूँगा; हो सकता है वह मुझसे प्रसन्‍न हो जाए। (IN)

उत्पत्ति 32:21 इसलिए वह भेंट याकूब से पहले पार उतर गई, और वह आप उस रात को छावनी में रहा। (IN)

उत्पत्ति 32:22 ¶ उसी रात को वह उठा और अपनी दोनों स्त्रियों, और दोनों दासियों, और ग्यारहों लड़कों को संग लेकर घाट से यब्बोक नदी के पार उतर गया। (IN)

उत्पत्ति 32:23 उसने उन्हें उस नदी के पार उतार दिया, वरन् अपना सब कुछ पार उतार दिया। (IN)

उत्पत्ति 32:24 और याकूब आप अकेला रह गया; तब कोई पुरुष आकर पौ फटने तक उससे मल्लयुद्ध करता रहा। (IN)

उत्पत्ति 32:25 जब उसने देखा कि मैं याकूब पर प्रबल नहीं होता, तब उसकी जाँघ की नस को छुआ; और याकूब की जाँघ की नस उससे मल्लयुद्ध करते ही करते चढ़ गई। (IN)

उत्पत्ति 32:26 तब उसने कहा, “मुझे जाने दे, क्योंकि भोर होनेवाला है।” याकूब ने कहा, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 32:27 और उसने याकूब से पूछा, “तेरा नाम क्या है?” उसने कहा, “याकूब।” (IN)

उत्पत्ति 32:28 उसने कहा, “तेरा नाम अब याकूब नहीं, परन्तु इस्राएल होगा, क्योंकि तू परमेश्‍वर से और मनुष्यों से भी युद्ध करके प्रबल हुआ है।” (IN)

उत्पत्ति 32:29 याकूब ने कहा, “मैं विनती करता हूँ, मुझे अपना नाम बता।” उसने कहा, “तू मेरा नाम क्यों पूछता है?” तब उसने उसको वहीं आशीर्वाद दिया। (IN)

उत्पत्ति 32:30 तब याकूब ने यह कहकर उस स्थान का नाम पनीएल रखा; “परमेश्‍वर को आमने-सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।” (IN)

उत्पत्ति 32:31 पनूएल के पास से चलते-चलते सूर्य उदय हो गया, और वह जाँघ से लँगड़ाता था। (IN)

उत्पत्ति 32:32 इस्राएली जो पशुओं की जाँघ की जोड़वाले जंघानस को आज के दिन तक नहीं खाते, इसका कारण यही है कि उस पुरुष ने याकूब की जाँघ के जोड़ में जंघानस को छुआ था। (IN)

उत्पत्ति 33:1 ¶ और याकूब ने आँखें उठाकर यह देखा, कि एसाव चार सौ पुरुष संग लिये हुए चला आता है। तब उसने बच्चों को अलग-अलग बाँटकर लिआ और राहेल और दोनों दासियों को सौंप दिया। (IN)

उत्पत्ति 33:2 और उसने सबके आगे लड़कों समेत दासियों को उसके पीछे लड़कों समेत लिआ को, और सबके पीछे राहेल और यूसुफ को रखा, (IN)

उत्पत्ति 33:3 और आप उन सबके आगे बढ़ा और सात बार भूमि पर गिरकर दण्डवत् की, और अपने भाई के पास पहुँचा। (IN)

उत्पत्ति 33:4 तब एसाव उससे भेंट करने को दौड़ा, और उसको हृदय से लगाकर, गले से लिपटकर चूमा; फिर वे दोनों रो पड़े। (IN)

उत्पत्ति 33:5 तब उसने आँखें उठाकर स्त्रियों और बच्चों को देखा; और पूछा, “ये जो तेरे साथ हैं वे कौन हैं?” उसने कहा, “ये तेरे दास के लड़के हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने अनुग्रह करके मुझको दिया है।” (IN)

उत्पत्ति 33:6 तब लड़कों समेत दासियों ने निकट आकर दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 33:7 फिर लड़कों समेत लिआ निकट आई, और उन्होंने भी दण्डवत् किया; अन्त में यूसुफ और राहेल ने भी निकट आकर दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 33:8 तब उसने पूछा, “तेरा यह बड़ा दल जो मुझको मिला, उसका क्या प्रयोजन है?” उसने कहा, “यह कि मेरे प्रभु की अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो।” (IN)

उत्पत्ति 33:9 एसाव ने कहा, “हे मेरे भाई, मेरे पास तो बहुत है; जो कुछ तेरा है वह तेरा ही रहे।” (IN)

उत्पत्ति 33:10 याकूब ने कहा, “नहीं-नहीं, यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो, तो मेरी भेंट ग्रहण कर: क्योंकि मैंने तेरा दर्शन पाकर, मानो परमेश्‍वर का दर्शन पाया है, और तू मुझसे प्रसन्‍न हुआ है। (IN)

उत्पत्ति 33:11 इसलिए यह भेंट, जो तुझे भेजी गई है, ग्रहण कर; क्योंकि परमेश्‍वर ने मुझ पर अनुग्रह किया है, और मेरे पास बहुत है।” जब उसने उससे बहुत आग्रह किया, तब उसने भेंट को ग्रहण किया। (IN)

उत्पत्ति 33:12 फिर एसाव ने कहा, “आ, हम बढ़ चलें: और मैं तेरे आगे-आगे चलूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 33:13 याकूब ने कहा, “हे मेरे प्रभु, तू जानता ही है कि मेरे साथ सुकुमार लड़के, और दूध देनेहारी भेड़-बकरियाँ और गायें है; यदि ऐसे पशु एक दिन भी अधिक हाँके जाएँ, तो सबके सब मर जाएँगे। (IN)

उत्पत्ति 33:14 इसलिए मेरा प्रभु अपने दास के आगे बढ़ जाए, और मैं इन पशुओं की गति के अनुसार, जो मेरे आगे है, और बच्चों की गति के अनुसार धीरे-धीरे चलकर सेईर में अपने प्रभु के पास पहुँचूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 33:15 एसाव ने कहा, “तो अपने साथियों में से मैं कई एक तेरे साथ छोड़ जाऊँ।” उसने कहा, “यह क्यों? इतना ही बहुत है, कि मेरे प्रभु के अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर बनी रहे।” (IN)

उत्पत्ति 33:16 तब एसाव ने उसी दिन सेईर जाने को अपना मार्ग लिया। (IN)

उत्पत्ति 33:17 परन्तु याकूब वहाँ से निकलकर सुक्कोत को गया, और वहाँ अपने लिये एक घर, और पशुओं के लिये झोंपड़े बनाए। इसी कारण उस स्थान का नाम सुक्कोत पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 33:18 ¶ और याकूब जो पद्दनराम से आया था, उसने कनान देश के शेकेम नगर के पास कुशल क्षेम से पहुँचकर नगर के सामने डेरे खड़े किए। (IN)

उत्पत्ति 33:19 और भूमि के जिस खण्ड पर उसने अपना तम्बू खड़ा किया, उसको उसने शेकेम के पिता हमोर के पुत्रों के हाथ से एक सौ कसीतों में मोल लिया। (IN)

उत्पत्ति 33:20 और वहाँ उसने एक वेदी बनाकर उसका नाम एल-एलोहे-इस्राएल रखा। (IN)

उत्पत्ति 34:1 ¶ एक दिन लिआ की बेटी दीना, जो याकूब से उत्‍पन्‍न हुई थी, उस देश की लड़कियों से भेंट करने को निकली। (IN)

उत्पत्ति 34:2 तब उस देश के प्रधान हिव्वी हमोर के पुत्र शेकेम ने उसे देखा, और उसे ले जाकर उसके साथ कुकर्म करके उसको भ्रष्ट कर डाला। (IN)

उत्पत्ति 34:3 तब उसका मन याकूब की बेटी दीना से लग गया, और उसने उस कन्या से प्रेम की बातें की, और उससे प्रेम करने लगा। (IN)

उत्पत्ति 34:4 अतः शेकेम ने अपने पिता हमोर से कहा, “मुझे इस लड़की को मेरी पत्‍नी होने के लिये दिला दे।” (IN)

उत्पत्ति 34:5 और याकूब ने सुना कि शेकेम ने मेरी बेटी दीना को अशुद्ध कर डाला है, पर उसके पुत्र उस समय पशुओं के संग मैदान में थे, इसलिए वह उनके आने तक चुप रहा। (IN)

उत्पत्ति 34:6 तब शेकेम का पिता हमोर निकलकर याकूब से बातचीत करने के लिये उसके पास गया। (IN)

उत्पत्ति 34:7 याकूब के पुत्र यह सुनते ही मैदान से बहुत उदास और क्रोधित होकर आए; क्योंकि शेकेम ने याकूब की बेटी के साथ कुकर्म करके इस्राएल के घराने से मूर्खता का ऐसा काम किया था, जिसका करना अनुचित था। (IN)

उत्पत्ति 34:8 हमोर ने उन सबसे कहा, “मेरे पुत्र शेकेम का मन तुम्हारी बेटी पर बहुत लगा है, इसलिए उसे उसकी पत्‍नी होने के लिये उसको दे दो। (IN)

उत्पत्ति 34:9 और हमारे साथ ब्याह किया करो; अपनी बेटियाँ हमको दिया करो, और हमारी बेटियों को आप लिया करो। (IN)

उत्पत्ति 34:10 और हमारे संग बसे रहो; और यह देश तुम्हारे सामने पड़ा है; इसमें रहकर लेन-देन करो, और इसकी भूमि को अपने लिये ले लो।” (IN)

उत्पत्ति 34:11 और शेकेम ने भी दीना के पिता और भाइयों से कहा, “यदि मुझ पर तुम लोगों की अनुग्रह की दृष्टि हो, तो जो कुछ तुम मुझसे कहो, वह मैं दूँगा। (IN)

उत्पत्ति 34:12 तुम मुझसे कितना ही मूल्य या बदला क्यों न माँगो, तो भी मैं तुम्हारे कहे के अनुसार दूँगा; परन्तु उस कन्या को पत्‍नी होने के लिये मुझे दो।” (IN)

उत्पत्ति 34:13 तब यह सोचकर कि शेकेम ने हमारी बहन दीना को अशुद्ध किया है, याकूब के पुत्रों ने शेकेम और उसके पिता हमोर को छल के साथ यह उत्तर दिया, (IN)

उत्पत्ति 34:14 “हम ऐसा काम नहीं कर सकते कि किसी खतनारहित पुरुष को अपनी बहन दें; क्योंकि इससे हमारी नामधराई होगी। (IN)

उत्पत्ति 34:15 इस बात पर तो हम तुम्हारी मान लेंगे कि हमारे समान तुम में से हर एक पुरुष का खतना किया जाए। (IN)

उत्पत्ति 34:16 तब हम अपनी बेटियाँ तुम्हें ब्याह देंगे, और तुम्हारी बेटियाँ ब्याह लेंगे, और तुम्हारे संग बसे भी रहेंगे, और हम दोनों एक ही समुदाय के मनुष्य हो जाएँगे। (IN)

उत्पत्ति 34:17 पर यदि तुम हमारी बात न मानकर अपना खतना न कराओगे, तो हम अपनी लड़की को लेकर यहाँ से चले जाएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 34:18 उसकी इस बात पर हमोर और उसका पुत्र शेकेम प्रसन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 34:19 और वह जवान जो याकूब की बेटी को बहुत चाहता था, इस काम को करने में उसने विलम्ब न किया। वह तो अपने पिता के सारे घराने में अधिक प्रतिष्ठित था। (IN)

उत्पत्ति 34:20 इसलिए हमोर और उसका पुत्र शेकेम अपने नगर के फाटक के निकट जाकर नगरवासियों को यह समझाने लगे; (IN)

उत्पत्ति 34:21 “वे मनुष्य तो हमारे संग मेल से रहना चाहते हैं; अतः उन्हें इस देश में रहकर लेन-देन करने दो; देखो, यह देश उनके लिये भी बहुत है; फिर हम लोग उनकी बेटियों को ब्याह लें, और अपनी बेटियों को उन्हें दिया करें। (IN)

उत्पत्ति 34:22 वे लोग केवल इस बात पर हमारे संग रहने और एक ही समुदाय के मनुष्य हो जाने को प्रसन्‍न हैं कि उनके समान हमारे सब पुरुषों का भी खतना किया जाए। (IN)

उत्पत्ति 34:23 क्या उनकी भेड़-बकरियाँ, और गाय-बैल वरन् उनके सारे पशु और धन सम्पत्ति हमारी न हो जाएगी? इतना ही करें कि हम लोग उनकी बात मान लें, तो वे हमारे संग रहेंगे।” (IN)

उत्पत्ति 34:24 इसलिए जितने उस नगर के फाटक से निकलते थे, उन सभी ने हमोर की और उसके पुत्र शेकेम की बात मानी; और हर एक पुरुष का खतना किया गया, जितने उस नगर के फाटक से निकलते थे। (IN)

उत्पत्ति 34:25 तीसरे दिन, जब वे लोग पीड़ित पड़े थे, तब ऐसा हुआ कि शिमोन और लेवी नाम याकूब के दो पुत्रों ने, जो दीना के भाई थे, अपनी-अपनी तलवार ले उस नगर में निधड़क घुसकर सब पुरुषों को घात किया। (IN)

उत्पत्ति 34:26 हमोर और उसके पुत्र शेकेम को उन्होंने तलवार से मार डाला, और दीना को शेकेम के घर से निकाल ले गए। (IN)

उत्पत्ति 34:27 याकूब के पुत्रों ने घात कर डालने पर भी चढ़कर नगर को इसलिए लूट लिया कि उसमें उनकी बहन अशुद्ध की गई थी। (IN)

उत्पत्ति 34:28 उन्होंने भेड़-बकरी, और गाय-बैल, और गदहे, और नगर और मैदान में जितना धन था ले लिया। (IN)

उत्पत्ति 34:29 उस सबको, और उनके बाल-बच्चों, और स्त्रियों को भी हर ले गए, वरन् घर-घर में जो कुछ था, उसको भी उन्होंने लूट लिया। (IN)

उत्पत्ति 34:30 तब याकूब ने शिमोन और लेवी से कहा, “तुमने जो इस देश के निवासी कनानियों और परिज्जियों के मन में मेरे प्रति घृणा उत्‍पन्‍न कराई है, इससे तुमने मुझे संकट में डाला है, क्योंकि मेरे साथ तो थोड़े ही लोग हैं, इसलिए अब वे इकट्ठे होकर मुझ पर चढ़ेंगे, और मुझे मार डालेंगे, तो मैं अपने घराने समेत सत्यानाश हो जाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 34:31 उन्होंने कहा, “क्या वह हमारी बहन के साथ वेश्या के समान बर्ताव करे?” (IN)

उत्पत्ति 35:1 ¶ तब परमेश्‍वर ने याकूब से कहा, “यहाँ से निकलकर बेतेल को जा, और वहीं रह; और वहाँ परमेश्‍वर के लिये वेदी बना, जिसने तुझे उस समय दर्शन दिया, जब तू अपने भाई एसाव के डर से भागा जाता था।” (IN)

उत्पत्ति 35:2 तब याकूब ने अपने घराने से, और उन सबसे भी जो उसके संग थे, कहा, “तुम्हारे बीच में जो पराए देवता हैं, उन्हें निकाल फेंको; और अपने-अपने को शुद्ध करो, और अपने वस्त्र बदल डालो; (IN)

उत्पत्ति 35:3 और आओ, हम यहाँ से निकलकर बेतेल को जाएँ; वहाँ मैं परमेश्‍वर के लिये एक वेदी बनाऊँगा, जिसने संकट के दिन मेरी सुन ली, और जिस मार्ग से मैं चलता था, उसमें मेरे संग रहा।” (IN)

उत्पत्ति 35:4 इसलिए जितने पराए देवता उनके पास थे, और जितने कुण्डल उनके कानों में थे, उन सभी को उन्होंने याकूब को दिया; और उसने उनको उस बांज वृक्ष के नीचे, जो शेकेम के पास है, गाड़ दिया। (IN)

उत्पत्ति 35:5 तब उन्होंने कूच किया; और उनके चारों ओर के नगर निवासियों के मन में परमेश्‍वर की ओर से ऐसा भय समा गया, कि उन्होंने याकूब के पुत्रों का पीछा न किया। (IN)

उत्पत्ति 35:6 याकूब उन सब समेत, जो उसके संग थे, कनान देश के लूज़ नगर को आया। वह नगर बेतेल भी कहलाता है। (IN)

उत्पत्ति 35:7 वहाँ उसने एक वेदी बनाई, और उस स्थान का नाम एलबेतेल रखा; क्योंकि जब वह अपने भाई के डर से भागा जाता था तब परमेश्‍वर उस पर वहीं प्रगट हुआ था। (IN)

उत्पत्ति 35:8 और रिबका की दूध पिलानेहारी दाई दबोरा मर गई, और बेतेल के बांज वृक्ष के तले उसको मिट्टी दी गई, और उस बांज वृक्ष का नाम अल्लोनबक्कूत रखा गया। (IN)

उत्पत्ति 35:9 फिर याकूब के पद्दनराम से आने के पश्चात् परमेश्‍वर ने दूसरी बार उसको दर्शन देकर आशीष दी। (IN)

उत्पत्ति 35:10 और परमेश्‍वर ने उससे कहा, “अब तक तो तेरा नाम याकूब रहा है; पर आगे को तेरा नाम याकूब न रहेगा, तू इस्राएल कहलाएगा।” इस प्रकार उसने उसका नाम इस्राएल रखा। (IN)

उत्पत्ति 35:11 फिर परमेश्‍वर ने उससे कहा, “मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर हूँ। तू फूले-फले और बढ़े; और तुझ से एक जाति वरन् जातियों की एक मण्डली भी उत्‍पन्‍न होगी, और तेरे वंश में राजा उत्‍पन्‍न होंगे। (IN)

उत्पत्ति 35:12 और जो देश मैंने अब्राहम और इसहाक को दिया है, वही देश तुझे देता हूँ, और तेरे पीछे तेरे वंश को भी दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 35:13 तब परमेश्‍वर उस स्थान में, जहाँ उसने याकूब से बातें की, उनके पास से ऊपर चढ़ गया। (IN)

उत्पत्ति 35:14 और जिस स्थान में परमेश्‍वर ने याकूब से बातें की, वहाँ याकूब ने पत्थर का एक खम्भा खड़ा किया, और उस पर अर्घ देकर तेल डाल दिया। (IN)

उत्पत्ति 35:15 जहाँ परमेश्‍वर ने याकूब से बातें की, उस स्थान का नाम उसने बेतेल रखा। (IN)

उत्पत्ति 35:16 ¶ फिर उन्होंने बेतेल से कूच किया; और एप्रात थोड़ी ही दूर रह गया था कि राहेल को बच्चा जनने की बड़ी पीड़ा उठने लगी। (IN)

उत्पत्ति 35:17 जब उसको बड़ी-बड़ी पीड़ा उठती थी तब दाई ने उससे कहा, “मत डर; अब की भी तेरे बेटा ही होगा।” (IN)

उत्पत्ति 35:18 तब ऐसा हुआ कि वह मर गई, और प्राण निकलते-निकलते उसने उस बेटे का नाम बेनोनी रखा; पर उसके पिता ने उसका नाम बिन्यामीन रखा। (IN)

उत्पत्ति 35:19 यों राहेल मर गई, और एप्रात, अर्थात् बैतलहम के मार्ग में, उसको मिट्टी दी गई। (IN)

उत्पत्ति 35:20 और याकूब ने उसकी कब्र पर एक खम्भा खड़ा किया: राहेल की कब्र का वह खम्भा आज तक बना है। (IN)

उत्पत्ति 35:21 फिर इस्राएल ने कूच किया, और एदेर नामक गुम्मट के आगे बढ़कर अपना तम्बू खड़ा किया। (IN)

उत्पत्ति 35:22 ¶ जब इस्राएल उस देश में बसा था, तब एक दिन ऐसा हुआ कि रूबेन ने जाकर अपने पिता की रखैली बिल्हा के साथ कुकर्म किया; और यह बात इस्राएल को मालूम हो गई। याकूब के बारह पुत्र हुए। (IN)

उत्पत्ति 35:23 उनमें से लिआ के पुत्र ये थे; अर्थात् याकूब का जेठा, रूबेन, फिर शिमोन, लेवी, यहूदा, इस्साकार, और जबूलून। (IN)

उत्पत्ति 35:24 और राहेल के पुत्र ये थे; अर्थात् यूसुफ, और बिन्यामीन। (IN)

उत्पत्ति 35:25 और राहेल की दासी बिल्हा के पुत्र ये थे; अर्थात् दान, और नप्ताली। (IN)

उत्पत्ति 35:26 और लिआ की दासी जिल्पा के पुत्र ये थे: अर्थात् गाद, और आशेर। याकूब के ये ही पुत्र हुए, जो उससे पद्दनराम में उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 35:27 ¶ और याकूब मम्रे में, जो किर्यतअर्बा, अर्थात् हेब्रोन है, जहाँ अब्राहम और इसहाक परदेशी होकर रहे थे, अपने पिता इसहाक के पास आया। (IN)

उत्पत्ति 35:28 इसहाक की आयु एक सौ अस्सी वर्ष की हुई। (IN)

उत्पत्ति 35:29 और इसहाक का प्राण छूट गया, और वह मर गया, और वह बूढ़ा और पूरी आयु का होकर अपने लोगों में जा मिला; और उसके पुत्र एसाव और याकूब ने उसको मिट्टी दी। (IN)

उत्पत्ति 36:1 ¶ एसाव जो एदोम भी कहलाता है, उसकी यह वंशावली है। (IN)

उत्पत्ति 36:2 एसाव ने तो कनानी लड़कियाँ ब्याह लीं; अर्थात् हित्ती एलोन की बेटी आदा को, और ओहोलीबामा को जो अना की बेटी, और हिव्वी सिबोन की नातिन थी। (IN)

उत्पत्ति 36:3 फिर उसने इश्माएल की बेटी बासमत को भी, जो नबायोत की बहन थी, ब्याह लिया। (IN)

उत्पत्ति 36:4 आदा ने तो एसाव के द्वारा एलीपज को, और बासमत ने रूएल को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 36:5 और ओहोलीबामा ने यूश, और यालाम, और कोरह को उत्‍पन्‍न किया, एसाव के ये ही पुत्र कनान देश में उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:6 एसाव अपनी पत्नियों, और बेटे-बेटियों, और घर के सब प्राणियों, और अपनी भेड़-बकरी, और गाय-बैल आदि सब पशुओं, निदान अपनी सारी सम्पत्ति को, जो उसने कनान देश में संचय किया था, लेकर अपने भाई याकूब के पास से दूसरे देश को चला गया। (IN)

उत्पत्ति 36:7 क्योंकि उनकी सम्पत्ति इतनी हो गई थी, कि वे इकट्ठे न रह सके; और पशुओं की बहुतायत के कारण उस देश में, जहाँ वे परदेशी होकर रहते थे, वे समा न सके। (IN)

उत्पत्ति 36:8 एसाव जो एदोम भी कहलाता है, सेईर नामक पहाड़ी देश में रहने लगा। (IN)

उत्पत्ति 36:9 सेईर नामक पहाड़ी देश में रहनेवाले एदोमियों के मूल पुरुष एसाव की वंशावली यह है (IN)

उत्पत्ति 36:10 एसाव के पुत्रों के नाम ये हैं; अर्थात् एसाव की पत्‍नी आदा का पुत्र एलीपज, और उसी एसाव की पत्‍नी बासमत का पुत्र रूएल। (IN)

उत्पत्ति 36:11 और एलीपज के ये पुत्र हुए; अर्थात् तेमान, ओमार, सपो, गाताम, और कनज। (IN)

उत्पत्ति 36:12 एसाव के पुत्र एलीपज के तिम्ना नामक एक रखैल थी, जिसने एलीपज के द्वारा अमालेक को जन्म दिया: एसाव की पत्‍नी आदा के वंश में ये ही हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:13 रूएल के ये पुत्र हुए; अर्थात् नहत, जेरह, शम्मा, और मिज्जा एसाव की पत्‍नी बासमत के वंश में ये ही हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:14 ओहोलीबामा जो एसाव की पत्‍नी, और सिबोन की नातिन और अना की बेटी थी, उसके ये पुत्र हुए: अर्थात् उसने एसाव के द्वारा यूश, यालाम और कोरह को जन्म दिया। (IN)

उत्पत्ति 36:15 ¶ एसाववंशियों के अधिपति ये हुए: अर्थात् एसाव के जेठे एलीपज के वंश में से तो तेमान अधिपति, ओमार अधिपति, सपो अधिपति, कनज अधिपति, (IN)

उत्पत्ति 36:16 कोरह अधिपति, गाताम अधिपति, अमालेक अधिपति एलीपज वंशियों में से, एदोम देश में ये ही अधिपति हुए: और ये ही आदा के वंश में हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:17 एसाव के पुत्र रूएल के वंश में ये हुए; अर्थात् नहत अधिपति, जेरह अधिपति, शम्मा अधिपति, मिज्जा अधिपति रूएलवंशियों में से, एदोम देश में ये ही अधिपति हुए; और ये ही एसाव की पत्‍नी बासमत के वंश में हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:18 एसाव की पत्‍नी ओहोलीबामा के वंश में ये हुए; अर्थात् यूश अधिपति, यालाम अधिपति, कोरह अधिपति, अना की बेटी ओहोलीबामा जो एसाव की पत्‍नी थी उसके वंश में ये ही हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:19 एसाव जो एदोम भी कहलाता है, उसके वंश ये ही हैं, और उनके अधिपति भी ये ही हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:20 ¶ सेईर जो होरी नामक जाति का था, उसके ये पुत्र उस देश में पहले से रहते थे; अर्थात् लोतान, शोबाल, सिबोन, अना, (IN)

उत्पत्ति 36:21 दीशोन, एसेर, और दीशान: एदोम देश में सेईर के ये ही होरी जातिवाले अधिपति हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:22 लोतान के पुत्र, होरी, और हेमाम हुए; और लोतान की बहन तिम्ना थी। (IN)

उत्पत्ति 36:23 शोबाल के ये पुत्र हुए: अर्थात् आल्वान, मानहत, एबाल, शपो, और ओनाम। (IN)

उत्पत्ति 36:24 और सीदोन के ये पुत्र हुए: अय्या, और अना; यह वही अना है जिसको जंगल में अपने पिता सिबोन के गदहों को चराते-चराते गरम पानी के झरने मिले। (IN)

उत्पत्ति 36:25 और अना के दीशोन नामक पुत्र हुआ, और उसी अना के ओहोलीबामा नामक बेटी हुई। (IN)

उत्पत्ति 36:26 दीशोन के ये पुत्र हुए: हेमदान, एशबान, यित्रान, और करान। (IN)

उत्पत्ति 36:27 एसेर के ये पुत्र हुए: बिल्हान, जावान, और अकान। (IN)

उत्पत्ति 36:28 दीशान के ये पुत्र हुए: ऊस, और अरान। (IN)

उत्पत्ति 36:29 होरियों के अधिपति ये हुए: लोतान अधिपति, शोबाल अधिपति, सिबोन अधिपति, अना अधिपति, (IN)

उत्पत्ति 36:30 दीशोन अधिपति, एसेर अधिपति, दीशान अधिपति; सेईर देश में होरी जातिवाले ये ही अधिपति हुए। (IN)

उत्पत्ति 36:31 ¶ फिर जब इस्राएलियों पर किसी राजा ने राज्य न किया था, तब भी एदोम के देश में ये राजा हुए; (IN)

उत्पत्ति 36:32 बोर के पुत्र बेला ने एदोम में राज्य किया, और उसकी राजधानी का नाम दिन्हाबा है। (IN)

उत्पत्ति 36:33 बेला के मरने पर, बोस्रानिवासी जेरह का पुत्र योबाब उसके स्थान पर राजा हुआ। (IN)

उत्पत्ति 36:34 योबाब के मरने पर, तेमानियों के देश का निवासी हूशाम उसके स्थान पर राजा हुआ। (IN)

उत्पत्ति 36:35 फिर हूशाम के मरने पर, बदद का पुत्र हदद उसके स्थान पर राजा हुआ यह वही है जिसने मिद्यानियों को मोआब के देश में मार लिया, और उसकी राजधानी का नाम अबीत है। (IN)

उत्पत्ति 36:36 हदद के मरने पर, मस्रेकावासी सम्ला उसके स्थान पर राजा हुआ। (IN)

उत्पत्ति 36:37 फिर सम्ला के मरने पर, शाऊल जो महानद के तटवाले रहोबोत नगर का था, वह उसके स्थान पर राजा हुआ। (IN)

उत्पत्ति 36:38 शाऊल के मरने पर, अकबोर का पुत्र बाल्हानान उसके स्थान पर राजा हुआ। (IN)

उत्पत्ति 36:39 अकबोर के पुत्र बाल्हानान के मरने पर, हदर उसके स्थान पर राजा हुआ और उसकी राजधानी का नाम पाऊ है; और उसकी पत्‍नी का नाम महेतबेल है, जो मेज़ाहाब की नातिन और मत्रेद की बेटी थी। (IN)

उत्पत्ति 36:40 फिर एसाववंशियों के अधिपतियों के कुलों, और स्थानों के अनुसार उनके नाम ये हैं तिम्ना अधिपति, अल्वा अधिपति, यतेत अधिपति, (IN)

उत्पत्ति 36:41 ओहोलीबामा अधिपति, एला अधिपति, पीनोन अधिपति, (IN)

उत्पत्ति 36:42 कनज अधिपति, तेमान अधिपति, मिबसार अधिपति, (IN)

उत्पत्ति 36:43 मग्दीएल अधिपति, ईराम अधिपति एदोमवंशियों ने जो देश अपना कर लिया था, उसके निवास-स्थानों में उनके ये ही अधिपति हुए; और एदोमी जाति का मूलपुरुष एसाव है। (IN)

उत्पत्ति 37:1 ¶ याकूब तो कनान देश में रहता था, जहाँ उसका पिता परदेशी होकर रहा था। (IN)

उत्पत्ति 37:2 और याकूब के वंश का वृत्तान्त यह है: यूसुफ सत्रह वर्ष का होकर अपने भाइयों के संग भेड़-बकरियों को चराता था; और वह लड़का अपने पिता की पत्‍नी बिल्हा, और जिल्पा के पुत्रों के संग रहा करता था; और उनकी बुराइयों का समाचार अपने पिता के पास पहुँचाया करता था। (IN)

उत्पत्ति 37:3 और इस्राएल अपने सब पुत्रों से बढ़कर यूसुफ से प्रीति रखता था, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र था : और उसने उसके लिये रंग बिरंगा अंगरखा बनवाया। (IN)

उत्पत्ति 37:4 परन्तु जब उसके भाइयों ने देखा, कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रीति रखता है, तब वे उससे बैर करने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे। (IN)

उत्पत्ति 37:5 ¶ यूसुफ ने एक स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका वर्णन किया; तब वे उससे और भी द्वेष करने लगे। (IN)

उत्पत्ति 37:6 उसने उनसे कहा, “जो स्वप्न मैंने देखा है, उसे सुनो (IN)

उत्पत्ति 37:7 हम लोग खेत में पूले बाँध रहे हैं, और क्या देखता हूँ कि मेरा पूला उठकर सीधा खड़ा हो गया; तब तुम्हारे पूलों ने मेरे पूले को चारों तरफ से घेर लिया और उसे दण्डवत् किया।” (IN)

उत्पत्ति 37:8 तब उसके भाइयों ने उससे कहा, “क्या सचमुच तू हमारे ऊपर राज्य करेगा? या क्या सचमुच तू हम पर प्रभुता करेगा?” इसलिए वे उसके स्वप्नों और उसकी बातों के कारण उससे और भी अधिक बैर करने लगे। (IN)

उत्पत्ति 37:9 फिर उसने एक और स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका भी यों वर्णन किया, “सुनो, मैंने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा, और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत् कर रहे हैं।” (IN)

उत्पत्ति 37:10 यह स्वप्न का उसने अपने पिता, और भाइयों से वर्णन किया; तब उसके पिता ने उसको डाँटकर कहा, “यह कैसा स्वप्न है जो तूने देखा है? क्या सचमुच मैं और तेरी माता और तेरे भाई सब जाकर तेरे आगे भूमि पर गिरकर दण्डवत् करेंगे?” (IN)

उत्पत्ति 37:11 उसके भाई तो उससे डाह करते थे; पर उसके पिता ने उसके उस वचन को स्मरण रखा। (IN)

उत्पत्ति 37:12 उसके भाई अपने पिता की भेड़-बकरियों को चराने के लिये शेकेम को गए। (IN)

उत्पत्ति 37:13 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, “तेरे भाई तो शेकेम ही में भेड़-बकरी चरा रहे होंगे, इसलिए जा, मैं तुझे उनके पास भेजता हूँ।” उसने उससे कहा, “जो आज्ञा मैं हाज़िर हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 37:14 उसने उससे कहा, “जा, अपने भाइयों और भेड़-बकरियों का हाल देख आ कि वे कुशल से तो हैं, फिर मेरे पास समाचार ले आ।” अतः उसने उसको हेब्रोन की तराई में विदा कर दिया, और वह शेकेम में आया। (IN)

उत्पत्ति 37:15 और किसी मनुष्य ने उसको मैदान में इधर-उधर भटकते हुए पाकर उससे पूछा, “तू क्या ढूँढ़ता है?” (IN)

उत्पत्ति 37:16 उसने कहा, “मैं तो अपने भाइयों को ढूँढ़ता हूँ कृपा कर मुझे बता कि वे भेड़-बकरियों को कहाँ चरा रहे हैं?” (IN)

उत्पत्ति 37:17 उस मनुष्य ने कहा, “वे तो यहाँ से चले गए हैं; और मैंने उनको यह कहते सुना, 'आओ, हम दोतान को चलें।'” इसलिए यूसुफ अपने भाइयों के पीछे चला, और उन्हें दोतान में पाया। (IN)

उत्पत्ति 37:18 ¶ जैसे ही उन्होंने उसे दूर से आते देखा, तो उसके निकट आने के पहले ही उसे मार डालने की युक्ति की। (IN)

उत्पत्ति 37:19 और वे आपस में कहने लगे, “देखो, वह स्वप्न देखनेवाला आ रहा है। (IN)

उत्पत्ति 37:20 इसलिए आओ, हम उसको घात करके किसी गड्ढे में डाल दें, और यह कह देंगे, कि कोई जंगली पशु उसको खा गया। फिर हम देखेंगे कि उसके स्वप्नों का क्या फल होगा।” (IN)

उत्पत्ति 37:21 यह सुनकर रूबेन ने उसको उनके हाथ से बचाने की मनसा से कहा, “हम उसको प्राण से तो न मारें।” (IN)

उत्पत्ति 37:22 फिर रूबेन ने उनसे कहा, “लहू मत बहाओ, उसको जंगल के इस गड्ढे में डाल दो, और उस पर हाथ मत उठाओ।” वह उसको उनके हाथ से छुड़ाकर पिता के पास फिर पहुँचाना चाहता था। (IN)

उत्पत्ति 37:23 इसलिए ऐसा हुआ कि जब यूसुफ अपने भाइयों के पास पहुँचा तब उन्होंने उसका रंगबिरंगा अंगरखा, जिसे वह पहने हुए था, उतार लिया। (IN)

उत्पत्ति 37:24 और यूसुफ को उठाकर गड्ढे में डाल दिया। वह गड्ढा सूखा था और उसमें कुछ जल न था। (IN)

उत्पत्ति 37:25 तब वे रोटी खाने को बैठ गए; और आँखें उठाकर क्या देखा कि इश्माएलियों का एक दल ऊँटों पर सुगन्ध-द्रव्य, बलसान, और गन्धरस लादे हुए, गिलाद से मिस्र को चला जा रहा है। (IN)

उत्पत्ति 37:26 तब यहूदा ने अपने भाइयों से कहा, “अपने भाई को घात करने और उसका खून छिपाने से क्या लाभ होगा? (IN)

उत्पत्ति 37:27 आओ, हम उसे इश्माएलियों के हाथ बेच डालें, और अपना हाथ उस पर न उठाए, क्योंकि वह हमारा भाई और हमारी ही हड्डी और माँस है।” और उसके भाइयों ने उसकी बात मान ली। (IN)

उत्पत्ति 37:28 तब मिद्यानी व्यापारी उधर से होकर उनके पास पहुँचे। अतः यूसुफ के भाइयों ने उसको उस गड्ढे में से खींचकर बाहर निकाला, और इश्माएलियों के हाथ चाँदी के बीस टुकड़ों में बेच दिया; और वे यूसुफ को मिस्र में ले गए। (IN)

उत्पत्ति 37:29 रूबेन ने गड्ढे पर लौटकर क्या देखा कि यूसुफ गड्ढे में नहीं है; इसलिए उसने अपने वस्त्र फाड़े, (IN)

उत्पत्ति 37:30 और अपने भाइयों के पास लौटकर कहने लगा, “लड़का तो नहीं है; अब मैं किधर जाऊँ?” (IN)

उत्पत्ति 37:31 तब उन्होंने यूसुफ का अंगरखा लिया, और एक बकरे को मारकर उसके लहू में उसे डुबा दिया। (IN)

उत्पत्ति 37:32 और उन्होंने उस रंग बिरंगे अंगरखे को अपने पिता के पास भेजकर यह सन्‍देश दिया; “यह हमको मिला है, अतः देखकर पहचान ले कि यह तेरे पुत्र का अंगरखा है कि नहीं।” (IN)

उत्पत्ति 37:33 उसने उसको पहचान लिया, और कहा, “हाँ यह मेरे ही पुत्र का अंगरखा है; किसी दुष्ट पशु ने उसको खा लिया है; निःसन्देह यूसुफ फाड़ डाला गया है।” (IN)

उत्पत्ति 37:34 तब याकूब ने अपने वस्त्र फाड़े और कमर में टाट लपेटा, और अपने पुत्र के लिये बहुत दिनों तक विलाप करता रहा। (IN)

उत्पत्ति 37:35 और उसके सब बेटे-बेटियों ने उसको शान्ति देने का यत्न किया; पर उसको शान्ति न मिली; और वह यही कहता रहा, “मैं तो विलाप करता हुआ अपने पुत्र के पास अधोलोक में उतर जाऊँगा।” इस प्रकार उसका पिता उसके लिये रोता ही रहा। (IN)

उत्पत्ति 37:36 इस बीच मिद्यानियों ने यूसुफ को मिस्र में ले जाकर पोतीपर नामक, फ़िरौन के एक हाकिम, और अंगरक्षकों के प्रधान, के हाथ बेच डाला। (IN)

उत्पत्ति 38:1 ¶ उन्हीं दिनों में ऐसा हुआ कि यहूदा अपने भाइयों के पास से चला गया, और हीरा नामक एक अदुल्लामवासी पुरुष के पास डेरा किया। (IN)

उत्पत्ति 38:2 वहाँ यहूदा ने शूआ नामक एक कनानी पुरुष की बेटी को देखा; और उससे विवाह करके उसके पास गया। (IN)

उत्पत्ति 38:3 वह गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ; और यहूदा ने उसका नाम एर रखा। (IN)

उत्पत्ति 38:4 और वह फिर गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र और उत्‍पन्‍न हुआ; और उसका नाम ओनान रखा गया। (IN)

उत्पत्ति 38:5 फिर उसके एक पुत्र और उत्‍पन्‍न हुआ, और उसका नाम शेला रखा गया; और जिस समय इसका जन्म हुआ उस समय यहूदा कजीब में रहता था। (IN)

उत्पत्ति 38:6 और यहूदा ने तामार नामक एक स्त्री से अपने जेठे एर का विवाह कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 38:7 परन्तु यहूदा का वह जेठा एर यहोवा के लेखे में दुष्ट था, इसलिए यहोवा ने उसको मार डाला। (IN)

उत्पत्ति 38:8 तब यहूदा ने ओनान से कहा, “अपनी भौजाई के पास जा, और उसके साथ देवर का धर्म पूरा करके अपने भाई के लिये सन्तान उत्‍पन्‍न कर।” (IN)

उत्पत्ति 38:9 ओनान तो जानता था कि सन्तान मेरी न ठहरेगी; इसलिए ऐसा हुआ कि जब वह अपनी भौजाई के पास गया, तब उसने भूमि पर वीर्य गिराकर नाश किया, जिससे ऐसा न हो कि उसके भाई के नाम से वंश चले। (IN)

उत्पत्ति 38:10 यह काम जो उसने किया उससे यहोवा अप्रसन्न हुआ और उसने उसको भी मार डाला। (IN)

उत्पत्ति 38:11 तब यहूदा ने इस डर के मारे कि कहीं ऐसा न हो कि अपने भाइयों के समान शेला भी मरे, अपनी बहू तामार से कहा, “जब तक मेरा पुत्र शेला सयाना न हो जाए तब तक अपने पिता के घर में विधवा ही बैठी रह। इसलिए तामार अपने पिता के घर में जाकर रहने लगी। (IN)

उत्पत्ति 38:12 बहुत समय के बीतने पर यहूदा की पत्‍नी जो शूआ की बेटी थी, वह मर गई; फिर यहूदा शोक के दिन बीतने पर अपने मित्र हीरा अदुल्लामवासी समेत अपनी भेड़-बकरियों का ऊन कतरनेवालों के पास तिम्‍नाह को गया। (IN)

उत्पत्ति 38:13 और तामार को यह समाचार मिला, “तेरा ससुर अपनी भेड़-बकरियों का ऊन कतराने के लिये तिम्‍नाह को जा रहा है।” (IN)

उत्पत्ति 38:14 तब उसने यह सोचकर कि शेला सयाना तो हो गया पर मैं उसकी स्त्री नहीं होने पाई; अपना विधवापन का पहरावा उतारा और घूँघट डालकर अपने को ढाँप लिया, और एनैम नगर के फाटक के पास, जो तिम्‍नाह के मार्ग में है, जा बैठी। (IN)

उत्पत्ति 38:15 जब यहूदा ने उसको देखा, उसने उसको वेश्या समझा; क्योंकि वह अपना मुँह ढाँपे हुए थी। (IN)

उत्पत्ति 38:16 वह मार्ग से उसकी ओर फिरा, और उससे कहने लगा, “मुझे अपने पास आने दे,” (क्योंकि उसे यह मालूम न था कि वह उसकी बहू है।) और वह कहने लगी, “यदि मैं तुझे अपने पास आने दूँ, तो तू मुझे क्या देगा?” (IN)

उत्पत्ति 38:17 उसने कहा, “मैं अपनी बकरियों में से बकरी का एक बच्चा तेरे पास भेज दूँगा।” तब उसने कहा, “भला उसके भेजने तक क्या तू हमारे पास कुछ रेहन रख जाएगा?” (IN)

उत्पत्ति 38:18 उसने पूछा, “मैं तेरे पास क्या रेहन रख जाऊँ?” उसने कहा, “अपनी मुहर, और बाजूबन्द, और अपने हाथ की छड़ी।” तब उसने उसको वे वस्तुएँ दे दीं, और उसके पास गया, और वह उससे गर्भवती हुई। (IN)

उत्पत्ति 38:19 तब वह उठकर चली गई, और अपना घूँघट उतारकर अपना विधवापन का पहरावा फिर पहन लिया। (IN)

उत्पत्ति 38:20 तब यहूदा ने बकरी का बच्चा अपने मित्र उस अदुल्लामवासी के हाथ भेज दिया कि वह रेहन रखी हुई वस्तुएँ उस स्त्री के हाथ से छुड़ा ले आए; पर वह स्त्री उसको न मिली। (IN)

उत्पत्ति 38:21 तब उसने वहाँ के लोगों से पूछा, “वह देवदासी जो एनैम में मार्ग की एक ओर बैठी थी, कहाँ है?” उन्होंने कहा, “यहाँ तो कोई देवदासी न थी।” (IN)

उत्पत्ति 38:22 इसलिए उसने यहूदा के पास लौटकर कहा, “मुझे वह नहीं मिली; और उस स्थान के लोगों ने कहा, 'यहाँ तो कोई देवदासी न थी।'” (IN)

उत्पत्ति 38:23 तब यहूदा ने कहा, “अच्छा, वह बन्धक उसी के पास रहने दे, नहीं तो हम लोग तुच्छ गिने जाएँगे; देख, मैंने बकरी का यह बच्चा भेज दिया था, पर वह तुझे नहीं मिली।” (IN)

उत्पत्ति 38:24 लगभग तीन महीने के बाद यहूदा को यह समाचार मिला, “तेरी बहू तामार ने व्यभिचार किया है; वरन् वह व्यभिचार से गर्भवती भी हो गई है।” तब यहूदा ने कहा, “उसको बाहर ले आओ कि वह जलाई जाए।” (IN)

उत्पत्ति 38:25 जब उसे बाहर निकाला जा रहा था, तब उसने, अपने ससुर के पास यह कहला भेजा, “जिस पुरुष की ये वस्तुएँ हैं, उसी से मैं गर्भवती हूँ,” फिर उसने यह भी कहलाया, “पहचान तो सही कि यह मुहर, और बाजूबन्द, और छड़ी किसकी हैं।” (IN)

उत्पत्ति 38:26 यहूदा ने उन्हें पहचानकर कहा, “वह तो मुझसे कम दोषी है; क्योंकि मैंने उसका अपने पुत्र शेला से विवाह न किया।” और उसने उससे फिर कभी प्रसंग न किया। (IN)

उत्पत्ति 38:27 जब उसके जनने का समय आया, तब यह जान पड़ा कि उसके गर्भ में जुड़वे बच्चे हैं। (IN)

उत्पत्ति 38:28 और जब वह जनने लगी तब एक बालक का हाथ बाहर आया, और दाई ने लाल सूत लेकर उसके हाथ में यह कहते हुए बाँध दिया, “पहले यही उत्‍पन्‍न हुआ।” (IN)

उत्पत्ति 38:29 जब उसने हाथ समेट लिया, तब उसका भाई उत्‍पन्‍न हो गया। तब उस दाई ने कहा, “तू क्यों बरबस निकल आया है?” इसलिए उसका नाम पेरेस रखा गया। (IN)

उत्पत्ति 38:30 पीछे उसका भाई जिसके हाथ में लाल सूत बन्धा था उत्‍पन्‍न हुआ, और उसका नाम जेरह रखा गया। (IN)

उत्पत्ति 39:1 ¶ जब यूसुफ मिस्र में पहुँचाया गया, तब पोतीपर नामक एक मिस्री ने, जो फ़िरौन का हाकिम, और अंगरक्षकों का प्रधान था, उसको इश्माएलियों के हाथ से जो उसे वहाँ ले गए थे, मोल लिया। (IN)

उत्पत्ति 39:2 यूसुफ अपने मिस्री स्वामी के घर में रहता था, और यहोवा उसके संग था; इसलिए वह भाग्यवान पुरुष हो गया। (IN)

उत्पत्ति 39:3 और यूसुफ के स्वामी ने देखा, कि यहोवा उसके संग रहता है, और जो काम वह करता है उसको यहोवा उसके हाथ से सफल कर देता है। (IN)

उत्पत्ति 39:4 तब उसकी अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई, और वह उसकी सेवा टहल करने के लिये नियुक्त किया गया; फिर उसने उसको अपने घर का अधिकारी बनाकर अपना सब कुछ उसके हाथ में सौंप दिया। (IN)

उत्पत्ति 39:5 जब से उसने उसको अपने घर का और अपनी सारी सम्पत्ति का अधिकारी बनाया, तब से यहोवा यूसुफ के कारण उस मिस्री के घर पर आशीष देने लगा; और क्या घर में, क्या मैदान में, उसका जो कुछ था, सब पर यहोवा की आशीष होने लगी। (IN)

उत्पत्ति 39:6 इसलिए उसने अपना सब कुछ यूसुफ के हाथ में यहाँ तक छोड़ दिया कि अपने खाने की रोटी को छोड़, वह अपनी सम्पत्ति का हाल कुछ न जानता था। यूसुफ सुन्दर और रूपवान था। (IN)

उत्पत्ति 39:7 इन बातों के पश्चात् ऐसा हुआ, कि उसके स्वामी की पत्‍नी ने यूसुफ की ओर आँख लगाई और कहा, “मेरे साथ सो।” (IN)

उत्पत्ति 39:8 पर उसने अस्वीकार करते हुए अपने स्वामी की पत्‍नी से कहा, “सुन, जो कुछ इस घर में है मेरे हाथ में है; उसे मेरा स्वामी कुछ नहीं जानता, और उसने अपना सब कुछ मेरे हाथ में सौंप दिया है। (IN)

उत्पत्ति 39:9 इस घर में मुझसे बड़ा कोई नहीं; और उसने तुझे छोड़, जो उसकी पत्‍नी है; मुझसे कुछ नहीं रख छोड़ा; इसलिए भला, मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्‍वर का अपराधी क्यों बनूँ?” (IN)

उत्पत्ति 39:10 और ऐसा हुआ कि वह प्रतिदिन यूसुफ से बातें करती रही, पर उसने उसकी न मानी कि उसके पास लेटे या उसके संग रहे। (IN)

उत्पत्ति 39:11 एक दिन क्या हुआ कि यूसुफ अपना काम-काज करने के लिये घर में गया, और घर के सेवकों में से कोई भी घर के अन्दर न था। (IN)

उत्पत्ति 39:12 तब उस स्त्री ने उसका वस्त्र पकड़कर कहा, “मेरे साथ सो,” पर वह अपना वस्त्र उसके हाथ में छोड़कर भागा, और बाहर निकल गया। (IN)

उत्पत्ति 39:13 यह देखकर कि वह अपना वस्त्र मेरे हाथ में छोड़कर बाहर भाग गया, (IN)

उत्पत्ति 39:14 उस स्त्री ने अपने घर के सेवकों को बुलाकर कहा, “देखो, वह एक इब्री मनुष्य को हमारा तिरस्कार करने के लिये हमारे पास ले आया है। वह तो मेरे साथ सोने के मतलब से मेरे पास अन्दर आया था और मैं ऊँचे स्वर से चिल्ला उठी। (IN)

उत्पत्ति 39:15 और मेरी बड़ी चिल्लाहट सुनकर वह अपना वस्त्र मेरे पास छोड़कर भागा, और बाहर निकल गया।” (IN)

उत्पत्ति 39:16 और वह उसका वस्त्र उसके स्वामी के घर आने तक अपने पास रखे रही। (IN)

उत्पत्ति 39:17 तब उसने उससे इस प्रकार की बातें कहीं, “वह इब्री दास जिसको तू हमारे पास ले आया है, वह मुझसे हँसी करने के लिये मेरे पास आया था; (IN)

उत्पत्ति 39:18 और जब मैं ऊँचे स्वर से चिल्ला उठी, तब वह अपना वस्त्र मेरे पास छोड़कर बाहर भाग गया।” (IN)

उत्पत्ति 39:19 अपनी पत्‍नी की ये बातें सुनकर कि तेरे दास ने मुझसे ऐसा-ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का। (IN)

उत्पत्ति 39:20 ¶ और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया; अतः वह उस बन्दीगृह में रहा। (IN)

उत्पत्ति 39:21 पर यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा, और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दरोगा के अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई। (IN)

उत्पत्ति 39:22 इसलिए बन्दीगृह के दरोगा ने उन सब बन्दियों को, जो कारागार में थे, यूसुफ के हाथ में सौंप दिया; और जो-जो काम वे वहाँ करते थे, वह उसी की आज्ञा से होता था। (IN)

उत्पत्ति 39:23 यूसुफ के वश में जो कुछ था उसमें से बन्दीगृह के दरोगा को कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती थी; क्योंकि यहोवा यूसुफ के साथ था; और जो कुछ वह करता था, यहोवा उसको उसमें सफलता देता था। (IN)

उत्पत्ति 40:1 ¶ इन बातों के पश्चात् ऐसा हुआ, कि मिस्र के राजा के पिलानेहारे और पकानेहारे ने अपने स्वामी के विरुद्ध कुछ अपराध किया। (IN)

उत्पत्ति 40:2 तब फ़िरौन ने अपने उन दोनों हाकिमों, अर्थात् पिलानेहारों के प्रधान, और पकानेहारों के प्रधान पर क्रोधित होकर (IN)

उत्पत्ति 40:3 उन्हें कैद कराके, अंगरक्षकों के प्रधान के घर के उसी बन्दीगृह में, जहाँ यूसुफ बन्दी था, डलवा दिया। (IN)

उत्पत्ति 40:4 तब अंगरक्षकों के प्रधान ने उनको यूसुफ के हाथ सौंपा, और वह उनकी सेवा-टहल करने लगा; अतः वे कुछ दिन तक बन्दीगृह में रहे। (IN)

उत्पत्ति 40:5 मिस्र के राजा का पिलानेहारा और पकानेहारा, जो बन्दीगृह में बन्द थे, उन दोनों ने एक ही रात में, अपने-अपने होनहार के अनुसार, स्वप्न देखा। (IN)

उत्पत्ति 40:6 सवेरे जब यूसुफ उनके पास अन्दर गया, तब उन पर उसने जो दृष्टि की, तो क्या देखता है, कि वे उदास हैं। (IN)

उत्पत्ति 40:7 इसलिए उसने फ़िरौन के उन हाकिमों से, जो उसके साथ उसके स्वामी के घर के बन्दीगृह में थे, पूछा, “आज तुम्हारे मुँह क्यों उदास हैं?” (IN)

उत्पत्ति 40:8 उन्होंने उससे कहा, “हम दोनों ने स्वप्न देखा है, और उनके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं।” यूसुफ ने उनसे कहा, “क्या स्वप्नों का फल कहना परमेश्‍वर का काम नहीं है? मुझे अपना-अपना स्वप्न बताओ।” (IN)

उत्पत्ति 40:9 तब पिलानेहारों का प्रधान अपना स्वप्न यूसुफ को यों बताने लगा: “मैंने स्वप्न में देखा, कि मेरे सामने एक दाखलता है; (IN)

उत्पत्ति 40:10 और उस दाखलता में तीन डालियाँ हैं; और उसमें मानो कलियाँ लगीं हैं, और वे फूलीं और उसके गुच्छों में दाख लगकर पक गई। (IN)

उत्पत्ति 40:11 और फ़िरौन का कटोरा मेरे हाथ में था; और मैंने उन दाखों को लेकर फ़िरौन के कटोरे में निचोड़ा और कटोरे को फ़िरौन के हाथ में दिया।” (IN)

उत्पत्ति 40:12 यूसुफ ने उससे कहा, “इसका फल यह है: तीन डालियों का अर्थ तीन दिन हैं (IN)

उत्पत्ति 40:13 इसलिए अब से तीन दिन के भीतर फ़िरौन तेरा सिर ऊँचा करेगा, और फिर से तेरे पद पर तुझे नियुक्त करेगा, और तू पहले के समान फ़िरौन का पिलानेहारा होकर उसका कटोरा उसके हाथ में फिर दिया करेगा। (IN)

उत्पत्ति 40:14 अतः जब तेरा भला हो जाए तब मुझे स्मरण करना, और मुझ पर कृपा करके फ़िरौन से मेरी चर्चा चलाना, और इस घर से मुझे छुड़वा देना। (IN)

उत्पत्ति 40:15 क्योंकि सचमुच इब्रानियों के देश से मुझे चुरा कर लाया गया हैं, और यहाँ भी मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके कारण मैं इस कारागार में डाला जाऊँ।” (IN)

उत्पत्ति 40:16 यह देखकर कि उसके स्वप्न का फल अच्छा निकला, पकानेहारों के प्रधान ने यूसुफ से कहा, “मैंने भी स्वप्न देखा है, वह यह है: मैंने देखा कि मेरे सिर पर सफेद रोटी की तीन टोकरियाँ है (IN)

उत्पत्ति 40:17 और ऊपर की टोकरी में फ़िरौन के लिये सब प्रकार की पकी पकाई वस्तुएँ हैं; और पक्षी मेरे सिर पर की टोकरी में से उन वस्तुओं को खा रहे हैं।” (IN)

उत्पत्ति 40:18 यूसुफ ने कहा, “इसका फल यह है: तीन टोकरियों का अर्थ तीन दिन है। (IN)

उत्पत्ति 40:19 अब से तीन दिन के भीतर फ़िरौन तेरा सिर कटवाकर तुझे एक वृक्ष पर टंगवा देगा, और पक्षी तेरे माँस को नोच-नोच कर खाएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 40:20 और तीसरे दिन फ़िरौन का जन्मदिन था, उसने अपने सब कर्मचारियों को भोज दिया, और उनमें से पिलानेहारों के प्रधान, और पकानेहारों के प्रधान दोनों को बन्दीगृह से निकलवाया। (IN)

उत्पत्ति 40:21 पिलानेहारों के प्रधान को तो पिलानेहारे के पद पर फिर से नियुक्त किया, और वह फ़िरौन के हाथ में कटोरा देने लगा। (IN)

उत्पत्ति 40:22 पर पकानेहारों के प्रधान को उसने टंगवा दिया, जैसा कि यूसुफ ने उनके स्वप्नों का फल उनसे कहा था। (IN)

उत्पत्ति 40:23 फिर भी पिलानेहारों के प्रधान ने यूसुफ को स्मरण न रखा; परन्तु उसे भूल गया। (IN)

उत्पत्ति 41:1 ¶ पूरे दो वर्ष के बीतने पर फ़िरौन ने यह स्वप्न देखा कि वह नील नदी के किनारे खड़ा है। (IN)

उत्पत्ति 41:2 और उस नदी में से सात सुन्दर और मोटी-मोटी गायें निकलकर कछार की घास चरने लगीं। (IN)

उत्पत्ति 41:3 और, क्या देखा कि उनके पीछे और सात गायें, जो कुरूप और दुर्बल हैं, नदी से निकलीं; और दूसरी गायों के निकट नदी के तट पर जा खड़ी हुईं। (IN)

उत्पत्ति 41:4 तब ये कुरूप और दुर्बल गायें उन सात सुन्दर और मोटी-मोटी गायों को खा गईं। तब फ़िरौन जाग उठा। (IN)

उत्पत्ति 41:5 और वह फिर सो गया और दूसरा स्वप्न देखा कि एक डंठल में से सात मोटी और अच्छी-अच्छी बालें निकलीं। (IN)

उत्पत्ति 41:6 और, क्या देखा कि उनके पीछे सात बालें पतली और पुरवाई से मुरझाई हुई निकलीं। (IN)

उत्पत्ति 41:7 और इन पतली बालों ने उन सातों मोटी और अन्न से भरी हुई बालों को निगल लिया। तब फ़िरौन जागा, और उसे मालूम हुआ कि यह स्वप्न ही था। (IN)

उत्पत्ति 41:8 भोर को फ़िरौन का मन व्याकुल हुआ; और उसने मिस्र के सब ज्योतिषियों, और पंडितों को बुलवा भेजा; और उनको अपने स्वप्न बताए; पर उनमें से कोई भी उनका फल फ़िरौन को न बता सका। (IN)

उत्पत्ति 41:9 ¶ तब पिलानेहारों का प्रधान फ़िरौन से बोल उठा, “मेरे अपराध आज मुझे स्मरण आए: (IN)

उत्पत्ति 41:10 जब फ़िरौन अपने दासों से क्रोधित हुआ था, और मुझे और पकानेहारों के प्रधान को कैद कराके अंगरक्षकों के प्रधान के घर के बन्दीगृह में डाल दिया था; (IN)

उत्पत्ति 41:11 तब हम दोनों ने एक ही रात में, अपने-अपने होनहार के अनुसार स्वप्न देखा; (IN)

उत्पत्ति 41:12 और वहाँ हमारे साथ एक इब्री जवान था, जो अंगरक्षकों के प्रधान का दास था; अतः हमने उसको बताया, और उसने हमारे स्वप्नों का फल हम से कहा, हम में से एक-एक के स्वप्न का फल उसने बता दिया। (IN)

उत्पत्ति 41:13 और जैसा-जैसा फल उसने हम से कहा था, वैसा ही हुआ भी, अर्थात् मुझको तो मेरा पद फिर मिला, पर वह फांसी पर लटकाया गया।” (IN)

उत्पत्ति 41:14 तब फ़िरौन ने यूसुफ को बुलवा भेजा। और वह झटपट बन्दीगृह से बाहर निकाला गया, और बाल बनवाकर, और वस्त्र बदलकर फ़िरौन के सामने आया। (IN)

उत्पत्ति 41:15 फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “मैंने एक स्वप्न देखा है, और उसके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं; और मैंने तेरे विषय में सुना है, कि तू स्वप्न सुनते ही उसका फल बता सकता है।” (IN)

उत्पत्ति 41:16 यूसुफ ने फ़िरौन से कहा, “मैं तो कुछ नहीं जानता: परमेश्‍वर ही फ़िरौन के लिये शुभ वचन देगा।” (IN)

उत्पत्ति 41:17 फिर फ़िरौन यूसुफ से कहने लगा, “मैंने अपने स्वप्न में देखा, कि मैं नील नदी के किनारे पर खड़ा हूँ। (IN)

उत्पत्ति 41:18 फिर, क्या देखा, कि नदी में से सात मोटी और सुन्दर-सुन्दर गायें निकलकर कछार की घास चरने लगीं। (IN)

उत्पत्ति 41:19 फिर, क्या देखा, कि उनके पीछे सात और गायें निकली, जो दुबली, और बहुत कुरूप, और दुर्बल हैं; मैंने तो सारे मिस्र देश में ऐसी कुडौल गायें कभी नहीं देखीं। (IN)

उत्पत्ति 41:20 इन दुर्बल और कुडौल गायों ने उन पहली सातों मोटी-मोटी गायों को खा लिया। (IN)

उत्पत्ति 41:21 और जब वे उनको खा गईं तब यह मालूम नहीं होता था कि वे उनको खा गई हैं, क्योंकि वे पहले के समान जैसी की तैसी कुडौल रहीं। तब मैं जाग उठा। (IN)

उत्पत्ति 41:22 फिर मैंने दूसरा स्वप्न देखा, कि एक ही डंठल में सात अच्छी-अच्छी और अन्न से भरी हुई बालें निकलीं। (IN)

उत्पत्ति 41:23 फिर क्या देखता हूँ, कि उनके पीछे और सात बालें छूछी-छूछी और पतली और पुरवाई से मुरझाई हुई निकलीं। (IN)

उत्पत्ति 41:24 और इन पतली बालों ने उन सात अच्छी-अच्छी बालों को निगल लिया। इसे मैंने ज्योतिषियों को बताया, पर इसका समझानेवाला कोई नहीं मिला।” (IN)

उत्पत्ति 41:25 तब यूसुफ ने फ़िरौन से कहा, फ़िरौन का स्वप्न एक ही है, परमेश्‍वर जो काम करना चाहता है, उसको उसने फ़िरौन पर प्रकट किया है। (IN)

उत्पत्ति 41:26 वे सात अच्छी-अच्छी गायें सात वर्ष हैं; और वे सात अच्छी-अच्छी बालें भी सात वर्ष हैं; स्वप्न एक ही है। (IN)

उत्पत्ति 41:27 फिर उनके पीछे जो दुर्बल और कुडौल गायें निकलीं, और जो सात छूछी और पुरवाई से मुरझाई हुई बालें निकालीं, वे अकाल के सात वर्ष होंगे। (IN)

उत्पत्ति 41:28 यह वही बात है जो मैं फ़िरौन से कह चुका हूँ, कि परमेश्‍वर जो काम करना चाहता है, उसे उसने फ़िरौन को दिखाया है। (IN)

उत्पत्ति 41:29 सुन, सारे मिस्र देश में सात वर्ष तो बहुतायत की उपज के होंगे। (IN)

उत्पत्ति 41:30 उनके पश्चात् सात वर्ष अकाल के आएँगे, और सारे मिस्र देश में लोग इस सारी उपज को भूल जाएँगे; और अकाल से देश का नाश होगा। (IN)

उत्पत्ति 41:31 और सुकाल (बहुतायत की उपज) देश में फिर स्मरण न रहेगा क्योंकि अकाल अत्यन्त भयंकर होगा। (IN)

उत्पत्ति 41:32 और फ़िरौन ने जो यह स्वप्न दो बार देखा है इसका भेद यही है कि यह बात परमेश्‍वर की ओर से नियुक्त हो चुकी है, और परमेश्‍वर इसे शीघ्र ही पूरा करेगा। (IN)

उत्पत्ति 41:33 इसलिए अब फ़िरौन किसी समझदार और बुद्धिमान् पुरुष को ढूँढ़ करके उसे मिस्र देश पर प्रधानमंत्री ठहराए। (IN)

उत्पत्ति 41:34 फ़िरौन यह करे कि देश पर अधिकारियों को नियुक्त करे, और जब तक सुकाल के सात वर्ष रहें तब तक वह मिस्र देश की उपज का पंचमांश लिया करे। (IN)

उत्पत्ति 41:35 और वे इन अच्छे वर्षों में सब प्रकार की भोजनवस्तु इकट्ठा करें, और नगर-नगर में भण्डार घर भोजन के लिये, फ़िरौन के वश में करके उसकी रक्षा करें। (IN)

उत्पत्ति 41:36 और वह भोजनवस्तु अकाल के उन सात वर्षों के लिये, जो मिस्र देश में आएँगे, देश के भोजन के निमित्त रखी रहे, जिससे देश उस अकाल से सत्यानाश न हो जाए। (IN)

उत्पत्ति 41:37 ¶ यह बात फ़िरौन और उसके सारे कर्मचारियों को अच्छी लगी। (IN)

उत्पत्ति 41:38 इसलिए फ़िरौन ने अपने कर्मचारियों से कहा, “क्या हमको ऐसा पुरुष, जैसा यह है, जिसमें परमेश्‍वर का आत्मा रहता है, मिल सकता है?” (IN)

उत्पत्ति 41:39 फिर फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “परमेश्‍वर ने जो तुझे इतना ज्ञान दिया है, कि तेरे तुल्य कोई समझदार और बुद्धिमान् नहीं; (IN)

उत्पत्ति 41:40 इस कारण तू मेरे घर का अधिकारी होगा, और तेरी आज्ञा के अनुसार मेरी सारी प्रजा चलेगी, केवल राजगद्दी के विषय मैं तुझ से बड़ा ठहरूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 41:41 फिर फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “सुन, मैं तुझको मिस्र के सारे देश के ऊपर अधिकारी ठहरा देता हूँ।” (IN)

उत्पत्ति 41:42 तब फ़िरौन ने अपने हाथ से अँगूठी निकालकर यूसुफ के हाथ में पहना दी; और उसको बढ़िया मलमल के वस्त्र पहनवा दिए, और उसके गले में सोने की माला डाल दी; (IN)

उत्पत्ति 41:43 और उसको अपने दूसरे रथ पर चढ़वाया; और लोग उसके आगे-आगे यह प्रचार करते चले, कि घुटने टेककर दण्डवत् करो और उसने उसको मिस्र के सारे देश के ऊपर प्रधानमंत्री ठहराया। (IN)

उत्पत्ति 41:44 फिर फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “फ़िरौन तो मैं हूँ, और सारे मिस्र देश में कोई भी तेरी आज्ञा के बिना हाथ पाँव न हिलाएगा।” (IN)

उत्पत्ति 41:45 फ़िरौन ने यूसुफ का नाम सापनत-पानेह रखा। और ओन नगर के याजक पोतीपेरा की बेटी आसनत से उसका ब्याह करा दिया। और यूसुफ सारे मिस्र देश में दौरा करने लगा। (IN)

उत्पत्ति 41:46 जब यूसुफ मिस्र के राजा फ़िरौन के सम्मुख खड़ा हुआ, तब वह तीस वर्ष का था। वह फ़िरौन के सम्मुख से निकलकर सारे मिस्र देश में दौरा करने लगा। (IN)

उत्पत्ति 41:47 सुकाल के सातों वर्षों में भूमि बहुतायत से अन्न उपजाती रही। (IN)

उत्पत्ति 41:48 और यूसुफ उन सातों वर्षों में सब प्रकार की भोजन वस्तुएँ, जो मिस्र देश में होती थीं, जमा करके नगरों में रखता गया, और हर एक नगर के चारों ओर के खेतों की भोजन वस्तुओं को वह उसी नगर में इकट्ठा करता गया। (IN)

उत्पत्ति 41:49 इस प्रकार यूसुफ ने अन्न को समुद्र की रेत के समान अत्यन्त बहुतायत से राशि-राशि गिनके रखा, यहाँ तक कि उसने उनका गिनना छोड़ दिया; क्योंकि वे असंख्य हो गईं। (IN)

उत्पत्ति 41:50 अकाल के प्रथम वर्ष के आने से पहले यूसुफ के दो पुत्र, ओन के याजक पोतीपेरा की बेटी आसनत से जन्मे। (IN)

उत्पत्ति 41:51 और यूसुफ ने अपने जेठे का नाम यह कहकर मनश्शे रखा, कि ‘परमेश्‍वर ने मुझसे मेरा सारा क्लेश, और मेरे पिता का सारा घराना भुला दिया है।’ (IN)

उत्पत्ति 41:52 दूसरे का नाम उसने यह कहकर एप्रैम रखा, कि ‘मुझे दुःख भोगने के देश में परमेश्‍वर ने फलवन्त किया है।’ (IN)

उत्पत्ति 41:53 और मिस्र देश के सुकाल के सात वर्ष समाप्त हो गए। (IN)

उत्पत्ति 41:54 और यूसुफ के कहने के अनुसार सात वर्षों के लिये अकाल आरम्भ हो गया। सब देशों में अकाल पड़ने लगा; परन्तु सारे मिस्र देश में अन्न था। (IN)

उत्पत्ति 41:55 जब मिस्र का सारा देश भूखें मरने लगा; तब प्रजा फिरोन से चिल्ला-चिल्लाकर रोटी माँगने लगी; और वह सब मिस्रियों से कहा करता था, “यूसुफ के पास जाओ; और जो कुछ वह तुम से कहे, वही करो।” (IN)

उत्पत्ति 41:56 इसलिए जब अकाल सारी पृथ्वी पर फैल गया, और मिस्र देश में अकाल का भयंकर रूप हो गया, तब यूसुफ सब भण्डारों को खोल-खोलकर मिस्रियों के हाथ अन्न बेचने लगा। (IN)

उत्पत्ति 41:57 इसलिए सारी पृथ्वी के लोग मिस्र में अन्न मोल लेने के लिये यूसुफ के पास आने लगे, क्योंकि सारी पृथ्वी पर भयंकर अकाल था। (IN)

उत्पत्ति 42:1 ¶ जब याकूब ने सुना कि मिस्र में अन्न है, तब उसने अपने पुत्रों से कहा, “तुम एक दूसरे का मुँह क्यों देख रहे हो।” (IN)

उत्पत्ति 42:2 फिर उसने कहा, “मैंने सुना है कि मिस्र में अन्न है; इसलिए तुम लोग वहाँ जाकर हमारे लिये अन्न मोल ले आओ, जिससे हम न मरें, वरन् जीवित रहें।” (IN)

उत्पत्ति 42:3 अतः यूसुफ के दस भाई अन्न मोल लेने के लिये मिस्र को गए। (IN)

उत्पत्ति 42:4 पर यूसुफ के भाई बिन्यामीन को याकूब ने यह सोचकर भाइयों के साथ न भेजा कि कहीं ऐसा न हो कि उस पर कोई विपत्ति आ पड़े। (IN)

उत्पत्ति 42:5 इस प्रकार जो लोग अन्न मोल लेने आए उनके साथ इस्राएल के पुत्र भी आए; क्योंकि कनान देश में भी भारी अकाल था। (IN)

उत्पत्ति 42:6 यूसुफ तो मिस्र देश का अधिकारी था, और उस देश के सब लोगों के हाथ वही अन्न बेचता था; इसलिए जब यूसुफ के भाई आए तब भूमि पर मुँह के बल गिरकर उसको दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 42:7 उनको देखकर यूसुफ ने पहचान तो लिया, परन्तु उनके सामने भोला बनकर कठोरता के साथ उनसे पूछा, “तुम कहाँ से आते हो?” उन्होंने कहा, “हम तो कनान देश से अन्न मोल लेने के लिये आए हैं।” (IN)

उत्पत्ति 42:8 यूसुफ ने अपने भाइयों को पहचान लिया, परन्तु उन्होंने उसको न पहचाना। (IN)

उत्पत्ति 42:9 तब यूसुफ अपने उन स्वप्नों को स्मरण करके जो उसने उनके विषय में देखे थे, उनसे कहने लगा, “तुम भेदिये हो; इस देश की दुर्दशा को देखने के लिये आए हो।” (IN)

उत्पत्ति 42:10 उन्होंने उससे कहा, “नहीं, नहीं, हे प्रभु, तेरे दास भोजनवस्तु मोल लेने के लिये आए हैं। (IN)

उत्पत्ति 42:11 हम सब एक ही पिता के पुत्र हैं, हम सीधे मनुष्य हैं, तेरे दास भेदिये नहीं।” (IN)

उत्पत्ति 42:12 उसने उनसे कहा, “नहीं नहीं, तुम इस देश की दुर्दशा देखने ही को आए हो।” (IN)

उत्पत्ति 42:13 उन्होंने कहा, “हम तेरे दास बारह भाई हैं, और कनान देशवासी एक ही पुरुष के पुत्र हैं, और छोटा इस समय हमारे पिता के पास है, और एक जाता रहा।” (IN)

उत्पत्ति 42:14 तब यूसुफ ने उनसे कहा, “मैंने तो तुम से कह दिया, कि तुम भेदिये हो; (IN)

उत्पत्ति 42:15 अतः इसी रीति से तुम परखे जाओगे, फ़िरौन के जीवन की शपथ, जब तक तुम्हारा छोटा भाई यहाँ न आए तब तक तुम यहाँ से न निकलने पाओगे। (IN)

उत्पत्ति 42:16 इसलिए अपने में से एक को भेज दो कि वह तुम्हारे भाई को ले आए, और तुम लोग बन्दी रहोगे; इस प्रकार तुम्हारी बातें परखी जाएँगी कि तुम में सच्चाई है कि नहीं। यदि सच्चे न ठहरे तब तो फ़िरौन के जीवन की शपथ तुम निश्चय ही भेदिये समझे जाओगे।” (IN)

उत्पत्ति 42:17 तब उसने उनको तीन दिन तक बन्दीगृह में रखा। (IN)

उत्पत्ति 42:18 तीसरे दिन यूसुफ ने उनसे कहा, “एक काम करो तब जीवित रहोगे; क्योंकि मैं परमेश्‍वर का भय मानता हूँ; (IN)

उत्पत्ति 42:19 यदि तुम सीधे मनुष्य हो, तो तुम सब भाइयों में से एक जन इस बन्दीगृह में बँधुआ रहे; और तुम अपने घरवालों की भूख मिटाने के लिये अन्न ले जाओ। (IN)

उत्पत्ति 42:20 और अपने छोटे भाई को मेरे पास ले आओ; इस प्रकार तुम्हारी बातें सच्ची ठहरेंगी, और तुम मार डाले न जाओगे।” तब उन्होंने वैसा ही किया। (IN)

उत्पत्ति 42:21 उन्होंने आपस में कहा, “निःसन्देह हम अपने भाई के विषय में दोषी हैं, क्योंकि जब उसने हम से गिड़गिड़ाकर विनती की, तब भी हमने यह देखकर, कि उसका जीवन कैसे संकट में पड़ा है, उसकी न सुनी; इसी कारण हम भी अब इस संकट में पड़े हैं।” (IN)

उत्पत्ति 42:22 रूबेन ने उनसे कहा, “क्या मैंने तुम से न कहा था कि लड़के के अपराधी मत बनो? परन्तु तुमने न सुना। देखो, अब उसके लहू का बदला लिया जाता है।” (IN)

उत्पत्ति 42:23 यूसुफ की और उनकी बातचीत जो एक दुभाषिया के द्वारा होती थी; इससे उनको मालूम न हुआ कि वह उनकी बोली समझता है। (IN)

उत्पत्ति 42:24 तब वह उनके पास से हटकर रोने लगा; फिर उनके पास लौटकर और उनसे बातचीत करके उनमें से शिमोन को छाँट निकाला और उसके सामने बन्दी बना लिया। (IN)

उत्पत्ति 42:25 ¶ तब यूसुफ ने आज्ञा दी, कि उनके बोरे अन्न से भरो और एक-एक जन के बोरे में उसके रुपये को भी रख दो, फिर उनको मार्ग के लिये भोजनवस्तु दो। अतः उनके साथ ऐसा ही किया गया। (IN)

उत्पत्ति 42:26 तब वे अपना अन्न अपने गदहों पर लादकर वहाँ से चल दिए। (IN)

उत्पत्ति 42:27 सराय में जब एक ने अपने गदहे को चारा देने के लिये अपना बोरा खोला, तब उसका रुपया बोरे के मुँह पर रखा हुआ दिखलाई पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 42:28 तब उसने अपने भाइयों से कहा, “मेरा रुपया तो लौटा दिया गया है, देखो, वह मेरे बोरे में है,” तब उनके जी में जी न रहा, और वे एक दूसरे की और भय से ताकने लगे, और बोले, “परमेश्‍वर ने यह हम से क्या किया है?” (IN)

उत्पत्ति 42:29 तब वे कनान देश में अपने पिता याकूब के पास आए, और अपना सारा वृत्तान्त उसे इस प्रकार वर्णन किया: (IN)

उत्पत्ति 42:30 “जो पुरुष उस देश का स्वामी है, उसने हम से कठोरता के साथ बातें की, और हमको देश के भेदिये कहा। (IN)

उत्पत्ति 42:31 तब हमने उससे कहा, 'हम सीधे लोग हैं, भेदिये नहीं। (IN)

उत्पत्ति 42:32 हम बारह भाई एक ही पिता के पुत्र हैं, एक तो जाता रहा, परन्तु छोटा इस समय कनान देश में हमारे पिता के पास है।' (IN)

उत्पत्ति 42:33 तब उस पुरुष ने, जो उस देश का स्वामी है, हम से कहा, 'इससे मालूम हो जाएगा कि तुम सीधे मनुष्य हो; तुम अपने में से एक को मेरे पास छोड़कर अपने घरवालों की भूख मिटाने के लिये कुछ ले जाओ, (IN)

उत्पत्ति 42:34 और अपने छोटे भाई को मेरे पास ले आओ। तब मुझे विश्वास हो जाएगा कि तुम भेदिये नहीं, सीधे लोग हो। फिर मैं तुम्हारे भाई को तुम्हें सौंप दूँगा, और तुम इस देश में लेन-देन कर सकोगे'।” (IN)

उत्पत्ति 42:35 यह कहकर वे अपने-अपने बोरे से अन्न निकालने लगे, तब, क्या देखा, कि एक-एक जन के रुपये की थैली उसी के बोरे में रखी है। तब रुपये की थैलियों को देखकर वे और उनका पिता बहुत डर गए। (IN)

उत्पत्ति 42:36 तब उनके पिता याकूब ने उनसे कहा, “मुझको तुम ने निर्वंश कर दिया, देखो, यूसुफ नहीं रहा, और शिमोन भी नहीं आया, और अब तुम बिन्यामीन को भी ले जाना चाहते हो। ये सब विपत्तियाँ मेरे ऊपर आ पड़ी हैं।” (IN)

उत्पत्ति 42:37 रूबेन ने अपने पिता से कहा, “यदि मैं उसको तेरे पास न लाऊँ, तो मेरे दोनों पुत्रों को मार डालना; तू उसको मेरे हाथ में सौंप दे, मैं उसे तेरे पास फिर पहुँचा दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 42:38 उसने कहा, “मेरा पुत्र तुम्हारे संग न जाएगा; क्योंकि उसका भाई मर गया है, और वह अब अकेला रह गया है: इसलिए जिस मार्ग से तुम जाओगे, उसमें यदि उस पर कोई विपत्ति आ पड़े, तब तो तुम्हारे कारण मैं इस बुढ़ापे की अवस्था में शोक के साथ अधोलोक में उतर जाऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 43:1 ¶ देश में अकाल और भी भयंकर होता गया। (IN)

उत्पत्ति 43:2 जब वह अन्न जो वे मिस्र से ले आए थे, समाप्त हो गया तब उनके पिता ने उनसे कहा, “फिर जाकर हमारे लिये थोड़ी सी भोजनवस्तु मोल ले आओ।” (IN)

उत्पत्ति 43:3 तब यहूदा ने उससे कहा, “उस पुरुष ने हमको चेतावनी देकर कहा, 'यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे संग न आए, तो तुम मेरे सम्मुख न आने पाओगे।' (IN)

उत्पत्ति 43:4 इसलिए यदि तू हमारे भाई को हमारे संग भेजे, तब तो हम जाकर तेरे लिये भोजनवस्तु मोल ले आएँगे; (IN)

उत्पत्ति 43:5 परन्तु यदि तू उसको न भेजे, तो हम न जाएँगे, क्योंकि उस पुरुष ने हम से कहा, 'यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे संग न हो, तो तुम मेरे सम्मुख न आने पाओगे'।” (IN)

उत्पत्ति 43:6 तब इस्राएल ने कहा, “तुम ने उस पुरुष को यह बताकर कि हमारा एक और भाई है, क्यों मुझसे बुरा बर्ताव किया?” (IN)

उत्पत्ति 43:7 उन्होंने कहा, “जब उस पुरुष ने हमारी और हमारे कुटुम्बियों की स्थिति के विषय में इस रीति पूछा, 'क्या तुम्हारा पिता अब तक जीवित है? क्या तुम्हारे कोई और भाई भी है?' तब हमने इन प्रश्‍नों के अनुसार उससे वर्णन किया; फिर हम क्या जानते थे कि वह कहेगा, 'अपने भाई को यहाँ ले आओ।'” (IN)

उत्पत्ति 43:8 फिर यहूदा ने अपने पिता इस्राएल से कहा, “उस लड़के को मेरे संग भेज दे, कि हम चले जाएँ; इससे हम, और तू, और हमारे बाल-बच्चे मरने न पाएँगे, वरन् जीवित रहेंगे। (IN)

उत्पत्ति 43:9 मैं उसका जामिन होता हूँ; मेरे ही हाथ से तू उसको वापस लेना। यदि मैं उसको तेरे पास पहुँचाकर सामने न खड़ा कर दूँ, तब तो मैं सदा के लिये तेरा अपराधी ठहरूँगा। (IN)

उत्पत्ति 43:10 यदि हम लोग विलम्ब न करते, तो अब तक दूसरी बार लौट आते।” (IN)

उत्पत्ति 43:11 तब उनके पिता इस्राएल ने उनसे कहा, “यदि सचमुच ऐसी ही बात है, तो यह करो; इस देश की उत्तम-उत्तम वस्तुओं में से कुछ-कुछ अपने बोरों में उस पुरुष के लिये भेंट ले जाओ: जैसे थोड़ा सा बलसान, और थोड़ा सा मधु, और कुछ सुगन्ध-द्रव्य, और गन्धरस, पिस्ते, और बादाम। (IN)

उत्पत्ति 43:12 फिर अपने-अपने साथ दूना रुपया ले जाओ; और जो रुपया तुम्हारे बोरों के मुँह पर रखकर लौटा दिया गया था, उसको भी लेते जाओ; कदाचित् यह भूल से हुआ हो। (IN)

उत्पत्ति 43:13 अपने भाई को भी संग लेकर उस पुरुष के पास फिर जाओ, (IN)

उत्पत्ति 43:14 और सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर उस पुरुष को तुम पर दया करेगा, जिससे कि वह तुम्हारे दूसरे भाई को और बिन्यामीन को भी आने दे: और यदि मैं निर्वंश हुआ तो होने दो।” (IN)

उत्पत्ति 43:15 तब उन मनुष्यों ने वह भेंट, और दूना रुपया, और बिन्यामीन को भी संग लिया, और चल दिए और मिस्र में पहुँचकर यूसुफ के सामने खड़े हुए। (IN)

उत्पत्ति 43:16 ¶ उनके साथ बिन्यामीन को देखकर यूसुफ ने अपने घर के अधिकारी से कहा, “उन मनुष्यों को घर में पहुँचा दो, और पशु मारकर भोजन तैयार करो; क्योंकि वे लोग दोपहर को मेरे संग भोजन करेंगे।” (IN)

उत्पत्ति 43:17 तब वह अधिकारी पुरुष यूसुफ के कहने के अनुसार उन पुरुषों को यूसुफ के घर में ले गया। (IN)

उत्पत्ति 43:18 जब वे यूसुफ के घर को पहुँचाए गए तब वे आपस में डरकर कहने लगे, “जो रुपया पहली बार हमारे बोरों में लौटा दिया गया था, उसी के कारण हम भीतर पहुँचाए गए हैं; जिससे कि वह पुरुष हम पर टूट पड़े, और हमें वंश में करके अपने दास बनाए, और हमारे गदहों को भी छीन ले।” (IN)

उत्पत्ति 43:19 तब वे यूसुफ के घर के अधिकारी के निकट जाकर घर के द्वार पर इस प्रकार कहने लगे, (IN)

उत्पत्ति 43:20 “हे हमारे प्रभु, जब हम पहली बार अन्न मोल लेने को आए थे, (IN)

उत्पत्ति 43:21 तब हमने सराय में पहुँचकर अपने बोरों को खोला, तो क्या देखा, कि एक-एक जन का पूरा-पूरा रुपया उसके बोरे के मुँह पर रखा है; इसलिए हम उसको अपने साथ फिर लेते आए हैं। (IN)

उत्पत्ति 43:22 और दूसरा रुपया भी भोजनवस्तु मोल लेने के लिये लाए हैं; हम नहीं जानते कि हमारा रुपया हमारे बोरों में किसने रख दिया था।” (IN)

उत्पत्ति 43:23 उसने कहा, “तुम्हारा कुशल हो, मत डरो: तुम्हारा परमेश्‍वर, जो तुम्हारे पिता का भी परमेश्‍वर है, उसी ने तुमको तुम्हारे बोरों में धन दिया होगा, तुम्हारा रुपया तो मुझको मिल गया था।” फिर उसने शिमोन को निकालकर उनके संग कर दिया। (IN)

उत्पत्ति 43:24 तब उस जन ने उन मनुष्यों को यूसुफ के घर में ले जाकर जल दिया, तब उन्होंने अपने पाँवों को धोया; फिर उसने उनके गदहों के लिये चारा दिया। (IN)

उत्पत्ति 43:25 तब यह सुनकर, कि आज हमको यहीं भोजन करना होगा, उन्होंने यूसुफ के आने के समय तक, अर्थात् दोपहर तक, उस भेंट को इकट्ठा कर रखा। (IN)

उत्पत्ति 43:26 जब यूसुफ घर आया तब वे उस भेंट को, जो उनके हाथ में थी, उसके सम्मुख घर में ले गए, और भूमि पर गिरकर उसको दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 43:27 उसने उनका कुशल पूछा और कहा, “क्या तुम्हारा बूढ़ा पिता, जिसकी तुम ने चर्चा की थी, कुशल से है? क्या वह अब तक जीवित है?” (IN)

उत्पत्ति 43:28 उन्होंने कहा, “हाँ तेरा दास हमारा पिता कुशल से है और अब तक जीवित है।” तब उन्होंने सिर झुकाकर फिर दण्डवत् किया। (IN)

उत्पत्ति 43:29 तब उसने आँखें उठाकर और अपने सगे भाई बिन्यामीन को देखकर पूछा, “क्या तुम्हारा वह छोटा भाई, जिसकी चर्चा तुम ने मुझसे की थी, यही है?” फिर उसने कहा, “हे मेरे पुत्र, परमेश्‍वर तुझ पर अनुग्रह करे।” (IN)

उत्पत्ति 43:30 तब अपने भाई के स्नेह से मन भर आने के कारण और यह सोचकर कि मैं कहाँ जाकर रोऊँ, यूसुफ तुरन्त अपनी कोठरी में गया, और वहाँ रो पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 43:31 फिर अपना मुँह धोकर निकल आया, और अपने को शान्त कर कहा, “भोजन परोसो।” (IN)

उत्पत्ति 43:32 तब उन्होंने उसके लिये तो अलग, और भाइयों के लिये भी अलग, और जो मिस्री उसके संग खाते थे, उनके लिये भी अलग, भोजन परोसा; इसलिए कि मिस्री इब्रियों के साथ भोजन नहीं कर सकते, वरन् मिस्री ऐसा करना घृणा समझते थे। (IN)

उत्पत्ति 43:33 सो यूसुफ के भाई उसके सामने, बड़े-बड़े पहले, और छोटे-छोटे पीछे, अपनी-अपनी अवस्था के अनुसार, क्रम से बैठाए गए; यह देख वे विस्मित होकर एक दूसरे की ओर देखने लगे। (IN)

उत्पत्ति 43:34 तब यूसुफ अपने सामने से भोजन-वस्तुएँ उठा-उठाकर उनके पास भेजने लगा, और बिन्यामीन को अपने भाइयों से पाँचगुना भोजनवस्तु मिली। और उन्होंने उसके संग मनमाना खाया पिया। (IN)

उत्पत्ति 44:1 ¶ तब उसने अपने घर के अधिकारी को आज्ञा दी, “इन मनुष्यों के बोरों में जितनी भोजन वस्तु समा सके उतनी भर दे, और एक-एक जन के रुपये को उसके बोरे के मुँह पर रख दे। (IN)

उत्पत्ति 44:2 और मेरा चाँदी का कटोरा छोटे के बोरे के मुँह पर उसके अन्न के रुपये के साथ रख दे।” यूसुफ की इस आज्ञा के अनुसार उसने किया। (IN)

उत्पत्ति 44:3 सवेरे भोर होते ही वे मनुष्य अपने गदहों समेत विदा किए गए। (IN)

उत्पत्ति 44:4 वे नगर से निकले ही थे, और दूर न जाने पाए थे कि यूसुफ ने अपने घर के अधिकारी से कहा, “उन मनुष्यों का पीछा कर, और उनको पाकर उनसे कह, 'तुमने भलाई के बदले बुराई क्यों की है? (IN)

उत्पत्ति 44:5 क्या यह वह वस्तु नहीं जिसमें मेरा स्वामी पीता है, और जिससे वह शकुन भी विचारा करता है? तुम ने यह जो किया है सो बुरा किया’।” (IN)

उत्पत्ति 44:6 तब उसने उन्हें जा पकड़ा, और ऐसी ही बातें उनसे कहीं। (IN)

उत्पत्ति 44:7 उन्होंने उससे कहा, “हे हमारे प्रभु, तू ऐसी बातें क्यों कहता है? ऐसा काम करना तेरे दासों से दूर रहे। (IN)

उत्पत्ति 44:8 देख जो रुपया हमारे बोरों के मुँह पर निकला था, जब हमने उसको कनान देश से ले आकर तुझे लौटा दिया, तब भला, तेरे स्वामी के घर में से हम कोई चाँदी या सोने की वस्तु कैसे चुरा सकते हैं? (IN)

उत्पत्ति 44:9 तेरे दासों में से जिस किसी के पास वह निकले, वह मार डाला जाए, और हम भी अपने उस प्रभु के दास हो जाएँ।” (IN)

उत्पत्ति 44:10 उसने कहा, “तुम्हारा ही कहना सही, जिसके पास वह निकले वह मेरा दास होगा; और तुम लोग निर्दोषी ठहरोगे।” (IN)

उत्पत्ति 44:11 इस पर वे जल्दी से अपने-अपने बोरे को उतार भूमि पर रखकर उन्हें खोलने लगे। (IN)

उत्पत्ति 44:12 तब वह ढूँढ़ने लगा, और बडे़ के बोरे से लेकर छोटे के बोरे तक खोज की: और कटोरा बिन्यामीन के बोरे में मिला। (IN)

उत्पत्ति 44:13 तब उन्होंने अपने-अपने वस्त्र फाड़े, और अपना-अपना गदहा लादकर नगर को लौट गए। (IN)

उत्पत्ति 44:14 जब यहूदा और उसके भाई यूसुफ के घर पर पहुँचे, और यूसुफ वहीं था, तब वे उसके सामने भूमि पर गिरे। (IN)

उत्पत्ति 44:15 यूसुफ ने उनसे कहा, “तुम लोगों ने यह कैसा काम किया है? क्या तुम न जानते थे कि मुझ सा मनुष्य शकुन विचार सकता है?” (IN)

उत्पत्ति 44:16 यहूदा ने कहा, “हम लोग अपने प्रभु से क्या कहें? हम क्या कहकर अपने को निर्दोषी ठहराएँ? परमेश्‍वर ने तेरे दासों के अधर्म को पकड़ लिया है। हम, और जिसके पास कटोरा निकला वह भी, हम सबके सब अपने प्रभु के दास ही हैं।” (IN)

उत्पत्ति 44:17 उसने कहा, “ऐसा करना मुझसे दूर रहे, जिस जन के पास कटोरा निकला है, वही मेरा दास होगा; और तुम लोग अपने पिता के पास कुशल क्षेम से चले जाओ।” (IN)

उत्पत्ति 44:18 ¶ तब यहूदा उसके पास जाकर कहने लगा, “हे मेरे प्रभु, तेरे दास को अपने प्रभु से एक बात कहने की आज्ञा हो, और तेरा कोप तेरे दास पर न भड़के; क्योंकि तू तो फ़िरौन के तुल्य हैं। (IN)

उत्पत्ति 44:19 मेरे प्रभु ने अपने दासों से पूछा था, 'क्या तुम्हारे पिता या भाई हैं?' (IN)

उत्पत्ति 44:20 और हमने अपने प्रभु से कहा, 'हाँ, हमारा बूढ़ा पिता है, और उसके बुढ़ापे का एक छोटा सा बालक भी है, परन्तु उसका भाई मर गया है, इसलिए वह अब अपनी माता का अकेला ही रह गया है, और उसका पिता उससे स्नेह रखता है।' (IN)

उत्पत्ति 44:21 तब तूने अपने दासों से कहा था, 'उसको मेरे पास ले आओ, जिससे मैं उसको देखूँ।' (IN)

उत्पत्ति 44:22 तब हमने अपने प्रभु से कहा था, 'वह लड़का अपने पिता को नहीं छोड़ सकता; नहीं तो उसका पिता मर जाएगा।' (IN)

उत्पत्ति 44:23 और तूने अपने दासों से कहा, 'यदि तुम्हारा छोटा भाई तुम्हारे संग न आए, तो तुम मेरे सम्मुख फिर न आने पाओगे।' (IN)

उत्पत्ति 44:24 इसलिए जब हम अपने पिता तेरे दास के पास गए, तब हमने उससे अपने प्रभु की बातें कहीं। (IN)

उत्पत्ति 44:25 तब हमारे पिता ने कहा, 'फिर जाकर हमारे लिये थोड़ी सी भोजन वस्तु मोल ले आओ।' (IN)

उत्पत्ति 44:26 हमने कहा, 'हम नहीं जा सकते, हाँ, यदि हमारा छोटा भाई हमारे संग रहे, तब हम जाएँगे; क्योंकि यदि हमारा छोटा भाई हमारे संग न रहे, तो हम उस पुरुष के सम्मुख न जाने पाएँगे।' (IN)

उत्पत्ति 44:27 तब तेरे दास मेरे पिता ने हम से कहा, 'तुम तो जानते हो कि मेरी स्त्री से दो पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 44:28 और उनमें से एक तो मुझे छोड़ ही गया, और मैंने निश्चय कर लिया, कि वह फाड़ डाला गया होगा; और तब से मैं उसका मुँह न देख पाया। (IN)

उत्पत्ति 44:29 अतः यदि तुम इसको भी मेरी आँख की आड़ में ले जाओ, और कोई विपत्ति इस पर पड़े, तो तुम्हारे कारण मैं इस बुढ़ापे की अवस्था में शोक के साथ अधोलोक में उतर जाऊँगा।' (IN)

उत्पत्ति 44:30 इसलिए जब मैं अपने पिता तेरे दास के पास पहुँचूँ, और यह लड़का संग न रहे, तब, उसका प्राण जो इसी पर अटका रहता है, (IN)

उत्पत्ति 44:31 इस कारण, यह देखकर कि लड़का नहीं है, वह तुरन्त ही मर जाएगा। तब तेरे दासों के कारण तेरा दास हमारा पिता, जो बुढ़ापे की अवस्था में है, शोक के साथ अधोलोक में उतर जाएगा। (IN)

उत्पत्ति 44:32 फिर तेरा दास अपने पिता के यहाँ यह कहकर इस लड़के का जामिन हुआ है, 'यदि मैं इसको तेरे पास न पहुँचा दूँ, तब तो मैं सदा के लिये तेरा अपराधी ठहरूँगा।' (IN)

उत्पत्ति 44:33 इसलिए अब तेरा दास इस लड़के के बदले अपने प्रभु का दास होकर रहने की आज्ञा पाए, और यह लड़का अपने भाइयों के संग जाने दिया जाए। (IN)

उत्पत्ति 44:34 क्योंकि लड़के के बिना संग रहे मैं कैसे अपने पिता के पास जा सकूँगा; ऐसा न हो कि मेरे पिता पर जो दुःख पड़ेगा वह मुझे देखना पड़े।” (IN)

उत्पत्ति 45:1 ¶ तब यूसुफ उन सबके सामने, जो उसके आस-पास खड़े थे, अपने को और रोक न सका; और पुकारकर कहा, “मेरे आस-पास से सब लोगों को बाहर कर दो।” भाइयों के सामने अपने को प्रगट करने के समय यूसुफ के संग और कोई न रहा। (IN)

उत्पत्ति 45:2 तब वह चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा; और मिस्रियों ने सुना, और फ़िरौन के घर के लोगों को भी इसका समाचार मिला। (IN)

उत्पत्ति 45:3 तब यूसुफ अपने भाइयों से कहने लगा, “मैं यूसुफ हूँ, क्या मेरा पिता अब तक जीवित है?” इसका उत्तर उसके भाई न दे सके; क्योंकि वे उसके सामने घबरा गए थे। (IN)

उत्पत्ति 45:4 फिर यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, “मेरे निकट आओ।” यह सुनकर वे निकट गए। फिर उसने कहा, “मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूँ, जिसको तुम ने मिस्र आनेवालों के हाथ बेच डाला था। (IN)

उत्पत्ति 45:5 अब तुम लोग मत पछताओ, और तुम ने जो मुझे यहाँ बेच डाला, इससे उदास मत हो; क्योंकि परमेश्‍वर ने तुम्हारे प्राणों को बचाने के लिये मुझे तुम्हारे आगे भेज दिया है। (IN)

उत्पत्ति 45:6 क्योंकि अब दो वर्ष से इस देश में अकाल है; और अब पाँच वर्ष और ऐसे ही होंगे कि उनमें न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा। (IN)

उत्पत्ति 45:7 इसलिए परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे आगे इसलिए भेजा कि तुम पृथ्वी पर जीवित रहो, और तुम्हारे प्राणों के बचने से तुम्हारा वंश बढ़े। (IN)

उत्पत्ति 45:8 इस रीति अब मुझको यहाँ पर भेजनेवाले तुम नहीं, परमेश्‍वर ही ठहरा; और उसी ने मुझे फ़िरौन का पिता सा, और उसके सारे घर का स्वामी, और सारे मिस्र देश का प्रभु ठहरा दिया है। (IN)

उत्पत्ति 45:9 अतः शीघ्र मेरे पिता के पास जाकर कहो, 'तेरा पुत्र यूसुफ इस प्रकार कहता है, कि परमेश्‍वर ने मुझे सारे मिस्र का स्वामी ठहराया है; इसलिए तू मेरे पास बिना विलम्ब किए चला आ। (IN)

उत्पत्ति 45:10 और तेरा निवास गोशेन देश में होगा, और तू, बेटे, पोतों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, और अपने सब कुछ समेत मेरे निकट रहेगा। (IN)

उत्पत्ति 45:11 और अकाल के जो पाँच वर्ष और होंगे, उनमें मैं वहीं तेरा पालन-पोषण करूँगा; ऐसा न हो कि तू, और तेरा घराना, वरन् जितने तेरे हैं, वे भूखे मरें।' (IN)

उत्पत्ति 45:12 और तुम अपनी आँखों से देखते हो, और मेरा भाई बिन्यामीन भी अपनी आँखों से देखता है कि जो हम से बातें कर रहा है वह यूसुफ है। (IN)

उत्पत्ति 45:13 तुम मेरे सब वैभव का, जो मिस्र में है और जो कुछ तुम ने देखा है, उस सब का मेरे पिता से वर्णन करना; और तुरन्त मेरे पिता को यहाँ ले आना।” (IN)

उत्पत्ति 45:14 और वह अपने भाई बिन्यामीन के गले से लिपटकर रोया; और बिन्यामीन भी उसके गले से लिपटकर रोया। (IN)

उत्पत्ति 45:15 वह अपने सब भाइयों को चूमकर रोया और इसके पश्चात् उसके भाई उससे बातें करने लगे। (IN)

उत्पत्ति 45:16 इस बात का समाचार कि यूसुफ के भाई आए हैं, फ़िरौन के भवन तक पहुँच गया, और इससे फ़िरौन और उसके कर्मचारी प्रसन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 45:17 इसलिए फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “अपने भाइयों से कह कि एक काम करो: अपने पशुओं को लादकर कनान देश में चले जाओ। (IN)

उत्पत्ति 45:18 और अपने पिता और अपने-अपने घर के लोगों को लेकर मेरे पास आओ; और मिस्र देश में जो कुछ अच्छे से अच्छा है वह मैं तुम्हें दूँगा, और तुम्हें देश के उत्तम से उत्तम पदार्थ खाने को मिलेंगे। (IN)

उत्पत्ति 45:19 और तुझे आज्ञा मिली है, 'तुम एक काम करो कि मिस्र देश से अपने बाल-बच्चों और स्त्रियों के लिये गाड़ियाँ ले जाओ, और अपने पिता को ले आओ। (IN)

उत्पत्ति 45:20 और अपनी सामग्री की चिन्ता न करना; क्योंकि सारे मिस्र देश में जो कुछ अच्छे से अच्छा है वह तुम्हारा है’।” (IN)

उत्पत्ति 45:21 इस्राएल के पुत्रों ने वैसा ही किया; और यूसुफ ने फ़िरौन की आज्ञा के अनुसार उन्हें गाड़ियाँ दी, और मार्ग के लिये भोजन-सामग्री भी दी। (IN)

उत्पत्ति 45:22 उनमें से एक-एक जन को तो उसने एक-एक जोड़ा वस्त्र भी दिया; और बिन्यामीन को तीन सौ रूपे के टुकड़े और पाँच जोड़े वस्त्र दिए। (IN)

उत्पत्ति 45:23 अपने पिता के पास उसने जो भेजा वह यह है, अर्थात् मिस्र की अच्छी वस्तुओं से लदे हुए दस गदहे, और अन्न और रोटी और उसके पिता के मार्ग के लिये भोजन वस्तु से लदी हुई दस गदहियाँ। (IN)

उत्पत्ति 45:24 तब उसने अपने भाइयों को विदा किया, और वे चल दिए; और उसने उनसे कहा, “मार्ग में कहीं झगड़ा न करना।” (IN)

उत्पत्ति 45:25 मिस्र से चलकर वे कनान देश में अपने पिता याकूब के पास पहुँचे। (IN)

उत्पत्ति 45:26 और उससे यह वर्णन किया, “यूसुफ अब तक जीवित है, और सारे मिस्र देश पर प्रभुता वही करता है।” पर उसने उन पर विश्वास न किया, और वह अपने आपे में न रहा। (IN)

उत्पत्ति 45:27 तब उन्होंने अपने पिता याकूब से यूसुफ की सारी बातें, जो उसने उनसे कहीं थीं, कह दीं; जब उसने उन गाड़ियों को देखा, जो यूसुफ ने उसके ले आने के लिये भेजी थीं, तब उसका चित्त स्थिर हो गया। (IN)

उत्पत्ति 45:28 और इस्राएल ने कहा, “बस, मेरा पुत्र यूसुफ अब तक जीवित है; मैं अपनी मृत्यु से पहले जाकर उसको देखूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 46:1 ¶ तब इस्राएल अपना सब कुछ लेकर बेर्शेबा को गया, और वहाँ अपने पिता इसहाक के परमेश्‍वर को बलिदान चढ़ाया। (IN)

उत्पत्ति 46:2 तब परमेश्‍वर ने इस्राएल से रात को दर्शन में कहा, “हे याकूब हे याकूब।” उसने कहा, “क्या आज्ञा।” (IN)

उत्पत्ति 46:3 उसने कहा, “मैं परमेश्‍वर तेरे पिता का परमेश्‍वर हूँ, तू मिस्र में जाने से मत डर; क्योंकि मैं तुझ से वहाँ एक बड़ी जाति बनाऊँगा। (IN)

उत्पत्ति 46:4 मैं तेरे संग-संग मिस्र को चलता हूँ; और मैं तुझे वहाँ से फिर निश्चय ले आऊँगा; और यूसुफ अपने हाथ से तेरी आँखों को बन्द करेगा।” (IN)

उत्पत्ति 46:5 तब याकूब बेर्शेबा से चला; और इस्राएल के पुत्र अपने पिता याकूब, और अपने बाल-बच्चों, और स्त्रियों को उन गाड़ियों पर, जो फ़िरौन ने उनके ले आने को भेजी थीं, चढ़ाकर चल पड़े। (IN)

उत्पत्ति 46:6 वे अपनी भेड़-बकरी, गाय-बैल, और कनान देश में अपने इकट्ठा किए हुए सारे धन को लेकर मिस्र में आए। (IN)

उत्पत्ति 46:7 और याकूब अपने बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों, अर्थात् अपने वंश भर को अपने संग मिस्र में ले आया। (IN)

उत्पत्ति 46:8 ¶ याकूब के साथ जो इस्राएली, अर्थात् उसके बेटे, पोते, आदि मिस्र में आए, उनके नाम ये हैं याकूब का जेठा रूबेन था। (IN)

उत्पत्ति 46:9 और रूबेन के पुत्र हनोक, पल्लू, हेस्रोन, और कर्मी थे। (IN)

उत्पत्ति 46:10 शिमोन के पुत्र, यमूएल, यामीन, ओहद, याकीन, सोहर, और एक कनानी स्त्री से जन्मा हुआ शाऊल भी था। (IN)

उत्पत्ति 46:11 लेवी के पुत्र गेर्शोन, कहात, और मरारी थे। (IN)

उत्पत्ति 46:12 यहूदा के एर, ओनान, शेला, पेरेस, और जेरह नामक पुत्र हुए तो थे; पर एर और ओनान कनान देश में मर गए थे; और पेरेस के पुत्र, हेस्रोन और हामूल थे। (IN)

उत्पत्ति 46:13 इस्साकार के पुत्र, तोला, पुव्वा, योब और शिम्रोन थे। (IN)

उत्पत्ति 46:14 जबूलून के पुत्र, सेरेद, एलोन, और यहलेल थे। (IN)

उत्पत्ति 46:15 लिआ के पुत्र जो याकूब से पद्दनराम में उत्‍पन्‍न हुए थे, उनके बेटे पोते ये ही थे, और इनसे अधिक उसने उसके साथ एक बेटी दीना को भी जन्म दिया। यहाँ तक तो याकूब के सब वंशवाले तैंतीस प्राणी हुए। (IN)

उत्पत्ति 46:16 फिर गाद के पुत्र, सपोन, हाग्गी, शूनी, एसबोन, एरी, अरोदी, और अरेली थे। (IN)

उत्पत्ति 46:17 आशेर के पुत्र, यिम्ना, यिश्वा, यिश्वी, और बरीआ थे, और उनकी बहन सेरह थी; और बरीआ के पुत्र, हेबेर और मल्कीएल थे। (IN)

उत्पत्ति 46:18 जिल्पा, जिसे लाबान ने अपनी बेटी लिआ को दिया था, उसके बेटे पोते आदि ये ही थे; और उसके द्वारा याकूब के सोलह प्राणी उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

उत्पत्ति 46:19 फिर याकूब की पत्‍नी राहेल के पुत्र यूसुफ और बिन्यामीन थे। (IN)

उत्पत्ति 46:20 और मिस्र देश में ओन के याजक पोतीपेरा की बेटी आसनत से यूसुफ के ये पुत्र उत्‍पन्‍न हुए, अर्थात् मनश्शे और एप्रैम। (IN)

उत्पत्ति 46:21 बिन्यामीन के पुत्र, बेला, बेकेर, अश्बेल, गेरा, नामान, एही, रोश, मुप्पीम, हुप्पीम, और अर्द थे। (IN)

उत्पत्ति 46:22 राहेल के पुत्र जो याकूब से उत्‍पन्‍न हुए उनके ये ही पुत्र थे; उसके ये सब बेटे-पोते चौदह प्राणी हुए। (IN)

उत्पत्ति 46:23 फिर दान का पुत्र हूशीम था। (IN)

उत्पत्ति 46:24 नप्ताली के पुत्र, येसेर, गूनी, सेसेर, और शिल्लेम थे। (IN)

उत्पत्ति 46:25 बिल्हा, जिसे लाबान ने अपनी बेटी राहेल को दिया, उसके बेटे पोते ये ही हैं; उसके द्वारा याकूब के वंश में सात प्राणी हुए। (IN)

उत्पत्ति 46:26 याकूब के निज वंश के जो प्राणी मिस्र में आए, वे उसकी बहुओं को छोड़ सब मिलकर छियासठ प्राणी हुए। (IN)

उत्पत्ति 46:27 और यूसुफ के पुत्र, जो मिस्र में उससे उत्‍पन्‍न हुए, वे दो प्राणी थे; इस प्रकार याकूब के घराने के जो प्राणी मिस्र में आए सो सब मिलकर सत्तर हुए। (IN)

उत्पत्ति 46:28 ¶ फिर उसने यहूदा को अपने आगे यूसुफ के पास भेज दिया कि वह उसको गोशेन का मार्ग दिखाए; और वे गोशेन देश में आए। (IN)

उत्पत्ति 46:29 तब यूसुफ अपना रथ जुतवाकर अपने पिता इस्राएल से भेंट करने के लिये गोशेन देश को गया, और उससे भेंट करके उसके गले से लिपटा, और कुछ देर तक उसके गले से लिपटा हुआ रोता रहा। (IN)

उत्पत्ति 46:30 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, “मैं अब मरने से भी प्रसन्‍न हूँ, क्योंकि तुझे जीवित पाया और तेरा मुँह देख लिया।” (IN)

उत्पत्ति 46:31 तब यूसुफ ने अपने भाइयों से और अपने पिता के घराने से कहा, “मैं जाकर फ़िरौन को यह समाचार दूँगा, 'मेरे भाई और मेरे पिता के सारे घराने के लोग, जो कनान देश में रहते थे, वे मेरे पास आ गए हैं; (IN)

उत्पत्ति 46:32 और वे लोग चरवाहे हैं, क्योंकि वे पशुओं को पालते आए हैं; इसलिए वे अपनी भेड़-बकरी, गाय-बैल, और जो कुछ उनका है, सब ले आए हैं।' (IN)

उत्पत्ति 46:33 जब फ़िरौन तुमको बुलाकर पूछे, 'तुम्हारा उद्यम क्या है?' (IN)

उत्पत्ति 46:34 तब यह कहना, 'तेरे दास लड़कपन से लेकर आज तक पशुओं को पालते आए हैं, वरन् हमारे पुरखा भी ऐसा ही करते थे।' इससे तुम गोशेन देश में रहने पाओगे; क्योंकि सब चरवाहों से मिस्री लोग घृणा करते हैं।” (IN)

उत्पत्ति 47:1 ¶ तब यूसुफ ने फ़िरौन के पास जाकर यह समाचार दिया, “मेरा पिता और मेरे भाई, और उनकी भेड़-बकरियाँ, गाय-बैल और जो कुछ उनका है, सब कनान देश से आ गया है; और अभी तो वे गोशेन देश में हैं।” (IN)

उत्पत्ति 47:2 फिर उसने अपने भाइयों में से पाँच जन लेकर फ़िरौन के सामने खड़े कर दिए। (IN)

उत्पत्ति 47:3 फ़िरौन ने उसके भाइयों से पूछा, “तुम्हारा उद्यम क्या है?” उन्होंने फ़िरौन से कहा, “तेरे दास चरवाहे हैं, और हमारे पुरखा भी ऐसे ही रहे।” (IN)

उत्पत्ति 47:4 फिर उन्होंने फ़िरौन से कहा, “हम इस देश में परदेशी की भाँति रहने के लिये आए हैं; क्योंकि कनान देश में भारी अकाल होने के कारण तेरे दासों को भेड़-बकरियों के लिये चारा न रहा; इसलिए अपने दासों को गोशेन देश में रहने की आज्ञा दे।” (IN)

उत्पत्ति 47:5 तब फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “तेरा पिता और तेरे भाई तेरे पास आ गए हैं, (IN)

उत्पत्ति 47:6 और मिस्र देश तेरे सामने पड़ा है; इस देश का जो सबसे अच्छा भाग हो, उसमें अपने पिता और भाइयों को बसा दे; अर्थात् वे गोशेन देश में ही रहें; और यदि तू जानता हो, कि उनमें से परिश्रमी पुरुष हैं, तो उन्हें मेरे पशुओं के अधिकारी ठहरा दे।” (IN)

उत्पत्ति 47:7 तब यूसुफ ने अपने पिता याकूब को ले आकर फ़िरौन के सम्मुख खड़ा किया; और याकूब ने फ़िरौन को आशीर्वाद दिया। (IN)

उत्पत्ति 47:8 तब फ़िरौन ने याकूब से पूछा, “तेरी आयु कितने दिन की हुई है?” (IN)

उत्पत्ति 47:9 याकूब ने फ़िरौन से कहा, “मैं तो एक सौ तीस वर्ष परदेशी होकर अपना जीवन बिता चुका हूँ; मेरे जीवन के दिन थोड़े और दुःख से भरे हुए भी थे, और मेरे बापदादे परदेशी होकर जितने दिन तक जीवित रहे उतने दिन का मैं अभी नहीं हुआ।” (IN)

उत्पत्ति 47:10 और याकूब फ़िरौन को आशीर्वाद देकर उसके सम्मुख से चला गया। (IN)

उत्पत्ति 47:11 तब यूसुफ ने अपने पिता और भाइयों को बसा दिया, और फ़िरौन की आज्ञा के अनुसार मिस्र देश के अच्छे से अच्छे भाग में, अर्थात् रामसेस नामक प्रदेश में, भूमि देकर उनको सौंप दिया। (IN)

उत्पत्ति 47:12 और यूसुफ अपने पिता का, और अपने भाइयों का, और पिता के सारे घराने का, एक-एक के बाल-बच्चों की गिनती के अनुसार, भोजन दिला-दिलाकर उनका पालन-पोषण करने लगा। (IN)

उत्पत्ति 47:13 ¶ उस सारे देश में खाने को कुछ न रहा; क्योंकि अकाल बहुत भारी था, और अकाल के कारण मिस्र और कनान दोनों देश नाश हो गए। (IN)

उत्पत्ति 47:14 और जितना रुपया मिस्र और कनान देश में था, सबको यूसुफ ने उस अन्न के बदले, जो उनके निवासी मोल लेते थे इकट्ठा करके फ़िरौन के भवन में पहुँचा दिया। (IN)

उत्पत्ति 47:15 जब मिस्र और कनान देश का रुपया समाप्त हो गया, तब सब मिस्री यूसुफ के पास आ आकर कहने लगे, “हमको भोजन वस्तु दे, क्या हम रुपये के न रहने से तेरे रहते हुए मर जाएँ?” (IN)

उत्पत्ति 47:16 यूसुफ ने कहा, “यदि रुपये न हों तो अपने पशु दे दो, और मैं उनके बदले तुम्हें खाने को दूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 47:17 तब वे अपने पशु यूसुफ के पास ले आए; और यूसुफ उनको घोड़ों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और गदहों के बदले खाने को देने लगा: उस वर्ष में वह सब जाति के पशुओं के बदले भोजन देकर उनका पालन-पोषण करता रहा। (IN)

उत्पत्ति 47:18 वह वर्ष तो यों कट गया; तब अगले वर्ष में उन्होंने उसके पास आकर कहा, “हम अपने प्रभु से यह बात छिपा न रखेंगे कि हमारा रुपया समाप्त हो गया है, और हमारे सब प्रकार के पशु हमारे प्रभु के पास आ चुके हैं; इसलिए अब हमारे प्रभु के सामने हमारे शरीर और भूमि छोड़कर और कुछ नहीं रहा। (IN)

उत्पत्ति 47:19 हम तेरे देखते क्यों मरें, और हमारी भूमि क्यों उजड़ जाए? हमको और हमारी भूमि को भोजन वस्तु के बदले मोल ले, कि हम अपनी भूमि समेत फ़िरौन के दास हो और हमको बीज दे, कि हम मरने न पाएँ, वरन् जीवित रहें, और भूमि न उजड़े।” (IN)

उत्पत्ति 47:20 तब यूसुफ ने मिस्र की सारी भूमि को फ़िरौन के लिये मोल लिया; क्योंकि उस भयंकर अकाल के पड़ने से मिस्रियों को अपना-अपना खेत बेच डालना पड़ा। इस प्रकार सारी भूमि फ़िरौन की हो गई। (IN)

उत्पत्ति 47:21 और एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक सारे मिस्र देश में जो प्रजा रहती थी, उसको उसने नगरों में लाकर बसा दिया। (IN)

उत्पत्ति 47:22 पर याजकों की भूमि तो उसने न मोल ली; क्योंकि याजकों के लिये फ़िरौन की ओर से नित्य भोजन का बन्दोबस्त था, और नित्य जो भोजन फ़िरौन उनको देता था वही वे खाते थे; इस कारण उनको अपनी भूमि बेचनी न पड़ी। (IN)

उत्पत्ति 47:23 तब यूसुफ ने प्रजा के लोगों से कहा, “सुनो, मैंने आज के दिन तुमको और तुम्हारी भूमि को भी फ़िरौन के लिये मोल लिया है; देखो, तुम्हारे लिये यहाँ बीज है, इसे भूमि में बोओ। (IN)

उत्पत्ति 47:24 और जो कुछ उपजे उसका पंचमांश फ़िरौन को देना, बाकी चार अंश तुम्हारे रहेंगे कि तुम उसे अपने खेतों में बोओ, और अपने-अपने बाल-बच्चों और घर के अन्य लोगों समेत खाया करो।” (IN)

उत्पत्ति 47:25 उन्होंने कहा, “तूने हमको बचा लिया है; हमारे प्रभु के अनुग्रह की दृष्टि हम पर बनी रहे, और हम फ़िरौन के दास होकर रहेंगे।” (IN)

उत्पत्ति 47:26 इस प्रकार यूसुफ ने मिस्र की भूमि के विषय में ऐसा नियम ठहराया, जो आज के दिन तक चला आता है कि पंचमांश फ़िरौन को मिला करे; केवल याजकों ही की भूमि फ़िरौन की नहीं हुई। (IN)

उत्पत्ति 47:27 ¶ इस्राएली मिस्र के गोशेन प्रदेश में रहने लगे; और वहाँ की भूमि उनके वश में थी, और फूले-फले, और अत्यन्त बढ़ गए। (IN)

उत्पत्ति 47:28 मिस्र देश में याकूब सतरह वर्ष जीवित रहा इस प्रकार याकूब की सारी आयु एक सौ सैंतालीस वर्ष की हुई। (IN)

उत्पत्ति 47:29 जब इस्राएल के मरने का दिन निकट आ गया, तब उसने अपने पुत्र यूसुफ को बुलवाकर कहा, “यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो, तो अपना हाथ मेरी जाँघ के तले रखकर शपथ खा, कि तू मेरे साथ कृपा और सच्चाई का यह काम करेगा, कि मुझे मिस्र में मिट्टी न देगा। (IN)

उत्पत्ति 47:30 जब मैं अपने बाप-दादों के संग सो जाऊँगा, तब तू मुझे मिस्र से उठा ले जाकर उन्हीं के कब्रिस्तान में रखेगा।” तब यूसुफ ने कहा, “मैं तेरे वचन के अनुसार करूँगा।” (IN)

उत्पत्ति 47:31 फिर उसने कहा, “मुझसे शपथ खा।” अतः उसने उससे शपथ खाई। तब इस्राएल ने खाट के सिरहाने की ओर सिर झुकाकर प्रार्थना की। (IN)

उत्पत्ति 48:1 ¶ इन बातों के पश्चात् किसी ने यूसुफ से कहा, “सुन, तेरा पिता बीमार है।” तब वह मनश्शे और एप्रैम नामक अपने दोनों पुत्रों को संग लेकर उसके पास चला। (IN)

उत्पत्ति 48:2 किसी ने याकूब को बता दिया, “तेरा पुत्र यूसुफ तेरे पास आ रहा है,” तब इस्राएल अपने को सम्भालकर खाट पर बैठ गया। (IN)

उत्पत्ति 48:3 और याकूब ने यूसुफ से कहा, “सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ने कनान देश के लूज़ नगर के पास मुझे दर्शन देकर आशीष दी, (IN)

उत्पत्ति 48:4 और कहा, 'सुन, मैं तुझे फलवन्त करके बढ़ाऊँगा, और तुझे राज्य-राज्य की मण्डली का मूल बनाऊँगा, और तेरे पश्चात् तेरे वंश को यह देश दूँगा, जिससे कि वह सदा तक उनकी निज भूमि बनी रहे।' (IN)

उत्पत्ति 48:5 और अब तेरे दोनों पुत्र, जो मिस्र में मेरे आने से पहले उत्‍पन्‍न हुए हैं, वे मेरे ही ठहरेंगे; अर्थात् जिस रीति से रूबेन और शिमोन मेरे हैं, उसी रीति से एप्रैम और मनश्शे भी मेरे ठहरेंगे। (IN)

उत्पत्ति 48:6 और उनके पश्चात् तेरे जो सन्तान उत्‍पन्‍न हो, वह तेरे तो ठहरेंगे; परन्तु बँटवारे के समय वे अपने भाइयों ही के वंश में गिने जाएँगे। (IN)

उत्पत्ति 48:7 जब मैं पद्दान से आता था, तब एप्रात पहुँचने से थोड़ी ही दूर पहले राहेल कनान देश में, मार्ग में, मेरे सामने मर गई; और मैंने उसे वहीं, अर्थात् एप्रात जो बैतलहम भी कहलाता है, उसी के मार्ग में मिट्टी दी।” (IN)

उत्पत्ति 48:8 तब इस्राएल को यूसुफ के पुत्र देख पड़े, और उसने पूछा, “ये कौन हैं?” (IN)

उत्पत्ति 48:9 यूसुफ ने अपने पिता से कहा, “ये मेरे पुत्र हैं, जो परमेश्‍वर ने मुझे यहाँ दिए हैं।” उसने कहा, “उनको मेरे पास ले आ कि मैं उन्हें आशीर्वाद दूँ।” (IN)

उत्पत्ति 48:10 इस्राएल की आँखें बुढ़ापे के कारण धुन्धली हो गई थीं, यहाँ तक कि उसे कम सूझता था। तब यूसुफ उन्हें उनके पास ले गया; और उसने उन्हें चूमकर गले लगा लिया। (IN)

उत्पत्ति 48:11 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, “मुझे आशा न थी, कि मैं तेरा मुख फिर देखने पाऊँगा: परन्तु देख, परमेश्‍वर ने मुझे तेरा वंश भी दिखाया है।” (IN)

उत्पत्ति 48:12 तब यूसुफ ने उन्हें अपने घुटनों के बीच से हटाकर और अपने मुँह के बल भूमि पर गिरकर दण्डवत् की। (IN)

उत्पत्ति 48:13 तब यूसुफ ने उन दोनों को लेकर, अर्थात् एप्रैम को अपने दाहिने हाथ से, कि वह इस्राएल के बाएँ हाथ पड़े, और मनश्शे को अपने बाएँ हाथ से, कि इस्राएल के दाहिने हाथ पड़े, उन्हें उसके पास ले गया। (IN)

उत्पत्ति 48:14 तब इस्राएल ने अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर एप्रैम के सिर पर जो छोटा था, और अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर मनश्शे के सिर पर रख दिया; उसने तो जान-बूझकर ऐसा किया; नहीं तो जेठा मनश्शे ही था। (IN)

उत्पत्ति 48:15 फिर उसने यूसुफ को आशीर्वाद देकर कहा, “परमेश्‍वर जिसके सम्मुख मेरे बापदादे अब्राहम और इसहाक चलते थे वही परमेश्‍वर मेरे जन्म से लेकर आज के दिन तक मेरा चरवाहा बना है; (IN)

उत्पत्ति 48:16 और वही दूत मुझे सारी बुराई से छुड़ाता आया है, वही अब इन लड़कों को आशीष दे; और ये मेरे और मेरे बापदादे अब्राहम और इसहाक के कहलाएँ; और पृथ्वी में बहुतायत से बढ़ें।” (IN)

उत्पत्ति 48:17 जब यूसुफ ने देखा कि मेरे पिता ने अपना दाहिना हाथ एप्रैम के सिर पर रखा है, तब यह बात उसको बुरी लगी; इसलिए उसने अपने पिता का हाथ इस मनसा से पकड़ लिया, कि एप्रैम के सिर पर से उठाकर मनश्शे के सिर पर रख दे। (IN)

उत्पत्ति 48:18 और यूसुफ ने अपने पिता से कहा, “हे पिता, ऐसा नहीं; क्योंकि जेठा यही है; अपना दाहिना हाथ इसके सिर पर रख।” (IN)

उत्पत्ति 48:19 उसके पिता ने कहा, “नहीं, सुन, हे मेरे पुत्र, मैं इस बात को भली भाँति जानता हूँ यद्यपि इससे भी मनुष्यों की एक मण्डली उत्‍पन्‍न होगी, और यह भी महान हो जाएगा, तो भी इसका छोटा भाई इससे अधिक महान हो जाएगा, और उसके वंश से बहुत सी जातियाँ निकलेंगी।” (IN)

उत्पत्ति 48:20 फिर उसने उसी दिन यह कहकर उनको आशीर्वाद दिया, “इस्राएली लोग तेरा नाम ले लेकर ऐसा आशीर्वाद दिया करेंगे, 'परमेश्‍वर तुझे एप्रैम और मनश्शे के समान बना दे,'” और उसने मनश्शे से पहले एप्रैम का नाम लिया। (IN)

उत्पत्ति 48:21 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, “देख, मैं तो मरने पर हूँ परन्तु परमेश्‍वर तुम लोगों के संग रहेगा, और तुमको तुम्हारे पितरों के देश में फिर पहुँचा देगा। (IN)

उत्पत्ति 48:22 और मैं तुझको तेरे भाइयों से अधिक भूमि का एक भाग देता हूँ, जिसको मैंने एमोरियों के हाथ से अपनी तलवार और धनुष के बल से ले लिया है।” (IN)

उत्पत्ति 49:1 ¶ फिर याकूब ने अपने पुत्रों को यह कहकर बुलाया, “इकट्ठे हो जाओ, मैं तुमको बताऊँगा, कि अन्त के दिनों में तुम पर क्या-क्या बीतेगा। (IN)

उत्पत्ति 49:2 हे याकूब के पुत्रों, इकट्ठे होकर सुनो, अपने पिता इस्राएल की ओर कान लगाओ। (IN)

उत्पत्ति 49:3 “हे रूबेन, तू मेरा जेठा, मेरा बल, और मेरे पौरूष का पहला फल है; (IN)

उत्पत्ति 49:4 तू जो जल के समान उबलनेवाला है, इसलिए दूसरों से श्रेष्ठ न ठहरेगा; (IN)

उत्पत्ति 49:5 शिमोन और लेवी तो भाई-भाई हैं, (IN)

उत्पत्ति 49:6 हे मेरे जीव, उनके मर्म में न पड़, (IN)

उत्पत्ति 49:7 धिक्कार उनके कोप को, जो प्रचण्ड था; (IN)

उत्पत्ति 49:8 हे यहूदा, तेरे भाई तेरा धन्यवाद करेंगे, (IN)

उत्पत्ति 49:9 यहूदा सिंह का बच्चा है। (IN)

उत्पत्ति 49:10 जब तक शीलो न आए (IN)

उत्पत्ति 49:11 वह अपने जवान गदहे को दाखलता में, (IN)

उत्पत्ति 49:12 उसकी आँखें दाखमधु से चमकीली (IN)

उत्पत्ति 49:13 जबूलून समुद्र तट पर निवास करेगा, (IN)

उत्पत्ति 49:14 इस्साकार एक बड़ा और बलवन्त गदहा है, (IN)

उत्पत्ति 49:15 उसने एक विश्रामस्थान देखकर, कि अच्छा है, (IN)

उत्पत्ति 49:16 दान इस्राएल का एक गोत्र होकर अपने (IN)

उत्पत्ति 49:17 दान मार्ग में का एक साँप, (IN)

उत्पत्ति 49:18 हे यहोवा, मैं तुझी से उद्धार पाने की बाट जोहता आया हूँ। (IN)

उत्पत्ति 49:19 गाद पर एक दल चढ़ाई तो करेगा; (IN)

उत्पत्ति 49:20 आशेर से जो अन्न उत्‍पन्‍न होगा वह उत्तम होगा, (IN)

उत्पत्ति 49:21 नप्ताली एक छूटी हुई हिरनी है; (IN)

उत्पत्ति 49:22 यूसुफ बलवन्त लता की एक शाखा है, (IN)

उत्पत्ति 49:23 धनुर्धारियों ने उसको खेदित किया, (IN)

उत्पत्ति 49:24 पर उसका धनुष दृढ़ रहा, (IN)

उत्पत्ति 49:25 यह तेरे पिता के उस परमेश्‍वर का काम है, (IN)

उत्पत्ति 49:26 तेरे पिता के आशीर्वाद (IN)

उत्पत्ति 49:27 बिन्यामीन फाड़नेवाला भेड़िया है, (IN)

उत्पत्ति 49:28 ¶ इस्राएल के बारहों गोत्र ये ही हैं और उनके पिता ने जिस-जिस वचन से उनको आशीर्वाद दिया, वे ये ही हैं; एक-एक को उसके आशीर्वाद के अनुसार उसने आशीर्वाद दिया। (IN)

उत्पत्ति 49:29 ¶ तब उसने यह कहकर उनको आज्ञा दी, “मैं अपने लोगों के साथ मिलने पर हूँ: इसलिए मुझे हित्ती एप्रोन की भूमिवाली गुफा में मेरे बाप-दादों के साथ मिट्टी देना, (IN)

उत्पत्ति 49:30 अर्थात् उसी गुफा में जो कनान देश में मम्रे के सामने वाली मकपेला की भूमि में है; उस भूमि को अब्राहम ने हित्ती एप्रोन के हाथ से इसलिए मोल लिया था, कि वह कब्रिस्तान के लिये उसकी निज भूमि हो। (IN)

उत्पत्ति 49:31 “वहाँ अब्राहम और उसकी पत्‍नी सारा को मिट्टी दी गई थी; और वहीं इसहाक और उसकी पत्‍नी रिबका को भी मिट्टी दी गई; और वहीं मैंने लिआ को भी मिट्टी दी। (IN)

उत्पत्ति 49:32 वह भूमि और उसमें की गुफा हित्तियों के हाथ से मोल ली गई।” (IN)

उत्पत्ति 49:33 याकूब जब अपने पुत्रों को यह आज्ञा दे चुका, तब अपने पाँव खाट पर समेट प्राण छोड़े, और अपने लोगों में जा मिला। (IN)

उत्पत्ति 50:1 ¶ तब यूसुफ अपने पिता के मुँह पर गिरकर रोया और उसे चूमा। (IN)

उत्पत्ति 50:2 और यूसुफ ने उन वैद्यों को, जो उसके सेवक थे, आज्ञा दी कि उसके पिता के शव में सुगन्ध-द्रव्य भरे; तब वैद्यों ने इस्राएल के शव में सुगन्ध-द्रव्य भर दिए। (IN)

उत्पत्ति 50:3 और उसके चालीस दिन पूरे हुए, क्योंकि जिनके शव में सुगन्ध-द्रव्य भरे जाते हैं, उनको इतने ही दिन पूरे लगते है; और मिस्री लोग उसके लिये सत्तर दिन तक विलाप करते रहे। (IN)

उत्पत्ति 50:4 जब उसके विलाप के दिन बीत गए, तब यूसुफ फ़िरौन के घराने के लोगों से कहने लगा, “यदि तुम्हारे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो तो मेरी यह विनती फ़िरौन को सुनाओ, (IN)

उत्पत्ति 50:5 मेरे पिता ने यह कहकर, 'देख मैं मरने पर हूँ,' मुझे यह शपथ खिलाई, 'जो कब्र मैंने अपने लिये कनान देश में खुदवाई है उसी में तू मुझे मिट्टी देगा।' इसलिए अब मुझे वहाँ जाकर अपने पिता को मिट्टी देने की आज्ञा दे, तत्पश्चात् मैं लौट आऊँगा।” (IN)

उत्पत्ति 50:6 तब फ़िरौन ने कहा, “जाकर अपने पिता की खिलाई हुई शपथ के अनुसार उनको मिट्टी दे।” (IN)

उत्पत्ति 50:7 इसलिए यूसुफ अपने पिता को मिट्टी देने के लिये चला, और फ़िरौन के सब कर्मचारी, अर्थात् उसके भवन के पुरनिये, और मिस्र देश के सब पुरनिये उसके संग चले। (IN)

उत्पत्ति 50:8 और यूसुफ के घर के सब लोग, और उसके भाई, और उसके पिता के घर के सब लोग भी संग गए; पर वे अपने बाल-बच्चों, और भेड़-बकरियों, और गाय-बैलों को गोशेन देश में छोड़ गए। (IN)

उत्पत्ति 50:9 और उसके संग रथ और सवार गए, इस प्रकार भीड़ बहुत भारी हो गई। (IN)

उत्पत्ति 50:10 जब वे आताद के खलिहान तक, जो यरदन नदी के पार है, पहुँचे, तब वहाँ अत्यन्त भारी विलाप किया, और यूसुफ ने अपने पिता के लिये सात दिन का विलाप कराया। (IN)

उत्पत्ति 50:11 आताद के खलिहान में के विलाप को देखकर उस देश के निवासी कनानियों ने कहा, “यह तो मिस्रियों का कोई भारी विलाप होगा।” इसी कारण उस स्थान का नाम आबेलमिस्रैम पड़ा, और वह यरदन के पार है। (IN)

उत्पत्ति 50:12 ¶ इस्राएल के पुत्रों ने ठीक वही काम किया जिसकी उसने उनको आज्ञा दी थी: (IN)

उत्पत्ति 50:13 अर्थात् उन्होंने उसको कनान देश में ले जाकर मकपेला की उस भूमिवाली गुफा में, जो मम्रे के सामने हैं, मिट्टी दी; जिसको अब्राहम ने हित्ती एप्रोन के हाथ से इसलिए मोल लिया था, कि वह कब्रिस्तान के लिये उसकी निज भूमि हो। (IN)

उत्पत्ति 50:14 अपने पिता को मिट्टी देकर यूसुफ अपने भाइयों और उन सब समेत, जो उसके पिता को मिट्टी देने के लिये उसके संग गए थे, मिस्र लौट आया। (IN)

उत्पत्ति 50:15 ¶ जब यूसुफ के भाइयों ने देखा कि हमारा पिता मर गया है, तब कहने लगे, “कदाचित् यूसुफ अब हमारे पीछे पडे़, और जितनी बुराई हमने उससे की थी सब का पूरा बदला हम से ले।” (IN)

उत्पत्ति 50:16 इसलिए उन्होंने यूसुफ के पास यह कहला भेजा, “तेरे पिता ने मरने से पहले हमें यह आज्ञा दी थी, (IN)

उत्पत्ति 50:17 'तुम लोग यूसुफ से इस प्रकार कहना, कि हम विनती करते हैं, कि तू अपने भाइयों के अपराध और पाप को क्षमा कर; हमने तुझ से बुराई की थी, पर अब अपने पिता के परमेश्‍वर के दासों का अपराध क्षमा कर’।” उनकी ये बातें सुनकर यूसुफ रो पड़ा। (IN)

उत्पत्ति 50:18 और उसके भाई आप भी जाकर उसके सामने गिर पड़े, और कहा, “देख, हम तेरे दास हैं।” (IN)

उत्पत्ति 50:19 यूसुफ ने उनसे कहा, “मत डरो, क्या मैं परमेश्‍वर की जगह पर हूँ? (IN)

उत्पत्ति 50:20 यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्‍वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं। (IN)

उत्पत्ति 50:21 इसलिए अब मत डरो: मैं तुम्हारा और तुम्हारे बाल-बच्चों का पालन-पोषण करता रहूँगा।” इस प्रकार उसने उनको समझा-बुझाकर शान्ति दी। (IN)

उत्पत्ति 50:22 ¶ यूसुफ अपने पिता के घराने समेत मिस्र में रहता रहा, और यूसुफ एक सौ दस वर्ष जीवित रहा। (IN)

उत्पत्ति 50:23 और यूसुफ एप्रैम के परपोतों तक को देखने पाया और मनश्शे के पोते, जो माकीर के पुत्र थे, वे उत्‍पन्‍न हुए और यूसुफ ने उन्हें गोद में लिया। (IN)

उत्पत्ति 50:24 यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, “मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुँचा देगा, जिसके देने की उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी।” (IN)

उत्पत्ति 50:25 फिर यूसुफ ने इस्राएलियों से यह कहकर कि परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, उनको इस विषय की शपथ खिलाई, “हम तेरी हड्डियों को यहाँ से उस देश में ले जाएँगे।” (IN)

उत्पत्ति 50:26 इस प्रकार यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया: और उसकी शव में सुगन्ध-द्रव्य भरे गए, और वह शव मिस्र में एक सन्दूक में रखा गया। (IN)

निर्गमन 1:1 ¶ इस्राएल के पुत्रों के नाम, जो अपने-अपने घराने को लेकर याकूब के साथ मिस्र देश में आए, ये हैं (IN)

निर्गमन 1:2 रूबेन, शिमोन, लेवी, यहूदा, (IN)

निर्गमन 1:3 इस्साकार, जबूलून, बिन्यामीन, (IN)

निर्गमन 1:4 दान, नप्ताली, गाद और आशेर। (IN)

निर्गमन 1:5 और यूसुफ तो मिस्र में पहले ही आ चुका था। याकूब के निज वंश में जो उत्‍पन्‍न हुए वे सब सत्तर प्राणी थे। (IN)

निर्गमन 1:6 यूसुफ, और उसके सब भाई, और उस पीढ़ी के सब लोग मर मिटे। (IN)

निर्गमन 1:7 परन्तु इस्राएल की सन्तान फूलने-फलने लगी; और वे अत्यन्त सामर्थी बनते चले गए; और इतना अधिक बढ़ गए कि सारा देश उनसे भर गया। (IN)

निर्गमन 1:8 मिस्र में एक नया राजा गद्दी पर बैठा जो यूसुफ को नहीं जानता था। (IN)

निर्गमन 1:9 और उसने अपनी प्रजा से कहा, “देखो, इस्राएली हम से गिनती और सामर्थ्य में अधिक बढ़ गए हैं। (IN)

निर्गमन 1:10 इसलिए आओ, हम उनके साथ बुद्धिमानी से बर्ताव करें, कहीं ऐसा न हो कि जब वे बहुत बढ़ जाएँ, और यदि युद्ध का समय आ पड़े, तो हमारे बैरियों से मिलकर हम से लड़ें और इस देश से निकल जाएँ।” (IN)

निर्गमन 1:11 इसलिए उन्होंने उन पर बेगारी करानेवालों को नियुक्त किया कि वे उन पर भार डाल-डालकर उनको दुःख दिया करें; तब उन्होंने फ़िरौन के लिये पितोम और रामसेस नामक भण्डारवाले नगरों को बनाया। (IN)

निर्गमन 1:12 पर ज्यों-ज्यों वे उनको दुःख देते गए त्यों-त्यों वे बढ़ते और फैलते चले गए; इसलिए वे इस्राएलियों से अत्यन्त डर गए। (IN)

निर्गमन 1:13 तो भी मिस्रियों ने इस्राएलियों से कठोरता के साथ सेवा करवाई; (IN)

निर्गमन 1:14 और उनके जीवन को गारे, ईंट और खेती के भाँति-भाँति के काम की कठिन सेवा से दुःखी कर डाला; जिस किसी काम में वे उनसे सेवा करवाते थे उसमें वे कठोरता का व्यवहार करते थे। (IN)

निर्गमन 1:15 शिप्रा और पूआ नामक दो इब्री दाइयों को मिस्र के राजा ने आज्ञा दी, (IN)

निर्गमन 1:16 “जब तुम इब्री स्त्रियों को बच्चा उत्‍पन्‍न होने के समय प्रसव के पत्थरों पर बैठी देखो, तब यदि बेटा हो, तो उसे मार डालना; और बेटी हो, तो जीवित रहने देना।” (IN)

निर्गमन 1:17 परन्तु वे दाइयां परमेश्‍वर का भय मानती थीं, इसलिए मिस्र के राजा की आज्ञा न मानकर लड़कों को भी जीवित छोड़ देती थीं। (IN)

निर्गमन 1:18 तब मिस्र के राजा ने उनको बुलवाकर पूछा, “तुम जो लड़कों को जीवित छोड़ देती हो, तो ऐसा क्यों करती हो?” (IN)

निर्गमन 1:19 दाइयों ने फ़िरौन को उतर दिया, “इब्री स्त्रियाँ मिस्री स्त्रियों के समान नहीं हैं; वे ऐसी फुर्तीली हैं कि दाइयों के पहुँचने से पहले ही उनको बच्चा उत्‍पन्‍न हो जाता है।” (IN)

निर्गमन 1:20 इसलिए परमेश्‍वर ने धाइयों के साथ भलाई की; और वे लोग बढ़कर बहुत सामर्थी हो गए। (IN)

निर्गमन 1:21 और दाइयों इसलिए कि वे परमेश्‍वर का भय मानती थीं उसने उनके घर बसाए। (IN)

निर्गमन 1:22 तब फ़िरौन ने अपनी सारी प्रजा के लोगों को आज्ञा दी, “इब्रियों के जितने बेटे उत्‍पन्‍न हों उन सभी को तुम नील नदी में डाल देना, और सब बेटियों को जीवित रख छोड़ना।” (IN)

निर्गमन 2:1 ¶ लेवी के घराने के एक पुरुष ने एक लेवी वंश की स्त्री को ब्याह लिया। (IN)

निर्गमन 2:2 वह स्त्री गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ; और यह देखकर कि यह बालक सुन्दर है, उसे तीन महीने तक छिपा रखा। (IN)

निर्गमन 2:3 जब वह उसे और छिपा न सकी तब उसके लिये सरकण्डों की एक टोकरी लेकर, उस पर चिकनी मिट्टी और राल लगाकर, उसमें बालक को रखकर नील नदी के किनारे कांसों के बीच छोड़ आई। (IN)

निर्गमन 2:4 उस बालक कि बहन दूर खड़ी रही, कि देखे इसका क्या हाल होगा। (IN)

निर्गमन 2:5 तब फ़िरौन की बेटी नहाने के लिये नदी के किनारे आई; उसकी सखियाँ नदी के किनारे-किनारे टहलने लगीं; तब उसने कांसों के बीच टोकरी को देखकर अपनी दासी को उसे ले आने के लिये भेजा। (IN)

निर्गमन 2:6 तब उसने उसे खोलकर देखा कि एक रोता हुआ बालक है; तब उसे तरस आया और उसने कहा, “यह तो किसी इब्री का बालक होगा।” (IN)

निर्गमन 2:7 तब बालक की बहन ने फ़िरौन की बेटी से कहा, “क्या मैं जाकर इब्री स्त्रियों में से किसी धाई को तेरे पास बुला ले आऊँ जो तेरे लिये बालक को दूध पिलाया करे?” (IN)

निर्गमन 2:8 फ़िरौन की बेटी ने कहा, “जा।” तब लड़की जाकर बालक की माता को बुला ले आई। (IN)

निर्गमन 2:9 फ़िरौन की बेटी ने उससे कहा, “तू इस बालक को ले जाकर मेरे लिये दूध पिलाया कर, और मैं तुझे मजदूरी दूँगी।” तब वह स्त्री बालक को ले जाकर दूध पिलाने लगी। (IN)

निर्गमन 2:10 जब बालक कुछ बड़ा हुआ तब वह उसे फ़िरौन की बेटी के पास ले गई, और वह उसका बेटा ठहरा; और उसने यह कहकर उसका नाम मूसा रखा, “मैंने इसको जल से निकाला था।” (IN)

निर्गमन 2:11 ¶ उन दिनों में ऐसा हुआ कि जब मूसा जवान हुआ, और बाहर अपने भाई-बन्धुओं के पास जाकर उनके दुःखों पर दृष्टि करने लगा; तब उसने देखा कि कोई मिस्री जन मेरे एक इब्री भाई को मार रहा है। (IN)

निर्गमन 2:12 जब उसने इधर-उधर देखा कि कोई नहीं है, तब उस मिस्री को मार डाला और रेत में छिपा दिया। (IN)

निर्गमन 2:13 फिर दूसरे दिन बाहर जाकर उसने देखा कि दो इब्री पुरुष आपस में मार पीट कर रहे हैं; उसने अपराधी से कहा, “तू अपने भाई को क्यों मारता है?” (IN)

निर्गमन 2:14 उसने कहा, “किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया? जिस भाँति तूने मिस्री को घात किया क्या उसी भाँति तू मुझे भी घात करना चाहता है?” तब मूसा यह सोचकर डर गया, “निश्चय वह बात खुल गई है।” (IN)

निर्गमन 2:15 जब फ़िरौन ने यह बात सुनी तब मूसा को घात करने की योजना की। तब मूसा फ़िरौन के सामने से भागा, और मिद्यान देश में जाकर रहने लगा; और वह वहाँ एक कुएँ के पास बैठ गया। (IN)

निर्गमन 2:16 मिद्यान के याजक की सात बेटियाँ थीं; और वे वहाँ आकर जल भरने लगीं कि कठौतों में भरकर अपने पिता की भेड़-बकरियों को पिलाएँ। (IN)

निर्गमन 2:17 तब चरवाहे आकर उनको हटाने लगे; इस पर मूसा ने खड़े होकर उनकी सहायता की, और भेड़-बकरियों को पानी पिलाया। (IN)

निर्गमन 2:18 जब वे अपने पिता रूएल के पास फिर आई, तब उसने उनसे पूछा, “क्या कारण है कि आज तुम ऐसी फुर्ती से आई हो?” (IN)

निर्गमन 2:19 उन्होंने कहा, “एक मिस्री पुरुष ने हमको चरवाहों के हाथ से छुड़ाया, और हमारे लिये बहुत जल भरकर भेड़-बकरियों को पिलाया।” (IN)

निर्गमन 2:20 तब उसने अपनी बेटियों से कहा, “वह पुरुष कहाँ है? तुम उसको क्यों छोड़ आई हो? उसको बुला ले आओ कि वह भोजन करे।” (IN)

निर्गमन 2:21 और मूसा उस पुरुष के साथ रहने को प्रसन्‍न हुआ; उसने उसे अपनी बेटी सिप्पोरा को ब्याह दिया। (IN)

निर्गमन 2:22 और उसके एक पुत्र उत्‍पन्‍न हुआ, तब मूसा ने यह कहकर, “मैं अन्य देश में परदेशी हूँ,” उसका नाम गेर्शोम रखा। (IN)

निर्गमन 2:23 बहुत दिनों के बीतने पर मिस्र का राजा मर गया। और इस्राएली कठिन सेवा के कारण लम्बी-लम्बी साँस लेकर आहें भरने लगे, और पुकार उठे, और उनकी दुहाई जो कठिन सेवा के कारण हुई वह परमेश्‍वर तक पहुँची। (IN)

निर्गमन 2:24 और परमेश्‍वर ने उनका कराहना सुनकर अपनी वाचा को, जो उसने अब्राहम, और इसहाक, और याकूब के साथ बाँधी थी, स्मरण किया। (IN)

निर्गमन 2:25 और परमेश्‍वर ने इस्राएलियों पर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया। (IN)

निर्गमन 3:1 ¶ मूसा अपने ससुर यित्रो नामक मिद्यान के याजक की भेड़-बकरियों को चराता था; और वह उन्हें जंगल की पश्चिमी ओर होरेब नामक परमेश्‍वर के पर्वत के पास ले गया। (IN)

निर्गमन 3:2 और परमेश्‍वर के दूत ने एक कटीली झाड़ी के बीच आग की लौ में उसको दर्शन दिया; और उसने दृष्टि उठाकर देखा कि झाड़ी जल रही है, पर भस्म नहीं होती। (IN)

निर्गमन 3:3 तब मूसा ने कहा, “मैं उधर जाकर इस बड़े अचम्भे को देखूँगा कि वह झाड़ी क्यों नहीं जल जाती।” (IN)

निर्गमन 3:4 जब यहोवा ने देखा कि मूसा देखने को मुड़ा चला आता है, तब परमेश्‍वर ने झाड़ी के बीच से उसको पुकारा, “हे मूसा, हे मूसा!” मूसा ने कहा, “क्या आज्ञा।” (IN)

निर्गमन 3:5 उसने कहा, “इधर पास मत आ, और अपने पाँवों से जूतियों को उतार दे, क्योंकि जिस स्थान पर तू खड़ा है वह पवित्र भूमि है।” (IN)

निर्गमन 3:6 फिर उसने कहा, “मैं तेरे पिता का परमेश्‍वर, और अब्राहम का परमेश्‍वर, इसहाक का परमेश्‍वर, और याकूब का परमेश्‍वर हूँ।” तब मूसा ने जो परमेश्‍वर की ओर निहारने से डरता था अपना मुँह ढाँप लिया। (IN)

निर्गमन 3:7 फिर यहोवा ने कहा, “मैंने अपनी प्रजा के लोग जो मिस्र में हैं उनके दुःख को निश्चय देखा है, और उनकी जो चिल्लाहट परिश्रम करानेवालों के कारण होती है उसको भी मैंने सुना है, और उनकी पीड़ा पर मैंने चित्त लगाया है; (IN)

निर्गमन 3:8 इसलिए अब मैं उतर आया हूँ कि उन्हें मिस्रियों के वश से छुड़ाऊँ, और उस देश से निकालकर एक अच्छे और बड़े देश में जिसमें दूध और मधु की धारा बहती है, अर्थात् कनानी, हित्ती, एमोरी, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी लोगों के स्थान में पहुँचाऊँ। (IN)

निर्गमन 3:9 इसलिए अब सुन, इस्राएलियों की चिल्लाहट मुझे सुनाई पड़ी है, और मिस्रियों का उन पर अंधेर करना भी मुझे दिखाई पड़ा है, (IN)

निर्गमन 3:10 इसलिए आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए।” (IN)

निर्गमन 3:11 तब मूसा ने परमेश्‍वर से कहा, “मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ, और इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आऊँ?” (IN)

निर्गमन 3:12 उसने कहा, “निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा; और इस बात का कि तेरा भेजनेवाला मैं हूँ, तेरे लिए यह चिन्ह होगा; कि जब तू उन लोगों को मिस्र से निकाल चुके तब तुम इसी पहाड़ पर परमेश्‍वर की उपासना करोगे।” (IN)

निर्गमन 3:13 मूसा ने परमेश्‍वर से कहा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे यह कहूँ, 'तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,' तब यदि वे मुझसे पूछें, 'उसका क्या नाम है?' तब मैं उनको क्या बताऊँ?” (IN)

निर्गमन 3:14 परमेश्‍वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।” फिर उसने कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, 'जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है'।” (IN)

निर्गमन 3:15 फिर परमेश्‍वर ने मूसा से यह भी कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, 'तुम्हारे पूर्वजों का परमेश्‍वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्‍वर, इसहाक का परमेश्‍वर, और याकूब का परमेश्‍वर, यहोवा, उसी ने मुझको तुम्हारे पास भेजा है। देख सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी-पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा।' (IN)

निर्गमन 3:16 इसलिए अब जाकर इस्राएली पुरनियों को इकट्ठा कर, और उनसे कह, 'तुम्हारे पूर्वज अब्राहम, इसहाक, और याकूब के परमेश्‍वर, यहोवा ने मुझे दर्शन देकर यह कहा है कि मैंने तुम पर और तुम से जो बर्ताव मिस्र में किया जाता है उस पर भी चित्त लगाया है; (IN)

निर्गमन 3:17 और मैंने ठान लिया है कि तुमको मिस्र के दुःखों में से निकालकर कनानी, हित्ती, एमोरी, परिज्जी हिव्वी, और यबूसी लोगों के देश में ले चलूँगा, जो ऐसा देश है कि जिसमें दूध और मधु की धारा बहती है।' (IN)

निर्गमन 3:18 तब वे तेरी मानेंगे; और तू इस्राएली पुरनियों को संग लेकर मिस्र के राजा के पास जाकर उससे यह कहना, 'इब्रियों के परमेश्‍वर, यहोवा से हम लोगों की भेंट हुई है; इसलिए अब हमको तीन दिन के मार्ग पर जंगल में जाने दे कि अपने परमेश्‍वर यहोवा को बलिदान चढ़ाएँ।' (IN)

निर्गमन 3:19 मैं जानता हूँ कि मिस्र का राजा तुमको जाने न देगा वरन् बड़े बल से दबाए जाने पर भी जाने न देगा। (IN)

निर्गमन 3:20 इसलिए मैं हाथ बढ़ाकर उन सब आश्चर्यकर्मों से जो मिस्र के बीच करूँगा उस देश को मारूँगा; और उसके पश्चात् वह तुमको जाने देगा। (IN)

निर्गमन 3:21 तब मैं मिस्रियों से अपनी इस प्रजा पर अनुग्रह करवाऊँगा; और जब तुम निकलोगे तब खाली हाथ न निकलोगे। (IN)

निर्गमन 3:22 वरन् तुम्हारी एक-एक स्त्री अपनी-अपनी पड़ोसिन, और अपने-अपने घर में रहनेवाली से सोने चाँदी के गहने, और वस्त्र माँग लेगी, और तुम उन्हें अपने बेटों और बेटियों को पहनाना; इस प्रकार तुम मिस्रियों को लूटोगे।” (IN)

निर्गमन 4:1 ¶ तब मूसा ने उत्तर दिया, “वे मुझ पर विश्वास न करेंगे और न मेरी सुनेंगे, वरन् कहेंगे, 'यहोवा ने तुझको दर्शन नहीं दिया'।” (IN)

निर्गमन 4:2 यहोवा ने उससे कहा, “तेरे हाथ में वह क्या है?” वह बोला, “लाठी।” (IN)

निर्गमन 4:3 उसने कहा, “उसे भूमि पर डाल दे।” जब उसने उसे भूमि पर डाला तब वह सर्प बन गई, और मूसा उसके सामने से भागा। (IN)

निर्गमन 4:4 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “हाथ बढ़ाकर उसकी पूँछ पकड़ ले, ताकि वे लोग विश्वास करें कि तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्‍वर अर्थात् अब्राहम के परमेश्‍वर, इसहाक के परमेश्‍वर, और याकूब के परमेश्‍वर, यहोवा ने तुझको दर्शन दिया है।” (IN)

निर्गमन 4:5 जब उसने हाथ बढ़ाकर उसको पकड़ा तब वह उसके हाथ में फिर लाठी बन गई। (IN)

निर्गमन 4:6 फिर यहोवा ने उससे यह भी कहा, “अपना हाथ छाती पर रखकर ढाँप।” अतः उसने अपना हाथ छाती पर रखकर ढाँप लिया; फिर जब उसे निकाला तब क्या देखा, कि उसका हाथ कोढ़ के कारण हिम के समान श्वेत हो गया है। (IN)

निर्गमन 4:7 तब उसने कहा, “अपना हाथ छाती पर फिर रखकर ढाँप।” और उसने अपना हाथ छाती पर रखकर ढाँप लिया; और जब उसने उसको छाती पर से निकाला तब क्या देखता है कि वह फिर सारी देह के समान हो गया। (IN)

निर्गमन 4:8 तब यहोवा ने कहा, “यदि वे तेरी बात पर विश्वास न करें, और पहले चिन्ह को न मानें, तो दूसरे चिन्ह पर विश्वास करेंगे। (IN)

निर्गमन 4:9 और यदि वे इन दोनों चिन्हों पर विश्वास न करें और तेरी बात को न मानें, तब तू नील नदी से कुछ जल लेकर सूखी भूमि पर डालना; और जो जल तू नदी से निकालेगा वह सूखी भूमि पर लहू बन जाएगा।” (IN)

निर्गमन 4:10 मूसा ने यहोवा से कहा, “हे मेरे प्रभु, मैं बोलने में निपुण नहीं, न तो पहले था, और न जब से तू अपने दास से बातें करने लगा; मैं तो मुँह और जीभ का भद्दा हूँ।” (IN)

निर्गमन 4:11 यहोवा ने उससे कहा, “मनुष्य का मुँह किसने बनाया है? और मनुष्य को गूँगा, या बहरा, या देखनेवाला, या अंधा, मुझ यहोवा को छोड़ कौन बनाता है? (IN)

निर्गमन 4:12 अब जा, मैं तेरे मुख के संग होकर जो तुझे कहना होगा वह तुझे सिखाता जाऊँगा।” (IN)

निर्गमन 4:13 उसने कहा, “हे मेरे प्रभु, कृपया तू किसी अन्य व्यक्‍ति को भेज।” (IN)

निर्गमन 4:14 तब यहोवा का कोप मूसा पर भड़का और उसने कहा, “क्या तेरा भाई लेवीय हारून नहीं है? मुझे तो निश्चय है कि वह बोलने में निपुण है, और वह तुझ से भेंट करने के लिये निकला भी गया है, और तुझे देखकर मन में आनन्दित होगा। (IN)

निर्गमन 4:15 इसलिए तू उसे ये बातें सिखाना; और मैं उसके मुख के संग और तेरे मुख के संग होकर जो कुछ तुम्हें करना होगा वह तुमको सिखाता जाऊँगा। (IN)

निर्गमन 4:16 वह तेरी ओर से लोगों से बातें किया करेगा; वह तेरे लिये मुँह और तू उसके लिये परमेश्‍वर ठहरेगा। (IN)

निर्गमन 4:17 और तू इस लाठी को हाथ में लिए जा, और इसी से इन चिन्हों को दिखाना।” (IN)

निर्गमन 4:18 ¶ तब मूसा अपने ससुर यित्रो के पास लौटा और उससे कहा, “मुझे विदा कर, कि मैं मिस्र में रहनेवाले अपने भाइयों के पास जाकर देखूँ कि वे अब तक जीवित हैं या नहीं।” यित्रो ने कहा, “कुशल से जा।” (IN)

निर्गमन 4:19 और यहोवा ने मिद्यान देश में मूसा से कहा, “मिस्र को लौट जा; क्योंकि जो मनुष्य तेरे प्राण के प्यासे थे वे सब मर गए हैं।” (IN)

निर्गमन 4:20 तब मूसा अपनी पत्‍नी और बेटों को गदहे पर चढ़ाकर मिस्र देश की ओर परमेश्‍वर की लाठी को हाथ में लिये हुए लौटा। (IN)

निर्गमन 4:21 और यहोवा ने मूसा से कहा, “जब तू मिस्र में पहुँचे तब सावधान हो जाना, और जो चमत्कार मैंने तेरे वश में किए हैं उन सभी को फ़िरौन को दिखलाना; परन्तु मैं उसके मन को हठीला करूँगा, और वह मेरी प्रजा को जाने न देगा। (IN)

निर्गमन 4:22 और तू फ़िरौन से कहना, 'यहोवा यह कहता है, कि इस्राएल मेरा पुत्र वरन् मेरा पहलौठा है, (IN)

निर्गमन 4:23 और मैं जो तुझसे कह चुका हूँ, कि मेरे पुत्र को जाने दे कि वह मेरी सेवा करे; और तूने अब तक उसे जाने नहीं दिया, इस कारण मैं अब तेरे पुत्र वरन् तेरे पहलौठे को घात करूँगा'।” (IN)

निर्गमन 4:24 तब ऐसा हुआ कि मार्ग पर सराय में यहोवा ने मूसा से भेंट करके उसे मार डालना चाहा। (IN)

निर्गमन 4:25 तब सिप्पोरा ने एक तेज चकमक पत्थर लेकर अपने बेटे की खलड़ी को काट डाला, और मूसा के पाँवों पर यह कहकर फेंक दिया, “निश्चय तू लहू बहानेवाला मेरा पति है।” (IN)

निर्गमन 4:26 तब उसने उसको छोड़ दिया। और उसी समय खतने के कारण वह बोली, “तू लहू बहानेवाला पति है।” (IN)

निर्गमन 4:27 ¶ तब यहोवा ने हारून से कहा, “मूसा से भेंट करने को जंगल में जा।” और वह गया, और परमेश्‍वर के पर्वत पर उससे मिला और उसको चूमा। (IN)

निर्गमन 4:28 तब मूसा ने हारून को यह बताया कि यहोवा ने क्या-क्या बातें कहकर उसको भेजा है, और कौन-कौन से चिन्ह दिखलाने की आज्ञा उसे दी है। (IN)

निर्गमन 4:29 तब मूसा और हारून ने जाकर इस्राएलियों के सब पुरनियों को इकट्ठा किया। (IN)

निर्गमन 4:30 और जितनी बातें यहोवा ने मूसा से कही थीं वह सब हारून ने उन्हें सुनाई, और लोगों के सामने वे चिन्ह भी दिखलाए। (IN)

निर्गमन 4:31 और लोगों ने उन पर विश्वास किया; और यह सुनकर कि यहोवा ने इस्राएलियों की सुधि ली और उनके दुःखों पर दृष्टि की है, उन्होंने सिर झुकाकर दण्डवत् किया। (IN)

निर्गमन 5:1 ¶ इसके पश्चात् मूसा और हारून ने जाकर फ़िरौन से कहा, “इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा यह कहता है, 'मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे, कि वे जंगल में मेरे लिये पर्व करें'।” (IN)

निर्गमन 5:2 फ़िरौन ने कहा, “यहोवा कौन है कि मैं उसका वचन मानकर इस्राएलियों को जाने दूँ? मैं यहोवा को नहीं जानता, और मैं इस्राएलियों को नहीं जाने दूँगा।” (IN)

निर्गमन 5:3 उन्होंने कहा, “इब्रियों के परमेश्‍वर ने हम से भेंट की है; इसलिए हमें जंगल में तीन दिन के मार्ग पर जाने दे, कि अपने परमेश्‍वर यहोवा के लिये बलिदान करें, ऐसा न हो कि वह हम में मरी फैलाए या तलवार चलवाए।” (IN)

निर्गमन 5:4 मिस्र के राजा ने उनसे कहा, “हे मूसा, हे हारून, तुम क्यों लोगों से काम छुड़वाना चाहते हो? तुम जाकर अपने-अपने बोझ को उठाओ।” (IN)

निर्गमन 5:5 और फ़िरौन ने कहा, “सुनो, इस देश में वे लोग बहुत हो गए हैं, फिर तुम उनको उनके परिश्रम से विश्राम दिलाना चाहते हो!” (IN)

निर्गमन 5:6 ¶ फ़िरौन ने उसी दिन उन परिश्रम करवानेवालों को जो उन लोगों के ऊपर थे, और उनके सरदारों को यह आज्ञा दी, (IN)

निर्गमन 5:7 “तुम जो अब तक ईटें बनाने के लिये लोगों को पुआल दिया करते थे वह आगे को न देना; वे आप ही जाकर अपने लिये पुआल इकट्ठा करें। (IN)

निर्गमन 5:8 तो भी जितनी ईटें अब तक उन्हें बनानी पड़ती थीं उतनी ही आगे को भी उनसे बनवाना, ईटों की गिनती कुछ भी न घटाना; क्योंकि वे आलसी हैं; इस कारण वे यह कहकर चिल्लाते हैं, 'हम जाकर अपने परमेश्‍वर के लिये बलिदान करें।' (IN)

निर्गमन 5:9 उन मनुष्यों से और भी कठिन सेवा करवाई जाए कि वे उसमें परिश्रम करते रहें और झूठी बातों पर ध्यान न लगाएँ।” (IN)

निर्गमन 5:10 तब लोगों के परिश्रम करानेवालों ने और सरदारों ने बाहर जाकर उनसे कहा, “फ़िरौन इस प्रकार कहता है, 'मैं तुम्हें पुआल नहीं दूँगा। (IN)

निर्गमन 5:11 तुम ही जाकर जहाँ कहीं पुआल मिले वहाँ से उसको बटोर कर ले आओ; परन्तु तुम्हारा काम कुछ भी नहीं घटाया जाएगा'।” (IN)

निर्गमन 5:12 इसलिए वे लोग सारे मिस्र देश में तितर-बितर हुए कि पुआल के बदले खूँटी बटोरें। (IN)

निर्गमन 5:13 परिश्रम करनेवाले यह कह-कहकर उनसे जल्दी करते रहे कि जिस प्रकार तुम पुआल पाकर किया करते थे उसी प्रकार अपना प्रतिदिन का काम अब भी पूरा करो। (IN)

निर्गमन 5:14 और इस्राएलियों में से जिन सरदारों को फ़िरौन के परिश्रम करानेवालों ने उनका अधिकारी ठहराया था, उन्होंने मार खाई, और उनसे पूछा गया, “क्या कारण है कि तुमने अपनी ठहराई हुई ईटों की गिनती के अनुसार पहले के समान कल और आज पूरी नहीं कराई?” (IN)

निर्गमन 5:15 तब इस्राएलियों के सरदारों ने जाकर फ़िरौन की दुहाई यह कहकर दी, “तू अपने दासों से ऐसा बर्ताव क्यों करता है? (IN)

निर्गमन 5:16 तेरे दासों को पुआल तो दिया ही नहीं जाता और वे हम से कहते रहते हैं, 'ईटें बनाओ, ईटें बनाओ,' और तेरे दासों ने भी मार खाई है; परन्तु दोष तेरे ही लोगों का है।” (IN)

निर्गमन 5:17 फ़िरौन ने कहा, “तुम आलसी हो, आलसी; इसी कारण कहते हो कि हमें यहोवा के लिये बलिदान करने को जाने दे। (IN)

निर्गमन 5:18 अब जाकर अपना काम करो; और पुआल तुमको नहीं दिया जाएगा, परन्तु ईटों की गिनती पूरी करनी पड़ेगी।” (IN)

निर्गमन 5:19 जब इस्राएलियों के सरदारों ने यह बात सुनी कि उनकी ईटों की गिनती न घटेगी, और प्रतिदिन उतना ही काम पूरा करना पड़ेगा, तब वे जान गए कि उनके संकट के दिन आ गए हैं। (IN)

निर्गमन 5:20 जब वे फ़िरौन के सम्मुख से बाहर निकल आए तब मूसा और हारून, जो उनसे भेंट करने के लिये खड़े थे, उन्हें मिले। (IN)

निर्गमन 5:21 और उन्होंने मूसा और हारून से कहा, “यहोवा तुम पर दृष्टि करके न्याय करे, क्योंकि तुमने हमको फ़िरौन और उसके कर्मचारियों की दृष्टि में घृणित ठहराकर हमें घात करने के लिये उनके हाथ में तलवार दे दी है।” (IN)

निर्गमन 5:22 ¶ तब मूसा ने यहोवा के पास लौटकर कहा, “हे प्रभु, तूने इस प्रजा के साथ ऐसी बुराई क्यों की? और तूने मुझे यहाँ क्यों भेजा? (IN)

निर्गमन 5:23 जब से मैं तेरे नाम से फ़िरौन के पास बातें करने के लिये गया तब से उसने इस प्रजा के साथ बुरा ही व्यवहार किया है, और तूने अपनी प्रजा का कुछ भी छुटकारा नहीं किया।” (IN)

निर्गमन 6:1 ¶ तब यहोवा ने मूसा से कहा, “अब तू देखेगा कि मैं फ़िरौन से क्या करूँगा; जिससे वह उनको बरबस निकालेगा, वह तो उन्हें अपने देश से बरबस निकाल देगा।” (IN)

निर्गमन 6:2 ¶ परमेश्‍वर ने मूसा से कहा, “मैं यहोवा हूँ; (IN)

निर्गमन 6:3 मैं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम से अब्राहम, इसहाक, और याकूब को दर्शन देता था, परन्तु यहोवा के नाम से मैं उन पर प्रगट न हुआ। (IN)

निर्गमन 6:4 और मैंने उनके साथ अपनी वाचा दृढ़ की है, अर्थात् कनान देश जिसमें वे परदेशी होकर रहते थे, उसे उन्हें दे दूँ। (IN)

निर्गमन 6:5 इस्राएली जिन्हें मिस्री लोग दासत्व में रखते हैं उनका कराहना भी सुनकर मैंने अपनी वाचा को स्मरण किया है। (IN)

निर्गमन 6:6 इस कारण तू इस्राएलियों से कह, 'मैं यहोवा हूँ, और तुमको मिस्रियों के बोझों के नीचे से निकालूँगा, और उनके दासत्व से तुमको छुड़ाऊँगा, और अपनी भुजा बढ़ाकर और भारी दण्ड देकर तुम्हें छुड़ा लूँगा, (IN)

निर्गमन 6:7 और मैं तुमको अपनी प्रजा बनाने के लिये अपना लूँगा, और मैं तुम्हारा परमेश्‍वर ठहरूँगा; और तुम जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ जो तुम्हें मिस्रियों के बोझों के नीचे से निकाल ले आया। (IN)

निर्गमन 6:8 और जिस देश के देने की शपथ मैंने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से खाई थी उसी में मैं तुम्हें पहुँचाकर उसे तुम्हारा भाग कर दूँगा। मैं तो यहोवा हूँ'।” (IN)

निर्गमन 6:9 ये बातें मूसा ने इस्राएलियों को सुनाईं; परन्तु उन्होंने मन की बेचैनी और दासत्व की क्रूरता के कारण उसकी न सुनी। (IN)

निर्गमन 6:10 तब यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 6:11 “तू जाकर मिस्र के राजा फ़िरौन से कह कि इस्राएलियों को अपने देश में से निकल जाने दे।” (IN)

निर्गमन 6:12 और मूसा ने यहोवा से कहा, “देख, इस्राएलियों ने मेरी नहीं सुनी; फिर फ़िरौन मुझ भद्दे बोलनेवाले की कैसे सुनेगा?” (IN)

निर्गमन 6:13 तब यहोवा ने मूसा और हारून को इस्राएलियों और मिस्र के राजा फ़िरौन के लिये आज्ञा इस अभिप्राय से दी कि वे इस्राएलियों को मिस्र देश से निकाल ले जाएँ। (IN)

निर्गमन 6:14 ¶ उनके पितरों के घरानों के मुख्य पुरुष ये हैं: इस्राएल के पहलौठा रूबेन के पुत्र: हनोक, पल्लू, हेस्रोन और कर्मी थे; इन्हीं से रूबेन के कुल निकले। (IN)

निर्गमन 6:15 और शिमोन के पुत्र: यमूएल, यामीन, ओहद, याकीन, और सोहर थे, और एक कनानी स्त्री का बेटा शाऊल भी था; इन्हीं से शिमोन के कुल निकले। (IN)

निर्गमन 6:16 लेवी के पुत्र जिनसे उनकी वंशावली चली है, उनके नाम ये हैं: अर्थात् गेर्शोन, कहात और मरारी, और लेवी की पूरी अवस्था एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई। (IN)

निर्गमन 6:17 गेर्शोन के पुत्र जिनसे उनका कुल चला: लिब्नी और शिमी थे। (IN)

निर्गमन 6:18 कहात के पुत्र: अम्राम, यिसहार, हेब्रोन और उज्जीएल थे, और कहात की पूरी अवस्था एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई। (IN)

निर्गमन 6:19 मरारी के पुत्र: महली और मूशी थे। लेवियों के कुल जिनसे उनकी वंशावली चली ये ही हैं। (IN)

निर्गमन 6:20 अम्राम ने अपनी फूफी योकेबेद को ब्याह लिया और उससे हारून और मूसा उत्‍पन्‍न हुए, और अम्राम की पूरी अवस्था एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई। (IN)

निर्गमन 6:21 यिसहार के पुत्र: कोरह, नेपेग और जिक्री थे। (IN)

निर्गमन 6:22 उज्जीएल के पुत्र: मीशाएल, एलसाफान और सित्री थे। (IN)

निर्गमन 6:23 हारून ने अम्मीनादाब की बेटी, और नहशोन की बहन एलीशेबा को ब्याह लिया; और उससे नादाब, अबीहू, और ईतामार उत्‍पन्‍न हुए। (IN)

निर्गमन 6:24 कोरह के पुत्र: अस्सीर, एल्काना और अबीआसाफ थे; और इन्हीं से कोरहियों के कुल निकले। (IN)

निर्गमन 6:25 हारून के पुत्र एलीआजर ने पूतीएल की एक बेटी को ब्याह लिया; और उससे पीनहास उत्‍पन्‍न हुआ। जिनसे उनका कुल चला। लेवियों के पितरों के घरानों के मुख्य पुरुष ये ही हैं। (IN)

निर्गमन 6:26 हारून और मूसा वे ही हैं जिनको यहोवा ने यह आज्ञा दी: “इस्राएलियों को दल-दल करके उनके जत्थों के अनुसार मिस्र देश से निकाल ले आओ।” (IN)

निर्गमन 6:27 ये वही मूसा और हारून हैं जिन्होंने मिस्र के राजा फ़िरौन से कहा कि हम इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले जाएँगे। (IN)

निर्गमन 6:28 ¶ जब यहोवा ने मिस्र देश में मूसा से यह बात कहीं, (IN)

निर्गमन 6:29 “मैं तो यहोवा हूँ; इसलिए जो कुछ मैं तुम से कहूँगा वह सब मिस्र के राजा फ़िरौन से कहना।” (IN)

निर्गमन 6:30 परन्तु मूसा ने यहोवा को उत्तर दिया, “मैं तो बोलने में भद्दा हूँ; और फ़िरौन कैसे मेरी सुनेगा?” (IN)

निर्गमन 7:1 ¶ तब यहोवा ने मूसा से कहा, “सुन, मैं तुझे फ़िरौन के लिये परमेश्‍वर सा ठहराता हूँ; और तेरा भाई हारून तेरा नबी ठहरेगा। (IN)

निर्गमन 7:2 जो-जो आज्ञा मैं तुझे दूँ वही तू कहना, और हारून उसे फ़िरौन से कहेगा जिससे वह इस्राएलियों को अपने देश से निकल जाने दे। (IN)

निर्गमन 7:3 परन्तु मैं फ़िरौन के मन को कठोर कर दूँगा, और अपने चिन्ह और चमत्कार मिस्र देश में बहुत से दिखलाऊँगा। (IN)

निर्गमन 7:4 तो भी फ़िरौन तुम्हारी न सुनेगा; और मैं मिस्र देश पर अपना हाथ बढ़ाकर मिस्रियों को भारी दण्ड देकर अपनी सेना अर्थात् अपनी इस्राएली प्रजा को मिस्र देश से निकाल लूँगा। (IN)

निर्गमन 7:5 और जब मैं मिस्र पर हाथ बढ़ा कर इस्राएलियों को उनके बीच से निकालूँगा तब मिस्री जान लेंगे, कि मैं यहोवा हूँ।” (IN)

निर्गमन 7:6 तब मूसा और हारून ने यहोवा की आज्ञा के अनुसार ही किया। (IN)

निर्गमन 7:7 तब जब मूसा और हारून फ़िरौन से बात करने लगे तब मूसा तो अस्सी वर्ष का था, और हारून तिरासी वर्ष का था। (IN)

निर्गमन 7:8 ¶ फिर यहोवा ने मूसा और हारून से इस प्रकार कहा, (IN)

निर्गमन 7:9 “जब फ़िरौन तुम से कहे, 'अपने प्रमाण का कोई चमत्कार दिखाओ,' तब तू हारून से कहना, 'अपनी लाठी को लेकर फ़िरौन के सामने डाल दे, कि वह अजगर बन जाए'।” (IN)

निर्गमन 7:10 तब मूसा और हारून ने फ़िरौन के पास जाकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया; और जब हारून ने अपनी लाठी को फ़िरौन और उसके कर्मचारियों के सामने डाल दिया, तब वह अजगर बन गया। (IN)

निर्गमन 7:11 तब फ़िरौन ने पंडितों और टोनहा करनेवालों को बुलवाया; और मिस्र के जादूगरों ने आकर अपने-अपने तंत्र-मंत्र से वैसा ही किया। (IN)

निर्गमन 7:12 उन्होंने भी अपनी-अपनी लाठी को डाल दिया, और वे भी अजगर बन गए। पर हारून की लाठी उनकी लाठियों को निगल गई। (IN)

निर्गमन 7:13 परन्तु फ़िरौन का मन और हठीला हो गया, और यहोवा के वचन के अनुसार उसने मूसा और हारून की बातों को नहीं माना। (IN)

निर्गमन 7:14 ¶ तब यहोवा ने मूसा से कहा, “फ़िरौन का मन कठोर हो गया है और वह इस प्रजा को जाने नहीं देता। (IN)

निर्गमन 7:15 इसलिए सवेरे के समय फ़िरौन के पास जा, वह तो जल की ओर बाहर आएगा; और जो लाठी सर्प बन गई थी, उसको हाथ में लिए हुए नील नदी के तट पर उससे भेंट करने के लिये खड़े रहना। (IN)

निर्गमन 7:16 और उससे इस प्रकार कहना, 'इब्रियों के परमेश्‍वर यहोवा ने मुझे यह कहने के लिये तेरे पास भेजा है कि मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे कि जिससे वे जंगल में मेरी उपासना करें; और अब तक तूने मेरा कहना नहीं माना। (IN)

निर्गमन 7:17 यहोवा यह कहता है, इससे तू जान लेगा कि मैं ही परमेश्‍वर हूँ; देख, मैं अपने हाथ की लाठी को नील नदी के जल पर मारूँगा, और जल लहू बन जाएगा, (IN)

निर्गमन 7:18 और जो मछलियाँ नील नदी में हैं वे मर जाएँगी, और नील नदी से दुर्गन्ध आने लगेगी, और मिस्रियों का जी नदी का पानी पीने के लिये न चाहेगा'।” (IN)

निर्गमन 7:19 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “हारून से कह कि अपनी लाठी लेकर मिस्र देश में जितना जल है, अर्थात् उसकी नदियाँ, नहरें, झीलें, और जलकुण्ड, सब के ऊपर अपना हाथ बढ़ा कि उनका जल लहू बन जाए; और सारे मिस्र देश में काठ और पत्थर दोनों भाँति के जलपात्रों में लहू ही लहू हो जाएगा।” (IN)

निर्गमन 7:20 ¶ तब मूसा और हारून ने यहोवा की आज्ञा ही के अनुसार किया, अर्थात् उसने लाठी को उठाकर फ़िरौन और उसके कर्मचारियों के देखते नील नदी के जल पर मारा, और नदी का सब जल लहू बन गया। (IN)

निर्गमन 7:21 और नील नदी में जो मछलियाँ थीं वे मर गई; और नदी से दुर्गन्ध आने लगी, और मिस्री लोग नदी का पानी न पी सके; और सारे मिस्र देश में लहू हो गया। (IN)

निर्गमन 7:22 तब मिस्र के जादूगरों ने भी अपने तंत्र-मंत्रों से वैसा ही किया; तो भी फ़िरौन का मन हठीला हो गया, और यहोवा के कहने के अनुसार उसने मूसा और हारून की न मानी। (IN)

निर्गमन 7:23 फ़िरौन ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया, और मुँह फेरकर अपने घर में चला गया। (IN)

निर्गमन 7:24 और सब मिस्री लोग पीने के जल के लिये नील नदी के आस-पास खोदने लगे, क्योंकि वे नदी का जल नहीं पी सकते थे। (IN)

निर्गमन 7:25 जब से यहोवा ने नील नदी को मारा था तब से सात दिन हो चुके थे। (IN)

निर्गमन 8:1 ¶ तब यहोवा ने फिर मूसा से कहा, “फ़िरौन के पास जाकर कह, 'यहोवा तुझसे इस प्रकार कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे जिससे वे मेरी उपासना करें। (IN)

निर्गमन 8:2 परन्तु यदि उन्हें जाने न देगा तो सुन, मैं मेंढ़क भेजकर तेरे सारे देश को हानि पहुँचानेवाला हूँ। (IN)

निर्गमन 8:3 और नील नदी मेंढ़कों से भर जाएगी, और वे तेरे भवन में, और तेरे बिछौने पर, और तेरे कर्मचारियों के घरों में, और तेरी प्रजा पर, वरन् तेरे तन्दूरों और कठौतियों में भी चढ़ जाएँगे। (IN)

निर्गमन 8:4 और तुझ पर, और तेरी प्रजा, और तेरे कर्मचारियों, सभी पर मेंढ़क चढ़ जाएँगे'।” (IN)

निर्गमन 8:5 फिर यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी, “हारून से कह दे, कि नदियों, नहरों, और झीलों के ऊपर लाठी के साथ अपना हाथ बढ़ाकर मेंढ़कों को मिस्र देश पर चढ़ा ले आए।” (IN)

निर्गमन 8:6 तब हारून ने मिस्र के जलाशयों के ऊपर अपना हाथ बढ़ाया; और मेंढ़कों ने मिस्र देश पर चढ़कर उसे छा लिया। (IN)

निर्गमन 8:7 और जादूगर भी अपने तंत्र-मंत्रों से उसी प्रकार मिस्र देश पर मेंढ़क चढ़ा ले आए। (IN)

निर्गमन 8:8 तब फ़िरौन ने मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “यहोवा से विनती करो कि वह मेंढ़कों को मुझसे और मेरी प्रजा से दूर करे; और मैं इस्राएली लोगों को जाने दूँगा। जिससे वे यहोवा के लिये बलिदान करें।” (IN)

निर्गमन 8:9 तब मूसा ने फ़िरौन से कहा, “इतनी बात के लिये तू मुझे आदेश दे कि अब मैं तेरे, और तेरे कर्मचारियों, और प्रजा के निमित्त कब विनती करूँ, कि यहोवा तेरे पास से और तेरे घरों में से मेंढ़कों को दूर करे, और वे केवल नील नदी में पाए जाएँ?” (IN)

निर्गमन 8:10 उसने कहा, “कल।” उसने कहा, “तेरे वचन के अनुसार होगा, जिससे तुझे यह ज्ञात हो जाए कि हमारे परमेश्‍वर यहोवा के तुल्य कोई दूसरा नहीं है। (IN)

निर्गमन 8:11 और मेंढ़क तेरे पास से, और तेरे घरों में से, और तेरे कर्मचारियों और प्रजा के पास से दूर होकर केवल नील नदी में रहेंगे।” (IN)

निर्गमन 8:12 तब मूसा और हारून फ़िरौन के पास से निकल गए; और मूसा ने उन मेंढ़कों के विषय यहोवा की दुहाई दी जो उसने फ़िरौन पर भेजे थे। (IN)

निर्गमन 8:13 और यहोवा ने मूसा के कहने के अनुसार किया; और मेंढ़क घरों, आँगनों, और खेतों में मर गए। (IN)

निर्गमन 8:14 और लोगों ने इकट्ठे करके उनके ढेर लगा दिए, और सारा देश दुर्गन्ध से भर गया। (IN)

निर्गमन 8:15 परन्तु जब फ़िरौन ने देखा कि अब आराम मिला है तब यहोवा के कहने के अनुसार उसने फिर अपने मन को कठोर किया, और उनकी न सुनी। (IN)

निर्गमन 8:16 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “हारून को आज्ञा दे, 'तू अपनी लाठी बढ़ाकर भूमि की धूल पर मार, जिससे वह मिस्र देश भर में कुटकियाँ बन जाएँ'।” (IN)

निर्गमन 8:17 और उन्होंने वैसा ही किया; अर्थात् हारून ने लाठी को ले हाथ बढ़ाकर भूमि की धूल पर मारा, तब मनुष्य और पशु दोनों पर कुटकियाँ हो गईं वरन् सारे मिस्र देश में भूमि की धूल कुटकियाँ बन गईं। (IN)

निर्गमन 8:18 तब जादूगरों ने चाहा कि अपने तंत्र-मंत्रों के बल से हम भी कुटकियाँ ले आएँ, परन्तु यह उनसे न हो सका। और मनुष्यों और पशुओं दोनों पर कुटकियाँ बनी ही रहीं। (IN)

निर्गमन 8:19 तब जादूगरों ने फ़िरौन से कहा, “यह तो परमेश्‍वर के हाथ का काम है।” तो भी यहोवा के कहने के अनुसार फ़िरौन का मन कठोर होता गया, और उसने मूसा और हारून की बात न मानी। (IN)

निर्गमन 8:20 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “सवेरे उठकर फ़िरौन के सामने खड़ा होना, वह तो जल की ओर आएगा, और उससे कहना, 'यहोवा तुझसे यह कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे, कि वे मेरी उपासना करें। (IN)

निर्गमन 8:21 यदि तू मेरी प्रजा को न जाने देगा तो सुन, मैं तुझ पर, और तेरे कर्मचारियों और तेरी प्रजा पर, और तेरे घरों में झुण्ड के झुण्ड डांस भेजूँगा; और मिस्रियों के घर और उनके रहने की भूमि भी डांसों से भर जाएगी। (IN)

निर्गमन 8:22 उस दिन मैं गोशेन देश को जिसमें मेरी प्रजा रहती है अलग करूँगा, और उसमें डांसों के झुण्ड न होंगे; जिससे तू जान ले कि पृथ्वी के बीच मैं ही यहोवा हूँ। (IN)

निर्गमन 8:23 और मैं अपनी प्रजा और तेरी प्रजा में अन्तर ठहराऊँगा। यह चिन्ह कल होगा'।” (IN)

निर्गमन 8:24 और यहोवा ने वैसा ही किया, और फ़िरौन के भवन, और उसके कर्मचारियों के घरों में, और सारे मिस्र देश में डांसों के झुण्ड के झुण्ड भर गए, और डांसों के मारे वह देश नाश हुआ। (IN)

निर्गमन 8:25 तब फ़िरौन ने मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “तुम जाकर अपने परमेश्‍वर के लिये इसी देश में बलिदान करो।” (IN)

निर्गमन 8:26 मूसा ने कहा, “ऐसा करना उचित नहीं; क्योंकि हम अपने परमेश्‍वर यहोवा के लिये मिस्रियों की घृणित वस्तु बलिदान करेंगे; और यदि हम मिस्रियों के देखते उनकी घृणित वस्तु बलिदान करें तो क्या वे हमको पथरवाह न करेंगे? (IN)

निर्गमन 8:27 हम जंगल में तीन दिन के मार्ग पर जाकर अपने परमेश्‍वर यहोवा के लिये जैसा वह हम से कहेगा वैसा ही बलिदान करेंगे।” (IN)

निर्गमन 8:28 फ़िरौन ने कहा, “मैं तुमको जंगल में जाने दूँगा कि तुम अपने परमेश्‍वर यहोवा के लिये जंगल में बलिदान करो; केवल बहुत दूर न जाना, और मेरे लिये विनती करो।” (IN)

निर्गमन 8:29 तब मूसा ने कहा, “सुन, मैं तेरे पास से बाहर जाकर यहोवा से विनती करूँगा कि डांसों के झुण्ड तेरे, और तेरे कर्मचारियों, और प्रजा के पास से कल ही दूर हों; पर फ़िरौन आगे को कपट करके हमें यहोवा के लिये बलिदान करने को जाने देने के लिये मना न करे।” (IN)

निर्गमन 8:30 अतः मूसा ने फ़िरौन के पास से बाहर जाकर यहोवा से विनती की। (IN)

निर्गमन 8:31 और यहोवा ने मूसा के कहे के अनुसार डांसों के झुण्डों को फ़िरौन, और उसके कर्मचारियों, और उसकी प्रजा से दूर किया; यहाँ तक कि एक भी न रहा। (IN)

निर्गमन 8:32 तब फ़िरौन ने इस बार भी अपने मन को कठोर किया, और उन लोगों को जाने न दिया। (IN)

निर्गमन 9:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “फ़िरौन के पास जाकर कह, 'इब्रियों का परमेश्‍वर यहोवा तुझसे इस प्रकार कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे, कि मेरी उपासना करें। (IN)

निर्गमन 9:2 और यदि तू उन्हें जाने न दे और अब भी पकड़े रहे, (IN)

निर्गमन 9:3 तो सुन, तेरे जो घोड़े, गदहे, ऊँट, गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि पशु मैदान में हैं, उन पर यहोवा का हाथ ऐसा पड़ेगा कि बहुत भारी मरी होगी। (IN)

निर्गमन 9:4 परन्तु यहोवा इस्राएलियों के पशुओं में और मिस्रियों के पशुओं में ऐसा अन्तर करेगा कि जो इस्राएलियों के हैं उनमें से कोई भी न मरेगा'।” (IN)

निर्गमन 9:5 फिर यहोवा ने यह कहकर एक समय ठहराया, “मैं यह काम इस देश में कल करूँगा।” (IN)

निर्गमन 9:6 दूसरे दिन यहोवा ने ऐसा ही किया; और मिस्र के तो सब पशु मर गए, परन्तु इस्राएलियों का एक भी पशु न मरा। (IN)

निर्गमन 9:7 और फ़िरौन ने लोगों को भेजा, पर इस्राएलियों के पशुओं में से एक भी नहीं मरा था। तो भी फ़िरौन का मन कठोर हो गया, और उसने उन लोगों को जाने न दिया। (IN)

निर्गमन 9:8 ¶ फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “तुम दोनों भट्ठी में से एक-एक मुट्ठी राख ले लो, और मूसा उसे फ़िरौन के सामने आकाश की ओर उड़ा दे। (IN)

निर्गमन 9:9 तब वह सूक्ष्म धूल होकर सारे मिस्र देश में मनुष्यों और पशुओं दोनों पर फफोले और फोड़े बन जाएगी।” (IN)

निर्गमन 9:10 इसलिए वे भट्ठी में की राख लेकर फ़िरौन के सामने खड़े हुए, और मूसा ने उसे आकाश की ओर उड़ा दिया, और वह मनुष्यों और पशुओं दोनों पर फफोले और फोड़े बन गई। (IN)

निर्गमन 9:11 उन फोड़ों के कारण जादूगर मूसा के सामने खड़े न रह सके, क्योंकि वे फोड़े जैसे सब मिस्रियों के वैसे ही जादूगरों के भी निकले थे। (IN)

निर्गमन 9:12 तब यहोवा ने फ़िरौन के मन को कठोर कर दिया, और जैसा यहोवा ने मूसा से कहा था, उसने उसकी न सुनी। (IN)

निर्गमन 9:13 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “सवेरे उठकर फ़िरौन के सामने खड़ा हो, और उससे कह, 'इब्रियों का परमेश्‍वर यहोवा इस प्रकार कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे, कि वे मेरी उपासना करें। (IN)

निर्गमन 9:14 नहीं तो अब की बार मैं तुझ पर, और तेरे कर्मचारियों और तेरी प्रजा पर सब प्रकार की विपत्तियाँ डालूँगा, जिससे तू जान ले कि सारी पृथ्वी पर मेरे तुल्य कोई दूसरा नहीं है। (IN)

निर्गमन 9:15 मैंने तो अभी हाथ बढ़ाकर तुझे और तेरी प्रजा को मरी से मारा होता, और तू पृथ्वी पर से सत्यानाश हो गया होता; (IN)

निर्गमन 9:16 परन्तु सचमुच मैंने इसी कारण तुझे बनाए रखा है कि तुझे अपना सामर्थ्य दिखाऊँ, और अपना नाम सारी पृथ्वी पर प्रसिद्ध करूँ। (IN)

निर्गमन 9:17 क्या तू अब भी मेरी प्रजा के सामने अपने आप को बड़ा समझता है, और उन्हें जाने नहीं देता? (IN)

निर्गमन 9:18 सुन, कल मैं इसी समय ऐसे भारी-भारी ओले बरसाऊँगा, कि जिनके तुल्य मिस्र की नींव पड़ने के दिन से लेकर अब तक कभी नहीं पड़े। (IN)

निर्गमन 9:19 इसलिए अब लोगों को भेजकर अपने पशुओं को और मैदान में जो कुछ तेरा है सबको फुर्ती से आड़ में छिपा ले; नहीं तो जितने मनुष्य या पशु मैदान में रहें और घर में इकट्ठे न किए जाएँ उन पर ओले गिरेंगे, और वे मर जाएँगे'।” (IN)

निर्गमन 9:20 इसलिए फ़िरौन के कर्मचारियों में से जो लोग यहोवा के वचन का भय मानते थे उन्होंने तो अपने-अपने सेवकों और पशुओं को घर में हाँक दिया। (IN)

निर्गमन 9:21 पर जिन्होंने यहोवा के वचन पर मन न लगाया उन्होंने अपने सेवकों और पशुओं को मैदान में रहने दिया। (IN)

निर्गमन 9:22 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ा कि सारे मिस्र देश के मनुष्यों, पशुओं और खेतों की सारी उपज पर ओले गिरें।” (IN)

निर्गमन 9:23 तब मूसा ने अपनी लाठी को आकाश की ओर उठाया; और यहोवा की सामर्थ्य से मेघ गरजने और ओले बरसने लगे, और आग पृथ्वी तक आती रही। इस प्रकार यहोवा ने मिस्र देश पर ओले बरसाएँ। (IN)

निर्गमन 9:24 जो ओले गिरते थे उनके साथ आग भी मिली हुई थी, और वे ओले इतने भारी थे कि जब से मिस्र देश बसा था तब से मिस्र भर में ऐसे ओले कभी न गिरे थे। (IN)

निर्गमन 9:25 इसलिए मिस्र भर के खेतों में क्या मनुष्य, क्या पशु, जितने थे सब ओलों से मारे गए, और ओलों से खेत की सारी उपज नष्ट हो गई, और मैदान के सब वृक्ष भी टूट गए। (IN)

निर्गमन 9:26 केवल गोशेन प्रदेश में जहाँ इस्राएली बसते थे ओले नहीं गिरे। (IN)

निर्गमन 9:27 तब फ़िरौन ने मूसा और हारून को बुलवा भेजा और उनसे कहा, “इस बार मैंने पाप किया है; यहोवा धर्मी है, और मैं और मेरी प्रजा अधर्मी हैं। (IN)

निर्गमन 9:28 मेघों का गरजना और ओलों का बरसना तो बहुत हो गया; अब यहोवा से विनती करो; तब मैं तुम लोगों को जाने दूँगा, और तुम न रोके जाओगे।” (IN)

निर्गमन 9:29 मूसा ने उससे कहा, “नगर से निकलते ही मैं यहोवा की ओर हाथ फैलाऊँगा, तब बादल का गरजना बन्द हो जाएगा, और ओले फिर न गिरेंगे, इससे तू जान लेगा कि पृथ्वी यहोवा ही की है। (IN)

निर्गमन 9:30 तो भी मैं जानता हूँ, कि न तो तू और न तेरे कर्मचारी यहोवा परमेश्‍वर का भय मानेंगे।” (IN)

निर्गमन 9:31 सन और जौ तो ओलों से मारे गए, क्योंकि जौ की बालें निकल चुकी थीं और सन में फूल लगे हुए थे। (IN)

निर्गमन 9:32 पर गेहूँ और कठिया गेहूँ जो बढ़े न थे, इस कारण वे मारे न गए। (IN)

निर्गमन 9:33 जब मूसा ने फ़िरौन के पास से नगर के बाहर निकलकर यहोवा की ओर हाथ फैलाए, तब बादल का गरजना और ओलों का बरसना बन्द हुआ, और फिर बहुत मेंह भूमि पर न पड़ा। (IN)

निर्गमन 9:34 यह देखकर कि मेंह और ओलों और बादल का गरजना बन्द हो गया फ़िरौन ने अपने कर्मचारियों समेत फिर अपने मन को कठोर करके पाप किया। (IN)

निर्गमन 9:35 इस प्रकार फ़िरौन का मन हठीला होता गया, और उसने इस्राएलियों को जाने न दिया; जैसा कि यहोवा ने मूसा के द्वारा कहलवाया था। (IN)

निर्गमन 10:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “फ़िरौन के पास जा; क्योंकि मैं ही ने उसके और उसके कर्मचारियों के मन को इसलिए कठोर कर दिया है कि अपने चिन्ह उनके बीच में दिखलाऊँ, (IN)

निर्गमन 10:2 और तुम लोग अपने बेटों और पोतों से इसका वर्णन करो कि यहोवा ने मिस्रियों को कैसे उपहास में उड़ाया और अपने क्या-क्या चिन्ह उनके बीच प्रगट किए हैं; जिससे तुम यह जान लोगे कि मैं यहोवा हूँ।” (IN)

निर्गमन 10:3 तब मूसा और हारून ने फ़िरौन के पास जाकर कहा, “इब्रियों का परमेश्‍वर यहोवा तुझसे इस प्रकार कहता है, कि तू कब तक मेरे सामने दीन होने से संकोच करता रहेगा? मेरी प्रजा के लोगों को जाने दे कि वे मेरी उपासना करें। (IN)

निर्गमन 10:4 यदि तू मेरी प्रजा को जाने न दे तो सुन, कल मैं तेरे देश में टिड्डियाँ ले आऊँगा। (IN)

निर्गमन 10:5 और वे धरती को ऐसा छा लेंगी कि वह देख न पड़ेगी; और तुम्हारा जो कुछ ओलों से बच रहा है उसको वे चट कर जाएँगी, और तुम्हारे जितने वृक्ष मैदान में लगे हैं उनको भी वे चट कर जाएँगी, (IN)

निर्गमन 10:6 और वे तेरे और तेरे सारे कर्मचारियों, यहाँ तक सारे मिस्रियों के घरों में भर जाएँगी; इतनी टिड्डियाँ तेरे बाप-दादों ने या उनके पुरखाओं ने जब से पृथ्वी पर जन्मे तब से आज तक कभी न देखीं।” और वह मुँह फेरकर फ़िरौन के पास से बाहर गया। (IN)

निर्गमन 10:7 तब फ़िरौन के कर्मचारी उससे कहने लगे, “वह जन कब तक हमारे लिये फंदा बना रहेगा? उन मनुष्यों को जाने दे कि वे अपने परमेश्‍वर यहोवा की उपासना करें; क्या तू अब तक नहीं जानता कि सारा मिस्र नाश हो गया है?” (IN)

निर्गमन 10:8 तब मूसा और हारून फ़िरौन के पास फिर बुलवाए गए, और उसने उनसे कहा, “चले जाओ, अपने परमेश्‍वर यहोवा की उपासना करो; परन्तु वे जो जानेवाले हैं, कौन-कौन हैं?” (IN)

निर्गमन 10:9 मूसा ने कहा, “हम तो बेटों-बेटियों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों समेत वरन् बच्चों से बूढ़ों तक सब के सब जाएँगे, क्योंकि हमें यहोवा के लिये पर्व करना है।” (IN)

निर्गमन 10:10 उसने इस प्रकार उनसे कहा, “यहोवा तुम्हारे संग रहे जब कि मैं तुम्हें बच्चों समेत जाने देता हूँ; देखो, तुम्हारे मन में बुराई है। (IN)

निर्गमन 10:11 नहीं, ऐसा नहीं होने पाएगा; तुम पुरुष ही जाकर यहोवा की उपासना करो, तुम यही तो चाहते थे।” और वे फ़िरौन के सम्मुख से निकाल दिए गए। (IN)

निर्गमन 10:12 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “मिस्र देश के ऊपर अपना हाथ बढ़ा कि टिड्डियाँ मिस्र देश पर चढ़कर भूमि का जितना अन्न आदि ओलों से बचा है सबको चट कर जाएँ।” (IN)

निर्गमन 10:13 अतः मूसा ने अपनी लाठी को मिस्र देश के ऊपर बढ़ाया, तब यहोवा ने दिन भर और रात भर देश पर पुरवाई बहाई; और जब भोर हुआ तब उस पुरवाई में टिड्डियाँ आईं। (IN)

निर्गमन 10:14 और टिडि्डयों ने चढ़कर मिस्र देश के सारे स्थानों में बसेरा किया, उनका दल बहुत भारी था, वरन् न तो उनसे पहले ऐसी टिड्डियाँ आई थीं, और न उनके पीछे ऐसी फिर आएँगी। (IN)

निर्गमन 10:15 वे तो सारी धरती पर छा गईं, यहाँ तक कि देश में अंधकार छा गया, और उसका सारा अन्न आदि और वृक्षों के सब फल, अर्थात् जो कुछ ओलों से बचा था, सबको उन्होंने चट कर लिया; यहाँ तक कि मिस्र देश भर में न तो किसी वृक्ष पर कुछ हरियाली रह गई और न खेत में अनाज रह गया। (IN)

निर्गमन 10:16 तब फ़िरौन ने फुर्ती से मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “मैंने तो तुम्हारे परमेश्‍वर यहोवा का और तुम्हारा भी अपराध किया है। (IN)

निर्गमन 10:17 इसलिए अब की बार मेरा अपराध क्षमा करो, और अपने परमेश्‍वर यहोवा से विनती करो कि वह केवल मेरे ऊपर से इस मृत्यु को दूर करे।” (IN)

निर्गमन 10:18 तब मूसा ने फ़िरौन के पास से निकलकर यहोवा से विनती की। (IN)

निर्गमन 10:19 तब यहोवा ने बहुत प्रचण्ड पश्चिमी हवा बहाकर टिड्डियों को उड़ाकर लाल समुद्र में डाल दिया, और मिस्र के किसी स्थान में एक भी टिड्डी न रह गई। (IN)

निर्गमन 10:20 तो भी यहोवा ने फ़िरौन के मन को कठोर कर दिया, जिससे उसने इस्राएलियों को जाने न दिया। (IN)

निर्गमन 10:21 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ा कि मिस्र देश के ऊपर अंधकार छा जाए, ऐसा अंधकार कि टटोला जा सके।” (IN)

निर्गमन 10:22 तब मूसा ने अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ाया, और सारे मिस्र देश में तीन दिन तक घोर अंधकार छाया रहा। (IN)

निर्गमन 10:23 तीन दिन तक न तो किसी ने किसी को देखा, और न कोई अपने स्थान से उठा; परन्तु सारे इस्राएलियों के घरों में उजियाला रहा। (IN)

निर्गमन 10:24 तब फ़िरौन ने मूसा को बुलवाकर कहा, “तुम लोग जाओ, यहोवा की उपासना करो; अपने बालकों को भी संग ले जाओ; केवल अपनी भेड़-बकरी और गाय-बैल को छोड़ जाओ।” (IN)

निर्गमन 10:25 मूसा ने कहा, “तुझको हमारे हाथ मेलबलि और होमबलि के पशु भी देने पड़ेंगे, जिन्हें हम अपने परमेश्‍वर यहोवा के लिये चढ़ाएँ। (IN)

निर्गमन 10:26 इसलिए हमारे पशु भी हमारे संग जाएँगे, उनका एक खुर तक न रह जाएगा, क्योंकि उन्हीं में से हमको अपने परमेश्‍वर यहोवा की उपासना का सामान लेना होगा, और हम जब तक वहाँ न पहुँचें तब तक नहीं जानते कि क्या-क्या लेकर यहोवा की उपासना करनी होगी।” (IN)

निर्गमन 10:27 पर यहोवा ने फ़िरौन का मन हठीला कर दिया, जिससे उसने उन्हें जाने न दिया। (IN)

निर्गमन 10:28 तब फ़िरौन ने उससे कहा, “मेरे सामने से चला जा; और सचेत रह; मुझे अपना मुख फिर न दिखाना; क्योंकि जिस दिन तू मुझे मुँह दिखलाए उसी दिन तू मारा जाएगा।” (IN)

निर्गमन 10:29 मूसा ने कहा, “तूने ठीक कहा है; मैं तेरे मुँह को फिर कभी न देखूँगा।” (IN)

निर्गमन 11:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “एक और विपत्ति मैं फ़िरौन और मिस्र देश पर डालता हूँ, उसके पश्चात् वह तुम लोगों को वहाँ से जाने देगा; और जब वह जाने देगा तब तुम सभी को निश्चय निकाल देगा। (IN)

निर्गमन 11:2 मेरी प्रजा को मेरी यह आज्ञा सुना कि एक-एक पुरुष अपने-अपने पड़ोसी, और एक-एक स्त्री अपनी-अपनी पड़ोसिन से सोने-चाँदी के गहने माँग ले।” (IN)

निर्गमन 11:3 तब यहोवा ने मिस्रियों को अपनी प्रजा पर दयालु किया। और इससे अधिक वह पुरुष मूसा मिस्र देश में फ़िरौन के कर्मचारियों और साधारण लोगों की दृष्टि में अति महान था। (IN)

निर्गमन 11:4 फिर मूसा ने कहा, “यहोवा इस प्रकार कहता है, कि आधी रात के लगभग मैं मिस्र देश के बीच में होकर चलूँगा। (IN)

निर्गमन 11:5 तब मिस्र में सिंहासन पर विराजने वाले फ़िरौन से लेकर चक्की पीसनेवाली दासी तक के पहलौठे; वरन् पशुओं तक के सब पहलौठे मर जाएँगे। (IN)

निर्गमन 11:6 और सारे मिस्र देश में बड़ा हाहाकार मचेगा, यहाँ तक कि उसके समान न तो कभी हुआ और न होगा। (IN)

निर्गमन 11:7 पर इस्राएलियों के विरुद्ध, क्या मनुष्य क्या पशु, किसी पर कोई कुत्ता भी न भौंकेगा; जिससे तुम जान लो कि मिस्रियों और इस्राएलियों में मैं यहोवा अन्तर करता हूँ। (IN)

निर्गमन 11:8 तब तेरे ये सब कर्मचारी मेरे पास आ मुझे दण्डवत् करके यह कहेंगे, 'अपने सब अनुचरों समेत निकल जा।' और उसके पश्चात् मैं निकल जाऊँगा।” यह कहकर मूसा बड़े क्रोध में फ़िरौन के पास से निकल गया। (IN)

निर्गमन 11:9 यहोवा ने मूसा से कह दिया था, “फ़िरौन तुम्हारी न सुनेगा; क्योंकि मेरी इच्छा है कि मिस्र देश में बहुत से चमत्कार करूँ।” (IN)

निर्गमन 11:10 मूसा और हारून ने फ़िरौन के सामने ये सब चमत्कार किए; पर यहोवा ने फ़िरौन का मन और कठोर कर दिया, इसलिए उसने इस्राएलियों को अपने देश से जाने न दिया। (IN)

निर्गमन 12:1 ¶ फिर यहोवा ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा, (IN)

निर्गमन 12:2 “यह महीना तुम लोगों के लिये आरम्भ का ठहरे; अर्थात् वर्ष का पहला महीना यही ठहरे। (IN)

निर्गमन 12:3 इस्राएल की सारी मण्डली से इस प्रकार कहो, कि इसी महीने के दसवें दिन को तुम अपने-अपने पितरों के घरानों के अनुसार, घराने पीछे एक-एक मेम्‍ना ले रखो। (IN)

निर्गमन 12:4 और यदि किसी के घराने में एक मेम्‍ने के खाने के लिये मनुष्य कम हों, तो वह अपने सबसे निकट रहनेवाले पड़ोसी के साथ प्राणियों की गिनती के अनुसार एक मेम्‍ना ले रखे; और तुम हर एक के खाने के अनुसार मेम्‍ने का हिसाब करना। (IN)

निर्गमन 12:5 तुम्हारा मेम्‍ना निर्दोष और पहले वर्ष का नर हो, और उसे चाहे भेड़ों में से लेना चाहे बकरियों में से। (IN)

निर्गमन 12:6 और इस महीने के चौदहवें दिन तक उसे रख छोड़ना, और उस दिन सूर्यास्त के समय इस्राएल की सारी मण्डली के लोग उसे बलि करें। (IN)

निर्गमन 12:7 तब वे उसके लहू में से कुछ लेकर जिन घरों में मेम्‍ने को खाएँगे उनके द्वार के दोनों ओर और चौखट के सिरे पर लगाएँ। (IN)

निर्गमन 12:8 और वे उसके माँस को उसी रात आग में भूँजकर अख़मीरी रोटी और कड़वे सागपात के साथ खाएँ। (IN)

निर्गमन 12:9 उसको सिर, पैर, और अंतड़ियाँ समेत आग में भूँजकर खाना, कच्चा या जल में कुछ भी पकाकर न खाना। (IN)

निर्गमन 12:10 और उसमें से कुछ सवेरे तक न रहने देना, और यदि कुछ सवेरे तक रह भी जाए, तो उसे आग में जला देना। (IN)

निर्गमन 12:11 और उसके खाने की यह विधि है; कि कमर बाँधे, पाँव में जूती पहने, और हाथ में लाठी लिए हुए उसे फुर्ती से खाना; वह तो यहोवा का पर्व होगा। (IN)

निर्गमन 12:12 क्योंकि उस रात को मैं मिस्र देश के बीच में से होकर जाऊँगा, और मिस्र देश के क्या मनुष्य क्या पशु, सब के पहलौठों को मारूँगा; और मिस्र के सारे देवताओं को भी मैं दण्ड दूँगा; मैं तो यहोवा हूँ। (IN)

निर्गमन 12:13 और जिन घरों में तुम रहोगे उन पर वह लहू तुम्हारे निमित्त चिन्ह ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुमको छोड़ जाऊँगा, और जब मैं मिस्र देश के लोगों को मारूँगा, तब वह विपत्ति तुम पर न पड़ेगी और तुम नाश न होंगे। (IN)

निर्गमन 12:14 और वह दिन तुमको स्मरण दिलानेवाला ठहरेगा, और तुम उसको यहोवा के लिये पर्व करके मानना; वह दिन तुम्हारी पीढ़ियों में सदा की विधि जानकर पर्व माना जाए। (IN)

निर्गमन 12:15 ¶ “सात दिन तक अख़मीरी रोटी खाया करना, उनमें से पहले ही दिन अपने-अपने घर में से ख़मीर उठा डालना, वरन् जो पहले दिन से लेकर सातवें दिन तक कोई ख़मीरी वस्तु खाए, वह प्राणी इस्राएलियों में से नाश किया जाए। (IN)

निर्गमन 12:16 पहले दिन एक पवित्र सभा, और सातवें दिन भी एक पवित्र सभा करना; उन दोनों दिनों में कोई काम न किया जाए; केवल जिस प्राणी का जो खाना हो उसके काम करने की आज्ञा है। (IN)

निर्गमन 12:17 इसलिए तुम बिना ख़मीर की रोटी का पर्व मानना, क्योंकि उसी दिन मानो मैंने तुमको दल-दल करके मिस्र देश से निकाला है; इस कारण वह दिन तुम्हारी पीढ़ियों में सदा की विधि जानकर माना जाए। (IN)

निर्गमन 12:18 पहले महीने के चौदहवें दिन की सांझ से लेकर इक्कीसवें दिन की सांझ तक तुम अख़मीरी रोटी खाया करना। (IN)

निर्गमन 12:19 सात दिन तक तुम्हारे घरों में कुछ भी ख़मीर न रहे, वरन् जो कोई किसी ख़मीरी वस्तु को खाए, चाहे वह देशी हो चाहे परदेशी, वह प्राणी इस्राएलियों की मण्डली से नाश किया जाए। (IN)

निर्गमन 12:20 कोई ख़मीरी वस्तु न खाना; अपने सब घरों में बिना ख़मीर की रोटी खाया करना।” (IN)

निर्गमन 12:21 ¶ तब मूसा ने इस्राएल के सब पुरनियों को बुलाकर कहा, “तुम अपने-अपने कुल के अनुसार एक-एक मेम्‍ना अलग कर रखो, और फसह का पशु बलि करना। (IN)

निर्गमन 12:22 और उसका लहू जो तसले में होगा उसमें जूफा का एक गुच्छा डुबाकर उसी तसले में के लहू से द्वार के चौखट के सिरे और दोनों ओर पर कुछ लगाना; और भोर तक तुम में से कोई घर से बाहर न निकले। (IN)

निर्गमन 12:23 क्योंकि यहोवा देश के बीच होकर मिस्रियों को मारता जाएगा; इसलिए जहाँ-जहाँ वह चौखट के सिरे, और दोनों ओर पर उस लहू को देखेगा, वहाँ-वहाँ वह उस द्वार को छोड़ जाएगा, और नाश करनेवाले को तुम्हारे घरों में मारने के लिये न जाने देगा। (IN)

निर्गमन 12:24 फिर तुम इस विधि को अपने और अपने वंश के लिये सदा की विधि जानकर माना करो। (IN)

निर्गमन 12:25 जब तुम उस देश में जिसे यहोवा अपने कहने के अनुसार तुमको देगा प्रवेश करो, तब वह काम किया करना। (IN)

निर्गमन 12:26 और जब तुम्हारे लड़के वाले तुम से पूछें, 'इस काम से तुम्हारा क्या मतलब है?' (IN)

निर्गमन 12:27 तब तुम उनको यह उत्तर देना, 'यहोवा ने जो मिस्रियों के मारने के समय मिस्र में रहनेवाले हम इस्राएलियों के घरों को छोड़कर हमारे घरों को बचाया, इसी कारण उसके फसह का यह बलिदान किया जाता है।” तब लोगों ने सिर झुकाकर दण्डवत् किया। (IN)

निर्गमन 12:28 और इस्राएलियों ने जाकर, जो आज्ञा यहोवा ने मूसा और हारून को दी थी, उसी के अनुसार किया। (IN)

निर्गमन 12:29 ¶ ऐसा हुआ कि आधी रात को यहोवा ने मिस्र देश में सिंहासन पर विराजनेवाले फ़िरौन से लेकर गड्ढे में पड़े हुए बँधुए तक सब के पहलौठों को, वरन् पशुओं तक के सब पहलौठों को मार डाला। (IN)

निर्गमन 12:30 और फ़िरौन रात ही को उठ बैठा, और उसके सब कर्मचारी, वरन् सारे मिस्री उठे; और मिस्र में बड़ा हाहाकार मचा, क्योंकि एक भी ऐसा घर न था जिसमें कोई मरा न हो। (IN)

निर्गमन 12:31 तब फ़िरौन ने रात ही रात में मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “तुम इस्राएलियों समेत मेरी प्रजा के बीच से निकल जाओ; और अपने कहने के अनुसार जाकर यहोवा की उपासना करो। (IN)

निर्गमन 12:32 अपने कहने के अनुसार अपनी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों को साथ ले जाओ; और मुझे आशीर्वाद दे जाओ।” (IN)

निर्गमन 12:33 और मिस्री जो कहते थे, 'हम तो सब मर मिटे हैं,' उन्होंने इस्राएली लोगों पर दबाव डालकर कहा, “देश से झटपट निकल जाओ।” (IN)

निर्गमन 12:34 तब उन्होंने अपने गुँधे-गुँधाए आटे को बिना ख़मीर दिए ही कठौतियों समेत कपड़ों में बाँधकर अपने-अपने कंधे पर डाल लिया। (IN)

निर्गमन 12:35 इस्राएलियों ने मूसा के कहने के अनुसार मिस्रियों से सोने-चाँदी के गहने और वस्त्र माँग लिए। (IN)

निर्गमन 12:36 और यहोवा ने मिस्रियों को अपनी प्रजा के लोगों पर ऐसा दयालु किया कि उन्होंने जो-जो माँगा वह सब उनको दिया। इस प्रकार इस्राएलियों ने मिस्रियों को लूट लिया। (IN)

निर्गमन 12:37 ¶ तब इस्राएली रामसेस से कूच करके सुक्कोत को चले, और बाल-बच्चों को छोड़ वे कोई छः लाख पैदल चलने वाले पुरुष थे। (IN)

निर्गमन 12:38 उनके साथ मिली-जुली हुई एक भीड़ गई, और भेड़-बकरी, गाय-बैल, बहुत से पशु भी साथ गए। (IN)

निर्गमन 12:39 और जो गूँधा आटा वे मिस्र से साथ ले गए उसकी उन्होंने बिना ख़मीर दिए रोटियाँ बनाईं; क्योंकि वे मिस्र से ऐसे बरबस निकाले गए, कि उन्हें अवसर भी न मिला की मार्ग में खाने के लिये कुछ पका सके, इसी कारण वह गूँधा हुआ आटा बिना ख़मीर का था। (IN)

निर्गमन 12:40 मिस्र में बसे हुए इस्राएलियों को चार सौ तीस वर्ष बीत गए थे। (IN)

निर्गमन 12:41 और उन चार सौ तीस वर्षों के बीतने पर, ठीक उसी दिन, यहोवा की सारी सेना मिस्र देश से निकल गई। (IN)

निर्गमन 12:42 यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से निकाल लाया, इस कारण वह रात उसके निमित्त मानने के योग्य है; यह यहोवा की वही रात है जिसका पीढ़ी-पीढ़ी में मानना इस्राएलियों के लिये अवश्य है। (IN)

निर्गमन 12:43 ¶ फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “पर्व की विधि यह है; कि कोई परदेशी उसमें से न खाए; (IN)

निर्गमन 12:44 पर जो किसी का मोल लिया हुआ दास हो, और तुम लोगों ने उसका खतना किया हो, वह तो उसमें से खा सकेगा। (IN)

निर्गमन 12:45 पर परदेशी और मजदूर उसमें से न खाएँ। (IN)

निर्गमन 12:46 उसका खाना एक ही घर में हो; अर्थात् तुम उसके माँस में से कुछ घर से बाहर न ले जाना; और बलिपशु की कोई हड्डी न तोड़ना। (IN)

निर्गमन 12:47 पर्व को मानना इस्राएल की सारी मण्डली का कर्त्तव्य है। (IN)

निर्गमन 12:48 और यदि कोई परदेशी तुम लोगों के संग रहकर यहोवा के लिये पर्व को मानना चाहे, तो वह अपने यहाँ के सब पुरुषों का खतना कराए, तब वह समीप आकर उसको माने; और वह देशी मनुष्य के तुल्य ठहरेगा। पर कोई खतनारहित पुरुष उसमें से न खाने पाए। (IN)

निर्गमन 12:49 उसकी व्यवस्था देशी और तुम्हारे बीच में रहनेवाले परदेशी दोनों के लिये एक ही हो।” (IN)

निर्गमन 12:50 यह आज्ञा जो यहोवा ने मूसा और हारून को दी उसके अनुसार सारे इस्राएलियों ने किया। (IN)

निर्गमन 12:51 और ठीक उसी दिन यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से दल-दल करके निकाल ले गया। (IN)

निर्गमन 13:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 13:2 “क्या मनुष्य के क्या पशु के, इस्राएलियों में जितने अपनी-अपनी माँ के पहलौठे हों, उन्हें मेरे लिये पवित्र मानना; वह तो मेरा ही है।” (IN)

निर्गमन 13:3 फिर मूसा ने लोगों से कहा, “इस दिन को स्मरण रखो, जिसमें तुम लोग दासत्व के घर, अर्थात् मिस्र से निकल आए हो; यहोवा तो तुमको वहाँ से अपने हाथ के बल से निकाल लाया; इसमें ख़मीरी रोटी न खाई जाए। (IN)

निर्गमन 13:4 अबीब के महीने में आज के दिन तुम निकले हो। (IN)

निर्गमन 13:5 इसलिए जब यहोवा तुमको कनानी, हित्ती, एमोरी, हिव्वी, और यबूसी लोगों के देश में पहुँचाएगा, जिसे देने की उसने तुम्हारे पुरखाओं से शपथ खाई थी, और जिसमें दूध और मधु की धारा बहती हैं, तब तुम इसी महीने में पर्व करना। (IN)

निर्गमन 13:6 सात दिन तक अख़मीरी रोटी खाया करना, और सातवें दिन यहोवा के लिये पर्व मानना। (IN)

निर्गमन 13:7 इन सातों दिनों में अख़मीरी रोटी खाई जाए; वरन् तुम्हारे देश भर में न ख़मीरी रोटी, न ख़मीर तुम्हारे पास देखने में आए। (IN)

निर्गमन 13:8 और उस दिन तुम अपने-अपने पुत्रों को यह कहकर समझा देना, कि यह तो हम उसी काम के कारण करते हैं, जो यहोवा ने हमारे मिस्र से निकल आने के समय हमारे लिये किया था। (IN)

निर्गमन 13:9 फिर यह तुम्हारे लिये तुम्हारे हाथ में एक चिन्ह होगा, और तुम्हारी आँखों के सामने स्मरण करानेवाली वस्तु ठहरे; जिससे यहोवा की व्यवस्था तुम्हारे मुँह पर रहे क्योंकि यहोवा ने तुम्हें अपने बलवन्त हाथों से मिस्र से निकाला है। (IN)

निर्गमन 13:10 इस कारण तुम इस विधि को प्रति वर्ष नियत समय पर माना करना। (IN)

निर्गमन 13:11 ¶ “फिर जब यहोवा उस शपथ के अनुसार, जो उसने तुम्हारे पुरखाओं से और तुम से भी खाई है, तुम्हें कनानियों के देश में पहुँचाकर उसको तुम्हें दे देगा, (IN)

निर्गमन 13:12 तब तुम में से जितने अपनी-अपनी माँ के जेठे हों उनको, और तुम्हारे पशुओं में जो ऐसे हों उनको भी यहोवा के लिये अर्पण करना; सब नर बच्चे तो यहोवा के हैं। (IN)

निर्गमन 13:13 और गदही के हर एक पहलौठे के बदले मेम्‍ना देकर उसको छुड़ा लेना, और यदि तुम उसे छुड़ाना न चाहो तो उसका गला तोड़ देना। पर अपने सब पहलौठे पुत्रों को बदला देकर छुड़ा लेना। (IN)

निर्गमन 13:14 और आगे के दिनों में जब तुम्हारे पुत्र तुम से पूछें, 'यह क्या है?' तो उनसे कहना, 'यहोवा हम लोगों को दासत्व के घर से, अर्थात् मिस्र देश से अपने हाथों के बल से निकाल लाया है। (IN)

निर्गमन 13:15 उस समय जब फ़िरौन ने कठोर होकर हमको जाने देना न चाहा, तब यहोवा ने मिस्र देश में मनुष्य से लेकर पशु तक सबके पहलौठों को मार डाला। इसी कारण पशुओं में से तो जितने अपनी-अपनी माँ के पहलौठे नर हैं, उन्हें हम यहोवा के लिये बलि करते हैं; पर अपने सब जेठे पुत्रों को हम बदला देकर छुड़ा लेते हैं।' (IN)

निर्गमन 13:16 यह तुम्हारे हाथों पर एक चिन्ह-सा और तुम्हारी भौहों के बीच टीका-सा ठहरे; क्योंकि यहोवा हम लोगों को मिस्र से अपने हाथों के बल से निकाल लाया है।” (IN)

निर्गमन 13:17 ¶ जब फ़िरौन ने लोगों को जाने की आज्ञा दे दी, तब यद्यपि पलिश्तियों के देश में होकर जो मार्ग जाता है वह छोटा था; तो भी परमेश्‍वर यह सोचकर उनको उस मार्ग से नहीं ले गया कि कहीं ऐसा न हो कि जब ये लोग लड़ाई देखें तब पछताकर मिस्र को लौट आएँ। (IN)

निर्गमन 13:18 इसलिए परमेश्‍वर उनको चक्कर खिलाकर लाल समुद्र के जंगल के मार्ग से ले चला। और इस्राएली पाँति बाँधे हुए मिस्र से निकल गए। (IN)

निर्गमन 13:19 और मूसा यूसुफ की हड्डियों को साथ लेता गया; क्योंकि यूसुफ ने इस्राएलियों से यह कहकर, 'परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा,' उनको इस विषय की दृढ़ शपथ खिलाई थी कि वे उसकी हड्डियों को अपने साथ यहाँ से ले जाएँगे। (IN)

निर्गमन 13:20 फिर उन्होंने सुक्कोत से कूच करके जंगल की छोर पर एताम में डेरा किया। (IN)

निर्गमन 13:21 ¶ और यहोवा उन्हें दिन को मार्ग दिखाने के लिये बादल के खम्भे में, और रात को उजियाला देने के लिये आग के खम्भे में होकर उनके आगे-आगे चला करता था, जिससे वे रात और दिन दोनों में चल सके। (IN)

निर्गमन 13:22 उसने न तो बादल के खम्भे को दिन में और न आग के खम्भे को रात में लोगों के आगे से हटाया। (IN)

निर्गमन 14:1 ¶ यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 14:2 “इस्राएलियों को आज्ञा दे, कि वे लौटकर मिग्दोल और समुद्र के बीच पीहहीरोत के सम्मुख, बाल-सपोन के सामने अपने डेरे खड़े करें, उसी के सामने समुद्र के तट पर डेरे खड़े करें। (IN)

निर्गमन 14:3 तब फ़िरौन इस्राएलियों के विषय में सोचेगा, 'वे देश के उलझनों में फंसे हैं और जंगल में घिर गए हैं।' (IN)

निर्गमन 14:4 तब मैं फ़िरौन के मन को कठोर कर दूँगा, और वह उनका पीछा करेगा, तब फ़िरौन और उसकी सारी सेना के द्वारा मेरी महिमा होगी; और मिस्री जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ।” और उन्होंने वैसा ही किया। (IN)

निर्गमन 14:5 जब मिस्र के राजा को यह समाचार मिला कि वे लोग भाग गए, तब फ़िरौन और उसके कर्मचारियों का मन उनके विरुद्ध पलट गया, और वे कहने लगे, “हमने यह क्या किया, कि इस्राएलियों को अपनी सेवकाई से छुटकारा देकर जाने दिया?” (IN)

निर्गमन 14:6 तब उसने अपना रथ तैयार करवाया और अपनी सेना को संग लिया। (IN)

निर्गमन 14:7 उसने छः सौ अच्छे से अच्छे रथ वरन् मिस्र के सब रथ लिए और उन सभी पर सरदार बैठाए। (IN)

निर्गमन 14:8 और यहोवा ने मिस्र के राजा फ़िरौन के मन को कठोर कर दिया। इसलिए उसने इस्राएलियों का पीछा किया; परन्तु इस्राएली तो बेखटके निकले चले जाते थे। (IN)

निर्गमन 14:9 पर फ़िरौन के सब घोड़ों, और रथों, और सवारों समेत मिस्री सेना ने उनका पीछा करके उनके पास, जो पीहहीरोत के पास, बाल-सपोन के सामने, समुद्र के किनारे पर डेरे डालें पड़े थे, जा पहुँची। (IN)

निर्गमन 14:10 जब फ़िरौन निकट आया, तब इस्राएलियों ने आँखें उठाकर क्या देखा, कि मिस्री हमारा पीछा किए चले आ रहे हैं; और इस्राएली अत्यन्त डर गए, और चिल्लाकर यहोवा की दुहाई दी। (IN)

निर्गमन 14:11 और वे मूसा से कहने लगे, “क्या मिस्र में कब्रें न थीं जो तू हमको वहाँ से मरने के लिये जंगल में ले आया है? तूने हम से यह क्या किया कि हमको मिस्र से निकाल लाया? (IN)

निर्गमन 14:12 क्या हम तुझसे मिस्र में यही बात न कहते रहे, कि हमें रहने दे कि हम मिस्रियों की सेवा करें? हमारे लिये जंगल में मरने से मिस्रियों कि सेवा करनी अच्छी थी।” (IN)

निर्गमन 14:13 मूसा ने लोगों से कहा, “डरो मत, खड़े-खड़े वह उद्धार का काम देखो, जो यहोवा आज तुम्हारे लिये करेगा; क्योंकि जिन मिस्रियों को तुम आज देखते हो, उनको फिर कभी न देखोगे। (IN)

निर्गमन 14:14 यहोवा आप ही तुम्हारे लिये लड़ेगा, इसलिए तुम चुपचाप रहो।” (IN)

निर्गमन 14:15 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “तू क्यों मेरी दुहाई दे रहा है? इस्राएलियों को आज्ञा दे कि यहाँ से कूच करें। (IN)

निर्गमन 14:16 और तू अपनी लाठी उठाकर अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा, और वह दो भाग हो जाएगा; तब इस्राएली समुद्र के बीच होकर स्थल ही स्थल पर चले जाएँगे। (IN)

निर्गमन 14:17 और सुन, मैं आप मिस्रियों के मन को कठोर करता हूँ, और वे उनका पीछा करके समुद्र में घुस पड़ेंगे, तब फ़िरौन और उसकी सेना, और रथों, और सवारों के द्वारा मेरी महिमा होगी। (IN)

निर्गमन 14:18 और जब फ़िरौन, और उसके रथों, और सवारों के द्वारा मेरी महिमा होगी, तब मिस्री जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ।” (IN)

निर्गमन 14:19 तब परमेश्‍वर का दूत जो इस्राएली सेना के आगे-आगे चला करता था जाकर उनके पीछे हो गया; और बादल का खम्भा उनके आगे से हटकर उनके पीछे जा ठहरा। (IN)

निर्गमन 14:20 इस प्रकार वह मिस्रियों की सेना और इस्राएलियों की सेना के बीच में आ गया; और बादल और अंधकार तो हुआ, तो भी उससे रात को उन्हें प्रकाश मिलता रहा; और वे रात भर एक दूसरे के पास न आए। (IN)

निर्गमन 14:21 तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया; और यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई, और समुद्र को दो भाग करके जल ऐसा हटा दिया, जिससे कि उसके बीच सूखी भूमि हो गई। (IN)

निर्गमन 14:22 तब इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर होकर चले, और जल उनकी दाहिनी और बाईं ओर दीवार का काम देता था। (IN)

निर्गमन 14:23 तब मिस्री, अर्थात् फ़िरौन के सब घोड़े, रथ, और सवार उनका पीछा किए हुए समुद्र के बीच में चले गए। (IN)

निर्गमन 14:24 और रात के अन्तिम पहर में यहोवा ने बादल और आग के खम्भे में से मिस्रियों की सेना पर दृष्टि करके उन्हें घबरा दिया। (IN)

निर्गमन 14:25 और उसने उनके रथों के पहियों को निकाल डाला, जिससे उनका चलना कठिन हो गया; तब मिस्री आपस में कहने लगे, “आओ, हम इस्राएलियों के सामने से भागें; क्योंकि यहोवा उनकी ओर से मिस्रियों के विरुद्ध युद्ध कर रहा है।” (IN)

निर्गमन 14:26 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा, कि जल मिस्रियों, और उनके रथों, और सवारों पर फिर बहने लगे।” (IN)

निर्गमन 14:27 तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया, और भोर होते-होते क्या हुआ कि समुद्र फिर ज्यों का त्यों अपने बल पर आ गया; और मिस्री उलटे भागने लगे, परन्तु यहोवा ने उनको समुद्र के बीच ही में झटक दिया। (IN)

निर्गमन 14:28 और जल के पलटने से, जितने रथ और सवार इस्राएलियों के पीछे समुद्र में आए थे, वे सब वरन् फ़िरौन की सारी सेना उसमें डूब गई, और उसमें से एक भी न बचा। (IN)

निर्गमन 14:29 परन्तु इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर होकर चले गए, और जल उनकी दाहिनी और बाईं दोनों ओर दीवार का काम देता था। (IN)

निर्गमन 14:30 इस प्रकार यहोवा ने उस दिन इस्राएलियों को मिस्रियों के वश से इस प्रकार छुड़ाया; और इस्राएलियों ने मिस्रियों को समुद्र के तट पर मरे पड़े हुए देखा। (IN)

निर्गमन 14:31 और यहोवा ने मिस्रियों पर जो अपना पराक्रम दिखलाता था, उसको देखकर इस्राएलियों ने यहोवा का भय माना और यहोवा की और उसके दास मूसा की भी प्रतीति की। (IN)

निर्गमन 15:1 ¶ तब मूसा और इस्राएलियों ने यहोवा के लिये यह गीत गाया। उन्होंने कहा, (IN)

निर्गमन 15:2 यहोवा मेरा बल और भजन का विषय है, (IN)

निर्गमन 15:3 यहोवा योद्धा है; (IN)

निर्गमन 15:4 फ़िरौन के रथों और सेना को उसने समुद्र में डाल दिया; (IN)

निर्गमन 15:5 गहरे जल ने उन्हें ढाँप लिया; (IN)

निर्गमन 15:6 हे यहोवा, तेरा दाहिना हाथ शक्ति में महाप्रतापी हुआ हे यहोवा, (IN)

निर्गमन 15:7 तू अपने विरोधियों को अपने महाप्रताप से गिरा देता है; (IN)

निर्गमन 15:8 तेरे नथनों की साँस से जल एकत्र हो गया, धाराएँ ढेर के समान थम गईं; (IN)

निर्गमन 15:9 शत्रु ने कहा था, (IN)

निर्गमन 15:10 तूने अपने श्‍वास का पवन चलाया, तब समुद्र ने उनको ढाँप लिया; (IN)

निर्गमन 15:11 हे यहोवा, देवताओं में तेरे तुल्य कौन है? (IN)

निर्गमन 15:12 तूने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया, (IN)

निर्गमन 15:13 अपनी करुणा से तूने अपनी छुड़ाई हुई प्रजा की अगुआई की है, (IN)

निर्गमन 15:14 देश-देश के लोग सुनकर काँप उठेंगे; (IN)

निर्गमन 15:15 एदोम के अधिपति व्याकुल होंगे; (IN)

निर्गमन 15:16 उनमें डर और घबराहट समा जाएगा; (IN)

निर्गमन 15:17 तू उन्हें पहुँचाकर अपने निज भागवाले पहाड़ पर बसाएगा, यह वही स्थान है, (IN)

निर्गमन 15:18 यहोवा सदा सर्वदा राज्य करता रहेगा।” (IN)

निर्गमन 15:19 ¶ यह गीत गाने का कारण यह है, कि फ़िरौन के घोड़े रथों और सवारों समेत समुद्र के बीच में चले गए, और यहोवा उनके ऊपर समुद्र का जल लौटा ले आया; परन्तु इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर होकर चले गए। (IN)

निर्गमन 15:20 ¶ तब हारून की बहन मिर्याम नाम नबिया ने हाथ में डफ लिया; और सब स्त्रियाँ डफ लिए नाचती हुई उसके पीछे हो लीं। (IN)

निर्गमन 15:21 और मिर्याम उनके साथ यह टेक गाती गई कि: (IN)

निर्गमन 15:22 ¶ तब मूसा इस्राएलियों को लाल समुद्र से आगे ले गया, और वे शूर नामक जंगल में आए; और जंगल में जाते हुए तीन दिन तक पानी का सोता न मिला। (IN)

निर्गमन 15:23 फिर मारा नामक एक स्थान पर पहुँचे, वहाँ का पानी खारा था, उसे वे न पी सके; इस कारण उस स्थान का नाम मारा पड़ा। (IN)

निर्गमन 15:24 तब वे यह कहकर मूसा के विरुद्ध बड़बड़ाने लगे, “हम क्या पीएँ?” (IN)

निर्गमन 15:25 तब मूसा ने यहोवा की दुहाई दी, और यहोवा ने उसे एक पौधा बता दिया, जिसे जब उसने पानी में डाला, तब वह पानी मीठा हो गया। वहीं यहोवा ने उनके लिये एक विधि और नियम बनाया, और वहीं उसने यह कहकर उनकी परीक्षा की, (IN)

निर्गमन 15:26 “यदि तू अपने परमेश्‍वर यहोवा का वचन तन मन से सुने, और जो उसकी दृष्टि में ठीक है वही करे, और उसकी आज्ञाओं पर कान लगाए और उसकी सब विधियों को माने, तो जितने रोग मैंने मिस्रियों पर भेजे हैं उनमें से एक भी तुझ पर न भेजूँगा; क्योंकि मैं तुम्हारा चंगा करनेवाला यहोवा हूँ।” (IN)

निर्गमन 15:27 तब वे एलीम को आए, जहाँ पानी के बारह सोते और सत्तर खजूर के पेड़ थे; और वहाँ उन्होंने जल के पास डेरे खड़े किए। (IN)

निर्गमन 16:1 ¶ फिर एलीम से कूच करके इस्राएलियों की सारी मण्डली, मिस्र देश से निकलने के बाद दूसरे महीने के पंद्रहवे दिन को, सीन नामक जंगल में, जो एलीम और सीनै पर्वत के बीच में है, आ पहुँची। (IN)

निर्गमन 16:2 जंगल में इस्राएलियों की सारी मण्डली मूसा और हारून के विरुद्ध बड़बड़ाने लगे। (IN)

निर्गमन 16:3 और इस्राएली उनसे कहने लगे, “जब हम मिस्र देश में माँस की हाँडियों के पास बैठकर मनमाना भोजन खाते थे, तब यदि हम यहोवा के हाथ से मार डाले भी जाते तो उत्तम वही था; पर तुम हमको इस जंगल में इसलिए निकाल ले आए हो कि इस सारे समाज को भूखा मार डालो।” (IN)

निर्गमन 16:4 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “देखो, मैं तुम लोगों के लिये आकाश से भोजन वस्तु बरसाऊँगा; और ये लोग प्रतिदिन बाहर जाकर प्रतिदिन का भोजन इकट्ठा करेंगे, इससे मैं उनकी परीक्षा करूँगा, कि ये मेरी व्यवस्था पर चलेंगे कि नहीं। (IN)

निर्गमन 16:5 और ऐसा होगा कि छठवें दिन वह भोजन और दिनों से दूना होगा, इसलिए जो कुछ वे उस दिन बटोरें उसे तैयार कर रखें।” (IN)

निर्गमन 16:6 तब मूसा और हारून ने सारे इस्राएलियों से कहा, “सांझ को तुम जान लोगे कि जो तुमको मिस्र देश से निकाल ले आया है वह यहोवा है। (IN)

निर्गमन 16:7 और भोर को तुम्हें यहोवा का तेज देख पड़ेगा, क्योंकि तुम जो यहोवा पर बड़बड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं कि तुम हम पर बड़बड़ाते हो?” (IN)

निर्गमन 16:8 फिर मूसा ने कहा, “यह तब होगा जब यहोवा सांझ को तुम्हें खाने के लिये माँस और भोर को रोटी मनमाने देगा; क्योंकि तुम जो उस पर बड़बड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं? तुम्हारा बुड़बुड़ाना हम पर नहीं यहोवा ही पर होता है।” (IN)

निर्गमन 16:9 फिर मूसा ने हारून से कहा, “इस्राएलियों की सारी मण्डली को आज्ञा दे, कि यहोवा के सामने वरन् उसके समीप आए, क्योंकि उसने उनका बुड़बुड़ाना सुना है।” (IN)

निर्गमन 16:10 और ऐसा हुआ कि जब हारून इस्राएलियों की सारी मण्डली से ऐसी ही बातें कर रहा था, कि उन्होंने जंगल की ओर दृष्टि करके देखा, और उनको यहोवा का तेज बादल में दिखलाई दिया। (IN)

निर्गमन 16:11 तब यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 16:12 “इस्राएलियों का बुड़बुड़ाना मैंने सुना है; उनसे कह दे, कि सूर्यास्त के समय तुम माँस खाओगे और भोर को तुम रोटी से तृप्त हो जाओगे; और तुम यह जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ।” (IN)

निर्गमन 16:13 तब ऐसा हुआ कि सांझ को बटेरें आकर सारी छावनी पर बैठ गईं; और भोर को छावनी के चारों ओर ओस पड़ी। (IN)

निर्गमन 16:14 और जब ओस सूख गई तो वे क्या देखते हैं, कि जंगल की भूमि पर छोटे-छोटे छिलके पाले के किनकों के समान पड़े हैं। (IN)

निर्गमन 16:15 यह देखकर इस्राएली, जो न जानते थे कि यह क्या वस्तु है, वे आपस में कहने लगे यह तो मन्ना है। तब मूसा ने उनसे कहा, “यह तो वही भोजन वस्तु है जिसे यहोवा तुम्हें खाने के लिये देता है। (IN)

निर्गमन 16:16 जो आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है, कि तुम उसमें से अपने-अपने खाने के योग्य बटोरा करना, अर्थात् अपने-अपने प्राणियों की गिनती के अनुसार, प्रति मनुष्य के पीछे एक-एक ओमेर बटोरना; जिसके डेरे में जितने हों वह उन्हीं के लिये बटोरा करे।” (IN)

निर्गमन 16:17 और इस्राएलियों ने वैसा ही किया; और किसी ने अधिक, और किसी ने थोड़ा बटोर लिया। (IN)

निर्गमन 16:18 जब उन्होंने उसको ओमेर से नापा, तब जिसके पास अधिक था उसके कुछ अधिक न रह गया, और जिसके पास थोड़ा था उसको कुछ घटी न हुई; क्योंकि एक-एक मनुष्य ने अपने खाने के योग्य ही बटोर लिया था। (IN)

निर्गमन 16:19 फिर मूसा ने उनसे कहा, “कोई इसमें से कुछ सवेरे तक न रख छोड़े।” (IN)

निर्गमन 16:20 तो भी उन्होंने मूसा की बात न मानी; इसलिए जब किसी-किसी मनुष्य ने उसमें से कुछ सवेरे तक रख छोड़ा, तो उसमें कीड़े पड़ गए और वह बसाने लगा; तब मूसा उन पर क्रोधित हुआ। (IN)

निर्गमन 16:21 वे भोर को प्रतिदिन अपने-अपने खाने के योग्य बटोर लेते थे, और जब धूप कड़ी होती थी, तब वह गल जाता था। (IN)

निर्गमन 16:22 फिर ऐसा हुआ कि छठवें दिन उन्होंने दूना, अर्थात् प्रति मनुष्य के पीछे दो-दो ओमेर बटोर लिया, और मण्डली के सब प्रधानों ने आकर मूसा को बता दिया। (IN)

निर्गमन 16:23 उसने उनसे कहा, “यह तो वही बात है जो यहोवा ने कही, क्योंकि कल पवित्र विश्राम, अर्थात् यहोवा के लिये पवित्र विश्राम होगा; इसलिए तुम्हें जो तंदूर में पकाना हो उसे पकाओ, और जो सिझाना हो उसे सिझाओ, और इसमें से जितना बचे उसे सवेरे के लिये रख छोड़ो। (IN)

निर्गमन 16:24 जब उन्होंने उसको मूसा की इस आज्ञा के अनुसार सवेरे तक रख छोड़ा, तब न तो वह बसाया, और न उसमें कीड़े पड़े। (IN)

निर्गमन 16:25 तब मूसा ने कहा, “आज उसी को खाओ, क्योंकि आज यहोवा का विश्रामदिन है; इसलिए आज तुमको मैदान में न मिलेगा। (IN)

निर्गमन 16:26 छः दिन तो तुम उसे बटोरा करोगे; परन्तु सातवाँ दिन तो विश्राम का दिन है, उसमें वह न मिलेगा।” (IN)

निर्गमन 16:27 तो भी लोगों में से कोई-कोई सातवें दिन भी बटोरने के लिये बाहर गए, परन्तु उनको कुछ न मिला। (IN)

निर्गमन 16:28 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “तुम लोग मेरी आज्ञाओं और व्यवस्था को कब तक नहीं मानोगे? (IN)

निर्गमन 16:29 देखो, यहोवा ने जो तुमको विश्राम का दिन दिया है, इसी कारण वह छठवें दिन को दो दिन का भोजन तुम्हें देता है; इसलिए तुम अपने-अपने यहाँ बैठे रहना, सातवें दिन कोई अपने स्थान से बाहर न जाना।” (IN)

निर्गमन 16:30 अतः लोगों ने सातवें दिन विश्राम किया। (IN)

निर्गमन 16:31 इस्राएल के घराने ने उस वस्तु का नाम मन्ना रखा; और वह धनिया के समान श्वेत था, और उसका स्वाद मधु के बने हुए पूए का सा था। (IN)

निर्गमन 16:32 फिर मूसा ने कहा, “यहोवा ने जो आज्ञा दी वह यह है, कि इसमें से ओमेर भर अपने वंश की पीढ़ी-पीढ़ी के लिये रख छोड़ो, जिससे वे जानें कि यहोवा हमको मिस्र देश से निकालकर जंगल में कैसी रोटी खिलाता था।” (IN)

निर्गमन 16:33 तब मूसा ने हारून से कहा, “एक पात्र लेकर उसमें ओमेर भर लेकर उसे यहोवा के आगे रख दे, कि वह तुम्हारी पीढ़ियों के लिये रखा रहे।” (IN)

निर्गमन 16:34 जैसी आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी, उसी के अनुसार हारून ने उसको साक्षी के सन्दूक के आगे रख दिया, कि वह वहीं रखा रहे। (IN)

निर्गमन 16:35 इस्राएली जब तक बसे हुए देश में न पहुँचे तब तक, अर्थात् चालीस वर्ष तक मन्ना को खाते रहे; वे जब तक कनान देश की सीमा पर नहीं पहुँचे तब तक मन्ना को खाते रहे। (IN)

निर्गमन 16:36 एक ओमेर तो एपा का दसवाँ भाग है। (IN)

निर्गमन 17:1 ¶ फिर इस्राएलियों की सारी मण्डली सीन नामक जंगल से निकल चली, और यहोवा के आज्ञानुसार कूच करके रपीदीम में अपने डेरे खड़े किए; और वहाँ उन लोगों को पीने का पानी न मिला। (IN)

निर्गमन 17:2 इसलिए वे मूसा से वाद-विवाद करके कहने लगे, “हमें पीने का पानी दे।” मूसा ने उनसे कहा, “तुम मुझसे क्यों वाद-विवाद करते हो? और यहोवा की परीक्षा क्यों करते हो?” (IN)

निर्गमन 17:3 फिर वहाँ लोगों को पानी की प्यास लगी तब वे यह कहकर मूसा पर बुड़बुड़ाने लगे, “तू हमें बाल-बच्चों और पशुओं समेत प्यासा मार डालने के लिये मिस्र से क्यों ले आया है?” (IN)

निर्गमन 17:4 तब मूसा ने यहोवा की दुहाई दी, और कहा, “इन लोगों से मैं क्या करूँ? ये सब मुझे पथरवाह करने को तैयार हैं।” (IN)

निर्गमन 17:5 यहोवा ने मूसा से कहा, “इस्राएल के वृद्ध लोगों में से कुछ को अपने साथ ले ले; और जिस लाठी से तूने नील नदी पर मारा था, उसे अपने हाथ में लेकर लोगों के आगे बढ़ चल। (IN)

निर्गमन 17:6 देख मैं तेरे आगे चलकर होरेब पहाड़ की एक चट्टान पर खड़ा रहूँगा; और तू उस चट्टान पर मारना, तब उसमें से पानी निकलेगा जिससे ये लोग पीएँ।” तब मूसा ने इस्राएल के वृद्ध लोगों के देखते वैसा ही किया। (IN)

निर्गमन 17:7 और मूसा ने उस स्थान का नाम मस्सा और मरीबा रखा, क्योंकि इस्राएलियों ने वहाँ वाद-विवाद किया था, और यहोवा की परीक्षा यह कहकर की, “क्या यहोवा हमारे बीच है या नहीं?” (IN)

निर्गमन 17:8 ¶ तब अमालेकी आकर रपीदीम में इस्राएलियों से लड़ने लगे। (IN)

निर्गमन 17:9 तब मूसा ने यहोशू से कहा, “हमारे लिये कई एक पुरुषों को चुनकर छाँट ले, और बाहर जाकर अमालेकियों से लड़; और मैं कल परमेश्‍वर की लाठी हाथ में लिये हुए पहाड़ी की चोटी पर खड़ा रहूँगा।” (IN)

निर्गमन 17:10 मूसा की इस आज्ञा के अनुसार यहोशू अमालेकियों से लड़ने लगा; और मूसा, हारून, और हूर पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए। (IN)

निर्गमन 17:11 और जब तक मूसा अपना हाथ उठाए रहता था तब तक तो इस्राएल प्रबल होता था; परन्तु जब-जब वह उसे नीचे करता तब-तब अमालेक प्रबल होता था। (IN)

निर्गमन 17:12 और जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्थर लेकर मूसा के नीचे रख दिया, और वह उस पर बैठ गया, और हारून और हूर एक-एक ओर में उसके हाथों को सम्भाले रहे; और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्थिर रहे। (IN)

निर्गमन 17:13 और यहोशू ने अनुचरों समेत अमालेकियों को तलवार के बल से हरा दिया। (IN)

निर्गमन 17:14 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “स्मरणार्थ इस बात को पुस्तक में लिख ले और यहोशू को सुना दे कि मैं आकाश के नीचे से अमालेक का स्मरण भी पूरी रीति से मिटा डालूँगा।” (IN)

निर्गमन 17:15 तब मूसा ने एक वेदी बनाकर उसका नाम 'यहोवा निस्सी' रखा; (IN)

निर्गमन 17:16 और कहा, “यहोवा ने शपथ खाई है कि यहोवा अमालेकियों से पीढ़ियों तक लड़ाई करता रहेगा।” (IN)

निर्गमन 18:1 ¶ जब मूसा के ससुर मिद्यान के याजक यित्रो ने यह सुना, कि परमेश्‍वर ने मूसा और अपनी प्रजा इस्राएल के लिये क्या-क्या किया है, अर्थात् यह कि किस रीति से यहोवा इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आया। (IN)

निर्गमन 18:2 तब मूसा के ससुर यित्रो मूसा की पत्‍नी सिप्पोरा को, जो पहले अपने पिता के घर भेज दी गई थी, (IN)

निर्गमन 18:3 और उसके दोनों बेटों को भी ले आया; इनमें से एक का नाम मूसा ने यह कहकर गेर्शोम रखा था, “मैं अन्य देश में परदेशी हुआ हूँ।” (IN)

निर्गमन 18:4 और दूसरे का नाम उसने यह कहकर एलीएजेर रखा, “मेरे पिता के परमेश्‍वर ने मेरा सहायक होकर मुझे फ़िरौन की तलवार से बचाया।” (IN)

निर्गमन 18:5 मूसा की पत्‍नी और पुत्रों को उसका ससुर यित्रो संग लिए मूसा के पास जंगल के उस स्थान में आया, जहाँ परमेश्‍वर के पर्वत के पास उसका डेरा पड़ा था। (IN)

निर्गमन 18:6 और आकर उसने मूसा के पास यह कहला भेजा, “मैं तेरा ससुर यित्रो हूँ, और दोनों बेटों समेत तेरी पत्‍नी को तेरे पास ले आया हूँ।” (IN)

निर्गमन 18:7 तब मूसा अपने ससुर से भेंट करने के लिये निकला, और उसको दण्डवत् करके चूमा; और वे परस्पर कुशलता पूछते हुए डेरे पर आ गए। (IN)

निर्गमन 18:8 वहाँ मूसा ने अपने ससुर से वर्णन किया कि यहोवा ने इस्राएलियों के निमित्त फ़िरौन और मिस्रियों से क्या-क्या किया, और इस्राएलियों ने मार्ग में क्या-क्या कष्ट उठाया, फिर यहोवा उन्हें कैसे-कैसे छुड़ाता आया है। (IN)

निर्गमन 18:9 तब यित्रो ने उस समस्त भलाई के कारण जो यहोवा ने इस्राएलियों के साथ की थी कि उन्हें मिस्रियों के वश से छुड़ाया था, मगन होकर कहा, (IN)

निर्गमन 18:10 “धन्य है यहोवा, जिसने तुमको फ़िरौन और मिस्रियों के वश से छुड़ाया, जिसने तुम लोगों को मिस्रियों की मुट्ठी में से छुड़ाया है। (IN)

निर्गमन 18:11 अब मैंने जान लिया है कि यहोवा सब देवताओं से बड़ा है; वरन् उस विषय में भी जिसमें उन्होंने इस्राएलियों के साथ अहंकारपूर्ण व्यवहार किया था।” (IN)

निर्गमन 18:12 तब मूसा के ससुर यित्रो ने परमेश्‍वर के लिये होमबलि और मेलबलि चढ़ाए, और हारून इस्राएलियों के सब पुरनियों समेत मूसा के ससुर यित्रो के संग परमेश्‍वर के आगे भोजन करने को आया। (IN)

निर्गमन 18:13 ¶ दूसरे दिन मूसा लोगों का न्याय करने को बैठा, और भोर से सांझ तक लोग मूसा के आस-पास खड़े रहे। (IN)

निर्गमन 18:14 यह देखकर कि मूसा लोगों के लिये क्या-क्या करता है, उसके ससुर ने कहा, “यह क्या काम है जो तू लोगों के लिये करता है? क्या कारण है कि तू अकेला बैठा रहता है, और लोग भोर से सांझ तक तेरे आस-पास खड़े रहते हैं?” (IN)

निर्गमन 18:15 मूसा ने अपने ससुर से कहा, “इसका कारण यह है कि लोग मेरे पास परमेश्‍वर से पूछने आते हैं। (IN)

निर्गमन 18:16 जब-जब उनका कोई मुकद्दमा होता है तब-तब वे मेरे पास आते हैं और मैं उनके बीच न्याय करता, और परमेश्‍वर की विधि और व्यवस्था उन्हें समझाता हूँ।” (IN)

निर्गमन 18:17 मूसा के ससुर ने उससे कहा, “जो काम तू करता है वह अच्छा नहीं। (IN)

निर्गमन 18:18 और इससे तू क्या, वरन् ये लोग भी जो तेरे संग हैं निश्चय थक जाएँगे, क्योंकि यह काम तेरे लिये बहुत भारी है; तू इसे अकेला नहीं कर सकता। (IN)

निर्गमन 18:19 इसलिए अब मेरी सुन ले, मैं तुझको सम्मति देता हूँ, और परमेश्‍वर तेरे संग रहे। तू तो इन लोगों के लिये परमेश्‍वर के सम्मुख जाया कर, और इनके मुकद्दमों को परमेश्‍वर के पास तू पहुँचा दिया कर। (IN)

निर्गमन 18:20 इन्हें विधि और व्यवस्था प्रगट कर-करके, जिस मार्ग पर इन्हें चलना, और जो-जो काम इन्हें करना हो, वह इनको समझा दिया कर। (IN)

निर्गमन 18:21 फिर तू इन सब लोगों में से ऐसे पुरुषों को छाँट ले, जो गुणी, और परमेश्‍वर का भय माननेवाले, सच्चे, और अन्याय के लाभ से घृणा करनेवाले हों; और उनको हजार-हजार, सौ-सौ, पचास-पचास, और दस-दस मनुष्यों पर प्रधान नियुक्त कर दे। (IN)

निर्गमन 18:22 और वे सब समय इन लोगों का न्याय किया करें; और सब बड़े-बड़े मुकद्दमों को तो तेरे पास ले आया करें, और छोटे-छोटे मुकद्दमों का न्याय आप ही किया करें; तब तेरा बोझ हलका होगा, क्योंकि इस बोझ को वे भी तेरे साथ उठाएँगे। (IN)

निर्गमन 18:23 यदि तू यह उपाय करे, और परमेश्‍वर तुझको ऐसी आज्ञा दे, तो तू ठहर सकेगा, और ये सब लोग अपने स्थान को कुशल से पहुँच सकेंगे।” (IN)

निर्गमन 18:24 अपने ससुर की यह बात मान कर मूसा ने उसके सब वचनों के अनुसार किया। (IN)

निर्गमन 18:25 अतः उसने सब इस्राएलियों में से गुणी पुरुष चुनकर उन्हें हजार-हजार, सौ-सौ, पचास-पचास, दस-दस, लोगों के ऊपर प्रधान ठहराया। (IN)

निर्गमन 18:26 और वे सब लोगों का न्याय करने लगे; जो मुकद्दमा कठिन होता उसे तो वे मूसा के पास ले आते थे, और सब छोटे मुकद्दमों का न्याय वे आप ही किया करते थे। (IN)

निर्गमन 18:27 तब मूसा ने अपने ससुर को विदा किया, और उसने अपने देश का मार्ग लिया। (IN)

निर्गमन 19:1 ¶ इस्राएलियों को मिस्र देश से निकले हुए जिस दिन तीन महीने बीत चुके, उसी दिन वे सीनै के जंगल में आए। (IN)

निर्गमन 19:2 और जब वे रपीदीम से कूच करके सीनै के जंगल में आए, तब उन्होंने जंगल में डेरे खड़े किए; और वहीं पर्वत के आगे इस्राएलियों ने छावनी डाली। (IN)

निर्गमन 19:3 तब मूसा पर्वत पर परमेश्‍वर के पास चढ़ गया, और यहोवा ने पर्वत पर से उसको पुकारकर कहा, “याकूब के घराने से ऐसा कह, और इस्राएलियों को मेरा यह वचन सुना, (IN)

निर्गमन 19:4 'तुमने देखा है कि मैंने मिस्रियों से क्या-क्या किया; तुमको मानो उकाब पक्षी के पंखों पर चढ़ाकर अपने पास ले आया हूँ। (IN)

निर्गमन 19:5 इसलिए अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; समस्त पृथ्वी तो मेरी है। (IN)

निर्गमन 19:6 और तुम मेरी दृष्टि में याजकों का राज्य और पवित्र जाति ठहरोगे।' जो बातें तुझे इस्राएलियों से कहनी हैं वे ये ही हैं।” (IN)

निर्गमन 19:7 तब मूसा ने आकर लोगों के पुरनियों को बुलवाया, और ये सब बातें, जिनके कहने की आज्ञा यहोवा ने उसे दी थी, उनको समझा दीं। (IN)

निर्गमन 19:8 और सब लोग मिलकर बोल उठे, “जो कुछ यहोवा ने कहा है वह सब हम नित करेंगे।” लोगों की यह बातें मूसा ने यहोवा को सुनाईं। (IN)

निर्गमन 19:9 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “सुन, मैं बादल के अंधियारे में होकर तेरे पास आता हूँ, इसलिए कि जब मैं तुझसे बातें करूँ तब वे लोग सुनें, और सदा तेरा विश्वास करें।” और मूसा ने यहोवा से लोगों की बातों का वर्णन किया। (IN)

निर्गमन 19:10 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “लोगों के पास जा और उन्हें आज और कल पवित्र करना, और वे अपने वस्त्र धो लें, (IN)

निर्गमन 19:11 और वे तीसरे दिन तक तैयार हो जाएँ; क्योंकि तीसरे दिन यहोवा सब लोगों के देखते सीनै पर्वत पर उतर आएगा। (IN)

निर्गमन 19:12 और तू लोगों के लिये चारों ओर बाड़ा बाँध देना, और उनसे कहना, 'तुम सचेत रहो कि पर्वत पर न चढ़ो और उसकी सीमा को भी न छूओ; और जो कोई पहाड़ को छूए वह निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 19:13 उसको कोई हाथ से न छूए, जो छूए उस पर पथराव किया जाए, या उसे तीर से छेदा जाए; चाहे पशु हो चाहे मनुष्य, वह जीवित न बचे।' जब महाशब्द वाले नरसिंगे का शब्द देर तक सुनाई दे, तब लोग पर्वत के पास आएँ।” (IN)

निर्गमन 19:14 तब मूसा ने पर्वत पर से उतरकर लोगों के पास आकर उनको पवित्र कराया; और उन्होंने अपने वस्त्र धो लिए। (IN)

निर्गमन 19:15 और उसने लोगों से कहा, “तीसरे दिन तक तैयार हो जाओ; स्त्री के पास न जाना।” (IN)

निर्गमन 19:16 जब तीसरा दिन आया तब भोर होते बादल गरजने और बिजली चमकने लगी, और पर्वत पर काली घटा छा गई, फिर नरसिंगे का शब्द बड़ा भारी हुआ, और छावनी में जितने लोग थे सब काँप उठे। (IN)

निर्गमन 19:17 तब मूसा लोगों को परमेश्‍वर से भेंट करने के लिये छावनी से निकाल ले गया; और वे पर्वत के नीचे खड़े हुए। (IN)

निर्गमन 19:18 और यहोवा जो आग में होकर सीनै पर्वत पर उतरा था, इस कारण समस्त पर्वत धुएँ से भर गया; और उसका धुआँ भट्ठे का सा उठ रहा था, और समस्त पर्वत बहुत काँप रहा था। (IN)

निर्गमन 19:19 फिर जब नरसिंगे का शब्द बढ़ता और बहुत भारी होता गया, तब मूसा बोला, और परमेश्‍वर ने वाणी सुनाकर उसको उत्तर दिया। (IN)

निर्गमन 19:20 और यहोवा सीनै पर्वत की चोटी पर उतरा; और मूसा को पर्वत की चोटी पर बुलाया और मूसा ऊपर चढ़ गया। (IN)

निर्गमन 19:21 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “नीचे उतरके लोगों को चेतावनी दे, कहीं ऐसा न हो कि वे बाड़ा तोड़कर यहोवा के पास देखने को घुसें, और उनमें से बहुत नाश हो जाएँ। (IN)

निर्गमन 19:22 और याजक जो यहोवा के समीप आया करते हैं वे भी अपने को पवित्र करें, कहीं ऐसा न हो कि यहोवा उन पर टूट पड़े।” (IN)

निर्गमन 19:23 मूसा ने यहोवा से कहा, “वे लोग सीनै पर्वत पर नहीं चढ़ सकते; तूने तो आप हमको यह कहकर चिताया कि पर्वत के चारों और बाड़ा बाँधकर उसे पवित्र रखो।” (IN)

निर्गमन 19:24 यहोवा ने उससे कहा, “उतर तो जा, और हारून समेत तू ऊपर आ; परन्तु याजक और साधारण लोग कहीं यहोवा के पास बाड़ा तोड़कर न चढ़ आएँ, कहीं ऐसा न हो कि वह उन पर टूट पड़े।” (IN)

निर्गमन 19:25 अतः ये बातें मूसा ने लोगों के पास उतरकर उनको सुनाईं। (IN)

निर्गमन 20:1 ¶ तब परमेश्‍वर ने ये सब वचन कहे, (IN)

निर्गमन 20:2 “मैं तेरा परमेश्‍वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है। (IN)

निर्गमन 20:3 “तू मुझे छोड़ दूसरों को परमेश्‍वर करके न मानना। (IN)

निर्गमन 20:4 “तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, या पृथ्वी पर, या पृथ्वी के जल में है। (IN)

निर्गमन 20:5 तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्‍वर यहोवा जलन रखने वाला परमेश्‍वर हूँ, और जो मुझसे बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ, (IN)

निर्गमन 20:6 और जो मुझसे प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारों पर करुणा किया करता हूँ। (IN)

निर्गमन 20:7 “तू अपने परमेश्‍वर का नाम व्यर्थ न लेना; क्योंकि जो यहोवा का नाम व्यर्थ ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा। (IN)

निर्गमन 20:8 “तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना। (IN)

निर्गमन 20:9 छः दिन तो तू परिश्रम करके अपना सब काम-काज करना; (IN)

निर्गमन 20:10 परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्‍वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें न तो तू किसी भाँति का काम-काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो। (IN)

निर्गमन 20:11 क्योंकि छः दिन में यहोवा ने आकाश और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें है, सबको बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया। (IN)

निर्गमन 20:12 “तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे जो देश तेरा परमेश्‍वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहने पाए। (IN)

निर्गमन 20:13 “तू खून न करना। (IN)

निर्गमन 20:14 “तू व्यभिचार न करना। (IN)

निर्गमन 20:15 “तू चोरी न करना। (IN)

निर्गमन 20:16 “तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना। (IN)

निर्गमन 20:17 “तू किसी के घर का लालच न करना; न तो किसी की स्त्री का लालच करना, और न किसी के दास-दासी, या बैल गदहे का, न किसी की किसी वस्तु का लालच करना।” (IN)

निर्गमन 20:18 ¶ और सब लोग गरजने और बिजली और नरसिंगे के शब्द सुनते, और धुआँ उठते हुए पर्वत को देखते रहे, और देखके, काँपकर दूर खड़े हो गए; (IN)

निर्गमन 20:19 और वे मूसा से कहने लगे, “तू ही हम से बातें कर, तब तो हम सुन सकेंगे; परन्तु परमेश्‍वर हम से बातें न करे, ऐसा न हो कि हम मर जाएँ।” (IN)

निर्गमन 20:20 मूसा ने लोगों से कहा, “डरो मत; क्योंकि परमेश्‍वर इस निमित्त आया है कि तुम्हारी परीक्षा करे, और उसका भय तुम्हारे मन में बना रहे, कि तुम पाप न करो।” (IN)

निर्गमन 20:21 और वे लोग तो दूर ही खड़े रहे, परन्तु मूसा उस घोर अंधकार के समीप गया जहाँ परमेश्‍वर था। (IN)

निर्गमन 20:22 ¶ तब यहोवा ने मूसा से कहा, “तू इस्राएलियों को मेरे ये वचन सुना, कि तुम लोगों ने तो आप ही देखा है कि मैंने तुम्हारे साथ आकाश से बातें की हैं। (IN)

निर्गमन 20:23 तुम मेरे साथ किसी को सम्मिलित न करना, अर्थात् अपने लिये चाँदी या सोने से देवताओं को न गढ़ लेना। (IN)

निर्गमन 20:24 मेरे लिये मिट्टी की एक वेदी बनाना, और अपनी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के होमबलि और मेलबलि को उस पर चढ़ाना; जहाँ-जहाँ मैं अपने नाम का स्मरण कराऊँ वहाँ-वहाँ मैं आकर तुम्हें आशीष दूँगा। (IN)

निर्गमन 20:25 और यदि तुम मेरे लिये पत्थरों की वेदी बनाओ, तो तराशे हुए पत्थरों से न बनाना; क्योंकि जहाँ तुमने उस पर अपना हथियार लगाया वहाँ तू उसे अशुद्ध कर देगा। (IN)

निर्गमन 20:26 और मेरी वेदी पर सीढ़ी से कभी न चढ़ना, कहीं ऐसा न हो कि तेरा तन उस पर नंगा देख पड़े। (IN)

निर्गमन 21:1 ¶ फिर जो नियम तुझे उनको समझाने हैं वे ये हैं। (IN)

निर्गमन 21:2 “जब तुम कोई इब्री दास मोल लो, तब वह छः वर्ष तक सेवा करता रहे, और सातवें वर्ष स्वतंत्र होकर सेंत-मेंत चला जाए। (IN)

निर्गमन 21:3 यदि वह अकेला आया हो, तो अकेला ही चला जाए; और यदि पत्‍नी सहित आया हो, तो उसके साथ उसकी पत्‍नी भी चली जाए। (IN)

निर्गमन 21:4 यदि उसके स्वामी ने उसको पत्‍नी दी हो और उससे उसके बेटे या बेटियाँ उत्‍पन्‍न हुई हों, तो उसकी पत्‍नी और बालक उस स्वामी के ही रहें, और वह अकेला चला जाए। (IN)

निर्गमन 21:5 परन्तु यदि वह दास दृढ़ता से कहे, 'मैं अपने स्वामी, और अपनी पत्‍नी, और बालकों से प्रेम रखता हूँ; इसलिए मैं स्वतंत्र होकर न चला जाऊँगा;' (IN)

निर्गमन 21:6 तो उसका स्वामी उसको परमेश्‍वर के पास ले चले; फिर उसको द्वार के किवाड़ या बाजू के पास ले जाकर उसके कान में सुतारी से छेद करें; तब वह सदा उसकी सेवा करता रहे। (IN)

निर्गमन 21:7 “यदि कोई अपनी बेटी को दासी होने के लिये बेच डालें, तो वह दासी के समान बाहर न जाए। (IN)

निर्गमन 21:8 यदि उसका स्वामी उसको अपनी पत्‍नी बनाए, और फिर उससे प्रसन्‍न न रहे, तो वह उसे दाम से छुड़ाई जाने दे; उसका विश्वासघात करने के बाद उसे विदेशी लोगों के हाथ बेचने का उसको अधिकार न होगा। (IN)

निर्गमन 21:9 यदि उसने उसे अपने बेटे को ब्याह दिया हो, तो उससे बेटी का सा व्यवहार करे। (IN)

निर्गमन 21:10 चाहे वह दूसरी पत्‍नी कर ले, तो भी वह उसका भोजन, वस्त्र, और संगति न घटाए। (IN)

निर्गमन 21:11 और यदि वह इन तीन बातों में घटी करे, तो वह स्त्री सेंत-मेंत बिना दाम चुकाए ही चली जाए। (IN)

निर्गमन 21:12 ¶ “जो किसी मनुष्य को ऐसा मारे कि वह मर जाए, तो वह भी निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 21:13 यदि वह उसकी घात में न बैठा हो, और परमेश्‍वर की इच्छा ही से वह उसके हाथ में पड़ गया हो, तो ऐसे मारनेवाले के भागने के निमित्त मैं एक स्थान ठहराऊँगा जहाँ वह भाग जाए। (IN)

निर्गमन 21:14 परन्तु यदि कोई ढिठाई से किसी पर चढ़ाई करके उसे छल से घात करे, तो उसको मार डालने के लिये मेरी वेदी के पास से भी अलग ले जाना। (IN)

निर्गमन 21:15 “जो अपने पिता या माता को मारे-पीटे वह निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 21:16 “जो किसी मनुष्य को चुराए, चाहे उसे ले जाकर बेच डाले, चाहे वह उसके पास पाया जाए, तो वह भी निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 21:17 “जो अपने पिता या माता को श्राप दे वह भी निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 21:18 “यदि मनुष्य झगड़ते हों, और एक दूसरे को पत्थर या मुक्के से ऐसा मारे कि वह मरे नहीं परन्तु बिछौने पर पड़ा रहे, (IN)

निर्गमन 21:19 तो जब वह उठकर लाठी के सहारे से बाहर चलने फिरने लगे, तब वह मारनेवाला निर्दोष ठहरे; उस दशा में वह उसके पड़े रहने के समय की हानि भर दे, और उसको भला चंगा भी करा दे। (IN)

निर्गमन 21:20 “यदि कोई अपने दास या दासी को सोंटे से ऐसा मारे कि वह उसके मारने से मर जाए, तब तो उसको निश्चय दण्ड दिया जाए। (IN)

निर्गमन 21:21 परन्तु यदि वह दो एक दिन जीवित रहे, तो उसके स्वामी को दण्ड न दिया जाए; क्योंकि वह दास उसका धन है। (IN)

निर्गमन 21:22 “यदि मनुष्य आपस में मार पीट करके किसी गर्भिणी स्त्री को ऐसी चोट पहुँचाए, कि उसका गर्भ गिर जाए, परन्तु और कुछ हानि न हो, तो मारनेवाले से उतना दण्ड लिया जाए जितना उस स्त्री का पति पंच की सम्मति से ठहराए। (IN)

निर्गमन 21:23 परन्तु यदि उसको और कुछ हानि पहुँचे, तो प्राण के बदले प्राण का, (IN)

निर्गमन 21:24 और आँख के बदले आँख का, और दाँत के बदले दाँत का, और हाथ के बदले हाथ का, और पाँव के बदले पाँव का, (IN)

निर्गमन 21:25 और दाग के बदले दाग का, और घाव के बदले घाव का, और मार के बदले मार का दण्ड हो। (IN)

निर्गमन 21:26 “जब कोई अपने दास या दासी की आँख पर ऐसा मारे कि फूट जाए, तो वह उसकी आँख के बदले उसे स्वतंत्र करके जाने दे। (IN)

निर्गमन 21:27 और यदि वह अपने दास या दासी को मारकर उसका दाँत तोड़ डाले, तो वह उसके दाँत के बदले उसे स्वतंत्र करके जाने दे। (IN)

निर्गमन 21:28 ¶ “यदि बैल किसी पुरुष या स्त्री को ऐसा सींग मारे कि वह मर जाए, तो वह बैल तो निश्चय पथरवाह करके मार डाला जाए, और उसका माँस खाया न जाए; परन्तु बैल का स्वामी निर्दोष ठहरे। (IN)

निर्गमन 21:29 परन्तु यदि उस बैल की पहले से सींग मारने की आदत पड़ी हो, और उसके स्वामी ने जताए जाने पर भी उसको न बाँध रखा हो, और वह किसी पुरुष या स्त्री को मार डाले, तब तो वह बैल पथरवाह किया जाए, और उसका स्वामी भी मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 21:30 यदि उस पर छुड़ौती ठहराई जाए, तो प्राण छुड़ाने को जो कुछ उसके लिये ठहराया जाए उसे उतना ही देना पड़ेगा। (IN)

निर्गमन 21:31 चाहे बैल ने किसी बेटे को, चाहे बेटी को मारा हो, तो भी इसी नियम के अनुसार उसके स्वामी के साथ व्यवहार किया जाए। (IN)

निर्गमन 21:32 यदि बैल ने किसी दास या दासी को सींग मारा हो, तो बैल का स्वामी उस दास के स्वामी को तीस शेकेल रूपा दे, और वह बैल पथरवाह किया जाए। (IN)

निर्गमन 21:33 “यदि कोई मनुष्य गड्ढा खोलकर या खोदकर उसको न ढाँपे, और उसमें किसी का बैल या गदहा गिर पड़े, (IN)

निर्गमन 21:34 तो जिसका वह गड्ढा हो वह उस हानि को भर दे; वह पशु के स्वामी को उसका मोल दे, और लोथ गड्ढेवाले की ठहरे। (IN)

निर्गमन 21:35 “यदि किसी का बैल किसी दूसरे के बैल को ऐसी चोट लगाए, कि वह मर जाए, तो वे दोनों मनुष्य जीवित बैल को बेचकर उसका मोल आपस में आधा-आधा बाँट लें; और लोथ को भी वैसा ही बाँटें। (IN)

निर्गमन 21:36 यदि यह प्रगट हो कि उस बैल की पहले से सींग मारने की आदत पड़ी थी, पर उसके स्वामी ने उसे बाँध नहीं रखा, तो निश्चय यह बैल के बदले बैल भर दे, पर लोथ उसी की ठहरे। (IN)

निर्गमन 22:1 ¶ “यदि कोई मनुष्य बैल, या भेड़, या बकरी चुराकर उसका घात करे या बेच डाले, तो वह बैल के बदले पाँच बैल, और भेड़-बकरी के बदले चार भेड़-बकरी भर दे। (IN)

निर्गमन 22:2 यदि चोर सेंध लगाते हुए पकड़ा जाए, और उस पर ऐसी मार पड़े कि वह मर जाए, तो उसके खून का दोष न लगे; (IN)

निर्गमन 22:3 यदि सूर्य निकल चुके, तो उसके खून का दोष लगे; अवश्य है कि वह हानि को भर दे, और यदि उसके पास कुछ न हो, तो वह चोरी के कारण बेच दिया जाए। (IN)

निर्गमन 22:4 यदि चुराया हुआ बैल, या गदहा, या भेड़ या बकरी उसके हाथ में जीवित पाई जाए, तो वह उसका दूना भर दे। (IN)

निर्गमन 22:5 ¶ “यदि कोई अपने पशु से किसी का खेत या दाख की बारी चराए, अर्थात् अपने पशु को ऐसा छोड़ दे कि वह पराए खेत को चर ले, तो वह अपने खेत की और अपनी दाख की बारी की उत्तम से उत्तम उपज में से उस हानि को भर दे। (IN)

निर्गमन 22:6 “यदि कोई आग जलाए, और वह काँटों में लग जाए और फूलों के ढेर या अनाज या खड़ा खेत जल जाए, तो जिसने आग जलाई हो वह हानि को निश्चय भर दे। (IN)

निर्गमन 22:7 ¶ “यदि कोई दूसरे को रुपये या सामग्री की धरोहर धरे, और वह उसके घर से चुराई जाए, तो यदि चोर पकड़ा जाए, तो दूना उसी को भर देना पड़ेगा। (IN)

निर्गमन 22:8 और यदि चोर न पकड़ा जाए, तो घर का स्वामी परमेश्‍वर के पास लाया जाए कि निश्चय हो जाए कि उसने अपने भाई-बन्धु की सम्पत्ति पर हाथ लगाया है या नहीं। (IN)

निर्गमन 22:9 चाहे बैल, चाहे गदहे, चाहे भेड़ या बकरी, चाहे वस्त्र, चाहे किसी प्रकार की ऐसी खोई हुई वस्तु के विषय अपराध क्यों न लगाया जाए, जिसे दो जन अपनी-अपनी कहते हों, तो दोनों का मुकद्दमा परमेश्‍वर के पास आए; और जिसको परमेश्‍वर दोषी ठहराए वह दूसरे को दूना भर दे। (IN)

निर्गमन 22:10 “यदि कोई दूसरे को गदहा या बैल या भेड़-बकरी या कोई और पशु रखने के लिये सौंपे, और किसी के बिना देखे वह मर जाए, या चोट खाए, या हाँक दिया जाए, (IN)

निर्गमन 22:11 तो उन दोनों के बीच यहोवा की शपथ खिलाई जाए, 'मैंने इसकी सम्पत्ति पर हाथ नहीं लगाया;' तब सम्पत्ति का स्वामी इसको सच माने, और दूसरे को उसे कुछ भी भर देना न होगा। (IN)

निर्गमन 22:12 यदि वह सचमुच उसके यहाँ से चुराया गया हो, तो वह उसके स्वामी को उसे भर दे। (IN)

निर्गमन 22:13 और यदि वह फाड़ डाला गया हो, तो वह फाड़े हुए को प्रमाण के लिये ले आए, तब उसे उसको भी भर देना न पड़ेगा। (IN)

निर्गमन 22:14 “फिर यदि कोई दूसरे से पशु माँग लाए, और उसके स्वामी के संग न रहते उसको चोट लगे या वह मर जाए, तो वह निश्चय उसकी हानि भर दे। (IN)

निर्गमन 22:15 यदि उसका स्वामी संग हो, तो दूसरे को उसकी हानि भरना न पड़े; और यदि वह भाड़े का हो तो उसकी हानि उसके भाड़े में आ गई। (IN)

निर्गमन 22:16 ¶ “यदि कोई पुरुष किसी कन्या को जिसके ब्याह की बात न लगी हो फुसलाकर उसके संग कुकर्म करे, तो वह निश्चय उसका मोल देकर उसे ब्याह ले। (IN)

निर्गमन 22:17 परन्तु यदि उसका पिता उसे देने को बिल्कुल इन्कार करे, तो कुकर्म करनेवाला कन्याओं के मोल की रीति के अनुसार रुपये तौल दे। (IN)

निर्गमन 22:18 “तू जादू-टोना करनेवाली को जीवित रहने न देना। (IN)

निर्गमन 22:19 “जो कोई पशुगमन करे वह निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 22:20 “जो कोई यहोवा को छोड़ किसी और देवता के लिये बलि करे वह सत्यानाश किया जाए। (IN)

निर्गमन 22:21 “तुम परदेशी को न सताना और न उस पर अंधेर करना क्योंकि मिस्र देश में तुम भी परदेशी थे। (IN)

निर्गमन 22:22 किसी विधवा या अनाथ बालक को दुःख न देना। (IN)

निर्गमन 22:23 यदि तुम ऐसों को किसी प्रकार का दुःख दो, और वे कुछ भी मेरी दुहाई दें, तो मैं निश्चय उनकी दुहाई सुनूँगा; (IN)

निर्गमन 22:24 तब मेरा क्रोध भड़केगा, और मैं तुमको तलवार से मरवाऊँगा, और तुम्हारी पत्नियाँ विधवा और तुम्हारे बालक अनाथ हो जाएँगे। (IN)

निर्गमन 22:25 “यदि तू मेरी प्रजा में से किसी दीन को जो तेरे पास रहता हो रुपये का ऋण दे, तो उससे महाजन के समान ब्याज न लेना। (IN)

निर्गमन 22:26 यदि तू कभी अपने भाई-बन्धु के वस्त्र को बन्धक करके रख भी ले, तो सूर्य के अस्त होने तक उसको लौटा देना; (IN)

निर्गमन 22:27 क्योंकि वह उसका एक ही ओढ़ना है, उसकी देह का वही अकेला वस्त्र होगा; फिर वह किसे ओढ़कर सोएगा? और जब वह मेरी दुहाई देगा तब मैं उसकी सुनूँगा, क्योंकि मैं तो करुणामय हूँ। (IN)

निर्गमन 22:28 “परमेश्‍वर को श्राप न देना, और न अपने लोगों के प्रधान को श्राप देना। (IN)

निर्गमन 22:29 “अपने खेतों की उपज और फलों के रस में से कुछ मुझे देने में विलम्ब न करना। अपने बेटों में से पहलौठे को मुझे देना। (IN)

निर्गमन 22:30 वैसे ही अपनी गायों और भेड़-बकरियों के पहलौठे भी देना; सात दिन तक तो बच्चा अपनी माता के संग रहे, और आठवें दिन तू उसे मुझे दे देना। (IN)

निर्गमन 22:31 “तुम मेरे लिये पवित्र मनुष्य बनना; इस कारण जो पशु मैदान में फाड़ा हुआ पड़ा मिले उसका माँस न खाना, उसको कुत्तों के आगे फेंक देना। (IN)

निर्गमन 23:1 ¶ “झूठी बात न फैलाना। अन्यायी साक्षी होकर दुष्ट का साथ न देना। (IN)

निर्गमन 23:2 बुराई करने के लिये न तो बहुतों के पीछे हो लेना; और न उनके पीछे फिरकर मुकदमें में न्याय बिगाड़ने को साक्षी देना; (IN)

निर्गमन 23:3 और कंगाल के मुकदमें में उसका भी पक्ष न करना। (IN)

निर्गमन 23:4 “यदि तेरे शत्रु का बैल या गदहा भटकता हुआ तुझे मिले, तो उसे उसके पास अवश्य फेर ले आना। (IN)

निर्गमन 23:5 फिर यदि तू अपने बैरी के गदहे को बोझ के मारे दबा हुआ देखे, तो चाहे उसको उसके स्वामी के लिये छुड़ाने के लिये तेरा मन न चाहे, तो भी अवश्य स्वामी का साथ देकर उसे छुड़ा लेना। (IN)

निर्गमन 23:6 “तेरे लोगों में से जो दरिद्र हों उसके मुकदमें में न्याय न बिगाड़ना। (IN)

निर्गमन 23:7 झूठे मुकदमें से दूर रहना, और निर्दोष और धर्मी को घात न करना, क्योंकि मैं दुष्ट को निर्दोष न ठहराऊँगा। (IN)

निर्गमन 23:8 घूस न लेना, क्योंकि घूस देखनेवालों को भी अंधेर कर देता, और धर्मियों की बातें पलट देता है। (IN)

निर्गमन 23:9 “परदेशी पर अंधेर न करना; तुम तो परदेशी के मन की बातें जानते हो, क्योंकि तुम भी मिस्र देश में परदेशी थे। (IN)

निर्गमन 23:10 ¶ “छः वर्ष तो अपनी भूमि में बोना और उसकी उपज इकट्ठी करना; (IN)

निर्गमन 23:11 परन्तु सातवें वर्ष में उसको पड़ती रहने देना और वैसा ही छोड़ देना, तो तेरे भाई-बन्धुओं में के दरिद्र लोग उससे खाने पाएँ, और जो कुछ उनसे भी बचे वह जंगली पशुओं के खाने के काम में आए। और अपनी दाख और जैतून की बारियों को भी ऐसे ही करना। (IN)

निर्गमन 23:12 छः दिन तक तो अपना काम-काज करना, और सातवें दिन विश्राम करना; कि तेरे बैल और गदहे सुस्ताएँ, और तेरी दासियों के बेटे और परदेशी भी अपना जी ठण्डा कर सके। (IN)

निर्गमन 23:13 और जो कुछ मैंने तुम से कहा है उसमें सावधान रहना; और दूसरे देवताओं के नाम की चर्चा न करना, वरन् वे तुम्हारे मुँह से सुनाई भी न दें। (IN)

निर्गमन 23:14 ¶ “प्रति वर्ष तीन बार मेरे लिये पर्व मानना। (IN)

निर्गमन 23:15 अख़मीरी रोटी का पर्व मानना; उसमें मेरी आज्ञा के अनुसार अबीब महीने के नियत समय पर सात दिन तक अख़मीरी रोटी खाया करना, क्योंकि उसी महीने में तुम मिस्र से निकल आए। और मुझको कोई खाली हाथ अपना मुँह न दिखाए। (IN)

निर्गमन 23:16 और जब तेरी बोई हुई खेती की पहली उपज तैयार हो, तब कटनी का पर्व मानना। और वर्ष के अन्त में जब तू परिश्रम के फल बटोर कर ढेर लगाए, तब बटोरन का पर्व मानना। (IN)

निर्गमन 23:17 प्रति वर्ष तीनों बार तेरे सब पुरुष प्रभु यहोवा को अपना मुँह दिखाएँ। (IN)

निर्गमन 23:18 “मेरे बलिपशु का लहू ख़मीरी रोटी के संग न चढ़ाना, और न मेरे पर्व के उत्तम बलिदान में से कुछ सवेरे तक रहने देना। (IN)

निर्गमन 23:19 अपनी भूमि की पहली उपज का पहला भाग अपने परमेश्‍वर यहोवा के भवन में ले आना। बकरी का बच्चा उसकी माता के दूध में न पकाना। (IN)

निर्गमन 23:20 ¶ “सुन, मैं एक दूत तेरे आगे-आगे भेजता हूँ जो मार्ग में तेरी रक्षा करेगा, और जिस स्थान को मैंने तैयार किया है उसमें तुझे पहुँचाएगा। (IN)

निर्गमन 23:21 उसके सामने सावधान रहना, और उसकी मानना, उसका विरोध न करना, क्योंकि वह तुम्हारा अपराध क्षमा न करेगा; इसलिए कि उसमें मेरा नाम रहता है। (IN)

निर्गमन 23:22 और यदि तू सचमुच उसकी माने और जो कुछ मैं कहूँ वह करे, तो मैं तेरे शत्रुओं का शत्रु और तेरे द्रोहियों का द्रोही बनूँगा। (IN)

निर्गमन 23:23 इस रीति मेरा दूत तेरे आगे-आगे चलकर तुझे एमोरी, हित्ती, परिज्जी, कनानी, हिव्वी, और यबूसी लोगों के यहाँ पहुँचाएगा, और मैं उनको सत्यानाश कर डालूँगा। (IN)

निर्गमन 23:24 उनके देवताओं को दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना, और न उनके से काम करना, वरन् उन मूरतों को पूरी रीति से सत्यानाश कर डालना, और उन लोगों की लाटों के टुकड़े-टुकड़े कर देना। (IN)

निर्गमन 23:25 तुम अपने परमेश्‍वर यहोवा की उपासना करना, तब वह तेरे अन्न जल पर आशीष देगा, और तेरे बीच में से रोग दूर करेगा। (IN)

निर्गमन 23:26 तेरे देश में न तो किसी का गर्भ गिरेगा और न कोई बाँझ होगी; और तेरी आयु मैं पूरी करूँगा। (IN)

निर्गमन 23:27 जितने लोगों के बीच तू जाएगा उन सभी के मन में मैं अपना भय पहले से ऐसा समवा दूँगा कि उनको व्याकुल कर दूँगा, और मैं तुझे सब शत्रुओं की पीठ दिखाऊँगा। (IN)

निर्गमन 23:28 और मैं तुझसे पहले बर्रों को भेजूँगा जो हिव्वी, कनानी, और हित्ती लोगों को तेरे सामने से भगाकर दूर कर देंगी। (IN)

निर्गमन 23:29 मैं उनको तेरे आगे से एक ही वर्ष में तो न निकाल दूँगा, ऐसा न हो कि देश उजाड़ हो जाए, और जंगली पशु बढ़कर तुझे दुःख देने लगें। (IN)

निर्गमन 23:30 जब तक तू फूल-फलकर देश को अपने अधिकार में न कर ले तब तक मैं उन्हें तेरे आगे से थोड़ा-थोड़ा करके निकालता रहूँगा। (IN)

निर्गमन 23:31 मैं लाल समुद्र से लेकर पलिश्तियों के समुद्र तक और जंगल से लेकर फरात तक के देश को तेरे वश में कर दूँगा; मैं उस देश के निवासियों को भी तेरे वश में कर दूँगा, और तू उन्हें अपने सामने से बरबस निकालेगा। (IN)

निर्गमन 23:32 तू न तो उनसे वाचा बाँधना और न उनके देवताओं से। (IN)

निर्गमन 23:33 वे तेरे देश में रहने न पाएँ, ऐसा न हो कि वे तुझसे मेरे विरुद्ध पाप कराएँ; क्योंकि यदि तू उनके देवताओं की उपासना करे, तो यह तेरे लिये फंदा बनेगा।” (IN)

निर्गमन 24:1 ¶ फिर उसने मूसा से कहा, “तू, हारून, नादाब, अबीहू, और इस्राएलियों के सत्तर पुरनियों समेत यहोवा के पास ऊपर आकर दूर से दण्डवत् करना। (IN)

निर्गमन 24:2 और केवल मूसा यहोवा के समीप आए; परन्तु वे समीप न आएँ, और दूसरे लोग उसके संग ऊपर न आएँ।” (IN)

निर्गमन 24:3 तब मूसा ने लोगों के पास जाकर यहोवा की सब बातें और सब नियम सुना दिए; तब सब लोग एक स्वर से बोल उठे, “जितनी बातें यहोवा ने कही हैं उन सब बातों को हम मानेंगे।” (IN)

निर्गमन 24:4 तब मूसा ने यहोवा के सब वचन लिख दिए। और सवेरे उठकर पर्वत के नीचे एक वेदी और इस्राएल के बारहों गोत्रों के अनुसार बारह खम्भे भी बनवाए। (IN)

निर्गमन 24:5 तब उसने कई इस्राएली जवानों को भेजा, जिन्होंने यहोवा के लिये होमबलि और बैलों के मेलबलि चढ़ाए। (IN)

निर्गमन 24:6 और मूसा ने आधा लहू लेकर कटोरों में रखा, और आधा वेदी पर छिड़क दिया। (IN)

निर्गमन 24:7 तब वाचा की पुस्तक को लेकर लोगों को पढ़ सुनाया; उसे सुनकर उन्होंने कहा, “जो कुछ यहोवा ने कहा है उस सबको हम करेंगे, और उसकी आज्ञा मानेंगे।” (IN)

निर्गमन 24:8 तब मूसा ने लहू को लेकर लोगों पर छिड़क दिया, और उनसे कहा, “देखो, यह उस वाचा का लहू है जिसे यहोवा ने इन सब वचनों पर तुम्हारे साथ बाँधी है।” (IN)

निर्गमन 24:9 तब मूसा, हारून, नादाब, अबीहू और इस्राएलियों के सत्तर पुरनिए ऊपर गए, (IN)

निर्गमन 24:10 और इस्राएल के परमेश्‍वर का दर्शन किया; और उसके चरणों के तले नीलमणि का चबूतरा सा कुछ था, जो आकाश के तुल्य ही स्वच्छ था। (IN)

निर्गमन 24:11 और उसने इस्राएलियों के प्रधानों पर हाथ न बढ़ाया; तब उन्होंने परमेश्‍वर का दर्शन किया, और खाया पिया। (IN)

निर्गमन 24:12 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “पहाड़ पर मेरे पास चढ़, और वहाँ रह; और मैं तुझे पत्थर की पटियाएँ, और अपनी लिखी हुई व्यवस्था और आज्ञा दूँगा कि तू उनको सिखाए।” (IN)

निर्गमन 24:13 तब मूसा यहोशू नामक अपने टहलुए समेत परमेश्‍वर के पर्वत पर चढ़ गया। (IN)

निर्गमन 24:14 और पुरनियों से वह यह कह गया, “जब तक हम तुम्हारे पास फिर न आएँ तब तक तुम यहीं हमारी बाट जोहते रहो; और सुनो, हारून और हूर तुम्हारे संग हैं; तो यदि किसी का मुकद्दमा हो तो उन्हीं के पास जाए।” (IN)

निर्गमन 24:15 तब मूसा पर्वत पर चढ़ गया, और बादल ने पर्वत को छा लिया। (IN)

निर्गमन 24:16 तब यहोवा के तेज ने सीनै पर्वत पर निवास किया, और वह बादल उस पर छः दिन तक छाया रहा; और सातवें दिन उसने मूसा को बादल के बीच में से पुकारा। (IN)

निर्गमन 24:17 और इस्राएलियों की दृष्टि में यहोवा का तेज पर्वत की चोटी पर प्रचण्ड आग सा देख पड़ता था। (IN)

निर्गमन 24:18 तब मूसा बादल के बीच में प्रवेश करके पर्वत पर चढ़ गया। और मूसा पर्वत पर चालीस दिन और चालीस रात रहा। (IN)

निर्गमन 25:1 ¶ यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 25:2 “इस्राएलियों से यह कहना कि मेरे लिये भेंट लाएँ; जितने अपनी इच्छा से देना चाहें उन्हीं सभी से मेरी भेंट लेना। (IN)

निर्गमन 25:3 और जिन वस्तुओं की भेंट उनसे लेनी हैं वे ये हैं; अर्थात् सोना, चाँदी, पीतल, (IN)

निर्गमन 25:4 नीले, बैंगनी और लाल रंग का कपड़ा, सूक्ष्म सनी का कपड़ा, बकरी का बाल, (IN)

निर्गमन 25:5 लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ों की खालें, सुइसों की खालें, बबूल की लकड़ी, (IN)

निर्गमन 25:6 उजियाले के लिये तेल, अभिषेक के तेल के लिये और सुगन्धित धूप के लिये सुगन्ध-द्रव्य, (IN)

निर्गमन 25:7 एपोद और चपरास के लिये सुलैमानी पत्थर, और जड़ने के लिये मणि। (IN)

निर्गमन 25:8 और वे मेरे लिये एक पवित्रस्‍थान बनाएँ, कि मैं उनके बीच निवास करूँ। (IN)

निर्गमन 25:9 जो कुछ मैं तुझे दिखाता हूँ, अर्थात् निवास-स्थान और उसके सब सामान का नमूना, उसी के अनुसार तुम लोग उसे बनाना। (IN)

निर्गमन 25:10 ¶ “बबूल की लकड़ी का एक सन्दूक बनाया जाए; उसकी लम्बाई ढाई हाथ, और चौड़ाई और ऊँचाई डेढ़-डेढ़ हाथ की हो। (IN)

निर्गमन 25:11 और उसको शुद्ध सोने से भीतर और बाहर मढ़वाना, और सन्दूक के ऊपर चारों ओर सोने की बाड़ बनवाना। (IN)

निर्गमन 25:12 और सोने के चार कड़े ढलवा कर उसके चारों पायों पर, एक ओर दो कड़े और दूसरी ओर भी दो कड़े लगवाना। (IN)

निर्गमन 25:13 फिर बबूल की लकड़ी के डंडे बनवाना, और उन्हें भी सोने से मढ़वाना। (IN)

निर्गमन 25:14 और डंडों को सन्दूक की दोनों ओर के कड़ों में डालना जिससे उनके बल सन्दूक उठाया जाए। (IN)

निर्गमन 25:15 वे डंडे सन्दूक के कड़ों में लगे रहें; और उससे अलग न किए जाएँ। (IN)

निर्गमन 25:16 और जो साक्षीपत्र मैं तुझे दूँगा उसे उसी सन्दूक में रखना। (IN)

निर्गमन 25:17 “फिर शुद्ध सोने का एक प्रायश्चित का ढकना बनवाना; उसकी लम्बाई ढाई हाथ, और चौड़ाई डेढ़ हाथ की हो। (IN)

निर्गमन 25:18 और सोना ढालकर दो करूब बनवाकर प्रायश्चित के ढकने के दोनों सिरों पर लगवाना। (IN)

निर्गमन 25:19 एक करूब तो एक सिरे पर और दूसरा करूब दूसरे सिरे पर लगवाना; और करूबों को और प्रायश्चित के ढकने को उसके ही टुकड़े से बनाकर उसके दोनों सिरों पर लगवाना। (IN)

निर्गमन 25:20 और उन करूबों के पंख ऊपर से ऐसे फैले हुए बनें कि प्रायश्चित का ढकना उनसे ढपा रहे, और उनके मुख आमने-सामने और प्रायश्चित के ढकने की ओर रहें। (IN)

निर्गमन 25:21 और प्रायश्चित के ढकने को सन्दूक के ऊपर लगवाना; और जो साक्षीपत्र मैं तुझे दूँगा उसे सन्दूक के भीतर रखना। (IN)

निर्गमन 25:22 और मैं उसके ऊपर रहकर तुझसे मिला करूँगा; और इस्राएलियों के लिये जितनी आज्ञाएँ मुझको तुझे देनी होंगी, उन सभी के विषय मैं प्रायश्चित के ढकने के ऊपर से और उन करूबों के बीच में से, जो साक्षीपत्र के सन्दूक पर होंगे, तुझसे वार्तालाप किया करूँगा। (IN)

निर्गमन 25:23 ¶ “फिर बबूल की लकड़ी की एक मेज बनवाना; उसकी लम्बाई दो हाथ, चौड़ाई एक हाथ, और ऊँचाई डेढ़ हाथ की हो। (IN)

निर्गमन 25:24 उसे शुद्ध सोने से मढ़वाना, और उसके चारों ओर सोने की एक बाड़ बनवाना। (IN)

निर्गमन 25:25 और उसके चारों ओर चार अंगुल चौड़ी एक पटरी बनवाना, और इस पटरी के चारों ओर सोने की एक बाड़ बनवाना। (IN)

निर्गमन 25:26 और सोने के चार कड़े बनवाकर मेज के उन चारों कोनों में लगवाना जो उसके चारों पायों में होंगे। (IN)

निर्गमन 25:27 वे कड़े पटरी के पास ही हों, और डंडों के घरों का काम दें कि मेंज़ उन्हीं के बल उठाई जाए। (IN)

निर्गमन 25:28 और डंडों को बबूल की लकड़ी के बनवाकर सोने से मढ़वाना, और मेज उन्हीं से उठाई जाए। (IN)

निर्गमन 25:29 और उसके परात और धूपदान, और चमचे और उण्डेलने के कटोरे, सब शुद्ध सोने के बनवाना। (IN)

निर्गमन 25:30 और मेज पर मेरे आगे भेंट की रोटियाँ नित्य रखा करना। (IN)

निर्गमन 25:31 ¶ “फिर शुद्ध सोने की एक दीवट बनवाना। सोना ढलवा कर वह दीवट, पाये और डंडी सहित बनाया जाए; उसके पुष्पकोष, गाँठ और फूल, सब एक ही टुकड़े के बनें; (IN)

निर्गमन 25:32 और उसके किनारों से छः डालियाँ निकलें, तीन डालियाँ तो दीवट की एक ओर से और तीन डालियाँ उसकी दूसरी ओर से निकली हुई हों; (IN)

निर्गमन 25:33 एक-एक डाली में बादाम के फूल के समान तीन-तीन पुष्पकोष, एक-एक गाँठ, और एक-एक फूल हों; दीवट से निकली हुई छहों डालियों का यही आकार या रूप हो; (IN)

निर्गमन 25:34 और दीवट की डंडी में बादाम के फूल के समान चार पुष्पकोष अपनी-अपनी गाँठ और फूल समेत हों; (IN)

निर्गमन 25:35 और दीवट से निकली हुई छहों डालियों में से दो-दो डालियों के नीचे एक-एक गाँठ हो, वे दीवट समेत एक ही टुकड़े के बने हुए हों। (IN)

निर्गमन 25:36 उनकी गाँठें और डालियाँ, सब दीवट समेत एक ही टुकड़े की हों, शुद्ध सोना ढलवा कर पूरा दीवट एक ही टुकड़े का बनवाना। (IN)

निर्गमन 25:37 और सात दीपक बनवाना; और दीपक जलाए जाएँ कि वे दीवट के सामने प्रकाश दें। (IN)

निर्गमन 25:38 और उसके गुलतराश और गुलदान सब शुद्ध सोने के हों। (IN)

निर्गमन 25:39 वह सब इन समस्त सामान समेत किक्कार भर शुद्ध सोने का बने। (IN)

निर्गमन 25:40 और सावधान रहकर इन सब वस्तुओं को उस नमूने के समान बनवाना, जो तुझे इस पर्वत पर दिखाया गया है। (IN)

निर्गमन 26:1 ¶ “फिर निवास-स्थान के लिये दस परदे बनवाना; इनको बटी हुई सनीवाले और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का कढ़ाई के काम किए हुए करूबों के साथ बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:2 एक-एक परदे की लम्बाई अट्ठाईस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हो; सब परदे एक ही नाप के हों। (IN)

निर्गमन 26:3 पाँच परदे एक दूसरे से जुड़े हुए हों; और फिर जो पाँच परदे रहेंगे वे भी एक दूसरे से जुड़े हुए हों। (IN)

निर्गमन 26:4 और जहाँ ये दोनों परदे जोड़े जाएँ वहाँ की दोनों छोरों पर नीले-नीले फंदे लगवाना। (IN)

निर्गमन 26:5 दोनों छोरों में पचास-पचास फंदे ऐसे लगवाना कि वे आमने-सामने हों। (IN)

निर्गमन 26:6 और सोने के पचास अंकड़े बनवाना; और परदों के छल्लों को अंकड़ों के द्वारा एक दूसरे से ऐसा जुड़वाना कि निवास-स्थान मिलकर एक ही हो जाए। (IN)

निर्गमन 26:7 “फिर निवास के ऊपर तम्बू का काम देने के लिये बकरी के बाल के ग्यारह परदे बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:8 एक-एक परदे की लम्बाई तीस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हो; ग्यारहों परदे एक ही नाप के हों। (IN)

निर्गमन 26:9 और पाँच परदे अलग और फिर छः परदे अलग जुड़वाना, और छठवें परदे को तम्बू के सामने मोड़ कर दुहरा कर देना। (IN)

निर्गमन 26:10 और तू पचास अंकड़े उस परदे की छोर में जो बाहर से मिलाया जाएगा और पचास ही अंकड़े दूसरी ओर के परदे की छोर में जो बाहर से मिलाया जाएगा बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:11 और पीतल के पचास अंकड़े बनाना, और अंकड़ों को फंदों में लगाकर तम्बू को ऐसा जुड़वाना कि वह मिलकर एक ही हो जाए। (IN)

निर्गमन 26:12 और तम्बू के परदों का लटका हुआ भाग, अर्थात् जो आधा पट रहेगा, वह निवास की पिछली ओर लटका रहे। (IN)

निर्गमन 26:13 और तम्बू के परदों की लम्बाई में से हाथ भर इधर, और हाथ भर उधर निवास को ढाँकने के लिये उसकी दोनों ओर पर लटका हुआ रहे। (IN)

निर्गमन 26:14 फिर तम्बू के लिये लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ों की खालों का एक ओढ़ना और उसके ऊपर सुइसों की खालों का भी एक ओढ़ना बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:15 “फिर निवास को खड़ा करने के लिये बबूल की लकड़ी के तख्ते बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:16 एक-एक तख्ते की लम्बाई दस हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ की हो। (IN)

निर्गमन 26:17 एक-एक तख्ते में एक दूसरे से जोड़ी हुई दो-दो चूलें हों; निवास के सब तख्तों को इसी भाँति से बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:18 और निवास के लिये जो तख्ते तू बनवाएगा उनमें से बीस तख्ते तो दक्षिण की ओर के लिये हों; (IN)

निर्गमन 26:19 और बीसों तख्तों के नीचे चाँदी की चालीस कुर्सियाँ बनवाना, अर्थात् एक-एक तख्ते के नीचे उसके चूलों के लिये दो-दो कुर्सियाँ। (IN)

निर्गमन 26:20 और निवास की दूसरी ओर, अर्थात् उत्तर की ओर बीस तख्ते बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:21 और उनके लिये चाँदी की चालीस कुर्सियाँ बनवाना, अर्थात् एक-एक तख्ते के नीचे दो-दो कुर्सियाँ हों। (IN)

निर्गमन 26:22 और निवास की पिछली ओर, अर्थात् पश्चिम की ओर के लिए छः तख्ते बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:23 और पिछले भाग में निवास के कोनों के लिये दो तख्ते बनवाना; (IN)

निर्गमन 26:24 और ये नीचे से दो-दो भाग के हों और दोनों भाग ऊपर के सिरे तक एक-एक कड़े में मिलाये जाएँ; दोनों तख्तों का यही रूप हो; ये तो दोनों कोनों के लिये हों। (IN)

निर्गमन 26:25 और आठ तख्ते हों, और उनकी चाँदी की सोलह कुर्सियाँ हों; अर्थात् एक-एक तख्ते के नीचे दो-दो कुर्सियाँ हों। (IN)

निर्गमन 26:26 “फिर बबूल की लकड़ी के बेंड़े बनवाना, अर्थात् निवास की एक ओर के तख्तों के लिये पाँच, (IN)

निर्गमन 26:27 और निवास की दूसरी ओर के तख्तों के लिये पाँच बेंड़े, और निवास का जो भाग पश्चिम की ओर पिछले भाग में होगा, उसके लिये पाँच बेंड़े बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:28 बीचवाला बेंड़ा जो तख्तों के मध्य में होगा वह तम्बू के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचे। (IN)

निर्गमन 26:29 फिर तख्तों को सोने से मढ़वाना, और उनके कड़े जो बेंड़ों के घरों का काम देंगे उन्हें भी सोने के बनवाना; और बेंड़ों को भी सोने से मढ़वाना। (IN)

निर्गमन 26:30 और निवास को इस रीति खड़ा करना जैसा इस पर्वत पर तुझे दिखाया गया है। (IN)

निर्गमन 26:31 ¶ “फिर नीले, बैंगनी और लाल रंग के और बटी हुई सूक्ष्म सनीवाले कपड़े का एक बीचवाला परदा बनवाना; वह कढ़ाई के काम किये हुए करूबों के साथ बने। (IN)

निर्गमन 26:32 और उसको सोने से मढ़े हुए बबूल के चार खम्भों पर लटकाना, इनकी अंकड़ियाँ सोने की हों, और ये चाँदी की चार कुर्सियों पर खड़ी रहें। (IN)

निर्गमन 26:33 और बीचवाले पर्दे को अंकड़ियों के नीचे लटकाकर, उसकी आड़ में साक्षीपत्र का सन्दूक भीतर ले जाना; सो वह बीचवाला परदा तुम्हारे लिये पवित्रस्‍थान को परमपवित्र स्थान से अलग किये रहे। (IN)

निर्गमन 26:34 फिर परमपवित्र स्थान में साक्षीपत्र के सन्दूक के ऊपर प्रायश्चित के ढकने को रखना। (IN)

निर्गमन 26:35 और उस पर्दे के बाहर निवास के उत्तर की ओर मेज रखना; और उसके दक्षिण की ओर मेज के सामने दीवट को रखना। (IN)

निर्गमन 26:36 ¶ फिर तम्बू के द्वार के लिये नीले, बैंगनी और लाल रंग के और बटी हुई सूक्ष्म सनीवाले कपड़े का कढ़ाई का काम किया हुआ एक परदा बनवाना। (IN)

निर्गमन 26:37 और इस पर्दे के लिये बबूल के पाँच खम्भे बनवाना, और उनको सोने से मढ़वाना; उनकी कड़ियाँ सोने की हों, और उनके लिये पीतल की पाँच कुर्सियाँ ढलवा कर बनवाना। (IN)

निर्गमन 27:1 ¶ “फिर वेदी को बबूल की लकड़ी की, पाँच हाथ लम्बी और पाँच हाथ चौड़ी बनवाना; वेदी चौकोर हो, और उसकी ऊँचाई तीन हाथ की हो। (IN)

निर्गमन 27:2 और उसके चारों कोनों पर चार सींग बनवाना; वे उस समेत एक ही टुकड़े के हों, और उसे पीतल से मढ़वाना। (IN)

निर्गमन 27:3 और उसकी राख उठाने के पात्र, और फावड़ियां, और कटोरे, और काँटे, और अँगीठियाँ बनवाना; उसका कुल सामान पीतल का बनवाना। (IN)

निर्गमन 27:4 और उसके पीतल की जाली की एक झंझरी बनवाना; और उसके चारों सिरों में पीतल के चार कड़े लगवाना। (IN)

निर्गमन 27:5 और उस झंझरी को वेदी के चारों ओर की कँगनी के नीचे ऐसे लगवाना कि वह वेदी की ऊँचाई के मध्य तक पहुँचे। (IN)

निर्गमन 27:6 और वेदी के लिये बबूल की लकड़ी के डंडे बनवाना, और उन्हें पीतल से मढ़वाना। (IN)

निर्गमन 27:7 और डंडे कड़ों में डाले जाएँ, कि जब-जब वेदी उठाई जाए तब वे उसकी दोनों ओर पर रहें। (IN)

निर्गमन 27:8 वेदी को तख्तों से खोखली बनवाना; जैसी वह इस पर्वत पर तुझे दिखाई गई है वैसी ही बनाई जाए। (IN)

निर्गमन 27:9 ¶ “फिर निवास के आँगन को बनवाना। उसकी दक्षिण ओर के लिये तो बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े के सब पर्दों को मिलाए कि उसकी लम्बाई सौ हाथ की हो; एक ओर पर तो इतना ही हो। (IN)

निर्गमन 27:10 और उनके बीस खम्भे बनें, और इनके लिये पीतल की बीस कुर्सियाँ बनें, और खम्भों के कुण्डे और उनकी पट्टियाँ चाँदी की हों। (IN)

निर्गमन 27:11 और उसी भाँति आँगन की उत्तर ओर की लम्बाई में भी सौ हाथ लम्बे पर्दे हों, और उनके भी बीस खम्भे और इनके लिये भी पीतल के बीस खाने हों; और उन खम्भों के कुण्डे और पट्टियाँ चाँदी की हों। (IN)

निर्गमन 27:12 फिर आँगन की चौड़ाई में पश्चिम की ओर पचास हाथ के पर्दे हों, उनके खम्भे दस और खाने भी दस हों। (IN)

निर्गमन 27:13 पूरब की ओर पर आँगन की चौड़ाई पचास हाथ की हो। (IN)

निर्गमन 27:14 और आँगन के द्वार की एक ओर पन्द्रह हाथ के पर्दे हों, और उनके खम्भे तीन और खाने तीन हों। (IN)

निर्गमन 27:15 और दूसरी ओर भी पन्द्रह हाथ के पर्दे हों, उनके भी खम्भे तीन और खाने तीन हों। (IN)

निर्गमन 27:16 आँगन के द्वार के लिये एक परदा बनवाना, जो नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े और बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े का कामदार बना हुआ बीस हाथ का हो, उसके खम्भे चार और खाने भी चार हों। (IN)

निर्गमन 27:17 आँगन की चारों ओर के सब खम्भे चाँदी की पट्टियों से जुड़े हुए हों, उनके कुण्डे चाँदी के और खाने पीतल के हों। (IN)

निर्गमन 27:18 आँगन की लम्बाई सौ हाथ की, और उसकी चौड़ाई बराबर पचास हाथ की और उसकी कनात की ऊँचाई पाँच हाथ की हो, उसकी कनात बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े की बने, और खम्भों के खाने पीतल के हों। (IN)

निर्गमन 27:19 निवास के भाँति-भाँति के बर्तन और सब सामान और उसके सब खूँटे और आँगन के भी सब खूँटे पीतल ही के हों। (IN)

निर्गमन 27:20 ¶ फिर तू इस्राएलियों को आज्ञा देना, कि मेरे पास दीवट के लिये कूट के निकाला हुआ जैतून का निर्मल तेल ले आना, जिससे दीपक नित्य जलता रहे। (IN)

निर्गमन 27:21 मिलापवाले तम्बू में, उस बीचवाले पर्दे से बाहर जो साक्षीपत्र के आगे होगा, हारून और उसके पुत्र दीवट सांझ से भोर तक यहोवा के सामने सजा कर रखें। यह विधि इस्राएलियों की पीढ़ियों के लिये सदैव बनी रहेगी। (IN)

निर्गमन 28:1 ¶ “फिर तू इस्राएलियों में से अपने भाई हारून, और नादाब, अबीहू, एलीआजर और ईतामार नामक उसके पुत्रों को अपने समीप ले आना कि वे मेरे लिये याजक का काम करें। (IN)

निर्गमन 28:2 और तू अपने भाई हारून के लिये वैभव और शोभा के निमित्त पवित्र वस्त्र बनवाना। (IN)

निर्गमन 28:3 और जितनों के हृदय में बुद्धि है, जिनको मैंने बुद्धि देनेवाली आत्मा से परिपूर्ण किया है, उनको तू हारून के वस्त्र बनाने की आज्ञा दे कि वह मेरे निमित्त याजक का काम करने के लिये पवित्र बनें। (IN)

निर्गमन 28:4 और जो वस्त्र उन्हें बनाने होंगे वे ये हैं, अर्थात् सीनाबन्द; और एपोद, और बागा, चार खाने का अंगरखा, पुरोहित का टोप, और कमरबन्द; ये ही पवित्र वस्त्र तेरे भाई हारून और उसके पुत्रों के लिये बनाएँ जाएँ कि वे मेरे लिये याजक का काम करें। (IN)

निर्गमन 28:5 और वे सोने और नीले और बैंगनी और लाल रंग का और सूक्ष्म सनी का कपड़ा लें। (IN)

निर्गमन 28:6 ¶ “वे एपोद को सोने, और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का और बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े का बनाएँ, जो कि निपुण कढ़ाई के काम करनेवाले के हाथ का काम हो। (IN)

निर्गमन 28:7 और वह इस तरह से जोड़ा जाए कि उसके दोनों कंधों के सिरे आपस में मिले रहें। (IN)

निर्गमन 28:8 और एपोद पर जो काढ़ा हुआ पटुका होगा उसकी बनावट उसी के समान हो, और वे दोनों बिना जोड़ के हों, और सोने और नीले, बैंगनी और लाल रंगवाले और बटी हुई सूक्ष्म सनीवाले कपड़े के हों। (IN)

निर्गमन 28:9 फिर दो सुलैमानी मणि लेकर उन पर इस्राएल के पुत्रों के नाम खुदवाना, (IN)

निर्गमन 28:10 उनके नामों में से छः तो एक मणि पर, और शेष छः नाम दूसरे मणि पर, इस्राएल के पुत्रों की उत्पत्ति के अनुसार खुदवाना। (IN)

निर्गमन 28:11 मणि गढ़नेवाले के काम के समान जैसे छापा खोदा जाता है, वैसे ही उन दो मणियों पर इस्राएल के पुत्रों के नाम खुदवाना; और उनको सोने के खानों में जड़वा देना। (IN)

निर्गमन 28:12 और दोनों मणियों को एपोद के कंधों पर लगवाना, वे इस्राएलियों के निमित्त स्मरण दिलवाने वाले मणि ठहरेंगे; अर्थात् हारून उनके नाम यहोवा के आगे अपने दोनों कंधों पर स्मरण के लिये लगाए रहे। (IN)

निर्गमन 28:13 “फिर सोने के खाने बनवाना, (IN)

निर्गमन 28:14 और डोरियों के समान गूँथे हुए दो जंजीर शुद्ध सोने के बनवाना; और गूँथे हुए जंजीरों को उन खानों में जड़वाना। (IN)

निर्गमन 28:15 ¶ “फिर न्याय की चपरास को भी कढ़ाई के काम का बनवाना; एपोद के समान सोने, और नीले, बैंगनी और लाल रंग के और बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े की उसे बनवाना। (IN)

निर्गमन 28:16 वह चौकोर और दोहरी हो, और उसकी लम्बाई और चौड़ाई एक-एक बिलांद की हो। (IN)

निर्गमन 28:17 और उसमें चार पंक्ति मणि जड़ाना। पहली पंक्ति में तो माणिक्य, पद्मराग और लालड़ी हों; (IN)

निर्गमन 28:18 दूसरी पंक्ति में मरकत, नीलमणि और हीरा; (IN)

निर्गमन 28:19 तीसरी पंक्ति में लशम, सूर्यकांत और नीलम; (IN)

निर्गमन 28:20 और चौथी पंक्ति में फीरोजा, सुलैमानी मणि और यशब हों; ये सब सोने के खानों में जड़े जाएँ। (IN)

निर्गमन 28:21 और इस्राएल के पुत्रों के जितने नाम हैं उतने मणि हों, अर्थात् उनके नामों की गिनती के अनुसार बारह नाम खुदें, बारहों गोत्रों में से एक-एक का नाम एक-एक मणि पर ऐसे खुदे जैसे छापा खोदा जाता है। (IN)

निर्गमन 28:22 फिर चपरास पर डोरियों के समान गूँथे हुए शुद्ध सोने की जंजीर लगवाना; (IN)

निर्गमन 28:23 और चपरास में सोने की दो कड़ियाँ लगवाना, और दोनों कड़ियों को चपरास के दोनों सिरों पर लगवाना। (IN)

निर्गमन 28:24 और सोने के दोनों गूँथे जंजीरों को उन दोनों कड़ियों में जो चपरास के सिरों पर होंगी लगवाना; (IN)

निर्गमन 28:25 और गूँथे हुए दोनों जंजीरों के दोनों बाकी सिरों को दोनों खानों में जड़वा के एपोद के दोनों कंधों के बंधनों पर उसके सामने लगवाना। (IN)

निर्गमन 28:26 फिर सोने की दो और कड़ियाँ बनवाकर चपरास के दोनों सिरों पर, उसकी उस कोर पर जो एपोद के भीतर की ओर होगी लगवाना। (IN)

निर्गमन 28:27 फिर उनके सिवाय सोने की दो और कड़ियाँ बनवाकर एपोद के दोनों कंधों के बंधनों पर, नीचे से उनके सामने और उसके जोड़ के पास एपोद के काढ़े हुए पटुके के ऊपर लगवाना। (IN)

निर्गमन 28:28 और चपरास अपनी कड़ियों के द्वारा एपोद की कड़ियों में नीले फीते से बाँधी जाए, इस रीति वह एपोद के काढ़े हुए पटुके पर बनी रहे, और चपरास एपोद पर से अलग न होने पाए। (IN)

निर्गमन 28:29 और जब-जब हारून पवित्रस्‍थान में प्रवेश करे, तब-तब वह न्याय की चपरास पर अपने हृदय के ऊपर इस्राएलियों के नामों को लगाए रहे, जिससे यहोवा के सामने उनका स्मरण नित्य रहे। (IN)

निर्गमन 28:30 और तू न्याय की चपरास में ऊरीम और तुम्मीम को रखना, और जब-जब हारून यहोवा के सामने प्रवेश करे, तब-तब वे उसके हृदय के ऊपर हों; इस प्रकार हारून इस्राएलियों के लिये यहोवा के न्याय को अपने हृदय के ऊपर यहोवा के सामने नित्य लगाए रहे। (IN)

निर्गमन 28:31 ¶ “फिर एपोद के बागे को सम्पूर्ण नीले रंग का बनवाना। (IN)

निर्गमन 28:32 उसकी बनावट ऐसी हो कि उसके बीच में सिर डालने के लिये छेद हो, और उस छेद की चारों ओर बख्तर के छेद की सी एक बुनी हुई कोर हो कि वह फटने न पाए। (IN)

निर्गमन 28:33 और उसके नीचेवाले घेरे में चारों ओर नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े के अनार बनवाना, और उनके बीच-बीच चारों ओर सोने की घंटियाँ लगवाना, (IN)

निर्गमन 28:34 अर्थात् एक सोने की घंटी और एक अनार, फिर एक सोने की घंटी और एक अनार, इसी रीति बागे के नीचेवाले घेरे में चारों ओर ऐसा ही हो। (IN)

निर्गमन 28:35 और हारून उस बागे को सेवा टहल करने के समय पहना करे, कि जब-जब वह पवित्रस्‍थान के भीतर यहोवा के सामने जाए, या बाहर निकले, तब-तब उसका शब्द सुनाई दे, नहीं तो वह मर जाएगा। (IN)

निर्गमन 28:36 “फिर शुद्ध सोने का एक टीका बनवाना, और जैसे छापे में वैसे ही उसमें ये अक्षर खोदे जाएँ, अर्थात् 'यहोवा के लिये पवित्र।' (IN)

निर्गमन 28:37 और उसे नीले फीते से बाँधना; और वह पगड़ी के सामने के हिस्से पर रहे। (IN)

निर्गमन 28:38 और वह हारून के माथे पर रहे, इसलिए कि इस्राएली जो कुछ पवित्र ठहराएँ, अर्थात् जितनी पवित्र वस्तुएँ भेंट में चढ़ावें उन पवित्र वस्तुओं का दोष हारून उठाए रहे, और वह नित्य उसके माथे पर रहे, जिससे यहोवा उनसे प्रसन्‍न रहे। (IN)

निर्गमन 28:39 “अंगरखे को सूक्ष्म सनी के कपड़े का चारखाना बुनवाना, और एक पगड़ी भी सूक्ष्म सनी के कपड़े की बनवाना, और बेलबूटे की कढ़ाई का काम किया हुआ एक कमरबन्द भी बनवाना। (IN)

निर्गमन 28:40 “फिर हारून के पुत्रों के लिये भी अंगरखे और कमरबन्द और टोपियाँ बनवाना; ये वस्त्र भी वैभव और शोभा के लिये बनें। (IN)

निर्गमन 28:41 अपने भाई हारून और उसके पुत्रों को ये ही सब वस्त्र पहनाकर उनका अभिषेक और संस्कार करना, और उन्हें पवित्र करना कि वे मेरे लिये याजक का काम करें। (IN)

निर्गमन 28:42 और उनके लिये सनी के कपड़े की जाँघिया बनवाना जिनसे उनका तन ढपा रहे; वे कमर से जाँघ तक की हों; (IN)

निर्गमन 28:43 और जब-जब हारून या उसके पुत्र मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करें, या पवित्रस्‍थान में सेवा टहल करने को वेदी के पास जाएँ तब-तब वे उन जाँघियों को पहने रहें, न हो कि वे पापी ठहरें और मर जाएँ। यह हारून के लिये और उसके बाद उसके वंश के लिये भी सदा की विधि ठहरे। (IN)

निर्गमन 29:1 ¶ “उन्हें पवित्र करने को जो काम तुझे उनसे करना है कि वे मेरे लिये याजक का काम करें वह यह है: एक निर्दोष बछड़ा और दो निर्दोष मेढ़े लेना, (IN)

निर्गमन 29:2 और अख़मीरी रोटी, और तेल से सने हुए मैदे के अख़मीरी फुलके, और तेल से चुपड़ी हुई अख़मीरी पपड़ियाँ भी लेना। ये सब गेहूँ के मैदे के बनवाना। (IN)

निर्गमन 29:3 इनको एक टोकरी में रखकर उस टोकरी को उस बछड़े और उन दोनों मेढ़ों समेत समीप ले आना। (IN)

निर्गमन 29:4 फिर हारून और उसके पुत्रों को मिलापवाले तम्बू के द्वार के समीप ले आकर जल से नहलाना। (IN)

निर्गमन 29:5 तब उन वस्त्रों को लेकर हारून को अंगरखा और एपोद का बागा पहनाना, और एपोद और चपरास बाँधना, और एपोद का काढ़ा हुआ पटुका भी बाँधना; (IN)

निर्गमन 29:6 और उसके सिर पर पगड़ी को रखना, और पगड़ी पर पवित्र मुकुट को रखना। (IN)

निर्गमन 29:7 तब अभिषेक का तेल ले उसके सिर पर डालकर उसका अभिषेक करना। (IN)

निर्गमन 29:8 फिर उसके पुत्रों को समीप ले आकर उनको अंगरखे पहनाना, (IN)

निर्गमन 29:9 और उसके अर्थात् हारून और उसके पुत्रों के कमर बाँधना और उनके सिर पर टोपियाँ रखना; जिससे याजक के पद पर सदा उनका हक़ रहे। इसी प्रकार हारून और उसके पुत्रों का संस्कार करना। (IN)

निर्गमन 29:10 “तब बछड़े को मिलापवाले तम्बू के सामने समीप ले आना। और हारून और उसके पुत्र बछड़े के सिर पर अपने-अपने हाथ रखें, (IN)

निर्गमन 29:11 तब उस बछड़े को यहोवा के सम्मुख मिलापवाले तम्बू के द्वार पर बलिदान करना, (IN)

निर्गमन 29:12 और बछड़े के लहू में से कुछ लेकर अपनी उँगली से वेदी के सींगों पर लगाना, और शेष सब लहू को वेदी के पाए पर उण्डेल देना, (IN)

निर्गमन 29:13 और जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं, और जो झिल्ली कलेजे के ऊपर होती है, उनको और दोनों गुर्दों को उनके ऊपर की चर्बी समेत लेकर सबको वेदी पर जलाना। (IN)

निर्गमन 29:14 परन्तु बछड़े का माँस, और खाल, और गोबर, छावनी से बाहर आग में जला देना; क्योंकि यह पापबलि होगा। (IN)

निर्गमन 29:15 “फिर एक मेढ़ा लेना, और हारून और उसके पुत्र उसके सिर पर अपने-अपने हाथ रखें, (IN)

निर्गमन 29:16 तब उस मेढ़े को बलि करना, और उसका लहू लेकर वेदी पर चारों ओर छिड़कना। (IN)

निर्गमन 29:17 और उस मेढ़े को टुकड़े-टुकड़े काटना, और उसकी अंतड़ियों और पैरों को धोकर उसके टुकड़ों और सिर के ऊपर रखना, (IN)

निर्गमन 29:18 तब उस पूरे मेढ़े को वेदी पर जलाना; वह तो यहोवा के लिये होमबलि होगा; वह सुखदायक सुगन्ध और यहोवा के लिये हवन होगा। (IN)

निर्गमन 29:19 “फिर दूसरे मेढ़े को लेना; और हारून और उसके पुत्र उसके सिर पर अपने-अपने हाथ रखें, (IN)

निर्गमन 29:20 तब उस मेढ़े को बलि करना, और उसके लहू में से कुछ लेकर हारून और उसके पुत्रों के दाहिने कान के सिरे पर, और उनके दाहिने हाथ और दाहिने पाँव के अँगूठों पर लगाना, और लहू को वेदी पर चारों ओर छिड़क देना। (IN)

निर्गमन 29:21 फिर वेदी पर के लहू, और अभिषेक के तेल, इन दोनों में से कुछ-कुछ लेकर हारून और उसके वस्त्रों पर, और उसके पुत्रों और उनके वस्त्रों पर भी छिड़क देना; तब वह अपने वस्त्रों समेत और उसके पुत्र भी अपने-अपने वस्त्रों समेत पवित्र हो जाएँगे। (IN)

निर्गमन 29:22 तब मेढ़े को संस्कारवाला जानकर उसमें से चर्बी और मोटी पूँछ को, और जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं उसको, और कलेजे पर की झिल्ली को, और चर्बी समेत दोनों गुर्दों को, और दाहिने पुट्ठे को लेना, (IN)

निर्गमन 29:23 और अख़मीरी रोटी की टोकरी जो यहोवा के आगे धरी होगी उसमें से भी एक रोटी, और तेल से सने हुए मैदे का एक फुलका, और एक पपड़ी लेकर, (IN)

निर्गमन 29:24 इन सबको हारून और उसके पुत्रों के हाथों में रखकर हिलाए जाने की भेंट ठहराकर यहोवा के आगे हिलाया जाए। (IN)

निर्गमन 29:25 तब उन वस्तुओं को उनके हाथों से लेकर होमबलि की वेदी पर जला देना, जिससे वह यहोवा के सामने सुखदायक सुगन्ध ठहरे; वह तो यहोवा के लिये हवन होगा। (IN)

निर्गमन 29:26 “फिर हारून के संस्कार को जो मेढ़ा होगा उसकी छाती को लेकर हिलाए जाने की भेंट के लिये यहोवा के आगे हिलाना; और वह तेरा भाग ठहरेगा। (IN)

निर्गमन 29:27 और हारून और उसके पुत्रों के संस्कार का जो मेढ़ा होगा, उसमें से हिलाए जाने की भेंटवाली छाती जो हिलाई जाएगी, और उठाए जाने का भेंटवाला पुट्ठा जो उठाया जाएगा, इन दोनों को पवित्र ठहराना। (IN)

निर्गमन 29:28 और ये सदा की विधि की रीति पर इस्राएलियों की ओर से उसका और उसके पुत्रों का भाग ठहरे, क्योंकि ये उठाए जाने की भेंटें ठहरी हैं; और यह इस्राएलियों की ओर से उनके मेलबलियों में से यहोवा के लिये उठाए जाने की भेंट होगी। (IN)

निर्गमन 29:29 “हारून के जो पवित्र वस्त्र होंगे वह उसके बाद उसके बेटे पोते आदि को मिलते रहें, जिससे उन्हीं को पहने हुए उनका अभिषेक और संस्कार किया जाए। (IN)

निर्गमन 29:30 उसके पुत्रों के जो उसके स्थान पर याजक होगा, वह जब पवित्रस्‍थान में सेवा टहल करने को मिलापवाले तम्बू में पहले आए, तब उन वस्त्रों को सात दिन तक पहने रहें। (IN)

निर्गमन 29:31 “फिर याजक के संस्कार का जो मेढ़ा होगा उसे लेकर उसका माँस किसी पवित्रस्‍थान में पकाना; (IN)

निर्गमन 29:32 तब हारून अपने पुत्रों समेत उस मेढ़े का माँस और टोकरी की रोटी, दोनों को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर खाए। (IN)

निर्गमन 29:33 जिन पदार्थों से उनका संस्कार और उन्हें पवित्र करने के लिये प्रायश्चित किया जाएगा उनको तो वे खाएँ, परन्तु पराए कुल का कोई उन्हें न खाने पाए, क्योंकि वे पवित्र होंगे। (IN)

निर्गमन 29:34 यदि संस्कारवाले माँस या रोटी में से कुछ सवेरे तक बचा रहे, तो उस बचे हुए को आग में जलाना, वह खाया न जाए; क्योंकि वह पवित्र होगा। (IN)

निर्गमन 29:35 “मैंने तुझे जो-जो आज्ञा दी हैं, उन सभी के अनुसार तू हारून और उसके पुत्रों से करना; और सात दिन तक उनका संस्कार करते रहना, (IN)

निर्गमन 29:36 अर्थात् पापबलि का एक बछड़ा प्रायश्चित के लिये प्रतिदिन चढ़ाना। और वेदी को भी प्रायश्चित करने के समय शुद्ध करना, और उसे पवित्र करने के लिये उसका अभिषेक करना। (IN)

निर्गमन 29:37 सात दिन तक वेदी के लिये प्रायश्चित करके उसे पवित्र करना, और वेदी परमपवित्र ठहरेगी; और जो कुछ उससे छू जाएगा वह भी पवित्र हो जाएगा। दैनिक भेंट (IN)

निर्गमन 29:38 “जो तुझे वेदी पर नित्य चढ़ाना होगा वह यह है; अर्थात् प्रतिदिन एक-एक वर्ष के दो भेड़ी के बच्चे। (IN)

निर्गमन 29:39 एक भेड़ के बच्चे को तो भोर के समय, और दूसरे भेड़ के बच्चे को सांझ के समय चढ़ाना। (IN)

निर्गमन 29:40 और एक भेड़ के बच्चे के संग हीन की चौथाई कूटकर निकाले हुए तेल से सना हुआ एपा का दसवाँ भाग मैदा, और अर्घ के लिये ही की चौथाई दाखमधु देना। (IN)

निर्गमन 29:41 और दूसरे भेड़ के बच्चे को सांझ के समय चढ़ाना, और उसके साथ भोर की रीति अनुसार अन्नबलि और अर्घ दोनों देना, जिससे वह सुखदायक सुगन्ध और यहोवा के लिये हवन ठहरे। (IN)

निर्गमन 29:42 तुम्हारी पीढ़ी से पीढ़ी में यहोवा के आगे मिलापवाले तम्बू के द्वार पर नित्य ऐसा ही होमबलि हुआ करे; यह वह स्थान है जिसमें मैं तुम लोगों से इसलिए मिला करूँगा कि तुझसे बातें करूँ। (IN)

निर्गमन 29:43 मैं इस्राएलियों से वहीं मिला करूँगा, और वह तम्बू मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा। (IN)

निर्गमन 29:44 और मैं मिलापवाले तम्बू और वेदी को पवित्र करूँगा, और हारून और उसके पुत्रों को भी पवित्र करूँगा कि वे मेरे लिये याजक का काम करें। (IN)

निर्गमन 29:45 और मैं इस्राएलियों के मध्य निवास करूँगा, और उनका परमेश्‍वर ठहरूँगा। (IN)

निर्गमन 29:46 तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा उनका परमेश्‍वर हूँ, जो उनको मिस्र देश से इसलिए निकाल ले आया, कि उनके मध्य निवास करूँ; मैं ही उनका परमेश्‍वर यहोवा हूँ। (IN)

निर्गमन 30:1 ¶ “फिर धूप जलाने के लिये बबूल की लकड़ी की वेदी बनाना। (IN)

निर्गमन 30:2 उसकी लम्बाई एक हाथ और चौड़ाई एक हाथ की हो, वह चौकोर हो, और उसकी ऊँचाई दो हाथ की हो, और उसके सींग उसी टुकड़े से बनाए जाएँ। (IN)

निर्गमन 30:3 और वेदी के ऊपरवाले पल्ले और चारों ओर के बाजुओं और सींगों को शुद्ध सोने से मढ़ना, और इसके चारों ओर सोने की एक बाड़ बनाना। (IN)

निर्गमन 30:4 और इसकी बाड़ के नीचे इसके आमने-सामने के दोनों पल्लों पर सोने के दो-दो कड़े बनाकर इसके दोनों ओर लगाना, वे इसके उठाने के डंडों के खानों का काम देंगे। (IN)

निर्गमन 30:5 डंडों को बबूल की लकड़ी के बनाकर उनको सोने से मढ़ना। (IN)

निर्गमन 30:6 और तू उसको उस पर्दे के आगे रखना जो साक्षीपत्र के सन्दूक के सामने है, अर्थात् प्रायश्चित वाले ढकने के आगे जो साक्षीपत्र के ऊपर है, वहीं मैं तुझसे मिला करूँगा। (IN)

निर्गमन 30:7 और उसी वेदी पर हारून सुगन्धित धूप जलाया करे; प्रतिदिन भोर को जब वह दीपक को ठीक करे तब वह धूप को जलाए, (IN)

निर्गमन 30:8 तब सांझ के समय जब हारून दीपकों को जलाए तब धूप जलाया करे, यह धूप यहोवा के सामने तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में नित्य जलाया जाए। (IN)

निर्गमन 30:9 और उस वेदी पर तुम और प्रकार का धूप न जलाना, और न उस पर होमबलि और न अन्नबलि चढ़ाना; और न इस पर अर्घ देना। (IN)

निर्गमन 30:10 हारून वर्ष में एक बार इसके सींगों पर प्रायश्चित करे; और तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में वर्ष में एक बार प्रायश्चित के पापबलि के लहू से इस पर प्रायश्चित किया जाए; यह यहोवा के लिये परमपवित्र है।” (IN)

निर्गमन 30:11 ¶ और तब यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 30:12 “जब तू इस्राएलियों कि गिनती लेने लगे, तब वे गिनने के समय जिनकी गिनती हुई हो अपने-अपने प्राणों के लिये यहोवा को प्रायश्चित दें, जिससे जब तू उनकी गिनती कर रहा हो उस समय कोई विपत्ति उन पर न आ पड़े। (IN)

निर्गमन 30:13 जितने लोग गिने जाएँ वे पवित्रस्‍थान के शेकेल के अनुसार आधा शेकेल दें, (यह शेकेल बीस गेरा का होता है), यहोवा की भेंट आधा शेकेल हो। (IN)

निर्गमन 30:14 बीस वर्ष के या उससे अधिक अवस्था के जितने गिने जाएँ उनमें से एक-एक जन यहोवा की भेंट दे। (IN)

निर्गमन 30:15 जब तुम्हारे प्राणों के प्रायश्चित के निमित्त यहोवा की भेंट अर्पित की जाए, तब न तो धनी लोग आधे शेकेल से अधिक दें, और न कंगाल लोग उससे कम दें। (IN)

निर्गमन 30:16 और तू इस्राएलियों से प्रायश्चित का रुपया लेकर मिलापवाले तम्बू के काम में लगाना; जिससे वह यहोवा के सम्मुख इस्राएलियों के स्मरणार्थ चिन्ह ठहरे, और उनके प्राणों का प्रायश्चित भी हो।” (IN)

निर्गमन 30:17 ¶ और यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 30:18 “धोने के लिये पीतल की एक हौदी और उसका पाया भी पीतल का बनाना। और उसे मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच में रखकर उसमें जल भर देना; (IN)

निर्गमन 30:19 और उसमें हारून और उसके पुत्र अपने-अपने हाथ पाँव धोया करें। (IN)

निर्गमन 30:20 जब-जब वे मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करें तब-तब वे हाथ पाँव जल से धोएँ, नहीं तो मर जाएँगे; और जब-जब वे वेदी के पास सेवा टहल करने, अर्थात् यहोवा के लिये हव्य जलाने को आएँ तब-तब वे हाथ पाँव धोएँ, न हो कि मर जाएँ। (IN)

निर्गमन 30:21 यह हारून और उसके पीढ़ी-पीढ़ी के वंश के लिये सदा की विधि ठहरे।” (IN)

निर्गमन 30:22 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 30:23 “तू उत्तम से उत्तम सुगन्ध-द्रव्य ले, अर्थात् पवित्रस्‍थान के शेकेल के अनुसार पाँच सौ शेकेल अपने आप निकला हुआ गन्धरस, और उसका आधा, अर्थात् ढाई सौ शेकेल सुगन्धित दालचीनी और ढाई सौ शेकेल सुगन्धित अगर, (IN)

निर्गमन 30:24 और पाँच सौ शेकेल तज, और एक हीन जैतून का तेल लेकर (IN)

निर्गमन 30:25 उनसे अभिषेक का पवित्र तेल, अर्थात् गंधी की रीति से तैयार किया हुआ सुगन्धित तेल बनवाना; यह अभिषेक का पवित्र तेल ठहरे। (IN)

निर्गमन 30:26 और उससे मिलापवाले तम्बू का, और साक्षीपत्र के सन्दूक का, (IN)

निर्गमन 30:27 और सारे सामान समेत मेज का, और सामान समेत दीवट का, और धूपवेदी का, (IN)

निर्गमन 30:28 और सारे सामान समेत होमवेदी का, और पाए समेत हौदी का अभिषेक करना। (IN)

निर्गमन 30:29 और उनको पवित्र करना, जिससे वे परमपवित्र ठहरें; और जो कुछ उनसे छू जाएगा वह पवित्र हो जाएगा। (IN)

निर्गमन 30:30 फिर हारून का उसके पुत्रों के साथ अभिषेक करना, और इस प्रकार उन्हें मेरे लिये याजक का काम करने के लिये पवित्र करना। (IN)

निर्गमन 30:31 और इस्राएलियों को मेरी यह आज्ञा सुनाना, 'यह तेल तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में मेरे लिये पवित्र अभिषेक का तेल होगा। (IN)

निर्गमन 30:32 यह किसी मनुष्य की देह पर न डाला जाए, और मिलावट में उसके समान और कुछ न बनाना; यह पवित्र है, यह तुम्हारे लिये भी पवित्र होगा। (IN)

निर्गमन 30:33 जो कोई इसके समान कुछ बनाए, या जो कोई इसमें से कुछ पराए कुलवाले पर लगाए, वह अपने लोगों में से नाश किया जाए'।” (IN)

निर्गमन 30:34 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “बोल, नखी और कुन्दरू, ये सुगन्ध-द्रव्य निर्मल लोबान समेत ले लेना, ये सब एक तौल के हों, (IN)

निर्गमन 30:35 और इनका धूप अर्थात् नमक मिलाकर गंधी की रीति के अनुसार शुद्ध और पवित्र सुगन्ध-द्रव्य बनवाना; (IN)

निर्गमन 30:36 फिर उसमें से कुछ पीसकर बारीक कर डालना, तब उसमें से कुछ मिलापवाले तम्बू में साक्षीपत्र के आगे, जहाँ पर मैं तुझसे मिला करूँगा वहाँ रखना; वह तुम्हारे लिये परमपवित्र होगा। (IN)

निर्गमन 30:37 और जो धूप तू बनवाएगा, मिलावट में उसके समान तुम लोग अपने लिये और कुछ न बनवाना; वह तुम्हारे आगे यहोवा के लिये पवित्र होगा। (IN)

निर्गमन 30:38 जो कोई सूँघने के लिये उसके समान कुछ बनाए वह अपने लोगों में से नाश किया जाए। (IN)

निर्गमन 31:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 31:2 “सुन, मैं ऊरी के पुत्र बसलेल को, जो हूर का पोता और यहूदा के गोत्र का है, नाम लेकर बुलाता हूँ। (IN)

निर्गमन 31:3 और मैं उसको परमेश्‍वर की आत्मा से जो बुद्धि, प्रवीणता, ज्ञान, और सब प्रकार के कार्यों की समझ देनेवाली आत्मा है परिपूर्ण करता हूँ, (IN)

निर्गमन 31:4 जिससे वह कारीगरी के कार्य बुद्धि से निकाल निकालकर सब भाँति की बनावट में, अर्थात् सोने, चाँदी, और पीतल में, (IN)

निर्गमन 31:5 और जड़ने के लिये मणि काटने में, और लकड़ी पर नक्काशी का काम करे। (IN)

निर्गमन 31:6 और सुन, मैं दान के गोत्रवाले अहीसामाक के पुत्र ओहोलीआब को उसके संग कर देता हूँ; वरन् जितने बुद्धिमान हैं उन सभी के हृदय में मैं बुद्धि देता हूँ, जिससे जितनी वस्तुओं की आज्ञा मैंने तुझे दी है उन सभी को वे बनाएँ; (IN)

निर्गमन 31:7 अर्थात् मिलापवाले तम्बू, और साक्षीपत्र का सन्दूक, और उस पर का प्रायश्चितवाला ढकना, और तम्बू का सारा सामान, (IN)

निर्गमन 31:8 और सामान सहित मेज, और सारे सामान समेत शुद्ध सोने की दीवट, और धूपवेदी, (IN)

निर्गमन 31:9 और सारे सामान सहित होमवेदी, और पाए समेत हौदी, (IN)

निर्गमन 31:10 और काढ़े हुए वस्त्र, और हारून याजक के याजकवाले काम के पवित्र वस्त्र, और उसके पुत्रों के वस्त्र, (IN)

निर्गमन 31:11 और अभिषेक का तेल, और पवित्रस्‍थान के लिये सुगन्धित धूप, इन सभी को वे उन सब आज्ञाओं के अनुसार बनाएँ जो मैंने तुझे दी हैं।” (IN)

निर्गमन 31:12 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 31:13 “तू इस्राएलियों से यह भी कहना, 'निश्चय तुम मेरे विश्रामदिनों को मानना, क्योंकि तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में मेरे और तुम लोगों के बीच यह एक चिन्ह ठहरा है, जिससे तुम यह बात जान रखो कि यहोवा हमारा पवित्र करनेवाला है। (IN)

निर्गमन 31:14 इस कारण तुम विश्रामदिन को मानना, क्योंकि वह तुम्हारे लिये पवित्र ठहरा है; जो उसको अपवित्र करे वह निश्चय मार डाला जाए; जो कोई उस दिन में कुछ काम-काज करे वह प्राणी अपने लोगों के बीच से नाश किया जाए। (IN)

निर्गमन 31:15 छः दिन तो काम-काज किया जाए, पर सातवाँ दिन पवित्र विश्राम का दिन और यहोवा के लिये पवित्र है; इसलिए जो कोई विश्राम के दिन में कुछ काम-काज करे वह निश्चय मार डाला जाए। (IN)

निर्गमन 31:16 इसलिए इस्राएली विश्रामदिन को माना करें, वरन् पीढ़ी-पीढ़ी में उसको सदा की वाचा का विषय जानकर माना करें। (IN)

निर्गमन 31:17 वह मेरे और इस्राएलियों के बीच सदा एक चिन्ह रहेगा, क्योंकि छः दिन में यहोवा ने आकाश और पृथ्वी को बनाया, और सातवें दिन विश्राम करके अपना जी ठण्डा किया'।” (IN)

निर्गमन 31:18 ¶ जब परमेश्‍वर मूसा से सीनै पर्वत पर ऐसी बातें कर चुका, तब उसने उसको अपनी उँगली से लिखी हुई साक्षी देनेवाली पत्थर की दोनों तख्तियाँ दीं। (IN)

निर्गमन 32:1 ¶ जब लोगों ने देखा कि मूसा को पर्वत से उतरने में विलम्ब हो रहा है, तब वे हारून के पास इकट्ठे होकर कहने लगे, “अब हमारे लिये देवता बना, जो हमारे आगे-आगे चले; क्योंकि उस पुरुष मूसा को जो हमें मिस्र देश से निकाल ले आया है, हम नहीं जानते कि उसे क्या हुआ?” (IN)

निर्गमन 32:2 हारून ने उनसे कहा, “तुम्हारी स्त्रियों और बेटे बेटियों के कानों में सोने की जो बालियाँ हैं उन्हें तोड़कर उतारो, और मेरे पास ले आओ।” (IN)

निर्गमन 32:3 तब सब लोगों ने उनके कानों से सोने की बालियों को तोड़कर उतारा, और हारून के पास ले आए। (IN)

निर्गमन 32:4 और हारून ने उन्हें उनके हाथ से लिया, और एक बछड़ा ढालकर बनाया, और टाँकी से गढ़ा। तब वे कहने लगे, “हे इस्राएल तेरा परमेश्‍वर जो तुझे मिस्र देश से छुड़ा लाया है वह यही है।” (IN)

निर्गमन 32:5 यह देखकर हारून ने उसके आगे एक वेदी बनवाई; और यह प्रचार किया, “कल यहोवा के लिये पर्व होगा।” (IN)

निर्गमन 32:6 और दूसरे दिन लोगों ने भोर को उठकर होमबलि चढ़ाए, और मेलबलि ले आए; फिर बैठकर खाया पिया, और उठकर खेलने लगे। (IN)

निर्गमन 32:7 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “नीचे उतर जा, क्योंकि तेरी प्रजा के लोग, जिन्हें तू मिस्र देश से निकाल ले आया है, वे बिगड़ गए हैं; (IN)

निर्गमन 32:8 और जिस मार्ग पर चलने की आज्ञा मैंने उनको दी थी उसको झटपट छोड़कर उन्होंने एक बछड़ा ढालकर बना लिया, फिर उसको दण्डवत् किया, और उसके लिये बलिदान भी चढ़ाया, और यह कहा है, 'हे इस्राएलियों तुम्हारा परमेश्‍वर जो तुम्हें मिस्र देश से छुड़ा ले आया है वह यही है'।” (IN)

निर्गमन 32:9 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “मैंने इन लोगों को देखा, और सुन, वे हठीले हैं। (IN)

निर्गमन 32:10 अब मुझे मत रोक, मेरा कोप उन पर भड़क उठा है जिससे मैं उन्हें भस्म करूँ; परन्तु तुझसे एक बड़ी जाति उपजाऊँगा।” (IN)

निर्गमन 32:11 तब मूसा अपने परमेश्‍वर यहोवा को यह कहकर मनाने लगा, “हे यहोवा, तेरा कोप अपनी प्रजा पर क्यों भड़का है, जिसे तू बड़े सामर्थ्य और बलवन्त हाथ के द्वारा मिस्र देश से निकाल लाया है? (IN)

निर्गमन 32:12 मिस्री लोग यह क्यों कहने पाएँ, 'वह उनको बुरे अभिप्राय से, अर्थात् पहाड़ों में घात करके धरती पर से मिटा डालने की मनसा से निकाल ले गया?' तू अपने भड़के हुए कोप को शान्त कर, और अपनी प्रजा को ऐसी हानि पहुँचाने से फिर जा। (IN)

निर्गमन 32:13 अपने दास अब्राहम, इसहाक, और याकूब को स्मरण कर, जिनसे तूने अपनी ही शपथ खाकर यह कहा था, 'मैं तुम्हारे वंश को आकाश के तारों के तुल्य बहुत करूँगा, और यह सारा देश जिसकी मैंने चर्चा की है तुम्हारे वंश को दूँगा, कि वह उसके अधिकारी सदैव बने रहें'।” (IN)

निर्गमन 32:14 तब यहोवा अपनी प्रजा की हानि करने से जो उसने कहा था पछताया। (IN)

निर्गमन 32:15 तब मूसा फिरकर साक्षी की दोनों तख्तियों को हाथ में लिये हुए पहाड़ से उतर गया, उन तख्तियों के तो इधर और उधर दोनों ओर लिखा हुआ था। (IN)

निर्गमन 32:16 और वे तख्तियाँ परमेश्‍वर की बनाई हुई थीं, और उन पर जो खोदकर लिखा हुआ था वह परमेश्‍वर का लिखा हुआ था। (IN)

निर्गमन 32:17 जब यहोशू को लोगों के कोलाहल का शब्द सुनाई पड़ा, तब उसने मूसा से कहा, “छावनी से लड़ाई का सा शब्द सुनाई देता है।” (IN)

निर्गमन 32:18 उसने कहा, “वह जो शब्द है वह न तो जीतनेवालों का है, और न हारनेवालों का, मुझे तो गाने का शब्द सुन पड़ता है।” (IN)

निर्गमन 32:19 छावनी के पास आते ही मूसा को वह बछड़ा और नाचना देख पड़ा, तब मूसा का कोप भड़क उठा, और उसने तख्तियों को अपने हाथों से पर्वत के नीचे पटककर तोड़ डाला। (IN)

निर्गमन 32:20 तब उसने उनके बनाए हुए बछड़े को लेकर आग में डालकर फूँक दिया। और पीसकर चूर चूरकर डाला, और जल के ऊपर फेंक दिया, और इस्राएलियों को उसे पिलवा दिया। (IN)

निर्गमन 32:21 तब मूसा हारून से कहने लगा, “उन लोगों ने तुझसे क्या किया कि तूने उनको इतने बड़े पाप में फँसाया?” (IN)

निर्गमन 32:22 हारून ने उत्तर दिया, “मेरे प्रभु का कोप न भड़के; तू तो उन लोगों को जानता ही है कि वे बुराई में मन लगाए रहते हैं। (IN)

निर्गमन 32:23 और उन्होंने मुझसे कहा, 'हमारे लिये देवता बनवा जो हमारे आगे-आगे चले; क्योंकि उस पुरुष मूसा को, जो हमें मिस्र देश से छुड़ा लाया है, हम नहीं जानते कि उसे क्या हुआ?' (IN)

निर्गमन 32:24 तब मैंने उनसे कहा, 'जिस-जिस के पास सोने के गहने हों, वे उनको तोड़कर उतार लाएँ;' और जब उन्होंने मुझ को दिया, मैंने उन्हें आग में डाल दिया, तब यह बछड़ा निकल पड़ा।” (IN)

निर्गमन 32:25 हारून ने उन लोगों को ऐसा निरंकुश कर दिया था कि वे अपने विरोधियों के बीच उपहास के योग्य हुए, (IN)

निर्गमन 32:26 उनको निरंकुश देखकर मूसा ने छावनी के निकास पर खड़े होकर कहा, “जो कोई यहोवा की ओर का हो वह मेरे पास आए;” तब सारे लेवीय उसके पास इकट्ठे हुए। (IN)

निर्गमन 32:27 उसने उनसे कहा, “इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा यह कहता है, कि अपनी-अपनी जाँघ पर तलवार लटकाकर छावनी से एक निकास से दूसरे निकास तक घूम-घूमकर अपने-अपने भाइयों, संगियों, और पड़ोसियों को घात करो।” (IN)

निर्गमन 32:28 मूसा के इस वचन के अनुसार लेवियों ने किया और उस दिन तीन हजार के लगभग लोग मारे गए। (IN)

निर्गमन 32:29 फिर मूसा ने कहा, “आज के दिन यहोवा के लिये अपना याजकपद का संस्कार करो, वरन् अपने-अपने बेटों और भाइयों के भी विरुद्ध होकर ऐसा करो जिससे वह आज तुमको आशीष दे।” (IN)

निर्गमन 32:30 दूसरे दिन मूसा ने लोगों से कहा, “तुमने बड़ा ही पाप किया है। अब मैं यहोवा के पास चढ़ जाऊँगा; सम्भव है कि मैं तुम्हारे पाप का प्रायश्चित कर सकूँ।” (IN)

निर्गमन 32:31 तब मूसा यहोवा के पास जाकर कहने लगा, “हाय, हाय, उन लोगों ने सोने का देवता बनवाकर बड़ा ही पाप किया है। (IN)

निर्गमन 32:32 तो भी अब तू उनका पाप क्षमा कर नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे।” (IN)

निर्गमन 32:33 यहोवा ने मूसा से कहा, “जिसने मेरे विरुद्ध पाप किया है उसी का नाम मैं अपनी पुस्तक में से काट दूँगा। (IN)

निर्गमन 32:34 अब तो तू जाकर उन लोगों को उस स्थान में ले चल जिसकी चर्चा मैंने तुझसे की थी; देख मेरा दूत तेरे आगे-आगे चलेगा। परन्तु जिस दिन मैं दण्ड देने लगूँगा उस दिन उनको इस पाप का भी दण्ड दूँगा।” (IN)

निर्गमन 32:35 अतः यहोवा ने उन लोगों पर विपत्ति डाली, क्योंकि हारून के बनाए हुए बछड़े को उन्हीं ने बनवाया था। (IN)

निर्गमन 33:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “तू उन लोगों को जिन्हें मिस्र देश से छुड़ा लाया है संग लेकर उस देश को जा, जिसके विषय मैंने अब्राहम, इसहाक और याकूब से शपथ खाकर कहा था, 'मैं उसे तुम्हारे वंश को दूँगा।' (IN)

निर्गमन 33:2 और मैं तेरे आगे-आगे एक दूत को भेजूँगा और कनानी, एमोरी, हित्ती, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी लोगों को बरबस निकाल दूँगा। (IN)

निर्गमन 33:3 तुम लोग उस देश को जाओ जिसमें दूध और मधु की धारा बहती है; परन्तु तुम हठीले हो, इस कारण मैं तुम्हारे बीच में होकर न चलूँगा, ऐसा न हो कि मैं मार्ग में तुम्हारा अन्त कर डालूँ।” (IN)

निर्गमन 33:4 यह बुरा समाचार सुनकर वे लोग विलाप करने लगे; और कोई अपने गहने पहने हुए न रहा। (IN)

निर्गमन 33:5 क्योंकि यहोवा ने मूसा से कह दिया था, “इस्राएलियों को मेरा यह वचन सुना, 'तुम लोग तो हठीले हो; जो मैं पल भर के लिये तुम्हारे बीच होकर चलूँ, तो तुम्हारा अन्त कर डालूँगा। इसलिए अब अपने-अपने गहने अपने अंगों से उतार दो, कि मैं जानूँ कि तुम्हारे साथ क्या करना चाहिए'।” (IN)

निर्गमन 33:6 तब इस्राएली होरेब पर्वत से लेकर आगे को अपने गहने उतारे रहे। (IN)

निर्गमन 33:7 ¶ मूसा तम्बू को छावनी से बाहर वरन् दूर खड़ा कराया करता था, और उसको मिलापवाला तम्बू कहता था। और जो कोई यहोवा को ढूँढ़ता वह उस मिलापवाले तम्बू के पास जो छावनी के बाहर था निकल जाता था। (IN)

निर्गमन 33:8 जब-जब मूसा तम्बू के पास जाता, तब-तब सब लोग उठकर अपने-अपने डेरे के द्वार पर खड़े हो जाते, और जब तक मूसा उस तम्बू में प्रवेश न करता था तब तक उसकी ओर ताकते रहते थे। (IN)

निर्गमन 33:9 जब मूसा उस तम्बू में प्रवेश करता था, तब बादल का खम्भा उतरकर तम्बू के द्वार पर ठहर जाता था, और यहोवा मूसा से बातें करने लगता था। (IN)

निर्गमन 33:10 और सब लोग जब बादल के खम्भे को तम्बू के द्वार पर ठहरा देखते थे, तब उठकर अपने-अपने डेरे के द्वार पर से दण्डवत् करते थे। (IN)

निर्गमन 33:11 और यहोवा मूसा से इस प्रकार आमने-सामने बातें करता था, जिस प्रकार कोई अपने भाई से बातें करे। और मूसा तो छावनी में फिर लौट आता था, पर यहोशू नामक एक जवान, जो नून का पुत्र और मूसा का टहलुआ था, वह तम्बू में से न निकलता था। (IN)

निर्गमन 33:12 ¶ और मूसा ने यहोवा से कहा, “सुन तू मुझसे कहता है, 'इन लोगों को ले चल;' परन्तु यह नहीं बताया कि तू मेरे संग किसको भेजेगा। तो भी तूने कहा है, 'तेरा नाम मेरे चित्त में बसा है, और तुझ पर मेरे अनुग्रह की दृष्टि है।' (IN)

निर्गमन 33:13 और अब यदि मुझ पर तेरे अनुग्रह की दृष्टि हो, तो मुझे अपनी गति समझा दे, जिससे जब मैं तेरा ज्ञान पाऊँ तब तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर बनी रहे। फिर इसकी भी सुधि कर कि यह जाति तेरी प्रजा है।” (IN)

निर्गमन 33:14 यहोवा ने कहा, “मैं आप चलूँगा और तुझे विश्राम दूँगा।” (IN)

निर्गमन 33:15 उसने उससे कहा, “यदि तू आप न चले, तो हमें यहाँ से आगे न ले जा। (IN)

निर्गमन 33:16 यह कैसे जाना जाए कि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर और अपनी प्रजा पर है? क्या इससे नहीं कि तू हमारे संग-संग चले, जिससे मैं और तेरी प्रजा के लोग पृथ्वी भर के सब लोगों से अलग ठहरें?” (IN)

निर्गमन 33:17 यहोवा ने मूसा से कहा, “मैं यह काम भी जिसकी चर्चा तूने की है करूँगा; क्योंकि मेरे अनुग्रह की दृष्टि तुझ पर है, और तेरा नाम मेरे चित्त में बसा है।” (IN)

निर्गमन 33:18 उसने कहा, “मुझे अपना तेज दिखा दे।” (IN)

निर्गमन 33:19 उसने कहा, “मैं तेरे सम्मुख होकर चलते हुए तुझे अपनी सारी भलाई दिखाऊँगा, और तेरे सम्मुख यहोवा नाम का प्रचार करूँगा, और जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूँ उसी पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा।” (IN)

निर्गमन 33:20 फिर उसने कहा, “तू मेरे मुख का दर्शन नहीं कर सकता; क्योंकि मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता।” (IN)

निर्गमन 33:21 फिर यहोवा ने कहा, “सुन, मेरे पास एक स्थान है, तू उस चट्टान पर खड़ा हो; (IN)

निर्गमन 33:22 और जब तक मेरा तेज तेरे सामने होकर चलता रहे तब तक मैं तुझे चट्टान के दरार में रखूँगा, और जब तक मैं तेरे सामने होकर न निकल जाऊँ तब तक अपने हाथ से तुझे ढाँपे रहूँगा; (IN)

निर्गमन 33:23 फिर मैं अपना हाथ उठा लूँगा, तब तू मेरी पीठ का तो दर्शन पाएगा, परन्तु मेरे मुख का दर्शन नहीं मिलेगा।” (IN)

निर्गमन 34:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “पहली तख्तियों के समान पत्थर की दो और तख्तियाँ गढ़ ले; तब जो वचन उन पहली तख्तियों पर लिखे थे, जिन्हें तूने तोड़ डाला, वे ही वचन मैं उन तख्तियों पर भी लिखूँगा। (IN)

निर्गमन 34:2 और सवेरे तैयार रहना, और भोर को सीनै पर्वत पर चढ़कर उसकी चोटी पर मेरे सामने खड़ा होना। (IN)

निर्गमन 34:3 तेरे संग कोई न चढ़ पाए, वरन् पर्वत भर पर कोई मनुष्य कहीं दिखाई न दे; और न भेड़-बकरी और गाय-बैल भी पर्वत के आगे चरने पाएँ।” (IN)

निर्गमन 34:4 तब मूसा ने पहली तख्तियों के समान दो और तख्तियाँ गढ़ीं; और भोर को सवेरे उठकर अपने हाथ में पत्थर की वे दोनों तख्तियाँ लेकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार पर्वत पर चढ़ गया। (IN)

निर्गमन 34:5 तब यहोवा ने बादल में उतरकर उसके संग वहाँ खड़ा होकर यहोवा नाम का प्रचार किया। (IN)

निर्गमन 34:6 और यहोवा उसके सामने होकर यों प्रचार करता हुआ चला, “यहोवा, यहोवा, परमेश्‍वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य, (IN)

निर्गमन 34:7 हजारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप को क्षमा करनेवाला है, परन्तु दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष न ठहराएगा, वह पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों वरन् पोतों और परपोतों को भी देनेवाला है।” (IN)

निर्गमन 34:8 तब मूसा ने फुर्ती कर पृथ्वी की ओर झुककर दण्डवत् की। (IN)

निर्गमन 34:9 और उसने कहा, “हे प्रभु, यदि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो तो प्रभु, हम लोगों के बीच में होकर चले, ये लोग हठीले तो हैं, तो भी हमारे अधर्म और पाप को क्षमा कर, और हमें अपना निज भाग मानकर ग्रहण कर।” (IN)

निर्गमन 34:10 ¶ उसने कहा, “सुन, मैं एक वाचा बाँधता हूँ। तेरे सब लोगों के सामने मैं ऐसे आश्चर्यकर्म करूँगा जैसा पृथ्वी पर और सब जातियों में कभी नहीं हुए; और वे सारे लोग जिनके बीच तू रहता है यहोवा के कार्य को देखेंगे; क्योंकि जो मैं तुम लोगों से करने पर हूँ वह भय योग्य काम है। (IN)

निर्गमन 34:11 जो आज्ञा मैं आज तुम्हें देता हूँ उसे तुम लोग मानना। देखो, मैं तुम्हारे आगे से एमोरी, कनानी, हित्ती, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी लोगों को निकालता हूँ। (IN)

निर्गमन 34:12 इसलिए सावधान रहना कि जिस देश में तू जानेवाला है उसके निवासियों से वाचा न बाँधना; कहीं ऐसा न हो कि वह तेरे लिये फंदा ठहरे। (IN)

निर्गमन 34:13 वरन् उनकी वेदियों को गिरा देना, उनकी लाठों को तोड़ डालना, और उनकी अशेरा नामक मूर्तियों को काट डालना; (IN)

निर्गमन 34:14 क्योंकि तुम्हें किसी दूसरे को परमेश्‍वर करके दण्डवत् करने की आज्ञा नहीं, क्योंकि यहोवा जिसका नाम जलनशील है, वह जल उठनेवाला परमेश्‍वर है, (IN)

निर्गमन 34:15 ऐसा न हो कि तू उस देश के निवासियों से वाचा बाँधे, और वे अपने देवताओं के पीछे होने का व्यभिचार करें, और उनके लिये बलिदान भी करें, और कोई तुझे नेवता दे और तू भी उसके बलिपशु का प्रसाद खाए, (IN)

निर्गमन 34:16 और तू उनकी बेटियों को अपने बेटों के लिये लाये, और उनकी बेटियाँ जो आप अपने देवताओं के पीछे होने का व्यभिचार करती हैं तेरे बेटों से भी अपने देवताओं के पीछे होने को व्यभिचार करवाएँ। (IN)

निर्गमन 34:17 “तुम देवताओं की मूर्तियाँ ढालकर न बना लेना। (IN)

निर्गमन 34:18 “अख़मीरी रोटी का पर्व मानना। उसमें मेरी आज्ञा के अनुसार अबीब महीने के नियत समय पर सात दिन तक अख़मीरी रोटी खाया करना; क्योंकि तू मिस्र से अबीब महीने में निकल आया। (IN)

निर्गमन 34:19 हर एक पहलौठा मेरा है; और क्या बछड़ा, क्या मेम्‍ना, तेरे पशुओं में से जो नर पहलौठे हों वे सब मेरे ही हैं। (IN)

निर्गमन 34:20 और गदही के पहलौठे के बदले मेम्‍ना देकर उसको छुड़ाना, यदि तू उसे छुड़ाना न चाहे तो उसकी गर्दन तोड़ देना। परन्तु अपने सब पहलौठे बेटों को बदला देकर छुड़ाना। मुझे कोई खाली हाथ अपना मुँह न दिखाए। (IN)

निर्गमन 34:21 “छः दिन तो परिश्रम करना, परन्तु सातवें दिन विश्राम करना; वरन् हल जोतने और लवने के समय में भी विश्राम करना। (IN)

निर्गमन 34:22 और तू सप्ताहों का पर्व मानना जो पहले लवे हुए गेहूँ का पर्व कहलाता है, और वर्ष के अन्त में बटोरन का भी पर्व मानना। (IN)

निर्गमन 34:23 वर्ष में तीन बार तेरे सब पुरुष इस्राएल के परमेश्‍वर प्रभु यहोवा को अपने मुँह दिखाएँ। (IN)

निर्गमन 34:24 मैं तो अन्यजातियों को तेरे आगे से निकालकर तेरी सीमाओं को बढ़ाऊँगा; और जब तू अपने परमेश्‍वर यहोवा को अपना मुँह दिखाने के लिये वर्ष में तीन बार आया करे, तब कोई तेरी भूमि का लालच न करेगा। (IN)

निर्गमन 34:25 “मेरे बलिदान के लहू को ख़मीर सहित न चढ़ाना, और न फसह के पर्व के बलिदान में से कुछ सवेरे तक रहने देना। (IN)

निर्गमन 34:26 अपनी भूमि की पहली उपज का पहला भाग अपने परमेश्‍वर यहोवा के भवन में ले आना। बकरी के बच्चे को उसकी माँ के दूध में न पकाना।” (IN)

निर्गमन 34:27 और यहोवा ने मूसा से कहा, “ये वचन लिख ले; क्योंकि इन्हीं वचनों के अनुसार मैं तेरे और इस्राएल के साथ वाचा बाँधता हूँ।” (IN)

निर्गमन 34:28 मूसा तो वहाँ यहोवा के संग चालीस दिन और रात रहा; और तब तक न तो उसने रोटी खाई और न पानी पिया। और उसने उन तख्तियों पर वाचा के वचन अर्थात् दस आज्ञाएँ लिख दीं। (IN)

निर्गमन 34:29 ¶ जब मूसा साक्षी की दोनों तख्तियाँ हाथ में लिये हुए सीनै पर्वत से उतरा आता था तब यहोवा के साथ बातें करने के कारण उसके चेहरे से किरणें निकल रही थीं।, परन्तु वह यह नहीं जानता था कि उसके चेहरे से किरणें निकल रही हैं। (IN)

निर्गमन 34:30 जब हारून और सब इस्राएलियों ने मूसा को देखा कि उसके चेहरे से किरणें निकलती हैं, तब वे उसके पास जाने से डर गए। (IN)

निर्गमन 34:31 तब मूसा ने उनको बुलाया; और हारून मण्डली के सारे प्रधानों समेत उसके पास आया, और मूसा उनसे बातें करने लगा। (IN)

निर्गमन 34:32 इसके बाद सब इस्राएली पास आए, और जितनी आज्ञाएँ यहोवा ने सीनै पर्वत पर उसके साथ बात करने के समय दी थीं, वे सब उसने उन्हें बताईं। (IN)

निर्गमन 34:33 जब तक मूसा उनसे बात न कर चुका तब तक अपने मुँह पर ओढ़ना डाले रहा। (IN)

निर्गमन 34:34 और जब-जब मूसा भीतर यहोवा से बात करने को उसके सामने जाता तब-तब वह उस ओढ़नी को निकलते समय तक उतारे हुए रहता था; फिर बाहर आकर जो-जो आज्ञा उसे मिलती उन्हें इस्राएलियों से कह देता था। (IN)

निर्गमन 34:35 इस्राएली मूसा का चेहरा देखते थे कि उससे किरणें निकलती हैं; और जब तक वह यहोवा से बात करने को भीतर न जाता तब तक वह उस ओढ़नी को डाले रहता था। (IN)

निर्गमन 35:1 ¶ मूसा ने इस्राएलियों की सारी मण्डली इकट्ठा करके उनसे कहा, “जिन कामों के करने की आज्ञा यहोवा ने दी है वे ये हैं। (IN)

निर्गमन 35:2 छः दिन तो काम-काज किया जाए, परन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे लिये पवित्र और यहोवा के लिये पवित्र विश्राम का दिन ठहरे; उसमें जो कोई काम-काज करे वह मार डाला जाए; (IN)

निर्गमन 35:3 वरन् विश्राम के दिन तुम अपने-अपने घरों में आग तक न जलाना।” (IN)

निर्गमन 35:4 ¶ फिर मूसा ने इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहा, “जिस बात की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है। (IN)

निर्गमन 35:5 तुम्हारे पास से यहोवा के लिये भेंट ली जाए, अर्थात् जितने अपनी इच्छा से देना चाहें वे यहोवा की भेंट करके ये वस्तुएँ ले आएँ; अर्थात् सोना, रुपा, पीतल; (IN)

निर्गमन 35:6 नीले, बैंगनी और लाल रंग का कपड़ा, सूक्ष्म सनी का कपड़ा; बकरी का बाल, (IN)

निर्गमन 35:7 लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ों की खालें, सुइसों की खालें; बबूल की लकड़ी, (IN)

निर्गमन 35:8 उजियाला देने के लिये तेल, अभिषेक का तेल, और धूप के लिये सुगन्ध-द्रव्य, (IN)

निर्गमन 35:9 फिर एपोद और चपरास के लिये सुलैमानी मणि और जड़ने के लिये मणि। (IN)

निर्गमन 35:10 “तुम में से जितनों के हृदय में बुद्धि का प्रकाश है वे सब आकर जिस-जिस वस्तु की आज्ञा यहोवा ने दी है वे सब बनाएँ। (IN)

निर्गमन 35:11 अर्थात् तम्बू, और आवरण समेत निवास, और उसकी घुंडी, तख्ते, बेंड़े, खम्भे और कुर्सियाँ; (IN)

निर्गमन 35:12 फिर डंडों समेत सन्दूक, और प्रायश्चित का ढकना, और बीचवाला परदा; (IN)

निर्गमन 35:13 डंडों और सब सामान समेत मेज, और भेंट की रोटियाँ; (IN)

निर्गमन 35:14 सामान और दीपकों समेत उजियाला देनेवाला दीवट, और उजियाला देने के लिये तेल; (IN)

निर्गमन 35:15 डंडों समेत धूपवेदी, अभिषेक का तेल, सुगन्धित धूप, और निवास के द्वार का परदा; (IN)

निर्गमन 35:16 पीतल की झंझरी, डंडों आदि सारे सामान समेत होमवेदी, पाए समेत हौदी; (IN)

निर्गमन 35:17 खम्भों और उनकी कुर्सियों समेत आँगन के पर्दे, और आँगन के द्वार के पर्दे; (IN)

निर्गमन 35:18 निवास और आँगन दोनों के खूँटे, और डोरियाँ; (IN)

निर्गमन 35:19 पवित्रस्‍थान में सेवा टहल करने के लिये काढ़े हुए वस्त्र, और याजक का काम करने के लिये हारून याजक के पवित्र वस्त्र, और उसके पुत्रों के वस्त्र भी।” (IN)

निर्गमन 35:20 ¶ तब इस्राएलियों की सारी मण्डली मूसा के सामने से लौट गई। (IN)

निर्गमन 35:21 और जितनों को उत्साह हुआ, और जितनों के मन में ऐसी इच्छा उत्‍पन्‍न हुई थी, वे मिलापवाले तम्बू के काम करने और उसकी सारी सेवकाई और पवित्र वस्त्रों के बनाने के लिये यहोवा की भेंट ले आने लगे। (IN)

निर्गमन 35:22 क्या स्त्री, क्या पुरुष, जितनों के मन में ऐसी इच्छा उत्‍पन्‍न हुई थी वे सब जुगनू, नथनी, मुंदरी, और कंगन आदि सोने के गहने ले आने लगे, इस भाँति जितने मनुष्य यहोवा के लिये सोने की भेंट के देनेवाले थे वे सब उनको ले आए। (IN)

निर्गमन 35:23 और जिस-जिस पुरुष के पास नीले, बैंगनी या लाल रंग का कपड़ा या सूक्ष्म सनी का कपड़ा, या बकरी का बाल, या लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ों की खालें, या सुइसों की खालें थीं वे उन्हें ले आए। (IN)

निर्गमन 35:24 फिर जितने चाँदी, या पीतल की भेंट के देनेवाले थे वे यहोवा के लिये वैसी भेंट ले आए; और जिस-जिस के पास सेवकाई के किसी काम के लिये बबूल की लकड़ी थी वे उसे ले आए। (IN)

निर्गमन 35:25 और जितनी स्त्रियों के हृदय में बुद्धि का प्रकाश था वे अपने हाथों से सूत कात-कातकर नीले, बैंगनी और लाल रंग के, और सूक्ष्म सनी के काते हुए सूत को ले आईं। (IN)

निर्गमन 35:26 और जितनी स्त्रियों के मन में ऐसी बुद्धि का प्रकाश था उन्होंने बकरी के बाल भी काते। (IN)

निर्गमन 35:27 और प्रधान लोग एपोद और चपरास के लिये सुलैमानी मणि, और जड़ने के लिये मणि, (IN)

निर्गमन 35:28 और उजियाला देने और अभिषेक और धूप के सुगन्ध-द्रव्य और तेल ले आए। (IN)

निर्गमन 35:29 जिस-जिस वस्तु के बनाने की आज्ञा यहोवा ने मूसा के द्वारा दी थी उसके लिये जो कुछ आवश्यक था, उसे वे सब पुरुष और स्त्रियाँ ले आईं, जिनके हृदय में ऐसी इच्छा उत्‍पन्‍न हुई थी। इस प्रकार इस्राएली यहोवा के लिये अपनी ही इच्छा से भेंट ले आए। (IN)

निर्गमन 35:30 ¶ तब मूसा ने इस्राएलियों से कहा सुनो, “यहोवा ने यहूदा के गोत्रवाले बसलेल को, जो ऊरी का पुत्र और हूर का पोता है, नाम लेकर बुलाया है। (IN)

निर्गमन 35:31 और उसने उसको परमेश्‍वर के आत्मा से ऐसा परिपूर्ण किया है कि सब प्रकार की बनावट के लिये उसको ऐसी बुद्धि, समझ, और ज्ञान मिला है, (IN)

निर्गमन 35:32 कि वह कारीगरी की युक्तियाँ निकालकर सोने, चाँदी, और पीतल में, (IN)

निर्गमन 35:33 और जड़ने के लिये मणि काटने में और लकड़ी पर नक्काशी करने में, वरन् बुद्धि से सब भाँति की निकाली हुई बनावट में काम कर सके। (IN)

निर्गमन 35:34 फिर यहोवा ने उसके मन में और दान के गोत्रवाले अहीसामाक के पुत्र ओहोलीआब के मन में भी शिक्षा देने की शक्ति दी है। (IN)

निर्गमन 35:35 इन दोनों के हृदय को यहोवा ने ऐसी बुद्धि से परिपूर्ण किया है, कि वे नक्काशी करने और गढ़ने और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े, और सूक्ष्म सनी के कपड़े में काढ़ने और बुनने, वरन् सब प्रकार की बनावट में, और बुद्धि से काम निकालने में सब भाँति के काम करें। (IN)

निर्गमन 36:1 ¶ “बसलेल और ओहोलीआब और सब बुद्धिमान जिनको यहोवा ने ऐसी बुद्धि और समझ दी हो, कि वे यहोवा की सारी आज्ञाओं के अनुसार पवित्रस्‍थान की सेवकाई के लिये सब प्रकार का काम करना जानें, वे सब यह काम करें।” (IN)

निर्गमन 36:2 ¶ तब मूसा ने बसलेल और ओहोलीआब और सब बुद्धिमानों को जिनके हृदय में यहोवा ने बुद्धि का प्रकाश दिया था, अर्थात् जिस-जिस को पास आकर काम करने का उत्साह हुआ था उन सभी को बुलवाया। (IN)

निर्गमन 36:3 और इस्राएली जो-जो भेंट पवित्रस्‍थान की सेवकाई के काम और उसके बनाने के लिये ले आए थे, उन्हें उन पुरुषों ने मूसा के हाथ से ले लिया। तब भी लोग प्रति भोर को उसके पास भेंट अपनी इच्छा से लाते रहे; (IN)

निर्गमन 36:4 और जितने बुद्धिमान पवित्रस्‍थान का काम करते थे वे सब अपना-अपना काम छोड़कर मूसा के पास आए, (IN)

निर्गमन 36:5 और कहने लगे, “जिस काम के करने की आज्ञा यहोवा ने दी है उसके लिये जितना चाहिये उससे अधिक वे ले आए हैं।” (IN)

निर्गमन 36:6 तब मूसा ने सारी छावनी में इस आज्ञा का प्रचार करवाया, “क्या पुरुष, क्या स्त्री, कोई पवित्रस्‍थान के लिये और भेंट न लाए।” इस प्रकार लोग और भेंट लाने से रोके गए। (IN)

निर्गमन 36:7 क्योंकि सब काम बनाने के लिये जितना सामान आवश्यक था उतना वरन् उससे अधिक बनाने वालों के पास आ चुका था। (IN)

निर्गमन 36:8 ¶ और काम करनेवाले जितने बुद्धिमान थे उन्होंने निवास के लिये बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े के, और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े के दस परदों को काढ़े हुए करूबों सहित बनाया। (IN)

निर्गमन 36:9 एक-एक परदे की लम्बाई अट्ठाईस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हुई; सब परदे एक ही नाप के बने। (IN)

निर्गमन 36:10 उसने पाँच परदे एक दूसरे से जोड़ दिए, और फिर दूसरे पाँच परदे भी एक दूसरे से जोड़ दिए। (IN)

निर्गमन 36:11 और जहाँ ये परदे जोड़े गए वहाँ की दोनों छोरों पर उसने नीले-नीले फंदे लगाए। (IN)

निर्गमन 36:12 उसने दोनों छोरों में पचास-पचास फंदे इस प्रकार लगाए कि वे एक दूसरे के सामने थे। (IN)

निर्गमन 36:13 और उसने सोने की पचास अंकड़े बनाए, और उनके द्वारा परदों को एक दूसरे से ऐसा जोड़ा कि निवास मिलकर एक हो गया। (IN)

निर्गमन 36:14 फिर निवास के ऊपर के तम्बू के लिये उसने बकरी के बाल के ग्यारह परदे बनाए। (IN)

निर्गमन 36:15 एक-एक परदे की लम्बाई तीस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हुई; और ग्यारहों परदे एक ही नाप के थे। (IN)

निर्गमन 36:16 इनमें से उसने पाँच परदे अलग और छः परदे अलग जोड़ दिए। (IN)

निर्गमन 36:17 और जहाँ दोनों जोड़े गए वहाँ की छोरों में उसने पचास-पचास फंदे लगाए। (IN)

निर्गमन 36:18 और उसने तम्बू के जोड़ने के लिये पीतल की पचास अंकड़े भी बनाए जिससे वह एक हो जाए। (IN)

निर्गमन 36:19 और उसने तम्बू के लिये लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ों की खालों का एक ओढ़ना और उसके ऊपर के लिये सुइसों की खालों का एक ओढ़ना बनाया। (IN)

निर्गमन 36:20 फिर उसने निवास के लिये बबूल की लकड़ी के तख्तों को खड़े रहने के लिये बनाया। (IN)

निर्गमन 36:21 एक-एक तख्ते की लम्बाई दस हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ की हुई। (IN)

निर्गमन 36:22 एक-एक तख्ते में एक दूसरी से जोड़ी हुई दो-दो चूलें बनीं, निवास के सब तख्तों के लिये उसने इसी भाँति बनाया। (IN)

निर्गमन 36:23 और उसने निवास के लिये तख्तों को इस रीति से बनाया कि दक्षिण की ओर बीस तख्ते लगे। (IN)

निर्गमन 36:24 और इन बीसों तख्तो के नीचे चाँदी की चालीस कुर्सियाँ, अर्थात् एक-एक तख्ते के नीचे उसकी दो चूलों के लिये उसने दो कुर्सियाँ बनाईं। (IN)

निर्गमन 36:25 और निवास की दूसरी ओर, अर्थात् उत्तर की ओर के लिये भी उसने बीस तख्ते बनाए। (IN)

निर्गमन 36:26 और इनके लिये भी उसने चाँदी की चालीस कुर्सियाँ, अर्थात् एक-एक तख्ते के नीचे दो-दो कुर्सियाँ बनाईं। (IN)

निर्गमन 36:27 और निवास की पिछली ओर, अर्थात् पश्चिम ओर के लिये उसने छः तख्ते बनाए। (IN)

निर्गमन 36:28 और पिछले भाग में निवास के कोनों के लिये उसने दो तख्ते बनाए। (IN)

निर्गमन 36:29 और वे नीचे से दो-दो भाग के बने, और दोनों भाग ऊपर के सिरे तक एक-एक कड़े में मिलाये गए; उसने उन दोनों तख्तों का आकार ऐसा ही बनाया। (IN)

निर्गमन 36:30 इस प्रकार आठ तख्ते हुए, और उनकी चाँदी की सोलह कुर्सियाँ हुईं, अर्थात् एक-एक तख्ते के नीचे दो-दो कुर्सियाँ हुईं। (IN)

निर्गमन 36:31 फिर उसने बबूल की लकड़ी के बेंड़े बनाए, अर्थात् निवास की एक ओर के तख्तों के लिये पाँच बेंड़े, (IN)

निर्गमन 36:32 और निवास की दूसरी ओर के तख्तों के लिये पाँच बेंड़े, और निवास का जो किनारा पश्चिम की ओर पिछले भाग में था उसके लिये भी पाँच बेंड़े, बनाए। (IN)

निर्गमन 36:33 और उसने बीचवाले बेंड़े को तख्तों के मध्य में तम्बू के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के लिये बनाया। (IN)

निर्गमन 36:34 और तख्तों को उसने सोने से मढ़ा, और बेंड़ों के घर को काम देनेवाले कड़ों को सोने के बनाया, और बेंड़ों को भी सोने से मढ़ा। (IN)

निर्गमन 36:35 फिर उसने नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का, और बटी हुई सूक्ष्म सनीवाले कपड़े का बीचवाला परदा बनाया; वह कढ़ाई के काम किये हुए करूबों के साथ बना। (IN)

निर्गमन 36:36 और उसने उसके लिये बबूल के चार खम्भे बनाए, और उनको सोने से मढ़ा; उनकी घुंडियाँ सोने की बनीं, और उसने उनके लिये चाँदी की चार कुर्सियाँ ढालीं। (IN)

निर्गमन 36:37 उसने तम्बू के द्वार के लिये भी नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का, और बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े का कढ़ाई का काम किया हुआ परदा बनाया। (IN)

निर्गमन 36:38 और उसने घुंडियों समेत उसके पाँच खम्भे भी बनाए, और उनके सिरों और जोड़ने की छड़ों को सोने से मढ़ा, और उनकी पाँच कुर्सियाँ पीतल की बनाईं। (IN)

निर्गमन 37:1 ¶ फिर बसलेल ने बबूल की लकड़ी का सन्दूक बनाया; उसकी लम्बाई ढाई हाथ, चौड़ाई डेढ़ हाथ, और ऊँचाई डेढ़ हाथ की थी। (IN)

निर्गमन 37:2 उसने उसको भीतर बाहर शुद्ध सोने से मढ़ा, और उसके चारों ओर सोने की बाड़ बनाई। (IN)

निर्गमन 37:3 और उसके चारों पायों पर लगाने को उसने सोने के चार कड़े ढाले, दो कड़े एक ओर और दो कड़े दूसरी ओर लगे। (IN)

निर्गमन 37:4 फिर उसने बबूल के डंडे बनाए, और उन्हें सोने से मढ़ा, (IN)

निर्गमन 37:5 और उनको सन्दूक के दोनों ओर के कड़ों में डाला कि उनके बल सन्दूक उठाया जाए। (IN)

निर्गमन 37:6 फिर उसने शुद्ध सोने के प्रायश्चितवाले ढकने को बनाया; उसकी लम्बाई ढाई हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ की थी। (IN)

निर्गमन 37:7 और उसने सोना गढ़कर दो करूब प्रायश्चित के ढकने के दोनों सिरों पर बनाए; (IN)

निर्गमन 37:8 एक करूब तो एक सिरे पर, और दूसरा करूब दूसरे सिरे पर बना; उसने उनको प्रायश्चित के ढकने के साथ एक ही टुकड़े के दोनों सिरों पर बनाया। (IN)

निर्गमन 37:9 और करूबों के पंख ऊपर से फैले हुए बने, और उन पंखों से प्रायश्चित का ढकना ढपा हुआ बना, और उनके मुख आमने-सामने और प्रायश्चित के ढकने की ओर किए हुए बने। (IN)

निर्गमन 37:10 ¶ फिर उसने बबूल की लकड़ी की मेज को बनाया; उसकी लम्बाई दो हाथ, चौड़ाई एक हाथ, और ऊँचाई डेढ़ हाथ की थी; (IN)

निर्गमन 37:11 और उसने उसको शुद्ध सोने से मढ़ा, और उसमें चारों ओर शुद्ध सोने की एक बाड़ बनाई। (IN)

निर्गमन 37:12 और उसने उसके लिये चार अंगुल चौड़ी एक पटरी, और इस पटरी के लिये चारों ओर सोने की एक बाड़ बनाई। (IN)

निर्गमन 37:13 और उसने मेज के लिये सोने के चार कड़े ढालकर उन चारों कोनों में लगाया, जो उसके चारों पायों पर थे। (IN)

निर्गमन 37:14 वे कड़े पटरी के पास मेज उठाने के डंडों के खानों का काम देने को बने। (IN)

निर्गमन 37:15 और उसने मेज उठाने के लिये डंडों को बबूल की लकड़ी के बनाया, और सोने से मढ़ा। (IN)

निर्गमन 37:16 और उसने मेज पर का सामान अर्थात् परात, धूपदान, कटोरे, और उण्डेलने के बर्तन सब शुद्ध सोने के बनाए। (IN)

निर्गमन 37:17 ¶ फिर उसने शुद्ध सोना गढ़कर पाए और डंडी समेत दीवट को बनाया; उसके पुष्पकोष, गाँठ, और फूल सब एक ही टुकड़े के बने। (IN)

निर्गमन 37:18 और दीवट से निकली हुई छः डालियाँ बनीं; तीन डालियाँ तो उसकी एक ओर से और तीन डालियाँ उसकी दूसरी ओर से निकली हुई बनीं। (IN)

निर्गमन 37:19 एक-एक डाली में बादाम के फूल के सरीखे तीन-तीन पुष्पकोष, एक-एक गाँठ, और एक-एक फूल बना; दीवट से निकली हुई, उन छहों डालियों का यही आकार हुआ। (IN)

निर्गमन 37:20 और दीवट की डंडी में बादाम के फूल के समान अपनी-अपनी गाँठ और फूल समेत चार पुष्पकोष बने। (IN)

निर्गमन 37:21 और दीवट से निकली हुई छहों डालियों में से दो-दो डालियों के नीचे एक-एक गाँठ दीवट के साथ एक ही टुकड़े की बनी। (IN)

निर्गमन 37:22 गाँठें और डालियाँ सब दीवट के साथ एक ही टुकड़े की बनीं; सारा दीवट गढ़े हुए शुद्ध सोने का और एक ही टुकड़े का बना। (IN)

निर्गमन 37:23 और उसने दीवट के सातों दीपक, और गुलतराश, और गुलदान, शुद्ध सोने के बनाए। (IN)

निर्गमन 37:24 उसने सारे सामान समेत दीवट को किक्कार भर सोने का बनाया। (IN)

निर्गमन 37:25 ¶ फिर उसने बबूल की लकड़ी की धूप वेदी भी बनाई; उसकी लम्बाई एक हाथ और चौड़ाई एक हाथ की थी; वह चौकोर बनी, और उसकी ऊँचाई दो हाथ की थी; और उसके सींग उसके साथ बिना जोड़ के बने थे (IN)

निर्गमन 37:26 ऊपरवाले पल्लों, और चारों ओर के बाजुओं और सींगों समेत उसने उस वेदी को शुद्ध सोने से मढ़ा; और उसके चारों ओर सोने की एक बाड़ बनाई, (IN)

निर्गमन 37:27 और उस बाड़ के नीचे उसके दोनों पल्लों पर उसने सोने के दो कड़े बनाए, जो उसके उठाने के डंडों के खानों का काम दें। (IN)

निर्गमन 37:28 और डंडों को उसने बबूल की लकड़ी का बनाया, और सोने से मढ़ा। (IN)

निर्गमन 37:29 और उसने अभिषेक का पवित्र तेल, और सुगन्ध-द्रव्य का धूप गंधी की रीति के अनुसार बनाया। (IN)

निर्गमन 38:1 ¶ फिर उसने बबूल की लकड़ी की होमबलि के लिये वेदी भी बनाई; उसकी लम्बाई पाँच हाथ और चौड़ाई पाँच हाथ की थी; इस प्रकार से वह चौकोर बनी, और ऊँचाई तीन हाथ की थी। (IN)

निर्गमन 38:2 और उसने उसके चारों कोनों पर उसके चार सींग बनाए, वे उसके साथ बिना जोड़ के बने; और उसने उसको पीतल से मढ़ा। (IN)

निर्गमन 38:3 और उसने वेदी का सारा सामान, अर्थात् उसकी हाँडियों, फावड़ियों, कटोरों, काँटों, और करछों को बनाया। उसका सारा सामान उसने पीतल का बनाया। (IN)

निर्गमन 38:4 और वेदी के लिये उसके चारों ओर की कँगनी के तले उसने पीतल की जाली की एक झंझरी बनाई, वह नीचे से वेदी की ऊँचाई के मध्य तक पहुँची। (IN)

निर्गमन 38:5 और उसने पीतल की झंझरी के चारों कोनों के लिये चार कड़े ढाले, जो डंडों के खानों का काम दें। (IN)

निर्गमन 38:6 फिर उसने डंडों को बबूल की लकड़ी का बनाया, और पीतल से मढ़ा। (IN)

निर्गमन 38:7 तब उसने डंडों को वेदी की ओर के कड़ों में वेदी के उठाने के लिये डाल दिया। वेदी को उसने तख्तों से खोखली बनाया। (IN)

निर्गमन 38:8 ¶ उसने हौदी और उसका पाया दोनों पीतल के बनाए, यह मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सेवा करनेवाली महिलाओं के पीतल के दर्पणों के लिये बनाए गए। (IN)

निर्गमन 38:9 ¶ फिर उसने आँगन बनाया; और दक्षिण की ओर के लिये आँगन के पर्दे बटी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े के थे, और सब मिलाकर सौ हाथ लम्बे थे; (IN)

निर्गमन 38:10 उनके लिये बीस खम्भे, और इनकी पीतल की बीस कुर्सियाँ बनीं; और खम्भों की घुंडियाँ और जोड़ने की छड़ें चाँदी की बनीं। (IN)

निर्गमन 38:11 और उत्तर की ओर के लिये भी सौ हाथ लम्बे पर्दे बने; और उनके लिये बीस खम्भे, और इनकी पीतल की बीस ही कुर्सियाँ बनीं, और खम्भों की घुंडियाँ और जोड़ने की छड़ें चाँदी की बनीं। (IN)

निर्गमन 38:12 और पश्चिम की ओर के लिये सब पर्दे मिलाकर पचास हाथ के थे; उनके लिए दस खम्भे, और दस ही उनकी कुर्सियाँ थीं, और खम्भों की घुंडियाँ और जोड़ने की छड़ें चाँदी की थीं। (IN)

निर्गमन 38:13 और पूरब की ओर भी वह पचास हाथ के थे। (IN)

निर्गमन 38:14 आँगन के द्वार के एक ओर के लिये पन्द्रह हाथ के पर्दे बने; और उनके लिये तीन खम्भे और तीन कुर्सियाँ थीं। (IN)

निर्गमन 38:15 और आँगन के द्वार के दूसरी ओर भी वैसा ही बना था; और आँगन के दरवाज़े के इधर और उधर पन्द्रह-पन्द्रह हाथ के पर्दे बने थे; और उनके लिये तीन ही तीन खम्भे, और तीन ही तीन इनकी कुर्सियाँ भी थीं। (IN)

निर्गमन 38:16 आँगन की चारों ओर सब पर्दे सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े के बने हुए थे। (IN)

निर्गमन 38:17 और खम्भों की कुर्सियाँ पीतल की, और घुंडियाँ और छड़ें चाँदी की बनीं, और उनके सिरे चाँदी से मढ़े गए, और आँगन के सब खम्भे चाँदी के छड़ों से जोड़े गए थे। (IN)

निर्गमन 38:18 आँगन के द्वार के पर्दे पर बेल बूटे का काम किया हुआ था, और वह नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का; और सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े के बने थे; और उसकी लम्बाई बीस हाथ की थी, और उसकी ऊँचाई आँगन की कनात की चौड़ाई के सामान पाँच हाथ की बनी। (IN)

निर्गमन 38:19 और उनके लिये चार खम्भे, और खम्भों की चार ही कुर्सियाँ पीतल की बनीं, उनकी घुंडियाँ चाँदी की बनीं, और उनके सिरे चाँदी से मढ़े गए, और उनकी छड़ें चाँदी की बनीं। (IN)

निर्गमन 38:20 और निवास और आँगन के चारों ओर के सब खूँटे पीतल के बने थे। (IN)

निर्गमन 38:21 ¶ साक्षीपत्र के निवास का सामान जो लेवियों के सेवाकार्य के लिये बना; और जिसकी गिनती हारून याजक के पुत्र ईतामार के द्वारा मूसा के कहने से हुई थी, उसका वर्णन यह है। (IN)

निर्गमन 38:22 जिस-जिस वस्तु के बनाने की आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी उसको यहूदा के गोत्रवाले बसलेल ने, जो हूर का पोता और ऊरी का पुत्र था, बना दिया। (IN)

निर्गमन 38:23 और उसके संग दान के गोत्रवाले, अहीसामाक का पुत्र, ओहोलीआब था, जो नक्काशी करने और काढ़नेवाला और नीले, बैंगनी और लाल रंग के और सूक्ष्म सनी के कपड़े में कढ़ाई करनेवाला निपुण कारीगर था। (IN)

निर्गमन 38:24 पवित्रस्‍थान के सारे काम में जो भेंट का सोना लगा वह पवित्रस्‍थान के शेकेल के हिसाब से उनतीस किक्कार, और सात सौ तीस शेकेल था। (IN)

निर्गमन 38:25 और मण्डली के गिने हुए लोगों की भेंट की चाँदी पवित्रस्‍थान के शेकेल के हिसाब से सौ किक्कार, और सत्तरह सौ पचहत्तर शेकेल थी। (IN)

निर्गमन 38:26 अर्थात् जितने बीस वर्ष के और उससे अधिक आयु के गिने गए थे, वे छः लाख तीन हजार साढ़े पाँच सौ पुरुष थे, और एक-एक जन की ओर से पवित्रस्‍थान के शेकेल के अनुसार आधा शेकेल, जो एक बेका होता है, मिला। (IN)

निर्गमन 38:27 और वह सौ किक्कार चाँदी पवित्रस्‍थान और बीचवाले पर्दे दोनों की कुर्सियों के ढालने में लग गई; सौ किक्कार से सौ कुर्सियाँ बनीं, एक-एक कुर्सी एक किक्कार की बनी। (IN)

निर्गमन 38:28 और सत्तरह सौ पचहत्तर शेकेल जो बच गए उनसे खम्भों की घुंडियाँ बनाई गईं, और खम्भों की चोटियाँ मढ़ी गईं, और उनकी छड़ें भी बनाई गईं। (IN)

निर्गमन 38:29 और भेंट का पीतल सत्तर किक्कार और दो हजार चार सौ शेकेल था; (IN)

निर्गमन 38:30 इससे मिलापवाले तम्बू के द्वार की कुर्सियाँ, और पीतल की वेदी, पीतल की झंझरी, और वेदी का सारा सामान; (IN)

निर्गमन 38:31 और आँगन के चारों ओर की कुर्सियाँ, और उसके द्वार की कुर्सियाँ, और निवास, और आँगन के चारों ओर के खूँटे भी बनाए गए। (IN)

निर्गमन 39:1 ¶ फिर उन्होंने नीले, बैंगनी और लाल रंग के काढ़े हुए कपड़े पवित्रस्‍थान की सेवा के लिये, और हारून के लिये भी पवित्र वस्त्र बनाए; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 39:2 ¶ और उसने एपोद को सोने, और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का, और सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े का बनाया। (IN)

निर्गमन 39:3 और उन्होंने सोना पीट-पीट कर उसके पत्तर बनाए, फिर पत्तरों को काट-काटकर तार बनाए, और तारों को नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े में, और सूक्ष्म सनी के कपड़े में कढ़ाई की बनावट से मिला दिया। (IN)

निर्गमन 39:4 एपोद के जोड़ने को उन्होंने उसके कंधों पर के बन्धन बनाए, वह अपने दोनों सिरों से जोड़ा गया। (IN)

निर्गमन 39:5 और उसे कसने के लिये जो काढ़ा हुआ पटुका उस पर बना, वह उसके साथ बिना जोड़ का, और उसी की बनावट के अनुसार, अर्थात् सोने और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े का, और सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े का बना; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 39:6 उन्होंने सुलैमानी मणि काटकर उनमें इस्राएल के पुत्रों के नाम, जैसा छापा खोदा जाता है वैसे ही खोदे, और सोने के खानों में जड़ दिए। (IN)

निर्गमन 39:7 उसने उनको एपोद के कंधे के बन्धनों पर लगाया, जिससे इस्राएलियों के लिये स्मरण करानेवाले मणि ठहरें; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 39:8 ¶ उसने चपरास को एपोद के समान सोने की, और नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े की, और सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े में बेल बूटे का काम किया हुआ बनाया। (IN)

निर्गमन 39:9 चपरास तो चौकोर बनी; और उन्होंने उसको दोहरा बनाया, और वह दोहरा होकर एक बित्ता लम्बा और एक बित्ता चौड़ा बना। (IN)

निर्गमन 39:10 और उन्होंने उसमें चार पंक्तियों में मणि जड़े। पहली पंक्ति में माणिक्य, पद्मराग, और लालड़ी जड़े गए; (IN)

निर्गमन 39:11 और दूसरी पंक्ति में मरकत, नीलमणि, और हीरा, (IN)

निर्गमन 39:12 और तीसरी पंक्ति में लशम, सूर्यकांत, और नीलम; (IN)

निर्गमन 39:13 और चौथी पंक्ति में फीरोजा, सुलैमानी मणि, और यशब जड़े; ये सब अलग-अलग सोने के खानों में जड़े गए। (IN)

निर्गमन 39:14 और ये मणि इस्राएल के पुत्रों के नामों की गिनती के अनुसार बारह थे; बारहों गोत्रों में से एक-एक का नाम जैसा छापा खोदा जाता है वैसा ही खोदा गया। (IN)

निर्गमन 39:15 और उन्होंने चपरास पर डोरियों के समान गूँथे हुए शुद्ध सोने की जंजीर बनाकर लगाई; (IN)

निर्गमन 39:16 फिर उन्होंने सोने के दो खाने, और सोने की दो कड़ियाँ बनाकर दोनों कड़ियों को चपरास के दोनों सिरों पर लगाया; (IN)

निर्गमन 39:17 तब उन्होंने सोने की दोनों गूँथी हुई जंजीरों को चपरास के सिरों पर की दोनों कड़ियों में लगाया। (IN)

निर्गमन 39:18 और गूँथी हुई दोनों जंजीरों के दोनों बाकी सिरों को उन्होंने दोनों खानों में जड़ के, एपोद के सामने दोनों कंधों के बन्धनों पर लगाया। (IN)

निर्गमन 39:19 और उन्होंने सोने की और दो कड़ियाँ बनाकर चपरास के दोनों सिरों पर उसकी उस कोर पर, जो एपोद के भीतरी भाग में थी, लगाई। (IN)

निर्गमन 39:20 और उन्होंने सोने की दो और कड़ियाँ भी बनाकर एपोद के दोनों कंधों के बन्धनों पर नीचे से उसके सामने, और जोड़ के पास, एपोद के काढ़े हुए पटुके के ऊपर लगाई। (IN)

निर्गमन 39:21 तब उन्होंने चपरास को उसकी कड़ियों के द्वारा एपोद की कड़ियों में नीले फीते से ऐसा बाँधा, कि वह एपोद के काढ़े हुए पटुके के ऊपर रहे, और चपरास एपोद से अलग न होने पाए; जैसे यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 39:22 ¶ फिर एपोद का बागा सम्पूर्ण नीले रंग का बनाया गया। (IN)

निर्गमन 39:23 और उसकी बनावट ऐसी हुई कि उसके बीच बख्तर के छेद के समान एक छेद बना, और छेद के चारों ओर एक कोर बनी, कि वह फटने न पाए। (IN)

निर्गमन 39:24 और उन्होंने उसके नीचेवाले घेरे में नीले, बैंगनी और लाल रंग के कपड़े के अनार बनाए। (IN)

निर्गमन 39:25 और उन्होंने शुद्ध सोने की घंटियाँ भी बनाकर बागे के नीचेवाले घेरे के चारों ओर अनारों के बीचोंबीच लगाई; (IN)

निर्गमन 39:26 अर्थात् बागे के नीचेवाले घेरे के चारों ओर एक सोने की घंटी, और एक अनार फिर एक सोने की घंटी, और एक अनार लगाया गया कि उन्हें पहने हुए सेवा टहल करें; जैसे यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 39:27 फिर उन्होंने हारून, और उसके पुत्रों के लिये बुनी हुई सूक्ष्म सनी के कपड़े के अंगरखे, (IN)

निर्गमन 39:28 और सूक्ष्म सनी के कपड़े की पगड़ी, और सूक्ष्म सनी के कपड़े की सुन्दर टोपियाँ, और सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े की जाँघिया, (IN)

निर्गमन 39:29 और सूक्ष्म बटी हुई सनी के कपड़े की और नीले, बैंगनी और लाल रंग की कढ़ाई का काम की हुई पगड़ी; इन सभी को जिस तरह यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी वैसा ही बनाया। (IN)

निर्गमन 39:30 फिर उन्होंने पवित्र मुकुट की पटरी शुद्ध सोने की बनाई; और जैसे छापे में वैसे ही उसमें ये अक्षर खोदे गए, अर्थात् 'यहोवा के लिये पवित्र।' (IN)

निर्गमन 39:31 और उन्होंने उसमें नीला फीता लगाया, जिससे वह ऊपर पगड़ी पर रहे, जिस तरह यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 39:32 ¶ इस प्रकार मिलापवाले तम्बू के निवास का सब काम समाप्त हुआ, और जिस-जिस काम की आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी, इस्राएलियों ने उसी के अनुसार किया। (IN)

निर्गमन 39:33 तब वे निवास को मूसा के पास ले आए, अर्थात् घुंडियाँ, तख्ते, बेंड़े, खम्भे, कुर्सियाँ आदि सारे सामान समेत तम्बू; (IN)

निर्गमन 39:34 और लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ों की खालों का ओढ़ना, और सुइसों की खालों का ओढ़ना, और बीच का परदा; (IN)

निर्गमन 39:35 डंडों सहित साक्षीपत्र का सन्दूक, और प्रायश्चित का ढकना; (IN)

निर्गमन 39:36 सारे सामान समेत मेज, और भेंट की रोटी; (IN)

निर्गमन 39:37 सारे सामान सहित दीवट, और उसकी सजावट के दीपक और उजियाला देने के लिये तेल; (IN)

निर्गमन 39:38 सोने की वेदी, और अभिषेक का तेल, और सुगन्धित धूप, और तम्बू के द्वार का परदा; (IN)

निर्गमन 39:39 पीतल की झंझरी, डंडों और सारे सामान समेत पीतल की वेदी; और पाए समेत हौदी; (IN)

निर्गमन 39:40 खम्भों और कुर्सियों समेत आँगन के पर्दे, और आँगन के द्वार का परदा, और डोरियाँ, और खूँटे, और मिलापवाले तम्बू के निवास की सेवा का सारा सामान; (IN)

निर्गमन 39:41 पवित्रस्‍थान में सेवा टहल करने के लिये बेल बूटा काढ़े हुए वस्त्र, और हारून याजक के पवित्र वस्त्र, और उसके पुत्रों के वस्त्र जिन्हें पहनकर उन्हें याजक का काम करना था। (IN)

निर्गमन 39:42 अर्थात् जो-जो आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी उन्हीं के अनुसार इस्राएलियों ने सब काम किया। (IN)

निर्गमन 39:43 तब मूसा ने सारे काम का निरीक्षण करके देखा कि उन्होंने यहोवा की आज्ञा के अनुसार सब कुछ किया है। और मूसा ने उनको आशीर्वाद दिया। (IN)

निर्गमन 40:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

निर्गमन 40:2 “पहले महीने के पहले दिन को तू मिलापवाले तम्बू के निवास को खड़ा कर देना। (IN)

निर्गमन 40:3 और उसमें साक्षीपत्र के सन्दूक को रखकर बीचवाले पर्दे की ओट में कर देना। (IN)

निर्गमन 40:4 और मेज को भीतर ले जाकर जो कुछ उस पर सजाना है उसे सजा देना; तब दीवट को भीतर ले जाकर उसके दीपकों को जला देना। (IN)

निर्गमन 40:5 और साक्षीपत्र के सन्दूक के सामने सोने की वेदी को जो धूप के लिये है उसे रखना, और निवास के द्वार के पर्दे को लगा देना। (IN)

निर्गमन 40:6 और मिलापवाले तम्बू के निवास के द्वार के सामने होमवेदी को रखना। (IN)

निर्गमन 40:7 और मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच हौदी को रखकर उसमें जल भरना। (IN)

निर्गमन 40:8 और चारों ओर के आँगन की कनात को खड़ा करना, और उस आँगन के द्वार पर पर्दे को लटका देना। (IN)

निर्गमन 40:9 और अभिषेक का तेल लेकर निवास का और जो कुछ उसमें होगा सब कुछ का अभिषेक करना, और सारे सामान समेत उसको पवित्र करना; तब वह पवित्र ठहरेगा। (IN)

निर्गमन 40:10 सब सामान समेत होमवेदी का अभिषेक करके उसको पवित्र करना; तब वह परमपवित्र ठहरेगी। (IN)

निर्गमन 40:11 पाए समेत हौदी का भी अभिषेक करके उसे पवित्र करना। (IN)

निर्गमन 40:12 तब हारून और उसके पुत्रों को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर ले जाकर जल से नहलाना, (IN)

निर्गमन 40:13 और हारून को पवित्र वस्त्र पहनाना, और उसका अभिषेक करके उसको पवित्र करना कि वह मेरे लिये याजक का काम करे। (IN)

निर्गमन 40:14 और उसके पुत्रों को ले जाकर अंगरखे पहनाना, (IN)

निर्गमन 40:15 और जैसे तू उनके पिता का अभिषेक करे वैसे ही उनका भी अभिषेक करना कि वे मेरे लिये याजक का काम करें; और उनका अभिषेक उनकी पीढ़ी-पीढ़ी के लिये उनके सदा के याजकपद का चिन्ह ठहरेगा। (IN)

निर्गमन 40:16 ¶ और मूसा ने जो-जो आज्ञा यहोवा ने उसको दी थी उसी के अनुसार किया। (IN)

निर्गमन 40:17 और दूसरे वर्ष के पहले महीने के पहले दिन को निवास खड़ा किया गया। (IN)

निर्गमन 40:18 मूसा ने निवास को खड़ा करवाया और उसकी कुर्सियाँ धर उसके तख्ते लगाकर उनमें बेंड़े डाले, और उसके खम्भों को खड़ा किया; (IN)

निर्गमन 40:19 और उसने निवास के ऊपर तम्बू को फैलाया, और तम्बू के ऊपर उसने ओढ़ने को लगाया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:20 और उसने साक्षीपत्र को लेकर सन्दूक में रखा, और सन्दूक में डंडों को लगाके उसके ऊपर प्रायश्चित के ढकने को रख दिया; (IN)

निर्गमन 40:21 और उसने सन्दूक को निवास में पहुँचवाया, और बीचवाले पर्दे को लटकवा के साक्षीपत्र के सन्दूक को उसके अन्दर किया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:22 और उसने मिलापवाले तम्बू में निवास की उत्तर की ओर बीच के पर्दे से बाहर मेज को लगवाया, (IN)

निर्गमन 40:23 और उस पर उन ने यहोवा के सम्मुख रोटी सजाकर रखी; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:24 और उसने मिलापवाले तम्बू में मेज के सामने निवास की दक्षिण ओर पर दीवट को रखा, (IN)

निर्गमन 40:25 और उसने दीपकों को यहोवा के सम्मुख जला दिया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:26 और उसने मिलापवाले तम्बू में बीच के पर्दे के सामने सोने की वेदी को रखा, (IN)

निर्गमन 40:27 और उसने उस पर सुगन्धित धूप जलाया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:28 और उसने निवास के द्वार पर पर्दे को लगाया। (IN)

निर्गमन 40:29 और मिलापवाले तम्बू के निवास के द्वार पर होमबलि को रखकर उस पर होमबलि और अन्नबलि को चढ़ाया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:30 और उसने मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच हौदी को रखकर उसमें धोने के लिये जल डाला, (IN)

निर्गमन 40:31 और मूसा और हारून और उसके पुत्रों ने उसमें अपने-अपने हाथ पाँव धोए; (IN)

निर्गमन 40:32 और जब-जब वे मिलापवाले तम्बू में या वेदी के पास जाते थे तब-तब वे हाथ पाँव धोते थे; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

निर्गमन 40:33 और उसने निवास के चारों ओर और वेदी के आस-पास आँगन की कनात को खड़ा करवाया, और आँगन के द्वार के पर्दे को लटका दिया। इस प्रकार मूसा ने सब काम को पूरा किया। (IN)

निर्गमन 40:34 ¶ तब बादल मिलापवाले तम्बू पर छा गया, और यहोवा का तेज निवास-स्थान में भर गया। (IN)

निर्गमन 40:35 और बादल मिलापवाले तम्बू पर ठहर गया, और यहोवा का तेज निवास-स्थान में भर गया, इस कारण मूसा उसमें प्रवेश न कर सका। (IN)

निर्गमन 40:36 इस्राएलियों की सारी यात्रा में ऐसा होता था, कि जब-जब वह बादल निवास के ऊपर से उठ जाता तब-तब वे कूच करते थे। (IN)

निर्गमन 40:37 और यदि वह न उठता, तो जिस दिन तक वह न उठता था उस दिन तक वे कूच नहीं करते थे। (IN)

निर्गमन 40:38 इस्राएल के घराने की सारी यात्रा में दिन को तो यहोवा का बादल निवास पर, और रात को उसी बादल में आग उन सभी को दिखाई दिया करती थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:1 ¶ यहोवा ने मिलापवाले तम्बू में से मूसा को बुलाकर उससे कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:2 “इस्राएलियों से कह कि तुम में से यदि कोई मनुष्य यहोवा के लिये पशु का चढ़ावा चढ़ाए, तो उसका बलिपशु गाय-बैलों या भेड़-बकरियों में से एक का हो। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:3 “यदि वह गाय-बैलों में से होमबलि करे, तो निर्दोष नर मिलापवाले तम्बू के द्वार पर चढ़ाए कि यहोवा उसे ग्रहण करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:4 वह अपना हाथ होमबलि पशु के सिर पर रखे, और वह उनके लिये प्रायश्चित करने को ग्रहण किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:5 तब वह उस बछड़े को यहोवा के सामने बलि करे; और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे लहू को समीप ले जाकर उस वेदी की चारों ओर छिड़के जो मिलापवाले तम्बू के द्वार पर है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:6 फिर वह होमबलि पशु की खाल निकालकर उस पशु को टुकड़े-टुकड़े करे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:7 तब हारून याजक के पुत्र वेदी पर आग रखें, और आग पर लकड़ी सजाकर रखे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:8 और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे सिर और चर्बी समेत पशु के टुकड़ों को उस लकड़ी पर जो वेदी की आग पर होगी सजाकर रखें; (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:9 और वह उसकी अंतड़ियों और पैरों को जल से धोए। तब याजक सबको वेदी पर जलाए कि वह होमबलि यहोवा के लिये सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:10 “यदि वह भेड़ों या बकरों का होमबलि चढ़ाए, तो निर्दोष नर को चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:11 और वह उसको यहोवा के आगे वेदी के उत्तरी ओर बलि करे; और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे उसके लहू को वेदी के चारों ओर छिड़कें। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:12 और वह उसको टुकड़े-टुकड़े करे, और सिर और चरबी को अलग करे, और याजक इन सबको उस लकड़ी पर सजाकर रखे जो वेदी की आग पर होगी; (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:13 वह उसकी अंतड़ियों और पैरों को जल से धोए। और याजक वेदी पर जलाए कि वह होमबलि हो और यहोवा के लिये सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:14 “यदि वह यहोवा के लिये पक्षियों का होमबलि चढ़ाए, तो पंडुको या कबूतरों का चढ़ावा चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:15 याजक उसको वेदी के समीप ले जाकर उसका गला मरोड़कर सिर को धड़ से अलग करे, और वेदी पर जलाए; और उसका सारा लहू उस वेदी के बाजू पर गिराया जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:16 और वह उसकी गल-थैली को मल सहित निकालकर वेदी के पूरब की ओर से राख डालने के स्थान पर फेंक दे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 1:17 और वह उसको पंखों के बीच से फाड़े, पर अलग-अलग न करे। तब याजक उसको वेदी पर उस लकड़ी के ऊपर रखकर जो आग पर होगी जलाए कि वह होमबलि और यहोवा के लिये सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:1 ¶ “जब कोई यहोवा के लिये अन्नबलि का चढ़ावा चढ़ाना चाहे, तो वह मैदा चढ़ाए; और उस पर तेल डालकर उसके ऊपर लोबान रखे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:2 और वह उसको हारून के पुत्रों के पास जो याजक हैं लाए। और अन्नबलि के तेल मिले हुए मैदे में से इस तरह अपनी मुट्ठी भरकर निकाले कि सब लोबान उसमें आ जाए; और याजक उन्हें स्मरण दिलानेवाले भाग के लिये वेदी पर जलाए कि यह यहोवा के लिये सुखदायक सुगन्धित हवन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:3 और अन्नबलि में से जो बचा रहे वह हारून और उसके पुत्रों का ठहरे; यह यहोवा के हवनों में से परमपवित्र भाग होगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:4 “जब तू अन्नबलि के लिये तंदूर में पकाया हुआ चढ़ावा चढ़ाए, तो वह तेल से सने हुए अख़मीरी मैदे के फुलकों, या तेल से चुपड़ी हुई अख़मीरी रोटियाँ का हो। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:5 और यदि तेरा चढ़ावा तवे पर पकाया हुआ अन्नबलि हो, तो वह तेल से सने हुए अख़मीरी मैदे का हो; (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:6 उसको टुकड़े-टुकड़े करके उस पर तेल डालना, तब वह अन्नबलि हो जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:7 और यदि तेरा चढ़ावा कढ़ाही में तला हुआ अन्नबलि हो, तो वह मैदे से तेल में बनाया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:8 और जो अन्नबलि इन वस्तुओं में से किसी का बना हो उसे यहोवा के समीप ले जाना; और जब वह याजक के पास लाया जाए, तब याजक उसे वेदी के समीप ले जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:9 और याजक अन्नबलि में से स्मरण दिलानेवाला भाग निकालकर वेदी पर जलाए कि वह यहोवा के लिये सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:10 और अन्नबलि में से जो बचा रहे वह हारून और उसके पुत्रों का ठहरे; वह यहोवा के हवनों में परमपवित्र भाग होगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:11 “कोई अन्नबलि जिसे तुम यहोवा के लिये चढ़ाओ ख़मीर मिलाकर बनाया न जाए; तुम कभी हवन में यहोवा के लिये ख़मीर और मधु न जलाना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:12 तुम इनको पहली उपज का चढ़ावा करके यहोवा के लिये चढ़ाना, पर वे सुखदायक सुगन्ध के लिये वेदी पर चढ़ाए न जाएँ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:13 फिर अपने सब अन्नबलियों को नमकीन बनाना; और अपना कोई अन्नबलि अपने परमेश्‍वर के साथ बंधी हुई वाचा के नमक से रहित होने न देना; अपने सब चढ़ावों के साथ नमक भी चढ़ाना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:14 “यदि तू यहोवा के लिये पहली उपज का अन्नबलि चढ़ाए, तो अपनी पहली उपज के अन्नबलि के लिये आग में भुनी हुई हरी-हरी बालें, अर्थात् हरी-हरी बालों को मींजकर निकाल लेना, तब अन्न को चढ़ाना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:15 और उसमें तेल डालना, और उसके ऊपर लोबान रखना; तब वह अन्नबलि हो जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 2:16 और याजक मींजकर निकाले हुए अन्न को, और तेल को, और सारे लोबान को स्मरण दिलानेवाला भाग करके जला दे; वह यहोवा के लिये हवन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:1 ¶ “यदि उसका चढ़ावा मेलबलि का हो, और यदि वह गाय-बैलों में से किसी को चढ़ाए, तो चाहे वह पशु नर हो या मादा, पर जो निर्दोष हो उसी को वह यहोवा के आगे चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:2 और वह अपना हाथ अपने चढ़ावे के पशु के सिर पर रखे और उसको मिलापवाले तम्बू के द्वार पर बलि करे; और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे उसके लहू को वेदी के चारों ओर छिड़कें। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:3 वह मेलबलि में से यहोवा के लिये हवन करे, अर्थात् जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं, और जो चर्बी उनमें लिपटी रहती है वह भी, (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:4 और दोनों गुर्दे और उनके ऊपर की चर्बी जो कमर के पास रहती है, और गुर्दों समेत कलेजे के ऊपर की झिल्ली, इन सभी को वह अलग करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:5 तब हारून के पुत्र इनको वेदी पर उस होमबलि के ऊपर जलाएँ, जो उन लकड़ियों पर होगी जो आग के ऊपर है, कि यह यहोवा के लिये सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:6 “यदि यहोवा के मेलबलि के लिये उसका चढ़ावा भेड़-बकरियों में से हो, तो चाहे वह नर हो या मादा, पर जो निर्दोष हो उसी को वह चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:7 यदि वह भेड़ का बच्चा चढ़ाता हो, तो उसको यहोवा के सामने चढ़ाए, (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:8 और वह अपने चढ़ावे के पशु के सिर पर हाथ रखे और उसको मिलापवाले तम्बू के आगे बलि करे; और हारून के पुत्र उसके लहू को वेदी के चारों ओर छिड़कें। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:9 तब मेलबलि को यहोवा के लिये हवन करे, और उसकी चर्बी भरी मोटी पूँछ को वह रीढ़ के पास से अलग करे, और जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं, और जो चर्बी उनमें लिपटी रहती है, (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:10 और दोनों गुर्दे, और जो चर्बी उनके ऊपर कमर के पास रहती है, और गुर्दों समेत कलेजे के ऊपर की झिल्ली, इन सभी को वह अलग करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:11 और याजक इन्हें वेदी पर जलाए; यह यहोवा के लिये हवन रूपी भोजन ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:12 “यदि वह बकरा या बकरी चढ़ाए, तो उसे यहोवा के सामने चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:13 और वह अपना हाथ उसके सिर पर रखे, और उसको मिलापवाले तम्बू के आगे बलि करे; और हारून के पुत्र उसके लहू को वेदी के चारों ओर छिड़के। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:14 तब वह उसमें से अपना चढ़ावा यहोवा के लिये हवन करके चढ़ाए, और जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं, और जो चर्बी उनमें लिपटी रहती है वह भी, (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:15 और दोनों गुर्दे और जो चर्बी उनके ऊपर कमर के पास रहती है, और गुर्दों समेत कलेजे के ऊपर की झिल्ली, इन सभी को वह अलग करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:16 और याजक इन्हें वेदी पर जलाए; यह हवन रूपी भोजन है जो सुखदायक सुगन्ध के लिये होता है; क्योंकि सारी चर्बी यहोवा की है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 3:17 यह तुम्हारे निवासों में तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी के लिये सदा की विधि ठहरेगी कि तुम चर्बी और लहू कभी न खाओ।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:2 “इस्राएलियों से यह कह कि यदि कोई मनुष्य उन कामों में से जिनको यहोवा ने मना किया है, किसी काम को भूल से करके पापी हो जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:3 और यदि अभिषिक्त याजक ऐसा पाप करे, जिससे प्रजा दोषी ठहरे, तो अपने पाप के कारण वह एक निर्दोष बछड़ा यहोवा को पापबलि करके चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:4 वह उस बछड़े को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के आगे ले जाकर उसके सिर पर हाथ रखे, और उस बछड़े को यहोवा के सामने बलि करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:5 और अभिषिक्त याजक बछड़े के लहू में से कुछ लेकर मिलापवाले तम्बू में ले जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:6 और याजक अपनी उँगली लहू में डुबो-डुबोकर और उसमें से कुछ लेकर पवित्रस्‍थान के बीचवाले पर्दे के आगे यहोवा के सामने सात बार छिड़के। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:7 और याजक उस लहू में से कुछ और लेकर सुगन्धित धूप की वेदी के सींगों पर जो मिलापवाले तम्बू में है यहोवा के सामने लगाए; फिर बछड़े के सब लहू को वेदी के पाए पर होमबलि की वेदी जो मिलापवाले तम्बू के द्वार पर है उण्डेल दे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:8 फिर वह पापबलि के बछड़े की सब चर्बी को उससे अलग करे, अर्थात् जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं, और जितनी चर्बी उनमें लिपटी रहती है, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:9 और दोनों गुर्दे और उनके ऊपर की चर्बी जो कमर के पास रहती है, और गुर्दों समेत कलेजे के ऊपर की झिल्ली, इन सभी को वह ऐसे अलग करे, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:10 जैसे मेलबलिवाले चढ़ावे के बछड़े से अलग किए जाते हैं, और याजक इनको होमबलि की वेदी पर जलाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:11 परन्तु उस बछड़े की खाल, पाँव, सिर, अंतड़ियाँ, गोबर, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:12 और सारा माँस, अर्थात् समूचा बछड़ा छावनी से बाहर शुद्ध स्थान में, जहाँ राख डाली जाएगी, ले जाकर लकड़ी पर रखकर आग से जलाए; जहाँ राख डाली जाती है वह वहीं जलाया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:13 “यदि इस्राएल की सारी मण्डली अज्ञानता के कारण पाप करे और वह बात मण्डली की आँखों से छिपी हो, और वे यहोवा की किसी आज्ञा के विरुद्ध कुछ करके दोषी ठहरे हों; (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:14 तो जब उनका किया हुआ पाप प्रगट हो जाए तब मण्डली एक बछड़े को पापबलि करके चढ़ाए। वह उसे मिलापवाले तम्बू के आगे ले जाए, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:15 और मण्डली के वृद्ध लोग अपने-अपने हाथों को यहोवा के आगे बछड़े के सिर पर रखें, और वह बछड़ा यहोवा के सामने बलि किया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:16 तब अभिषिक्त याजक बछड़े के लहू में से कुछ मिलापवाले तम्बू में ले जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:17 और याजक अपनी उँगली लहू में डुबो-डुबोकर उसे बीचवाले पर्दे के आगे सात बार यहोवा के सामने छिड़के। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:18 और उसी लहू में से वेदी के सींगों पर जो यहोवा के आगे मिलापवाले तम्बू में है लगाए; और बचा हुआ सब लहू होमबलि की वेदी के पाए पर जो मिलापवाले तम्बू के द्वार पर है उण्डेल दे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:19 और वह बछड़े की कुल चर्बी निकालकर वेदी पर जलाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:20 जैसे पापबलि के बछड़े से किया था वैसे ही इससे भी करे; इस भाँति याजक इस्राएलियों के लिये प्रायश्चित करे, तब उनका पाप क्षमा किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:21 और वह बछड़े को छावनी से बाहर ले जाकर उसी भाँति जलाए जैसे पहले बछड़े को जलाया था; यह तो मण्डली के निमित्त पापबलि ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:22 “जब कोई प्रधान पुरुष पाप करके, अर्थात् अपने परमेश्‍वर यहोवा कि किसी आज्ञा के विरुद्ध भूल से कुछ करके दोषी हो जाए, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:23 और उसका पाप उस पर प्रगट हो जाए, तो वह एक निर्दोष बकरा बलिदान करने के लिये ले आए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:24 और बकरे के सिर पर अपना हाथ रखे, और बकरे को उस स्थान पर बलि करे जहाँ होमबलि पशु यहोवा के आगे बलि किये जाते हैं; यह पापबलि ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:25 तब याजक अपनी उँगली से पापबलि पशु के लहू में से कुछ लेकर होमबलि की वेदी के सींगों पर लगाए, और उसका लहू होमबलि की वेदी के पाए पर उण्डेल दे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:26 और वह उसकी कुल चर्बी को मेलबलि की चर्बी के समान वेदी पर जलाए; और याजक उसके पाप के विषय में प्रायश्चित करे, तब वह क्षमा किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:27 “यदि साधारण लोगों में से कोई अज्ञानता से पाप करे, अर्थात् कोई ऐसा काम जिसे यहोवा ने मना किया हो करके दोषी हो, और उसका वह पाप उस पर प्रगट हो जाए, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:28 तो वह उस पाप के कारण एक निर्दोष बकरी बलिदान के लिये ले आए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:29 और वह अपना हाथ पापबलि पशु के सिर पर रखे, और होमबलि के स्थान पर पापबलि पशु का बलिदान करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:30 और याजक उसके लहू में से अपनी उँगली से कुछ लेकर होमबलि की वेदी के सींगों पर लगाए, और उसके सब लहू को उसी वेदी के पाए पर उण्डेल दे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:31 और वह उसकी सब चर्बी को मेलबलि पशु की चर्बी के समान अलग करे, तब याजक उसको वेदी पर यहोवा के निमित्त सुखदायक सुगन्ध के लिये जलाए; और इस प्रकार याजक उसके लिये प्रायश्चित करे, तब उसे क्षमा मिलेगी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:32 “यदि वह पापबलि के लिये एक मेमना ले आए, तो वह निर्दोष मादा हो, (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:33 और वह अपना हाथ पापबलि पशु के सिर पर रखे, और उसको पापबलि के लिये वहीं बलिदान करे जहाँ होमबलि पशु बलि किया जाता है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:34 तब याजक अपनी उँगली से पापबलि के लहू में से कुछ लेकर होमबलि की वेदी के सींगों पर लगाए, और उसके सब लहू को वेदी के पाए पर उण्डेल दे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 4:35 और वह उसकी सब चर्बी को मेलबलिवाले मेमने की चर्बी के समान अलग करे, और याजक उसे वेदी पर यहोवा के हवनों के ऊपर जलाए; और इस प्रकार याजक उसके पाप के लिये प्रायश्चित करे, और वह क्षमा किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:1 ¶ “यदि कोई साक्षी होकर ऐसा पाप करे कि शपथ खिलाकर पूछने पर भी कि क्या तूने यह सुना अथवा जानता है, और वह बात प्रगट न करे, तो उसको अपने अधर्म का भार उठाना पड़ेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:2 अथवा यदि कोई किसी अशुद्ध वस्तु को अज्ञानता से छू ले, तो चाहे वह अशुद्ध जंगली पशु की, चाहे अशुद्ध घरेलू पशु की, चाहे अशुद्ध रेंगनेवाले जीव-जन्तु की लोथ हो, तो वह अशुद्ध होकर दोषी ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:3 अथवा यदि कोई मनुष्य किसी अशुद्ध वस्तु को अज्ञानता से छू ले, चाहे वह अशुद्ध वस्तु किसी भी प्रकार की क्यों न हो जिससे लोग अशुद्ध हो जाते हैं तो जब वह उस बात को जान लेगा तब वह दोषी ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:4 अथवा यदि कोई बुरा या भला करने को बिना सोचे समझे शपथ खाए, चाहे किसी प्रकार की बात वह बिना सोचे-विचारे शपथ खाकर कहे, तो ऐसी बात में वह दोषी उस समय ठहरेगा जब उसे मालूम हो जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:5 और जब वह इन बातों में से किसी भी बात में दोषी हो, तब जिस विषय में उसने पाप किया हो वह उसको मान ले, (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:6 और वह यहोवा के सामने अपना दोषबलि ले आए, अर्थात् उस पाप के कारण वह एक मादा भेड़ या बकरी पापबलि करने के लिये ले आए; तब याजक उस पाप के विषय उसके लिये प्रायश्चित करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:7 “पर यदि उसे भेड़ या बकरी देने की सामर्थ्य न हो, तो अपने पाप के कारण दो पिंडुक या कबूतरी के दो बच्चे दोषबलि चढ़ाने के लिये यहोवा के पास ले आए, उनमें से एक तो पापबलि के लिये और दूसरा होमबलि के लिये। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:8 वह उनको याजक के पास ले आए, और याजक पापबलि वाले को पहले चढ़ाए, और उसका सिर गले से मरोड़ डालें, पर अलग न करे, (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:9 और वह पापबलि पशु के लहू में से कुछ वेदी के बाजू पर छिड़के, और जो लहू शेष रहे वह वेदी के पाए पर उण्डेला जाए; वह तो पापबलि ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:10 तब दूसरे पक्षी को वह नियम के अनुसार होमबलि करे, और याजक उसके पाप का प्रायश्चित करे, और तब वह क्षमा किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:11 “यदि वह दो पिंडुक या कबूतरी के दो बच्चे भी न दे सके, तो वह अपने पाप के कारण अपना चढ़ावा एपा का दसवाँ भाग मैदा पापबलि करके ले आए; उस पर न तो वह तेल डाले, और न लोबान रखे, क्योंकि वह पापबलि होगा (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:12 वह उसको याजक के पास ले जाए, और याजक उसमें से अपनी मुट्ठी भर स्मरण दिलानेवाला भाग जानकर वेदी पर यहोवा के हवनों के ऊपर जलाए; वह तो पापबलि ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:13 और इन बातों में से किसी भी बात के विषय में जो कोई पाप करे, याजक उसका प्रायश्चित करे, और तब वह पाप क्षमा किया जाएगा। और इस पापबलि का शेष अन्नबलि के शेष के समान याजक का ठहरेगा।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:14 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:15 “यदि कोई यहोवा की पवित्र की हुई वस्तुओं के विषय में भूल से विश्वासघात करे और पापी ठहरे, तो वह यहोवा के पास एक निर्दोष मेढ़ा दोषबलि के लिये ले आए; उसका दाम पवित्रस्‍थान के शेकेल के अनुसार उतने ही शेकेल चाँदी का हो जितना याजक ठहराए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:16 और जिस पवित्र वस्तु के विषय उसने पाप किया हो, उसमें वह पाँचवाँ भाग और बढ़ाकर याजक को दे; और याजक दोषबलि का मेढ़ा चढ़ाकर उसके लिये प्रायश्चित करे, तब उसका पाप क्षमा किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:17 “यदि कोई ऐसा पाप करे, कि उन कामों में से जिन्हें यहोवा ने मना किया है किसी काम को करे, तो चाहे वह उसके अनजाने में हुआ हो, तो भी वह दोषी ठहरेगा, और उसको अपने अधर्म का भार उठाना पड़ेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:18 इसलिए वह एक निर्दोष मेढ़ा दोषबलि करके याजक के पास ले आए, वह उतने दाम का हो जितना याजक ठहराए, और याजक उसके लिये उसकी उस भूल का जो उसने अनजाने में की हो प्रायश्चित करे, और वह क्षमा किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 5:19 यह दोषबलि ठहरे; क्योंकि वह मनुष्य निःसन्देह यहोवा के सम्मुख दोषी ठहरेगा।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:2 “यदि कोई यहोवा का विश्वासघात करके पापी ठहरे, जैसा कि धरोहर, या लेनदेन, या लूट के विषय में अपने भाई से छल करे, या उस पर अत्याचार करे, (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:3 या पड़ी हुई वस्तु को पाकर उसके विषय झूठ बोले और झूठी शपथ भी खाए; ऐसी कोई भी बात क्यों न हो जिसे करके मनुष्य पापी ठहरते हैं, (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:4 तो जब वह ऐसा काम करके दोषी हो जाए, तब जो भी वस्तु उसने लूट, या अत्याचार करके, या धरोहर, या पड़ी पाई हो; (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:5 चाहे कोई वस्तु क्यों न हो जिसके विषय में उसने झूठी शपथ खाई हो; तो वह उसको पूरा-पूरा लौटा दे, और पाँचवाँ भाग भी बढ़ाकर भर दे, जिस दिन यह मालूम हो कि वह दोषी है, उसी दिन वह उस वस्तु को उसके स्वामी को लौटा दे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:6 और वह यहोवा के सम्मुख अपना दोषबलि भी ले आए, अर्थात् एक निर्दोष मेढ़ा दोषबलि के लिये याजक के पास ले आए, वह उतने ही दाम का हो जितना याजक ठहराए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:7 इस प्रकार याजक उसके लिये यहोवा के सामने प्रायश्चित करे, और जिस काम को करके वह दोषी हो गया है उसकी क्षमा उसे मिलेगी।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:8 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:9 “हारून और उसके पुत्रों को आज्ञा देकर यह कह कि होमबलि की व्यवस्था यह है: होमबलि ईंधन के ऊपर रात भर भोर तक वेदी पर पड़ा रहे, और वेदी की अग्नि वेदी पर जलती रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:10 और याजक अपने सनी के वस्त्र और अपने तन पर अपनी सनी की जाँघिया पहनकर होमबलि की राख, जो आग के भस्म करने से वेदी पर रह जाए, उसे उठाकर वेदी के पास रखे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:11 तब वह अपने ये वस्त्र उतारकर दूसरे वस्त्र पहनकर राख को छावनी से बाहर किसी शुद्ध स्थान पर ले जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:12 वेदी पर अग्नि जलती रहे, और कभी बुझने न पाए; और याजक प्रतिदिन भोर को उस पर लकड़ियाँ जलाकर होमबलि के टुकड़ों को उसके ऊपर सजाकर धर दे, और उसके ऊपर मेलबलियों की चर्बी को जलाया करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:13 वेदी पर आग लगातार जलती रहे; वह कभी बुझने न पाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:14 ¶ “अन्नबलि की व्यवस्था इस प्रकार है: हारून के पुत्र उसको वेदी के आगे यहोवा के समीप ले आएँ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:15 और वह अन्नबलि के तेल मिले हुए मैदे में से मुट्ठी भर और उस पर का सब लोबान उठाकर अन्नबलि के स्मरणार्थ इस भाग को यहोवा के सम्मुख सुखदायक सुगन्ध के लिये वेदी पर जलाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:16 और उसमें से जो शेष रह जाए उसे हारून और उसके पुत्र खाएँ; वह बिना ख़मीर पवित्रस्‍थान में खाया जाए, अर्थात् वे मिलापवाले तम्बू के आँगन में उसे खाएँ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:17 वह ख़मीर के साथ पकाया न जाए; क्योंकि मैंने अपने हव्य में से उसको उनका निज भाग होने के लिये उन्हें दिया है; इसलिए जैसा पापबलि और दोषबलि परमपवित्र हैं वैसा ही वह भी है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:18 तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में हारून के वंश के सब पुरुष उसमें से खा सकते हैं, यहोवा के हवनों में से यह उनका भाग सदैव बना रहेगा; जो कोई उन हवनों को छूए वह पवित्र ठहरेगा।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:19 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:20 “जिस दिन हारून का अभिषेक हो उस दिन वह अपने पुत्रों के साथ यहोवा को यह चढ़ावा चढ़ाए; अर्थात् एपा का दसवाँ भाग मैदा नित्य अन्नबलि में चढ़ाए, उसमें से आधा भोर को और आधा संध्या के समय चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:21 वह तवे पर तेल के साथ पकाया जाए; जब वह तेल से तर हो जाए तब उसे ले आना, इस अन्नबलि के पके हुए टुकडे़ यहोवा के सुखदायक सुगन्ध के लिये चढ़ाना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:22 हारून के पुत्रों में से जो भी उस याजकपद पर अभिषिक्त होगा, वह भी उसी प्रकार का चढ़ावा चढ़ाया करे; यह विधि सदा के लिये है, कि यहोवा के सम्मुख वह सम्पूर्ण चढ़ावा जलाया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:23 याजक के सम्पूर्ण अन्नबलि भी सब जलाए जाएँ; वह कभी न खाया जाए।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:24 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:25 “हारून और उसके पुत्रों से यह कह कि पापबलि की व्यवस्था यह है: जिस स्थान में होमबलि पशु वध किया जाता है उसी में पापबलि पशु भी यहोवा के सम्मुख बलि किया जाए; वह परमपवित्र है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:26 जो याजक पापबलि चढ़ाए वह उसे खाए; वह पवित्रस्‍थान में, अर्थात् मिलापवाले तम्बू के आँगन में खाया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:27 जो कुछ उसके माँस से छू जाए, वह पवित्र ठहरेगा; और यदि उसके लहू के छींटे किसी वस्त्र पर पड़ जाएँ, तो उसे किसी पवित्रस्‍थान में धो देना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:28 और वह मिट्टी का पात्र जिसमें वह पकाया गया हो तोड़ दिया जाए; यदि वह पीतल के पात्र में उबाला गया हो, तो वह मांजा जाए, और जल से धो लिया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:29 याजकों में से सब पुरुष उसे खा सकते हैं; वह परमपवित्र वस्तु है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 6:30 पर जिस पापबलि पशु के लहू में से कुछ भी लहू मिलापवाले तम्बू के भीतर पवित्रस्‍थान में प्रायश्चित करने को पहुँचाया जाए उसका माँस कभी न खाया जाए; वह आग में जला दिया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:1 ¶ “फिर दोषबलि की व्यवस्था यह है। वह परमपवित्र है; (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:2 जिस स्थान पर होमबलि पशु का वध करते हैं उसी स्थान पर दोषबलि पशु भी बलि करें, और उसके लहू को याजक वेदी पर चारों ओर छिड़के। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:3 और वह उसमें की सब चर्बी को चढ़ाए, अर्थात् उसकी मोटी पूँछ को, और जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं वह भी, (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:4 और दोनों गुर्दे और जो चर्बी उनके ऊपर और कमर के पास रहती है, और गुर्दों समेत कलेजे के ऊपर की झिल्ली; इन सभी को वह अलग करे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:5 और याजक इन्हें वेदी पर यहोवा के लिये हवन करे; तब वह दोषबलि होगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:6 याजकों में के सब पुरुष उसमें से खा सकते हैं; वह किसी पवित्रस्‍थान में खाया जाए; क्योंकि वह परमपवित्र है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:7 जैसा पापबलि है वैसा ही दोषबलि भी है, उन दोनों की एक ही व्यवस्था है; जो याजक उन बलियों को चढ़ा के प्रायश्चित करे वही उन वस्तुओं को ले-ले। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:8 और जो याजक किसी के लिये होमबलि को चढ़ाए उस होमबलि पशु की खाल को वही याजक ले-ले। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:9 और तंदूर में, या कढ़ाही में, या तवे पर पके हुए सब अन्नबलि उसी याजक की होंगी जो उन्हें चढ़ाता है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:10 और सब अन्नबलि, जो चाहे तेल से सने हुए हों चाहे रूखे हों, वे हारून के सब पुत्रों को एक समान मिले। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:11 ¶ “मेलबलि की जिसे कोई यहोवा के लिये चढ़ाए व्यवस्था यह है: (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:12 यदि वह उसे धन्यवाद के लिये चढ़ाए, तो धन्यवाद-बलि के साथ तेल से सने हुए अख़मीरी फुलके, और तेल से चुपड़ी हुई अख़मीरी रोटियाँ, और तेल से सने हुए मैदे के फुलके तेल से तर चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:13 और वह अपने धन्यवादवाले मेलबलि के साथ अख़मीरी रोटियाँ, भी चढ़ाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:14 और ऐसे एक-एक चढ़ावे में से वह एक-एक रोटी यहोवा को उठाने की भेंट करके चढ़ाए; वह मेलबलि के लहू के छिड़कनेवाले याजक की होगी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:15 और उस धन्यवादवाले मेलबलि का माँस बलिदान चढ़ाने के दिन ही खाया जाए; उसमें से कुछ भी भोर तक शेष न रह जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:16 पर यदि उसके बलिदान का चढ़ावा मन्नत का या स्वेच्छा का हो, तो उस बलिदान को जिस दिन वह चढ़ाया जाए उसी दिन वह खाया जाए, और उसमें से जो शेष रह जाए वह दूसरे दिन भी खाया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:17 परन्तु जो कुछ बलिदान के माँस में से तीसरे दिन तक रह जाए वह आग में जला दिया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:18 और उसके मेलबलि के माँस में से यदि कुछ भी तीसरे दिन खाया जाए, तो वह ग्रहण न किया जाएगा, और न उसके हित में गिना जाएगा; वह घृणित कर्म समझा जाएगा, और जो कोई उसमें से खाए उसका अधर्म उसी के सिर पर पड़ेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:19 “फिर जो माँस किसी अशुद्ध वस्तु से छू जाए वह न खाया जाए; वह आग में जला दिया जाए। फिर मेलबलि का माँस जितने शुद्ध हों वे ही खाएँ, (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:20 परन्तु जो अशुद्ध होकर यहोवा के मेलबलि के माँस में से कुछ खाए वह अपने लोगों में से नाश किया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:21 और यदि कोई किसी अशुद्ध वस्तु को छूकर यहोवा के मेलबलि पशु के माँस में से खाए, तो वह भी अपने लोगों में से नाश किया जाए, चाहे वह मनुष्य की कोई अशुद्ध वस्तु या अशुद्ध पशु या कोई भी अशुद्ध और घृणित वस्तु हो।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:22 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:23 “इस्राएलियों से इस प्रकार कह: तुम लोग न तो बैल की कुछ चर्बी खाना और न भेड़ या बकरी की। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:24 और जो पशु स्वयं मर जाए, और जो दूसरे पशु से फाड़ा जाए, उसकी चर्बी और अन्य काम में लाना, परन्तु उसे किसी प्रकार से खाना नहीं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:25 जो कोई ऐसे पशु की चर्बी खाएगा जिसमें से लोग कुछ यहोवा के लिये हवन करके चढ़ाया करते हैं वह खानेवाला अपने लोगों में से नाश किया जाएगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:26 और तुम अपने घर में किसी भाँति का लहू, चाहे पक्षी का चाहे पशु का हो, न खाना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:27 हर एक प्राणी जो किसी भाँति का लहू खाएगा वह अपने लोगों में से नाश किया जाएगा।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:28 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:29 “इस्राएलियों से इस प्रकार कह: जो यहोवा के लिये मेलबलि चढ़ाए वह उसी मेलबलि में से यहोवा के पास भेंट ले आए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:30 वह अपने ही हाथों से यहोवा के हव्य को, अर्थात् छाती समेत चर्बी को ले आए कि छाती हिलाने की भेंट करके यहोवा के सामने हिलाई जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:31 और याजक चर्बी को तो वेदी पर जलाए, परन्तु छाती हारून और उसके पुत्रों की होगी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:32 फिर तुम अपने मेलबलियों में से दाहिनी जाँघ को भी उठाने की भेंट करके याजक को देना; (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:33 हारून के पुत्रों में से जो मेलबलि के लहू और चर्बी को चढ़ाए दाहिनी जाँघ उसी का भाग होगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:34 क्योंकि इस्राएलियों के मेलबलियों में से हिलाने की भेंट की छाती और उठाने की भेंट की जाँघ को लेकर मैंने याजक हारून और उसके पुत्रों को दिया है, कि यह सर्वदा इस्राएलियों की ओर से उनका हक़ बना रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:35 “जिस दिन हारून और उसके पुत्र यहोवा के समीप याजक पद के लिये लाए गए, उसी दिन यहोवा के हव्यों में से उनका यही अभिषिक्त भाग ठहराया गया; (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:36 अर्थात् जिस दिन यहोवा ने उनका अभिषेक किया उसी दिन उसने आज्ञा दी कि उनको इस्राएलियों की ओर से ये भाग नित्य मिला करें; उनकी पीढ़ी-पीढ़ी के लिये उनका यही हक़ ठहराया गया।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:37 होमबलि, अन्नबलि, पापबलि, दोषबलि, याजकों के संस्कार बलि, और मेलबलि की व्यवस्था यही है; (IN)

लैव्यव्यवस्था 7:38 जब यहोवा ने सीनै पर्वत के पास के जंगल में मूसा को आज्ञा दी कि इस्राएली मेरे लिये क्या-क्या चढ़ावा चढ़ाएँ, तब उसने उनको यही व्यवस्था दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:2 “तू हारून और उसके पुत्रों के वस्त्रों, और अभिषेक के तेल, और पापबलि के बछड़े, और दोनों मेढ़ों, और अख़मीरी रोटी की टोकरी को (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:3 मिलापवाले तम्बू के द्वार पर ले आ, और वहीं सारी मण्डली को इकट्ठा कर।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:4 यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार मूसा ने किया; और मण्डली मिलापवाले तम्बू के द्वार पर इकट्ठा हुई। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:5 तब मूसा ने मण्डली से कहा, “जो काम करने की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:6 फिर मूसा ने हारून और उसके पुत्रों को समीप ले जाकर जल से नहलाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:7 तब उसने उनको अंगरखा पहनाया, और कटिबन्द लपेटकर बागा पहना दिया, और एपोद लगाकर एपोद के काढ़े हुए पट्टे से एपोद को बाँधकर कस दिया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:8 और उसने चपरास लगाकर चपरास में ऊरीम और तुम्मीम रख दिए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:9 तब उसने उसके सिर पर पगड़ी बाँधकर पगड़ी के सामने सोने के टीके को, अर्थात् पवित्र मुकुट को लगाया, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:10 तब मूसा ने अभिषेक का तेल लेकर निवास का और जो कुछ उसमें था उन सब का भी अभिषेक करके उन्हें पवित्र किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:11 और उस तेल में से कुछ उसने वेदी पर सात बार छिड़का, और सम्पूर्ण सामान समेत वेदी का और पाए समेत हौदी का अभिषेक करके उन्हें पवित्र किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:12 और उसने अभिषेक के तेल में से कुछ हारून के सिर पर डालकर उसका अभिषेक करके उसे पवित्र किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:13 फिर मूसा ने हारून के पुत्रों को समीप ले आकर, अंगरखे पहनाकर, कटिबन्ध बाँध के उनके सिर पर टोपी रख दी, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:14 तब वह पापबलि के बछड़े को समीप ले गया; और हारून और उसके पुत्रों ने अपने-अपने हाथ पापबलि के बछड़े के सिर पर रखे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:15 तब वह बलि किया गया, और मूसा ने लहू को लेकर उँगली से वेदी के चारों सींगों पर लगाकर पवित्र किया, और लहू को वेदी के पाए पर उण्डेल दिया, और उसके लिये प्रायश्चित करके उसको पवित्र किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:16 और मूसा ने अंतड़ियों पर की सब चर्बी, और कलेजे पर की झिल्ली, और चर्बी समेत दोनों गुर्दों को लेकर वेदी पर जलाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:17 परन्तु बछड़े में से जो कुछ शेष रह गया उसको, अर्थात् गोबर समेत उसकी खाल और माँस को उसने छावनी से बाहर आग में जलाया, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:18 फिर वह होमबलि के मेढ़े को समीप ले गया, और हारून और उसके पुत्रों ने अपने-अपने हाथ मेढ़े के सिर पर रखे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:19 तब वह बलि किया गया, और मूसा ने उसका लहू वेदी पर चारों ओर छिड़का। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:20 तब मेढ़ा टुकड़े-टुकड़े किया गया, और मूसा ने सिर और चर्बी समेत टुकड़ों को जलाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:21 तब अंतड़ियाँ और पाँव जल से धोये गए, और मूसा ने पूरे मेढ़े को वेदी पर जलाया, और वह सुखदायक सुगन्ध देने के लिये होमबलि और यहोवा के लिये हव्य हो गया, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:22 फिर वह दूसरे मेढ़े को जो संस्कार का मेढ़ा था समीप ले गया, और हारून और उसके पुत्रों ने अपने-अपने हाथ मेढ़े के सिर पर रखे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:23 तब वह बलि किया गया, और मूसा ने उसके लहू में से कुछ लेकर हारून के दाहिने कान के सिरे पर और उसके दाहिने हाथ और दाहिने पाँव के अँगूठों पर लगाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:24 और वह हारून के पुत्रों को समीप ले गया, और लहू में से कुछ एक-एक के दाहिने कान के सिरे पर और दाहिने हाथ और दाहिने पाँव के अँगूठों पर लगाया; और मूसा ने लहू को वेदी पर चारों ओर छिड़का। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:25 और उसने चर्बी, और मोटी पूँछ, और अंतड़ियों पर की सब चर्बी, और कलेजे पर की झिल्ली समेत दोनों गुर्दे, और दाहिनी जाँघ, ये सब लेकर अलग रखे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:26 और अख़मीरी रोटी की टोकरी जो यहोवा के आगे रखी गई थी उसमें से एक अख़मीरी रोटी, और तेल से सने हुए मैदे का एक फुलका, और एक पापड़ी लेकर चर्बी और दाहिनी जाँघ पर रख दी; (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:27 और ये सब वस्तुएँ हारून और उसके पुत्रों के हाथों पर रख दी गईं, और हिलाने की भेंट के लिये यहोवा के सामने हिलाई गईं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:28 तब मूसा ने उन्हें फिर उनके हाथों पर से लेकर उन्हें वेदी पर होमबलि के ऊपर जलाया, यह सुखदायक सुगन्ध देने के लिये संस्कार की भेंट और यहोवा के लिये हव्य था। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:29 तब मूसा ने छाती को लेकर हिलाने की भेंट के लिये यहोवा के आगे हिलाया; और संस्कार के मेढ़े में से मूसा का भाग यही हुआ जैसा यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:30 तब मूसा ने अभिषेक के तेल और वेदी पर के लहू, दोनों में से कुछ लेकर हारून और उसके वस्त्रों पर, और उसके पुत्रों और उनके वस्त्रों पर भी छिड़का; और उसने वस्त्रों समेत हारून को भी पवित्र किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:31 तब मूसा ने हारून और उसके पुत्रों से कहा, “माँस को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर पकाओ, और उस रोटी को जो संस्कार की टोकरी में है वहीं खाओ, जैसा मैंने आज्ञा दी है कि हारून और उसके पुत्र उसे खाएँ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:32 और माँस और रोटी में से जो शेष रह जाए उसे आग में जला देना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:33 और जब तक तुम्हारे संस्कार के दिन पूरे न हों तब तक, अर्थात् सात दिन तक मिलापवाले तम्बू के द्वार के बाहर न जाना, क्योंकि वह सात दिन तक तुम्हारा संस्कार करता रहेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:34 जिस प्रकार आज किया गया है वैसा ही करने की आज्ञा यहोवा ने दी है, जिससे तुम्हारा प्रायश्चित किया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:35 इसलिए तुम मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सात दिन तक दिन-रात ठहरे रहना, और यहोवा की आज्ञा को मानना, ताकि तुम मर न जाओ; क्योंकि ऐसी ही आज्ञा मुझे दी गई है।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 8:36 तब यहोवा की इन्हीं सब आज्ञाओं के अनुसार जो उसने मूसा के द्वारा दी थीं हारून और उसके पुत्रों ने किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:1 ¶ आठवें दिन मूसा ने हारून और उसके पुत्रों को और इस्राएली पुरनियों को बुलवाकर हारून से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:2 “पापबलि के लिये एक निर्दोष बछड़ा, और होमबलि के लिये एक निर्दोष मेढ़ा लेकर यहोवा के सामने भेंट चढ़ा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:3 और इस्राएलियों से यह कह, 'तुम पापबलि के लिये एक बकरा, और होमबलि के लिये एक बछड़ा और एक भेड़ का बच्चा लो, जो एक वर्ष के हों और निर्दोष हों, (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:4 और मेलबलि के लिये यहोवा के सम्मुख चढ़ाने के लिये एक बैल और एक मेढ़ा, और तेल से सने हुए मैदे का एक अन्नबलि भी ले लो; क्योंकि आज यहोवा तुमको दर्शन देगा'।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:5 और जिस-जिस वस्तु की आज्ञा मूसा ने दी उन सबको वे मिलापवाले तम्बू के आगे ले आए; और सारी मण्डली समीप जाकर यहोवा के सामने खड़ी हुई। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:6 तब मूसा ने कहा, “यह वह काम है जिसके करने के लिये यहोवा ने आज्ञा दी है कि तुम उसे करो; और यहोवा की महिमा का तेज तुमको दिखाई पड़ेगा।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:7 तब मूसा ने हारून से कहा, “यहोवा की आज्ञा के अनुसार वेदी के समीप जाकर अपने पापबलि और होमबलि को चढ़ाकर अपने और सब जनता के लिये प्रायश्चित कर और जनता के चढ़ावे को भी चढ़ाकर उनके लिये प्रायश्चित कर।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:8 इसलिए हारून ने वेदी के समीप जाकर अपने पापबलि के बछड़े को बलिदान किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:9 और हारून के पुत्र लहू को उसके पास ले गए, तब उसने अपनी उँगली को लहू में डुबाकर वेदी के सींगों पर लहू को लगाया, और शेष लहू को वेदी के पाए पर उण्डेल दिया; (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:10 और पापबलि में की चर्बी और गुर्दों और कलेजे पर की झिल्ली को उसने वेदी पर जलाया, जैसा यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी थी। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:11 और माँस और खाल को उसने छावनी से बाहर आग में जलाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:12 तब होमबलि पशु को बलिदान किया; और हारून के पुत्रों ने लहू को उसके हाथ में दिया, और उसने उसको वेदी पर चारों ओर छिड़क दिया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:13 तब उन्होंने होमबलि पशु को टुकड़े-टुकड़े करके सिर सहित उसके हाथ में दे दिया और उसने उनको वेदी पर जला दिया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:14 और उसने अंतड़ियों और पाँवों को धोकर वेदी पर होमबलि के ऊपर जलाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:15 तब उसने लोगों के चढ़ावे को आगे लेकर और उस पापबलि के बकरे को जो उनके लिये था लेकर उसका बलिदान किया, और पहले के समान उसे भी पापबलि करके चढ़ाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:16 और उसने होमबलि को भी समीप ले जाकर विधि के अनुसार चढ़ाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:17 और अन्नबलि को भी समीप ले जाकर उसमें से मुट्ठी भर वेदी पर जलाया, यह भोर के होमबलि के अलावा चढ़ाया गया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:18 बैल और मेढ़ा, अर्थात् जो मेलबलि पशु जनता के लिये थे वे भी बलि किये गए; और हारून के पुत्रों ने लहू को उसके हाथ में दिया, और उसने उसको वेदी पर चारों ओर छिड़क दिया; (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:19 और उन्होंने बैल की चर्बी को, और मेढ़े में से मोटी पूँछ को, और जिस चर्बी से अंतड़ियाँ ढपी रहती हैं उसको, और गुर्दों सहित कलेजे पर की झिल्ली को भी उसके हाथ में दिया; (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:20 और उन्होंने चर्बी को छातियों पर रखा; और उसने वह चर्बी वेदी पर जलाई, (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:21 परन्तु छातियों और दाहिनी जाँघ को हारून ने मूसा की आज्ञा के अनुसार हिलाने की भेंट के लिये यहोवा के सामने हिलाया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:22 तब हारून ने लोगों की ओर हाथ बढ़ाकर उन्हें आशीर्वाद दिया; और पापबलि, होमबलि, और मेलबलियों को चढ़ाकर वह नीचे उतर आया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:23 तब मूसा और हारून मिलापवाले तम्बू में गए, और निकलकर लोगों को आशीर्वाद दिया; तब यहोवा का तेज सारी जनता को दिखाई दिया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 9:24 और यहोवा के सामने से आग निकली चर्बी सहित होमबलि को वेदी पर भस्म कर दिया; इसे देखकर जनता ने जय-जयकार का नारा लगाया, और अपने-अपने मुँह के बल गिरकर दण्डवत् किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:1 ¶ तब नादाब और अबीहू नामक हारून के दो पुत्रों ने अपना-अपना धूपदान लिया, और उनमें आग भरी, और उसमें धूप डालकर उस अनुचित आग को जिसकी आज्ञा यहोवा ने नहीं दी थी यहोवा के सम्मुख अर्पित किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:2 तब यहोवा के सम्मुख से आग निकली और उन दोनों को भस्म कर दिया, और वे यहोवा के सामने मर गए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:3 तब मूसा ने हारून से कहा, “यह वही बात है जिसे यहोवा ने कहा था, कि जो मेरे समीप आए अवश्य है कि वह मुझे पवित्र जाने, और सारी जनता के सामने मेरी महिमा करे।” और हारून चुप रहा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:4 तब मूसा ने मीशाएल और एलसाफान को जो हारून के चाचा उज्जीएल के पुत्र थे बुलाकर कहा, “निकट आओ, और अपने भतीजों को पवित्रस्‍थान के आगे से उठाकर छावनी के बाहर ले जाओ।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:5 मूसा की इस आज्ञा के अनुसार वे निकट जाकर उनको अंगरखों सहित उठाकर छावनी के बाहर ले गए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:6 तब मूसा ने हारून से और उसके पुत्र एलीआजर और ईतामार से कहा, “तुम लोग अपने सिरों के बाल मत बिखराओ, और न अपने वस्त्रों को फाड़ो, ऐसा न हो कि तुम भी मर जाओ, और सारी मण्डली पर उसका क्रोध भड़क उठे; परन्तु इस्राएल के सारे घराने के लोग जो तुम्हारे भाईबन्धु हैं वह यहोवा की लगाई हुई आग पर विलाप करें। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:7 और तुम लोग मिलापवाले तम्बू के द्वार के बाहर न जाना, ऐसा न हो कि तुम मर जाओ; क्योंकि यहोवा के अभिषेक का तेल तुम पर लगा हुआ है।” मूसा के इस वचन के अनुसार उन्होंने किया। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:8 ¶ फिर यहोवा ने हारून से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:9 “जब-जब तू या तेरे पुत्र मिलापवाले तम्बू में आएँ तब-तब तुम में से कोई न तो दाखमधु पीए हो न और किसी प्रकार का मद्य, कहीं ऐसा न हो कि तुम मर जाओ; तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में यह विधि प्रचलित रहे, (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:10 जिससे तुम पवित्र और अपवित्र में, और शुद्ध और अशुद्ध में अन्तर कर सको; (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:11 और इस्राएलियों को उन सब विधियों को सिखा सको जिसे यहोवा ने मूसा के द्वारा उनको बता दी हैं।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:12 फिर मूसा ने हारून से और उसके बचे हुए दोनों पुत्र एलीआजर और ईतामार से भी कहा, “यहोवा के हव्य में से जो अन्नबलि बचा है उसे लेकर वेदी के पास बिना ख़मीर खाओ, क्योंकि वह परमपवित्र है; (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:13 और तुम उसे किसी पवित्रस्‍थान में खाओ, वह यहोवा के हव्य में से तेरा और तेरे पुत्रों का हक़ है; क्योंकि मैंने ऐसी ही आज्ञा पाई है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:14 तब हिलाई हुई भेंट की छाती और उठाई हुई भेंट की जाँघ को तुम लोग, अर्थात् तू और तेरे बेटे-बेटियाँ सब किसी शुद्ध स्थान में खाओ; क्योंकि वे इस्राएलियों के मेलबलियों में से तुझे और तेरे बच्चों का हक़ ठहरा दी गई हैं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:15 चर्बी के हव्यों समेत जो उठाई हुई जाँघ और हिलाई हुई छाती यहोवा के सामने हिलाने के लिये आया करेंगी, ये भाग यहोवा की आज्ञा के अनुसार सर्वदा की विधि की व्यवस्था से तेरे और तेरे बच्चों के लिये हैं।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:16 फिर मूसा ने पापबलि के बकरे की खोजबीन की, तो क्या पाया कि वह जलाया गया है, इसलिए एलीआजर और ईतामार जो हारून के पुत्र बचे थे उनसे वह क्रोध में आकर कहने लगा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:17 “पापबलि जो परमपवित्र है और जिसे यहोवा ने तुम्हें इसलिए दिया है कि तुम मण्डली के अधर्म का भार अपने पर उठाकर उनके लिये यहोवा के सामने प्रायश्चित करो, तुमने उसका माँस पवित्रस्‍थान में क्यों नहीं खाया? (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:18 देखो, उसका लहू पवित्रस्‍थान के भीतर तो लाया ही नहीं गया, निःसन्देह उचित था कि तुम मेरी आज्ञा के अनुसार उसके माँस को पवित्रस्‍थान में खाते।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:19 इसका उत्तर हारून ने मूसा को इस प्रकार दिया, “देख, आज ही उन्होंने अपने पापबलि और होमबलि को यहोवा के सामने चढ़ाया; फिर मुझ पर ऐसी विपत्तियाँ आ पड़ी हैं! इसलिए यदि मैं आज पापबलि का माँस खाता तो क्या यह बात यहोवा के सम्मुख भली होती?” (IN)

लैव्यव्यवस्था 10:20 जब मूसा ने यह सुना तब उसे संतोष हुआ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:2 “इस्राएलियों से कहो: जितने पशु पृथ्वी पर हैं उन सभी में से तुम इन जीवधारियों का माँस खा सकते हो। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:3 पशुओं में से जितने चिरे या फटे खुर के होते हैं और पागुर करते हैं उन्हें खा सकते हो। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:4 परन्तु पागुर करनेवाले या फटे खुरवालों में से इन पशुओं को न खाना, अर्थात् ऊँट, जो पागुर तो करता है परन्तु चिरे खुर का नहीं होता, इसलिए वह तुम्हारे लिये अशुद्ध ठहरा है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:5 और चट्टानी बिज्जू, जो पागुर तो करता है परन्तु चिरे खुर का नहीं होता, वह भी तुम्हारे लिये अशुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:6 और खरगोश, जो पागुर तो करता है परन्तु चिरे खुर का नहीं होता, इसलिए वह भी तुम्हारे लिये अशुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:7 और सूअर, जो चिरे अर्थात् फटे खुर का होता तो है परन्तु पागुर नहीं करता, इसलिए वह तुम्हारे लिये अशुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:8 इनके माँस में से कुछ न खाना, और इनकी लोथ को छूना भी नहीं; ये तो तुम्हारे लिये अशुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:9 ¶ “फिर जितने जलजन्तु हैं उनमें से तुम इन्हें खा सकते हों, अर्थात् समुद्र या नदियों के जल जन्तुओं में से जितनों के पंख और चोंयेटे होते हैं उन्हें खा सकते हो। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:10 और जलचरी प्राणियों में से जितने जीवधारी बिना पंख और चोंयेटे के समुद्र या नदियों में रहते हैं वे सब तुम्हारे लिये घृणित हैं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:11 वे तुम्हारे लिये घृणित ठहरें; तुम उनके माँस में से कुछ न खाना, और उनकी लोथों को अशुद्ध जानना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:12 जल में जिस किसी जन्तु के पंख और चोंयेटे नहीं होते वह तुम्हारे लिये अशुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:13 ¶ “फिर पक्षियों में से इनको अशुद्ध जानना, ये अशुद्ध होने के कारण खाए न जाएँ, अर्थात् उकाब, हड़फोड़, कुरर, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:14 चील, और भाँति-भाँति के बाज, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:15 और भाँति-भाँति के सब काग, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:16 शुतुर्मुर्ग, तखमास, जलकुक्कट, और भाँति-भाँति के जलकुक्कट, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:17 हबासिल, हाड़गील, उल्लू, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:18 राजहँस, धनेश, गिद्ध, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:19 सारस, भाँति-भाँति के बगुले, टिटीहरी और चमगादड़। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:20 ¶ “जितने पंखवाले कीड़े चार पाँवों के बल चलते हैं वे सब तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:21 पर रेंगनेवाले और पंखवाले जो चार पाँवों के बल चलते हैं, जिनके भूमि पर कूदने फाँदने को टाँगें होती हैं उनको तो खा सकते हो। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:22 वे ये हैं, अर्थात् भाँति-भाँति की टिड्डी, भाँति-भाँति के फनगे, भाँति-भाँति के झींगुर, और भाँति-भाँति के टिड्डे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:23 परन्तु और सब रेंगनेवाले पंखवाले जो चार पाँव वाले होते हैं वे तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:24 ¶ “इनके कारण तुम अशुद्ध ठहरोगे; जिस किसी से इनकी लोथ छू जाए वह सांझ तक अशुद्ध ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:25 और जो कोई इनकी लोथ में का कुछ भी उठाए वह अपने वस्त्र धोए और सांझ तक अशुद्ध रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:26 फिर जितने पशु चिरे खुर के होते हैं परन्तु न तो बिलकुल फटे खुर और न पागुर करनेवाले हैं वे तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं; जो कोई उन्हें छूए वह अशुद्ध ठहरेगा। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:27 और चार पाँव के बल चलनेवालों में से जितने पंजों के बल चलते हैं वे सब तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं; जो कोई उनकी लोथ छूए वह सांझ तक अशुद्ध रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:28 और जो कोई उनकी लोथ उठाए वह अपने वस्त्र धोए और सांझ तक अशुद्ध रहे; क्योंकि वे तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:29 “और जो पृथ्वी पर रेंगते हैं उनमें से ये रेंगनेवाले तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं, अर्थात् नेवला, चूहा, और भाँति-भाँति के गोह, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:30 और छिपकली, मगर, टिकटिक, सांडा, और गिरगिट। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:31 सब रेंगनेवालों में से ये ही तुम्हारे लिये अशुद्ध हैं; जो कोई इनकी लोथ छूए वह सांझ तक अशुद्ध रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:32 और इनमें से किसी की लोथ जिस किसी वस्तु पर पड़ जाए वह भी अशुद्ध ठहरे, चाहे वह काठ का कोई पात्र हो, चाहे वस्त्र, चाहे खाल, चाहे बोरा, चाहे किसी काम का कैसा ही पात्र आदि क्यों न हो; वह जल में डाला जाए, और सांझ तक अशुद्ध रहे, तब शुद्ध समझा जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:33 और यदि मिट्टी का कोई पात्र हो जिसमें इन जन्तुओं में से कोई पड़े, तो उस पात्र में जो कुछ हो वह अशुद्ध ठहरे, और पात्र को तुम तोड़ डालना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:34 उसमें जो खाने के योग्य भोजन हो, जिसमें पानी का छुआव हो वह सब अशुद्ध ठहरे; फिर यदि ऐसे पात्र में पीने के लिये कुछ हो तो वह भी अशुद्ध ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:35 और यदि इनकी लोथ में का कुछ तंदूर या चूल्हे पर पड़े तो वह भी अशुद्ध ठहरे, और तोड़ डाला जाए; क्योंकि वह अशुद्ध हो जाएगा, वह तुम्हारे लिये भी अशुद्ध ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:36 परन्तु सोता या तालाब जिसमें जल इकट्ठा हो वह तो शुद्ध ही रहे; परन्तु जो कोई इनकी लोथ को छूए वह अशुद्ध ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:37 और यदि इनकी लोथ में का कुछ किसी प्रकार के बीज पर जो बोने के लिये हो पड़े, तो वह बीज शुद्ध रहे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:38 पर यदि बीज पर जल डाला गया हो और पीछे लोथ में का कुछ उस पर पड़ जाए, तो वह तुम्हारे लिये अशुद्ध ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:39 “फिर जिन पशुओं के खाने की आज्ञा तुमको दी गई है यदि उनमें से कोई पशु मरे, तो जो कोई उसकी लोथ छूए वह सांझ तक अशुद्ध रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:40 और उसकी लोथ में से जो कोई कुछ खाए वह अपने वस्त्र धोए और सांझ तक अशुद्ध रहे; और जो कोई उसकी लोथ उठाए वह भी अपने वस्त्र धोए और सांझ तक अशुद्ध रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:41 ¶ “सब प्रकार के पृथ्वी पर रेंगनेवाले जन्तु घिनौने हैं; वे खाए न जाएँ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:42 पृथ्वी पर सब रेंगनेवालों में से जितने पेट या चार पाँवों के बल चलते हैं, या अधिक पाँव वाले होते हैं, उन्हें तुम न खाना; क्योंकि वे घिनौने हैं। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:43 तुम किसी प्रकार के रेंगनेवाले जन्तु के द्वारा अपने आप को घिनौना न करना; और न उनके द्वारा अपने को अशुद्ध करके अपवित्र ठहराना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:44 क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ; इस कारण अपने को शुद्ध करके पवित्र बने रहो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ। इसलिए तुम किसी प्रकार के रेंगनेवाले जन्तु के द्वारा जो पृथ्वी पर चलता है अपने आप को अशुद्ध न करना। (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:45 क्योंकि मैं वह यहोवा हूँ जो तुम्हें मिस्र देश से इसलिए निकाल ले आया हूँ कि तुम्हारा परमेश्‍वर ठहरूँ; इसलिए तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:46 पशुओं, पक्षियों, और सब जलचरी प्राणियों, और पृथ्वी पर सब रेंगनेवाले प्राणियों के विषय में यही व्यवस्था है, (IN)

लैव्यव्यवस्था 11:47 कि शुद्ध अशुद्ध और भक्ष्य और अभक्ष्य जीवधारियों में भेद किया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:2 “इस्राएलियों से कह: जो स्त्री गर्भवती हो और उसके लड़का हो, तो वह सात दिन तक अशुद्ध रहेगी; जिस प्रकार वह ऋतुमती होकर अशुद्ध रहा करती। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:3 और आठवें दिन लड़के का खतना किया जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:4 फिर वह स्त्री अपने शुद्ध करनेवाले रूधिर में तैंतीस दिन रहे; और जब तक उसके शुद्ध हो जाने के दिन पूरे न हों तब तक वह न तो किसी पवित्र वस्तु को छूए, और न पवित्रस्‍थान में प्रवेश करे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:5 और यदि उसके लड़की पैदा हो, तो उसको ऋतुमती की सी अशुद्धता चौदह दिन की लगे; और फिर छियासठ दिन तक अपने शुद्ध करनेवाले रूधिर में रहे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:6 “जब उसके शुद्ध हो जाने के दिन पूरे हों, तब चाहे उसके बेटा हुआ हो चाहे बेटी, वह होमबलि के लिये एक वर्ष का भेड़ का बच्चा, और पापबलि के लिये कबूतरी का एक बच्चा या पिंडुकी मिलापवाले तम्बू के द्वार पर याजक के पास लाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:7 तब याजक उसको यहोवा के सामने भेंट चढ़ाकर उसके लिये प्रायश्चित करे; और वह अपने रूधिर के बहने की अशुद्धता से छूटकर शुद्ध ठहरेगी। जिस स्त्री के लड़का या लड़की उत्‍पन्‍न हो उसके लिये यही व्यवस्था है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 12:8 और यदि उसके पास भेड़ या बकरी देने की पूँजी न हो, तो दो पिंडुकी या कबूतरी के दो बच्चे, एक तो होमबलि और दूसरा पापबलि के लिये दे; और याजक उसके लिये प्रायश्चित करे, तब वह शुद्ध ठहरेगी।” (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:1 ¶ फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:2 “जब किसी मनुष्य के शरीर के चर्म में सूजन या पपड़ी या दाग हो, और इससे उसके चर्म में कोढ़ की व्याधि के समान कुछ दिखाई पड़े, तो उसे हारून याजक के पास या उसके पुत्र जो याजक हैं, उनमें से किसी के पास ले जाएँ। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:3 जब याजक उसके चर्म की व्याधि को देखे, और यदि उस व्याधि के स्थान के रोएँ उजले हो गए हों और व्याधि चर्म से गहरी दिखाई पड़े, तो वह जान ले कि कोढ़ की व्याधि है; और याजक उस मनुष्य को देखकर उसको अशुद्ध ठहराए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:4 पर यदि वह दाग उसके चर्म में उजला तो हो, परन्तु चर्म से गहरा न देख पड़े, और न वहाँ के रोएँ उजले हो गए हों, तो याजक उसको सात दिन तक बन्द करके रखे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:5 और सातवें दिन याजक उसको देखे, और यदि वह व्याधि जैसी की तैसी बनी रहे और उसके चर्म में न फैली हो, तो याजक उसको और भी सात दिन तक बन्द करके रखे; (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:6 और सातवें दिन याजक उसको फिर देखे, और यदि देख पड़े कि व्याधि की चमक कम है और व्याधि चर्म पर फैली न हो, तो याजक उसको शुद्ध ठहराए; क्योंकि उसके तो चर्म में पपड़ी है; और वह अपने वस्त्र धोकर शुद्ध हो जाए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:7 पर यदि याजक की उस जाँच के पश्चात् जिसमें वह शुद्ध ठहराया गया था, वह पपड़ी उसके चर्म पर बहुत फैल जाए, तो वह फिर याजक को दिखाया जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:8 और यदि याजक को देख पड़े कि पपड़ी चर्म में फैल गई है, तो वह उसको अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह कोढ़ ही है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:9 “यदि कोढ़ की सी व्याधि किसी मनुष्य के हो, तो वह याजक के पास पहुँचाया जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:10 और याजक उसको देखे, और यदि वह सूजन उसके चर्म में उजली हो, और उसके कारण रोएँ भी उजले हो गए हों, और उस सूजन में बिना चर्म का माँस हो, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:11 तो याजक जाने कि उसके चर्म में पुराना कोढ़ है, इसलिए वह उसको अशुद्ध ठहराए; और बन्द न रखे, क्योंकि वह तो अशुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:12 और यदि कोढ़ किसी के चर्म में फूटकर यहाँ तक फैल जाए, कि जहाँ कहीं याजक देखे रोगी के सिर से पैर के तलवे तक कोढ़ ने सारे चर्म को छा लिया हो, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:13 तो याजक ध्यान से देखे, और यदि कोढ़ ने उसके सारे शरीर को छा लिया हो, तो वह उस व्यक्ति को शुद्ध ठहराए; और उसका शरीर जो बिलकुल उजला हो गया है वह शुद्ध ही ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:14 पर जब उसमें चर्महीन माँस देख पड़े, तब तो वह अशुद्ध ठहरे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:15 और याजक चर्महीन माँस को देखकर उसको अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वैसा चर्महीन माँस अशुद्ध ही होता है; वह कोढ़ है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:16 पर यदि वह चर्महीन माँस फिर उजला हो जाए, तो वह मनुष्य याजक के पास जाए, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:17 और याजक उसको देखे, और यदि वह व्याधि फिर से उजली हो गई हो, तो याजक रोगी को शुद्ध जाने; वह शुद्ध है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:18 “फिर यदि किसी के चर्म में फोड़ा होकर चंगा हो गया हो, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:19 और फोड़े के स्थान में उजली सी सूजन या लाली लिये हुए उजला दाग हो, तो वह याजक को दिखाया जाए; (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:20 और याजक उस सूजन को देखे, और यदि वह चर्म से गहरा दिखाई पड़े, और उसके रोएँ भी उजले हो गए हों, तो याजक यह जानकर उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह कोढ़ की व्याधि है जो फोड़े में से फूटकर निकली है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:21 परन्तु यदि याजक देखे कि उसमें उजले रोएँ नहीं हैं, और वह चर्म से गहरी नहीं, और उसकी चमक कम हुई है, तो याजक उस मनुष्य को सात दिन तक बन्द करके रखे। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:22 और यदि वह व्याधि उस समय तक चर्म में सचमुच फैल जाए, तो याजक उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह कोढ़ की व्याधि है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:23 परन्तु यदि वह दाग न फैले और अपने स्थान ही पर बना रहे, तो वह फोड़े का दाग है; याजक उस मनुष्य को शुद्ध ठहराए। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:24 “फिर यदि किसी के चर्म में जलने का घाव हो, और उस जलने के घाव में चर्महीन दाग लाली लिये हुए उजला या उजला ही हो जाए, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:25 तो याजक उसको देखे, और यदि उस दाग में के रोएँ उजले हो गए हों और वह चर्म से गहरा दिखाई पड़े, तो वह कोढ़ है; जो उस जलने के दाग में से फूट निकला है; याजक उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि उसमें कोढ़ की व्याधि है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:26 पर यदि याजक देखे, कि दाग में उजले रोएँ नहीं और न वह चर्म से कुछ गहरा है, और उसकी चमक कम हुई है, तो वह उसको सात दिन तक बन्द करके रखे, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:27 और सातवें दिन याजक उसको देखे, और यदि वह चर्म में फैल गई हो, तो वह उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि उसको कोढ़ की व्याधि है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:28 परन्तु यदि वह दाग चर्म में नहीं फैला और अपने स्थान ही पर जहाँ का तहाँ बना हो, और उसकी चमक कम हुई हो, तो वह जल जाने के कारण सूजा हुआ है, याजक उस मनुष्य को शुद्ध ठहराए; क्योंकि वह दाग जल जाने के कारण से है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:29 “फिर यदि किसी पुरुष या स्त्री के सिर पर, या पुरुष की दाढ़ी में व्याधि हो, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:30 तो याजक व्याधि को देखे, और यदि वह चर्म से गहरी देख पड़े, और उसमें भूरे-भूरे पतले बाल हों, तो याजक उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; वह व्याधि सेंहुआँ, अर्थात् सिर या दाढ़ी का कोढ़ है। (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:31 और यदि याजक सेंहुएँ की व्याधि को देखे, कि वह चर्म से गहरी नहीं है और उसमें काले-काले बाल नहीं हैं, तो वह सेंहुएँ के रोगी को सात दिन तक बन्द करके रखे, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:32 और सातवें दिन याजक व्याधि को देखे, तब यदि वह सेंहुआँ फैला न हो, और उसमें भूरे-भूरे बाल न हों, और सेंहुआँ चर्म से गहरा न देख पड़े, (IN)

लैव्यव्यवस्था 13:33 तो यह मनु